चुनावों के 'टेस्ट' में प्रियंका का 'टी-20'

[dc]कां[/dc]ग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया की बेटी और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी अगर थोड़ा और पहले मैदान में कूद जातीं तो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से जहरीली होती चुनावी राजनीति में बहस के मुद्दे कुछ बदल सकते थे, पर वैसा नहीं हुआ। प्रियंका ने एक ऐसे वक्त जुबान खोली है, जब चुनावों को लेकर हवा काफी खराब हो चुकी है। दिल्ली में मतदान के लिए प्रकट होते समय प्रियंका ने जब संक्षिप्त-सी टिप्पणी की थी कि देश में मोदी की कोई लहर नहीं है, तब यही माना गया था कि चूंकि उनसे सवाल ही इस तरह से पूछा गया, इसलिए उसका कोई और जवाब बन भी नहीं सकता था। पर प्रियंका गांधी अपने जिस अवतार में अब प्रस्तुत होकर बयान दे रही हैं, वह कम आश्चर्यचकित करने वाला नहीं है। प्रियंका के ताजा बयान को लेकर यह मानने की भूल भी नहीं करना चाहिए कि उनके द्वारा किया गया हमला अपने चचेरे भाई वरुण गांधी की किसी ताजा कार्रवाई की प्रतिक्रिया में है। प्रियंका वास्तव में अपने परिवार के खिलाफ नरेंद्र मोदी और अन्य भाजपा नेताओं द्वारा किए जा रहे प्रहारों की धार को कमजोर करना चाहती हैं, पर इस सच्चाई को ध्यान में रखते हुए कि वरुण गांधी ने हमलावरों की टीम से अपने आपको हाल-फिलहाल अलग रखा हुआ है। इस हद तक कि उन्होंने राहुल गांधी द्वारा अमेठी में स्वसहायता समूहों के जरिए किए जा रहे काम की सार्वजनिक रूप से तारीफ कर भाजपा में हलचल पैदा कर दी थी। यह बात अलग है कि राहुल के काम की तारीफ के अगले ही दिन वरुण को सफाई भी पेश करना पड़ी।
[dc]प्रि[/dc]यंका गांधी को एक ऐसे समय अपनी मां और भाई की मदद में उतरना पड़ा है, जब कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद के अपने इतिहास में सबसे खराब दौर का गिरते-पड़ते हुए सामना कर रही है। और यह भी कि पार्टी में सत्ता से गायब होने के बाद बनने वाली परिस्थितियों को लेकर खौफ व्याप्त है। अत: वरुण गांधी पर प्रियंका का हमला तो केवल एक बहाना है। प्रियंका वास्तव में चुनाव की लड़ाई के मुद्दों को बदलना चाहती हैं, पर उस काम में देरी हो चुकी है। दूसरे यह कि प्रियंका में अपनी दादी के कुछ गुण अवश्य हो सकते हैं, पर वे वैसी ‘इंदिरा गांधी’ नहीं बन सकतीं, जो जनता पार्टी के प्रयोग को भी विफल कर दें और दो-तिहाई से अधिक के बहुमत के साथ कांग्रेस को सत्ता में वापस भी ले आएं।
[dc]ज[/dc]नता पार्टी के जमाने में या उसके बाद भी राजनीति का इस तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का षड्यंत्र कभी नहीं देखा गया, जिसमें सभी पक्ष बराबरी के साथ अपना योगदान दे रहे हों। जयप्रकाश नारायण की नैतिक सत्ता को चुनौती देने के लिए भी इंदिरा गांधी पवनार (वर्धा) जाकर ‘संत’ विनोबा भावे की ही मदद लेती थीं, किन्हीं धर्मगुरुओं या इमामों के समर्थन के दम पर उन्होंने आपातकाल का बचाव नहीं किया। इस समय तो सभी पार्टियों ने धर्मगुरुओं और इमामों का सत्ता के लिए आपस में बंटवारा कर लिया है। इसलिए जब प्रियंका कहती हैं कि वरुण उनके भाई हैं और वे रास्ते से भटक गए हैं तो उनके कहे का मतलब यही निकलता है कि गांधी परिवार संकट के दौर में ऐसे विकल्प को भी आजमा लेना चाहता है, जो उसके पास कभी था ही नहीं। प्रियंका मानती रहें कि लोकसभा चुनाव एक वैचारिक युद्ध है, कोई पारिवारिक ‘टी पार्टी’ नहीं। हकीकत यही है कि एक लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी, उसके अनेकानेक बेनी प्रसाद और ‘स्वनियुक्त’ प्रवक्ता मोदी के परिदृश्य पर आगमन का मजाक उड़ाते रहे और अहंकार की शतरंज पर एकतरफा चालें चलते रहे। कांग्रेस ने पहले ही दिन से न तो चुनावों को वैचारिक लड़ाई बनने दिया और न ही कभी मुद्दों की परवाह की। धर्मगुरुओं और इमामों के हाथों में चुनावों का भविष्य पहुंच जाने के बाद जब वरुण गांधी को सही रास्ते पर लाने के बहाने प्रियंका वैचारिक युद्ध की बात करती हैं और यह कहती हैं कि परिवार के साथ विश्वासघात हुआ है तो उनके कहे में सच्चाई के मुकाबले भय ज्यादा नजर आता है। मोदी के खिलाफ राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ी जाने वाली ‘कांग्रेस पार्टी की लड़ाई’ प्रियंका के प्रवेश के बाद ‘गांधी परिवार की लड़ाई’ में बदलती नजर आती है। अत: समझा जा सकता है कि प्रियंका इस काम में वरुण को भी ‘परिवार’ के साथ जोड़ना चाहती हैं।
[dc]प्रि[/dc]यंका गांधी के साथ दिक्कत यह है कि वे रायबरेली और अमेठी को ही देश समझते रहना चाहती हैं। प्रत्येक चुनाव के मौके पर सीमित ओवरों की पारी खेलकर वे टेस्ट मैच का परिणाम अपनी पार्टी और परिवार के पक्ष में देखने की मंशा रखती हैं। पिछले चुनाव में भी उन्होंने ऐसी ही पारी खेली थी। और प्रत्येक चुनाव में कांग्रेस पार्टी के नेताओं का एक समूह भी प्रियंका की सक्रिय भूमिका का नारा बुलंद करता है और वोटों की गिनती के बाद सबकुछ ठंडा पड़ जाता है।
[dc]व[/dc]रुण गांधी की मां और इंदिरा गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका गांधी का यह मानना सही हो सकता है कि वरुण गांधी को लेकर प्रियंका की टिप्पणी से ‘नर्वसनेस’ जाहिर होती है। गांधी परिवार इस बात से नहीं डर रहा है कि कांग्रेस को विपक्ष की बेंचों पर बैठना पड़ेगा। वह डर इस बात से रहा है कि नरेंद्र मोदी को ‘माननीय प्रधानमंत्री जी’ के रूप में संबोधित करना पड़ सकता है। गुजरात अगर रोल मॉडल है तो गांधी परिवार यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि ‘माननीय प्रधानमंत्री जी’ बदले की भावना से काम नहीं करेंगे। साध्वी उमा भारती ने रायबरेली से चुनाव लड़ने से तो इनकार कर दिया था (उनका कहना था कि वे रायबरेली के लिए झांसी की सीट नहीं छोड़ेंगी), पर वे कह रही हैं कि एनडीए के सत्ता में आने के बाद सोनियाजी के जवांई की जगह जेल में होगी। प्रियंका अगर वास्तव में ठान लें कि राजनीति की फिल्म में वे इंदिरा गांधी का रोल निभाने के लिए तैयार हैं और अमेठी और रायबरेली से बाहर निकलकर देश को समझना चाहती हैं, तो चीजें बदल सकती हैं। देखना यही है कि वरुण के मार्फत प्रियंका ने मोदी और भाजपा के खिलाफ जो ‘वैचारिक युद्ध’ शुरू किया है, उसे चुनावों के बाद वे सुल्तानपुर से आगे कितनी दूरी तक ले जाने की तैयारी रखती हैं।

जूते और थप्पड़ के बीच का फर्क?

[dc]अ[/dc]रविंद केजरीवाल को इस तरह के सोच में पड़ने की जरूरत नहीं कि उन्हें थप्पड़ क्यों मारे जा रहे हैं, उन पर स्याही और अंडे क्यों फेंके जा रहे हैं। उन्हें पूछने का हक है कि जो कुछ भी उनके साथ हो रहा है, वैसा किसी और नेता के साथ क्यों नहीं हो रहा! मसलन क्या किसी की भी हिम्मत हो सकती है कि सोनिया गांधी, नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी या ममता, मुलायम और जयललिता की रैलियों या सभाओं में ‘जिंदाबाद’ के अलावा और कोई आवाज भी निकाल सके! ‘अनुभवी’ कांग्रेसी और भाजपाई नेताओं का कहना है कि केजरीवाल ने जनता को धोखा दिया है, इसलिए उनके साथ ऐसा हो रहा है। ये नेता यह भी कह रहे हैं कि मीडिया में बने रहने के लिए केजरीवाल स्वयं थप्पड़ लगवा रहे हैं। अमित शाह, वसुंधरा राजे, इमरान मसूद, बेनी प्रसाद और आजम खान जिस तरह की भाषा और धमकियों का इस समय इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके चलते तो केजरीवाल को मान लेना चाहिए कि वे सस्ते में छूट रहे हैं। हरियाणा के साथ दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों के लिए कल (गुरुवार को) वोट पड़ने हैं, इसलिए केजरीवाल के साथ जो कुछ भी हो रहा है, उसे आम आदमी पार्टी के मतदान-पूर्व की तैयारियों का ही हिस्सा समझ लिया जाना चाहिए। दिल्ली में मोदी, राहुल गांधी और केजरीवाल तीनों की नाक दांव पर लगी है। आम आदमी पार्टी का तो समूचा भविष्य दिल्ली के परिणामों पर टिका है। केजरीवाल पर होने वाले हमलों का अगर किसी षड्यंत्र से संबंध नहीं है तो आम आदमी पार्टी के नेता को मान लेना चाहिए कि अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए जनता इस तरह के प्रयोग आगे भी करती रहेगी। मसलन 1984 के दंगों के दोषियों को सजा मिलने में हो रहे विलंब को लेकर जब पत्रकार जरनैल सिंह ने तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर जूता फेंका था, तब केजरीवाल ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आने वाले वक्त में वे कोई राजनीतिक पार्टी भी बनाएंगे और जरनैल सिंह को अपनी आम आदमी पार्टी का टिकट देकर दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़वाएंगे। पी. चिदंबरम इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं और जरनैल सिंह जीतने की तैयारी में हैं।
[dc]के[/dc]जरीवाल राजघाट पहुंचकर उन पर बार-बार होने वाले हमलों के पीछे के ‘मास्टरमाइंड’ का पता लगाना चाहते हैं। पर इसका पता चलना उतना ही मुश्किल है, जितना इस बात का अंदाजा लग पाना कि केजरीवाल इस तरह के हमलों के बाद कितने विचलित होते हैं। हो यह गया है कि अण्णा हों या अरविंद केजरीवाल, जनता अब किसी भी नेता के बापू की समाधि पर बैठकर चिंतन करने से प्रभावित नहीं होती। आम आदमी पार्टी अगर लोकसभा चुनावों में कोई बड़ा उलटफेर करने में कामयाब हो जाती है तो आरोपों-प्रत्यारोपों की भाषा भी बदल जाएगी और हमलों के सरगना की तलाश भी ठंडी पड़ जाएगी।

'फतवा', मोदी की मदद में तो नहीं!

[dc]दि[/dc]ल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने कांग्रेस के हक में ‘फतवा’ जारी कर दिया है। कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने के लिए मुसलमानों को प्रेरित करने को इमाम ‘फतवा’ करार देने से इनकार करते हैं। वे इसे अपनी ‘राय’ जाहिर करना बताते हैं। इमाम की ‘अपील’ से कांग्रेस का एक बड़ा काम पूरा हो गया है। काम की शुरुआत उनके और श्रीमती सोनिया गांधी के बीच उस बहुचर्चित मुलाकात से हुई थी, जिसमें कहा गया था कि ‘धर्मनिरपेक्ष-मुस्लिमों’ का वोट बंटना नहीं चाहिए। मुलाकात की बुनियाद इमरान मसूद ने सहारनपुर में पहले ही रख दी थी। इमाम के कहे का देश के मुस्लिमों पर कितना असर होने वाला है, यह तो 16 मई को ही पता चलेगा, पर कांग्रेस ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी अगर सत्ता में आते हैं तो वह उन्हें उस ‘धर्मनिरपेक्षता’ के रास्ते पर कतई नहीं चलने देगी, जिस पर कि वे चलते हुए दिखाई पड़ना चाहते हैं। कांग्रेस के काम में इमाम भी साथ देने को तैयार हो गए हैं। कांग्रेस के निशाने पर इस समय उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल है। इमाम की ‘अपील’ ने यह भी संकेत दे दिया है कि चुनावों के बाद ममता बनर्जी कांग्रेस का साथ देने वाली हैं और मायावती एनडीए में जाने वाली हैं। उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों के सिलसिले में इमाम की अपील का मतलब यही है कि वहां के लगभग बीस प्रतिशत मुसलमान अपना वोट न तो मुलायम को दें और न ही मायावती को। इसी प्रकार बिहार के मुस्लिमों के लिए भी इमाम का यही संदेश है कि वे वहां लालू यादव की पार्टी को वोट दें। पश्चिम बंगाल में ममता की पार्टी को वोट दिया जाना है। कांग्रेस जो काम स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पैंसठ से अधिक वर्षों में ‘सार्वजनिक’ रूप से नहीं कर पाई, वह 4 अप्रैल 2014 को पूरा हो गया। कांग्रेस ने सत्ता के लिए सीमाओं के बाद देश की आत्मा का भी विभाजन संपन्न् करवा दिया। सोनिया गांधी और इमाम का सम्मिलित संदेश यही माना जा सकता है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ हिंदू चाहें तो अपना वोट मोदी की पार्टी को दे दें, ‘धर्मनिरपेक्ष’ मुस्लिम तो कांग्रेस के साथ ही रहेंगे। बाबरी मस्जिद को लेकर किए गए स्टिंग ऑपरेशन के वीडियो के जारी होने को इमाम की ‘अपील’ के समय के साथ भी जोड़कर देखा जा सकता है। इस सुलभ ‘संयोग’ से अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2014 की लड़ाई कांग्रेस के लिए इतनी बड़ी बन गई है कि वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है। कांग्रेस पार्टी, ‘धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं’ का वोट तो बंटने देना चाहती है, पर ‘धर्मनिरपेक्ष मुस्लिमों’ का नहीं।
[dc]कां[/dc]ग्रेस अगर अपनी ‘ध्रुवीकरण’ योजना में सफल नहीं हो पाती है तो चुनावों के बाद देश की जनता का वह अपने किस चेहरे के साथ सामना करने की तैयारी रखती है, यह भी साफ होना चाहिए। हकीकत तो यह है कि इमाम बुखारी की घोषणा ने कांग्रेस के प्रति आम जनता के बीच पैदा होती सहानुभूति की बची हुई लहर को भी नेस्तनाबूद कर दिया है। यह भी माना जा सकता है कि कांग्रेस का पूरा ‘गेमप्लान’ वास्तव में नरेंद्र मोदी की सीटें बढ़वाने के लिए ही तैयार करवाया गया था। इमाम के ‘फतवे’ के सही जवाब के लिए देश के मुसलमानों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा की जा सकती है।

राहुल की कांग्रेस और वरुण की भाजपा!

[dc]रा[/dc]हुल गांधी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे अपना सहारनपुर दौरा रद्द कर देते। उनमें यह भी दम नहीं था कि कांग्रेस के लोकसभा उम्मीदवार इमरान मसूद ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ जो कुछ भी अप्रिय कहा उसकी वे सार्वजनिक रूप से भर्त्सना कर देते। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ने तो इमरान मसूद का बचाव करते हुए पूरे मामले को यह कहते हुए दफन कर दिया कि हमें किसी के भी लिए ‘कठोर’ शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। राहुल गांधी जानते थे कि सहारनपुर संसदीय क्षेत्र में कोई एक तिहाई मतदाता मुस्लिम हैं। वे यह भी जानते हैं कि समूचे उत्तरप्रदेश में लगभग बीस प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं जो कांग्रेस की सीटों का गणित बना-बिगाड़ सकते हैं। इस समय एक-एक सीट के लिए मोहताज राहुल गांधी अगर सहारनपुर नहीं जाते और नरेंद्र मोदी के टुकड़े-टुकड़े कर देने की बात करने वाले इमरान मसूद को पार्टी से अलग करने की हिम्मत दिखा देते तो फिर उसके परिणामों का अंदाजा लगाना भी उनके लिए कठिन नहीं था। राहुल गांधी की इसी मजबूरी के चलते ही जेल भेजे जाने के दौरान भी इमरान मसूद को अपने कहे के लिए कोई पश्चाताप नहीं था। उसने साफ कहा कि वह न तो मोदी से या भाजपा से कोई माफी मांगेगा। वह सौ मर्तबा भी जेल जाने को तैयार है। उत्तरप्रदेश कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष नेता रीता बहुगुणा दावा करती हैं कि इमरान मसूद एक जीतने वाला उम्मीदवार है। कांग्रेस को इस समय जीत दर्ज कराने वालों की ही दरकार है। निश्चित ही इमरान चुनाव जीतने के बाद संसद में राहुल गांधी से हाथ मिलाने के साथ-साथ नरेंद्र मोदी से भी आंखें मिलाना चाहेगा। इमरान मसूद अब कांग्रेस पार्टी का नया हीरो है। कांग्रेस से अगर ईमानदारी से पूछताछ की जाए तो उसे इमरान मसूद जैसी शख्सियत की इस समय सख्त जरूरत थी जो उसके ‘मौत के सौदागर’ वाले नारे को और भी आक्रामक तरीके से आगे ले जा सके।
[dc]ड[/dc]र पहले यह दिखाया जा रहा था कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी तो मतदाताओं का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करना चाह रही है पर राहुल गांधी की नई कांग्रेस अब एक असली धर्म निरपेक्ष और पारदर्शी चेहरे के साथ चुनावों में उतरना चाहती है। पर हो यह रहा है कि कांग्रेस और ज्यादा नकली साबित होकर उभर रही है। मतदाताओं का जो ध्रुवीकरण कांग्रेस करना मांग रही है वह और भी ज्यादा खतरनाक साबित होने वाला है। भारतीय जनता पार्टी के नेता और राहुल के चचेरे भाई वरुण गांधी ने भी जब कुछ समय पहले लगभग इमरान मसूद जैसी ही भाषा का इस्तेमाल किया था तब देश को काफी कंपकंपी छूटी थी। भारतीय जनता पार्टी ने तब बचाव में पूरी तरह से सन्नाटा ओढ़ लिया था। श्रीराम सेना के प्रमोद मुतालिक को पार्टी में शामिल करने का प्रयास भी भाजपा के कट्टरपंथी चेहरे को ही उजागर करने वाला था। पर पार्टी ने समय रहते अपनी गलती सुधार ली।
[dc]अ[/dc]ण्णा हजारे के आंदोलन और ‘आम आदमी पार्टी’ के उदय के बाद देश को उम्मीदें बंधी थी कि नई लोकसभा का चेहरा अब शालीन, ईमानदार और पारदर्शी चरित्र वाले प्रतिनिधियों की उपस्थिति से मिलकर बनेगा पर वैसा होता नजर नहीं आ रहा। लोकसभा में कांग्रेस की बेंचों पर नंदन नीलकेणि के साथ अब इमरान मसूद बैठने वाले हैं। ऐसा ही कुछ नजारा भाजपा में भी दिखने वाला है। राजनीति का तालीबानीकरण भी किया जा रहा है और जनता से भारी संख्या में मतदान में भाग लेने की अपीलें की जा रही है।

भाजपा के भीतर की ‘परिवर्तन यात्रा’

[dc]ला[/dc]लकृष्ण आडवाणी की उम्मीदवारी को लेकर उत्पन्न हुआ संकट भारतीय जनता पार्टी के किसी नए विवाद में उलझने तक के लिए टल गया माना जाना चाहिए था, पर वैसा नहीं हुआ। वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने नया विवाद शुरू कर भी दिया है। राजनाथ सिंह की चेन्नई यात्रा के दौरान की गई इस घोषणा के बाद कि आडवाणीजी गांधीनगर या भोपाल कहीं से भी लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं। पितृपुरुष ने फैसला गांधीनगर के पक्ष में सुनाया, जो कि उनकी संघ के नेताओं से हो चुकी बैठक के परिप्रेक्ष्य में अपेक्षित भी था। राजनाथ सिंह चाहते तो जो दरियादिली उन्होंने चेन्नई पहुंचकर दिखाई, वह वे आडवाणी की उम्मीदवारी के पत्तों को सार्वजनिक करने के पहले नई दिल्ली में ही दिखा सकते थे। इससे पार्टी चुनाव-पूर्व की शर्मिंदगी से कुछ वक्त के लिए तो बच जाती। पर चीजें राजनाथ सिंह के हाथों में नहीं थीं। गांधीनगर सीट को लेकर आडवाणी ने अपनी नाराजगी व्यक्त कर पार्टी की सांसों को चाहे चौबीस घंटों तक सफलतापूर्वक रोके रखा हो पर अंत में उन्हें वही करना पड़ा, जो मोदी उनसे चाहते थे।
[dc]य[/dc]ह मान लेना उचित नहीं होगा कि भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा संकट के मूल में केवल गांधीनगर और बाड़मेर की सीटों को लेकर उपजी नाराजगी ही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रिय उपस्थिति में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि सत्ता की भूख में अपनी पूर्व प्रतिबद्धताओं को धता बताकर लोग मधुमक्खियों की तरह दोपहर को भाजपा में शामिल हुए हों और रात तक उन्हें पार्टी का टिकट भी बंट गया हो। नई भाजपा (जिसे कि जसवंत सिंह ‘नकली’ बता रहे हैं) का असली संकट यह है कि अटलबिहारी वाजपेयी जैसे भीष्म पितामही व्यक्तित्व की चुनावी परिदृश्य से गैर-मौजूदगी में उसे आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह जैसे अनुभवी नेताओं की दरकार तो है, पर उतनी भी नहीं जितनी कि ये बुजुर्ग नेता अपनी ओर से ‘नए नेतृत्व’ पर आरोपित करना चाहते हैं। अत: अगर आभास ऐसा जा रहा हो तो कुछ गलत नहीं कि पार्टी को केवल अपने फैसलों पर विश्वसनीयता की मोहर लगवाने भर के लिए घरेलू किस्म के कुछ दादाजी टाइप व्यक्तित्वों की जरूरत है, जिसे पूरी करने से आडवाणी आदि इनकार कर रहे हैं।
[dc]ह[/dc]कीकत यह है कि भारतीय जनता पार्टी की आत्मा अब अपना पुराना चोला छोड़कर नए शरीरों को धारण कर रही है। ये ‘शरीर’ पार्टी की स्थापित परंपराओं और संस्कारों से अलग ‘अंतरजातीय’ और अंतरराष्ट्रीय किस्म के माने जा रहे हैं। पार्टी अपने ‘बड़ों’ की परंपरागत पोशाकों से भी मुक्त होकर फैशन डिजाइनरों के कारखानों में प्रवेश कर रही है। कांग्रेस में भी यही सब चल रहा है, पर इतना मुखर कभी नहीं बन पाया जितना भाजपा में दिख रहा है। पुराने से नए की तरफ कांग्रेस पार्टी ने ट्रांजिशन तो कर लिया, पर वह अपने आपको सामंतवादी आचरण और चापलूसी परंपराओं से निजात नहीं दिला पाई। चुनावों के बाद किसी नई कांग्रेस पार्टी के जन्म की केवल उम्मीद भर ही की जा सकती है। पर यहां फिलहाल चर्चा भाजपा की चल रही है।
[dc]न[/dc]रेंद्र मोदी का संघर्ष वास्तव में अपनी पार्टी के ‘ओल्ड गार्ड्स’ और ‘ओल्ड थॉट्स’ से है। गुजरात में जब मोदी ने केशुभाई सहित तमाम पुराने लोगों और विहिप आदि संगठनों को हाशिए पर खड़ा करने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हस्तक्षेप से अपने आपको मुक्त कर लिया, तब वैसा शोर कभी नहीं मचा, जैसा कि उनके दिल्ली पहुंचने की संभावनाओं के बीच आज मच रहा है। वर्ष 2014 का चुनावी मुकाबला नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों के बीच कम से कम इस एक बात को लेकर तो साफ है कि दोनों ही गेहूं के साफ दानों को घुन लग गए गेहूं से अलग करके अपना नया किचन जमाना चाहते हैं। पर मोदी यह काम कथित तौर पर अपने चिर-परिचित अंदाज में ही पूरा करना चाहते हैं। वे तमाम दाइयां, जो पार्टी की स्थापना के बाद से सारी प्रसूतियां नागपुर के चिकित्सकों की सलाहों पर अभी तक घरों में ही संपन्न करवाती रही हैं, नरेंद्र मोदी की आधुनिक ‘सर्जरी’ का विरोध कर रही हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है।
[dc]मो[/dc]हन भागवत द्वारा ‘नमो जाप’ को लेकर अपने प्रतिनिधियों को बेंगलुरू में दिया गया प्रवचन तथा गांधीनगर सीट को लेकर मचे घमासान में संघ के जाग्रत हस्तक्षेप के बाद इस दिशा में सोचा जा सकता है कि क्या नागपुर ने मोदी की ‘भाजपा परिवर्तन यात्रा’ को लेकर अपनी पेशबंदी शुरू कर दी है? गुजरात अगर मोदी के लिए विकास का ‘रोल मॉडल’ है और वे उसे प्रधानमंत्री बनने के बाद समूचे देश में लागू करना चाहते हैं तो उसकी अनिवार्य जरूरतों में एक यह भी हो सकती है कि अपनी नई संस्कारित फौज को वे संघ के प्रति प्रतिबद्धताओं से आजाद कर दें। अत: संघ के स्थापित संस्कारों से इतर भाजपा में जो उथल-पुथल इस समय चल रही है, उसे कोई अनायास पैदा हुआ तूफान मानकर नहीं टाला जा सकता। नरेंद्र मोदी ने अपने आपको सफल साबित करने के लिए किसी की भी नाराजगी मोल लेने की क्षमता विकसित कर ली है।
[dc]गौ[/dc]र करने योग्य है कि अयोध्या से कारसेवकों को लेकर लौटने वाली जिस ट्रेन पर गोधरा में हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप गुजरात में 2002 मचा और जिसके लिए नरेंद्र मोदी को बार-बार कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है, वही मोदी राम जन्मभूमि की यात्रा करने के प्रत्येक आमंत्रण को बहुत ही विनम्रतापूर्वक टाल रहे हैं। अयोध्या उनके एजेंडे में नहीं है। वे सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि देश को आज देवालयों के बजाय शौचालयों की ज्यादा जरूरत है।
[dc]न[/dc]रेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के ‘ओरिजिनल नक्शे’ में वर्णित सत्ता की सीमाओं में इतना परिवर्तन कर दिया है कि उनके द्वारा लिए जाने वाले फैसलों को अब जितनी ज्यादा चुनौती दी जाएगी, वे पार्टी के अंदर उतनी ही मजबूती के साथ उभारे जाएंगे। मोदी की सत्ता को पार्टी के भीतर से अब चुनौती नहीं बची है। उन्हें अब अगर कोई चुनौती मिल सकती है तो वह जनता की तरफ से ही होगी, जो कि हाल-फिलहाल उनके ही पक्ष में जाती दिखाई जा रही है। जनता का फैसला चाहे जैसा भी व्यक्त हो, एक बात तय लगती है कि भारतीय जनता पार्टी का ‘चेहरा’ तब तक इतना बदल चुकेगा कि ‘मोदी मार्ग’ पर ही चलते रहना उसकी अनिवार्यता बन जाएगा। वे तमाम लोग जो मोदी के विरोध में आज करवटें बदल रहे हैं, उन्होंने वक्त रहते आंखें खोलकर सच्चाई को भांपने में देर कर दी है।

काशी से भाग न पाएं केजरीवाल

[dc]अ[/dc]रविंद केजरीवाल नरेंद्र मोदी से हकीकत में ही टकराना चाहते हैं या फिर कोई नुक्कड़ नाटक कर रहे हैं? अगर ऐसा सही है तो फिर ‘आम आदमी पार्टी’ के संस्थापक-नेता को 25 मार्च की प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए, जब वे भगवान शंकर के त्रिशूल पर विराजित दुनिया के सबसे प्राचीन शहर वाराणसी में रैली निकालकर जनता से पूछेंगे कि उन्हें वहीं से चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं। काशी और दिल्ली में फर्क है। उतना ही, जितना कि गंगा और यमुना में। दिल्ली की तर्ज का जनमत संग्रह वाराणसी में कारगर साबित नहीं हो सकेगा। मोदी के खिलाफ केजरीवाल का लड़ना अब इसलिए ज्यादा जरूरी हो गया है कि कांग्रेस ने चुनावों से पहले ही गुजरात के मुख्यमंत्री के सामने हथियार डाल दिए हैं। उसे वाराणसी से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए कोई अखिल भारतीय कद का नेता पार्टी में हाल-फिलहाल नहीं दिख रहा है। वाराणसी में मामला इंदिराजी के खिलाफ राजनारायण और सोनिया गांधी केे खिलाफ सुषमा स्वराज के संघर्ष करने जैसा बन रहा है। केजरीवाल का लड़ना इसलिए आवश्यक हो गया है कि वाराणसी में नरेंद्र मोदी को वॉकओवर नहीं मिलना चाहिए। देश को पता चलना चाहिए कि पिछले चुनाव में केवल सत्रह हजार मतों से मुश्किल से जीत दर्ज कराने वाले डॉ. मुरली मनोहर जोशी की सीट से अब नरेंद्र मोदी कितनी बड़ी फतह हासिल करते हैं। वाराणसी यह भी स्थापित करेगा कि बाबा विश्वनाथ की नगरी के लाखों मुस्लिम मतदाता नरेंद्र मोदी को भारत देश का अगला प्रधानमंत्री बनवाने में अपनी किस तरह की भूमिका निभाते हैं। वाराणसी में नरेंद्र मोदी के पक्ष में पड़ने वाला मुस्लिम वोट न सिर्फ उन्हें वर्ष 2002 के अभिशाप से मुक्त करेगा, देश के करोड़ों अल्पसंख्यकों का उनके नेतृत्व में यकीन होने की पुष्टि भी करेगा। साथ ही यह भी कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए अपनी अखिल भारतीय स्वीकृति पर मोहर लगवाने के लिए वाराणसी से श्रेष्ठ और कोई स्थान नहीं हो सकता।
[dc]के[/dc]जरीवाल अगर चाहें तो वाराणसी में नरेंद्र मोदी को ‘सीरियसली’ चुनाव लड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं। अगर वे नई दिल्ली में शीला दीक्षित की तरह ही वाराणसी में मोदी को चुनौती देने में कामयाब हो जाते हैं तो फिर भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राजनीति दोनों का ही इतिहास बदल जाएगा। मोदी के लिए वाराणसी से केवल चुनाव भर जीत लेना या पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा उससे लगे हुए बिहार की सीटों को प्रभावित करना ही बड़ी उपलब्धि नहीं माना जाना चाहिए। असल चुनौती यह है कि मोदी वाराणसी में मतों के ध्रुवीकरण को रोककर देश को कोई नया संदेश देने में कितने कामयाब होते हैं। नरेंद्र मोदी को गुजरात के सुरक्षित अभयारण्यों से बाहर निकालकर उस उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधि बनाना जरूरी है, जिसने कि देश को सबसे अधिक प्रधानमंत्री दिए हैं। राहुल गांधी केवल नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं, जबकि केजरीवाल गुजरात के मुख्यमंत्री के साथ-साथ बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों और ‘बिक चुके’ मीडिया की भी जमकर मुखालफत कर रहे हैं। वाराणसी में केजरीवाल की मोदी से लड़ाई यह भी बताएगी कि देश ‘आम आदमी पार्टी’ की राजनीति को कितनी दूरी तक ले जाने के लिए तैयार है। वाराणसी में केजरीवाल के साथ-साथ देश के मीडिया की विश्वसनीयता भी साबित हो जाएगी।
[dc]मो[/dc]दी को गुजरात से बाहर निकालकर वाराणसी लाना इसलिए भी जरूरी है कि अगर वे गुजरात की सीट को ही अपना सुरक्षा कवच बनाए रखेंगे तो गांधीनगर की हुकूमत से अपने आपको कभी मुक्त नहीं कर पाएंगे, जैसा कि वर्तमान में वे कर रहे हैं। वे भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए तो देशभर में फेरी लगा रहे हैं, पर गुजरात में अपने स्थान पर किसी और नेता को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी उन्होंने अब तक नहीं सौंपी है। इसे उनका असुरक्षा भाव भी माना जा सकता है और यह भी कि उनके द्वारा गुजरात में अपनी सत्ता को ‘डायल्यूट’ करने देने का अर्थ अपने खिलाफ विद्रोह को जान-बूझकर आमंत्रण देना भी हो सकता है। ममता बनर्जी भी ऐसा ही करती रही हैं। वे भी प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं, पर कोलकाता की रायटर्स बिल्डिंग का मोह भी नहीं छोड़ना चाहतीं। भारत सरकार की रेल मंत्री के रूप में उन्होंने अपना सारा कामकाज कोलकाता में बैठकर ही निपटाया। भारतीय जनता पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का काम संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने जो काम सबसे पहले किए, उनमें गुजरात के पूर्व गृह राज्यमंत्री और अपने अत्यंत विश्वस्त सहयोगी अमित शाह को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपना शामिल था। इससे यही पता चलता है कि उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीति में सक्रिय पार्टी के महारथी मोदी का विश्वास अर्जित करने में सफल नहीं रहे। कोई आश्चर्य नहीं अगर अमित शाह के चयन को लेकर मुरली मनोहर जोशी, लालजी टंडन और कलराज मिश्र सहित किसी भी बड़े नेता ने तब उस तरह से आवाज उठाने की हिम्मत नहीं दिखाई, जैसी कि हाल ही में वाराणसी, लखनऊ और कानपुर की सीटों के लिए टिकटों की दावेदारियों को लेकर सुनाई दी।
[dc]अ[/dc]रविंद केजरीवाल का मानना है कि देश की जनता ‘आम आदमी पार्टी’ के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार है। यह उनका एकतरफा भ्रम भी हो सकता है। केजरीवाल अगर वाराणसी में जनमत संग्रह की आड़ लेकर मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने से कन्‍नी काटते हैं तो यह भ्रम 2019 के लोकसभा चुनावों तक भी बना रह सकता है। केजरीवाल ने जो रास्ता अख्तियार किया है, उस पर टिके रहना अब उनकी राजनीतिक मजबूरी बन गया है। उन्होंने अपने चेहरे से ‘आदरणीय अण्णाजी’ के मुखौटे को उतार फेंका है। भारतीय जनता पार्टी के नाम पर अगर इस समय मंच पर केवल नरेंद्र मोदी नजर आते हैं तो आम आदमी पार्टी के नाम पर मंच पर केवल केजरीवाल। मोदी पर आक्रमण राहुल गांधी भी कर रहे हैं और केजरीवाल भी। दोनों का उद्देश्य एक ही है – मोदी को सत्ता में नहीं आने देना। कहा जा सकता है कि राहुल गांधी, आम आदमी पार्टी के नेता के मार्फत भी मोदी के खिलाफ अपनी लड़ाई चलाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में केजरीवाल को वाराणसी के मैदान से भागने नहीं दिया जाना चाहिए।

आडवाणी के साथ शिवराज को भी संदेश!

नरेंद्र मोदी ने पितृपुरुष आडवाणी के लिए गांधीनगर की सीट का फैसला करवाकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को भी संदेश भिजवा दिया है कि शिवराज सिंह चौहान चाहें तो भोपाल सीट को अब भर सकते हैं। मोदी ने बुधवार को साफ जतवा दिया कि अब उन्हीं की चलने वाली है, क्योंकि सरकार बनी तो उन्हें ही उसे चलाना है। आडवाणी भोपाल से चुनाव लड़ना चाहते थे और मोदी उन्हें गांधीनगर से ही छठी बार भी लड़वाकर उपकृत करना चाहते थे। आडवाणी इस बार मोदी के मुकाबले शिवराज के साथ अपना चुनावी भाग्य जोड़ना चाहते थे, जो कि गुजरात के मुख्यमंत्री को मंजूर नहीं था। आडवाणी के गांधीनगर छोड़ने का संदेश मोदी की छवि के खिलाफ जा सकता था कि उनके चलते पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। मोदी के सामने संकट स्वयं की छवि और आडवाणी की प्रत्यक्ष या परोक्ष इच्छा दोनों में से किसी एक पर अपनी अंगुली रखने का था। वो उन्होंने रख दी। आडवाणी के लिए गांधीनगर का फैसला करते समय मोदी को पक्का अंदाज रहा होगा कि बात निकली है तो कुछ दूर तक तो अवश्य ही जाएगी। अब ‘च्वाइस’ आडवाणी के समक्ष छोड़ दी गई है कि वे या तो गांधीनगर स्वीकार करें या फिर चुनाव लड़ने का इरादा ही त्याग दें। पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा करते हुए पार्टी के प्रवक्ताओं ने सबसे पहला नाम नरेंद्र मोदी की वडोदरा सीट का लिया, और दूसरे क्रम पर आडवाणी की सीट की घोषणा की। वाराणसी, लखनऊ और कानपुर के लिए नामों का फैसला करने के वक्त वरिष्ठ नेताओं को पार्टी में उनके भावी स्थान के बारे में संकेत दे दिया गया था। इससे आडवाणी को सबक ले लेना था, जो उन्होंने नहीं लिया। इसके बाद तो वर्ष 2009 में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के पोस्टर ब्वॉय को उनकी हैसियत से परिचित करवा दिया गया। आडवाणीजी ने अभ्यास साध रखा है कि नरेंद्र मोदी उन्हें पहले नाराज करेंगे और फिर पार्टी की छवि और एकता के नाम पर अन्य वरिष्ठ नेता उन्हें आकर मनाएंगे और वे अंतत: मान जाएंगे। नरेंद्र मोदी को गोवा में पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाने और फिर उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते वक्त भी दिल्ली के पृथ्वीराज रोड स्थित लालजी के बंगले पर इसी तरह की गतिविधियों के दरबार सजे थे। पूरी बहस का मुद्दा अब केवल एक बिंदु पर पहुंचकर लटक गया है कि आडवाणी मानेंगे कि नहीं। नहीं मानेंगे तो क्या नरेंद्र मोदी अपना फैसला बदल देंगे? भाजपा के हाल के इतिहास पर भरोसा करना हो तो निर्णय आडवाणी को ही बदलना पड़ सकता है। मोदी को पता है कि उनका संकट जारी रहने वाला है। आडवाणी अगर गांधीनगर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं तो उन्हें जिताना भी पड़ेगा और आगे चलकर इस संकट से भी जूझना है कि अब (उनका) क्या किया जाए?

मजमा न लगे तो मीडिया खराब!

[dc]मी[/dc]डिया को अरविंद केजरीवाल के प्रति अपना गुस्सा थूक देना चाहिए – ऐसी जगह पर, जो झाडू की पहुंच के बाहर हो। मान लेना चाहिए कि केजरीवाल सबकुछ समझ-बूझकर कर रहे हैं। यह उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। केजरीवाल जानते हैं कि वे मीडिया को जितना ज्यादा लतियाएंगे, वे मीडिया वालों की उतनी ही जरूरत बने रहेंगे। ऐसा वे पहली बार नहीं कर रहे हैं। उनकी मानें तो पिछले तीन सालों में मीडिया कई बार बिक चुका है। वे मीडिया की खबरों के लिए भूख और आम जनता की जरूरत को अब अच्छे-से समझ गए हैं। ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन के दौरान जब-जब भीड़ कम हुई, उसका सारा दोष मीडिया के सिर मढ़ा गया। अब कहा जा रहा है कि मीडिया का एक वर्ग मोदी का एजेंडा चला रहा है। केजरीवाल ने कथित तौर पर धमकी दी है कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आई तो वे समूचे षड्यंत्र के खिलाफ जांच बैठाकर दोषी लोगों और मीडियाकर्मियों को जेल में डलवा देंगे। मीडिया पर अंकुश लगाने और मीडियाकर्मियों को जेल में डालने का दु:साहस अंग्रेजों के बाद आपातकाल के दौरान केवल श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने किया था। कांग्रेस की हुकूमत इस समय डूब के कगार पर है और मीडिया में उनके शासनकाल की जमकर आलोचना भी की जा रही है, पर न तो मनमोहन सिंह और न ही सोनिया-राहुल गांधी ने कभी उस तरह के आरोप लगाए, जैसे कि केजरीवाल लगा रहे हैं।
[dc]के[/dc]जरीवाल द्वारा मीडिया को बेईमान साबित करने के पीछे केवल दो कारण हो सकते हैं :
पहले कारण का संबंध केजरीवाल के इस अतिरंजित अहंकार के साथ हो सकता है कि वे अब शिखर पर पहुंच गए हैं और कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र हैं। देश की जनता सड़कों के दोनों ओर खड़ी होकर उनके सम्मान में हाथ हिला रही है, स्टेशनों पर मेटल डिटेक्टर तोड़ रही है, उनकी एक झलक पाने को बेताब है और मीडिया है कि उन्हें सत्ता की प्रतिस्पर्धा में गिन ही नहीं रहा है। सिर्फ मोदी का नाम जप रहा है। मीडिया को भी मोदी के खिलाफ उसी तरह से प्रचार में जुट जाना चाहिए, जैसा कि वे कर रहे हैं। केजरीवाल की नजरों में मीडिया ऐसा इसलिए नहीं कर रहा है, क्योंकि उसका एक वर्ग बिक गया है। आम आदमी पार्टी को यकीन है कि लोकसभा चुनावों में वह बड़ा चमत्कार करने वाली है। ओपिनियन पोल्स चूंकि बिक चुके हैं, इसलिए आम आदमी पार्टी की चुनावी संभावनाओं को कमतर करके दिखा रहे हैं। केजरीवाल को भरोसा है कि जिस तरह से दिल्ली विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी ने चमत्कार किया, वैसा ही लोकसभा चुनावों में भी होगा। चूंकि देश की जनता उनके साथ है, मीडिया की मजबूरी बनी रहेगी कि वह अपनी आलोचना झेलकर भी उन्हें और ‘आप’ को खबरों में बनाए रखे। मीडिया के प्रति केजरीवाल की नाराजगी का दूसरा कारण केवल यही हो सकता है कि प्रतिकूल चुनाव परिणाम आने की स्थिति में सबकुछ मीडिया पर ढोल देने की भूमिका वे अभी से तैयार कर लेना चाहते हैं।
[dc]दु[/dc]र्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि ईमानदार जनता के कंधों पर सवार होकर खड़े किए एक शानदार आंदोलन का इस्तेमाल अरविंद और अण्णा दोनों ही अपने-अपने कारणों से केवल भीड़ जमा करने के लिए करना चाहते हैं और उसके लिए मदद मीडिया से चाहते हैं।

'नमो' के जाप पर 'भागवत' कथा

[dc]प्र[/dc]धानमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नाम का जाप करने के संबंध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने बेंगलुरु में हुई संगठन की प्रतिनिधि सभा में जो कुछ भी कहा, क्या उसकी इस समय इतनी जरूरत थी? चुनावों की पूर्वसंध्या पर एक ऐसे समय, जब समूचे देश में गुजरात के मुख्यमंत्री के नाम की लहर चल रही है, मोहन भागवत का संघ के प्रतिनिधियों को मोदी-केंद्रित उद्बोधन आश्चर्यचकित करने वाला है। चुनावों को लेकर संघ और भाजपा का जितना भी सामर्थ्य दांव पर लगा है, उसे देखते हुए तो अपेक्षा यही की जा सकती थी कि संघ के कार्यकर्ताओं का मोहन भागवत यही आह्वान करेंगे कि ‘नमो-नमो’ का जाप और भी जोर से करो। संघ प्रमुख के उद्बोधन और उसके बाद दिए जा रहे स्पष्टीकरणों से यही ध्वनि उभरती है कि भागवत भारतीय जनता पार्टी के चुनाव ‘प्रचार’ के साथ तो संघ के कार्यकर्ताओं को जोड़े रखना चाहते हैं, पर ‘नमो’ के ‘प्रसार’ से दूरी बनाना चाहते हैं। पर संघ प्रमुख ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में ज्यादा देरी कर दी है। नरेंद्र मोदी, ‘नमो’ के जाप से काफी आगे पहुंच गए हैं। इस बात में संदेह है कि अपने व्यस्त चुनाव प्रचार कार्यक्रम से समय निकालकर पूर्व प्रचारक मोदी नागपुर पहुंचकर मोहन भागवत से उनके बेंगलुरु उद्बोधन के बाद कोई मार्गदर्शन लेना चाहेंगे।
[dc]सं[/dc]घ को कभी ‘शायद’ ऐसी उम्मीद रही होगी कि नरेंद्र मोदी अपने नाम और प्रचार तंत्र की मदद से सीटों का बहुमत प्राप्त करके उसे नागपुर की झोली में डाल देंगे और आगे के दिशानिर्देशों के लिए सरसंघचालक के मार्गदर्शन की प्रतीक्षा करेंगे। पर जो लोग गुजरात के मुख्यमंत्री की ‘व्यक्तिवादी’ प्रचार पद्धति के दर्शक, श्रोता और पाठक हैं, वे जानते हैं कि ऐसी अपेक्षा व्यक्त करने में संघ ने चूक कर दी। संघ के हाथों से छूट रहा है कि : ‘चुनाव हो जाने दो, फिर देख लेंगे कि मोदी का क्या करना है।’ हाल-फिलहाल तो संघ और भाजपा की ज्यादा रुचि मोदी के ‘करिश्मे’ के साथ अपने आपको जोड़े रखने की है। मोदी भी दोनों के ‘स्पर्धी’ नेताओं की इस जरूरत को बखूबी समझते हैं। बेंगलुरु में मोहन भागवत द्वारा व्यक्त भावनाओं को भाजपा नेताओं की पिछले दिनों नई दिल्ली में संपन्न् हुई उस बैठक के साथ भी जोड़कर देखा जा सकता है, जिसमें पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने अपनी वाराणसी सीट से नरेंद्र मोदी को लड़ाए जाने के सवाल पर कथित तौर पर पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से स्पष्टीकरण चाहा था। उसी बैठक से सुषमा स्वराज कथित तौर पर यह कहते हुए उठ खड़ी हुई थीं कि उन्हें किसी अन्य बैठक में भाग लेना है।
[dc]वा[/dc]राणसी सीट पर दिल्ली बैठक में हुई चर्चा के बाद लखनऊ सीट को लेकर लालजी टंडन और कानपुर को लेकर कलराज मिश्र ने भी स्पष्टीकरणों की गुहार लगाई। लखनऊ सीट को लेकर तो राजनाथ सिंह के ही नाम की चर्चा चल रही है। पार्टी के पितृपुरुष पूरे मामले में खामोश हैं। पार्टी में इस समय ‘हाईकमान’ कौन है और कौन किसे स्पष्टीकरण देकर संतुष्ट करने की हैसियत रखता है, इसका स्पष्ट पता नहीं है। मोहन भागवत की यह चिंता असामान्य नहीं कही जा सकती है कि ‘नमो’ के जाप को लेकर वे बेंगलुरु में अगर अपना मौन नहीं तोड़ते तो नरेंद्र मोदी के ‘लार्जर दैन लाइफ साइज’ होते व्यक्तित्व को लेकर पार्टी के बुजुर्ग नेतृत्व और नागपुर के बीच जो खाई बढ़ती जा रही है, वह जिन्नाा प्रकरण से भी ज्यादा गहरी हो जाती। अत: यह भी माना जा सकता है कि मोहन भागवत ने अपना वक्तव्य भाजपा के नाराज नेतृत्व को यही विश्वास दिलाने के लिए दिया हो कि ‘संघ सबकुछ देख और समझ रहा है।’
[dc]दू[/dc]सरी ओर, नरेंद्र मोदी स्वयं के सामने खड़ी हुई चुनौतियों को भी जानते हैं और उन संभावनाओं से भी परिचित हैं, जो चुनाव परिणामों के आने के बाद पार्टी के भीतर से और एनडीए में शामिल दलों की ओर से प्रकट हो सकती हैं। संघ के पूर्व प्रचारक होते हुए भी नरेंद्र मोदी अगर संघ और पार्टी से बड़े दिखाई दे रहे हैं तो इसमें या तो दृष्टिदोष माना जा सकता है या फिर मुख्यमंत्री के रूप में उनके साथ काम करते हुए संघ, पार्टी संगठन व विहिप आदि संगठनों को गुजरात में प्राप्त हुए अनुभवों के दोहराने का भय।
[dc]सं[/dc]घ और भाजपा दोनों ही अलग-अलग और सम्मिलित रूप से भी मानते हैं कि दिल्ली की सत्ता में आने का इससे बेहतर अवसर कोई और नहीं हो सकता और साथ ही यह भी कि नरेंद्र मोदी ही इस सपने को पूरा कर सकते हैं। पर दोनों ही शायद यह भी चाहते हैं कि मोदी इस काम में पार्टी के ही संगठन का और संघ के ही काडर का उपयोग करें। मोहन भागवत तक यह संदेश शायद पहुंचने लगा था कि नरेंद्र मोदी अपने काम में पार्टी के नाम का और स्वयं के द्वारा खड़े किए गए समानांतर काडर का ज्यादा प्रभावकारी तरीके से उपयोग कर रहे हैं।
[dc]मो[/dc]दी इस चुनौती को अच्छे-से समझते हैं कि अगर अकेले के दम पर वे ढाई सौ का चमत्कार नहीं दिखा पाए तो गठबंधन में शामिल दल और मुंडेरों पर बैठी पार्टियां फिर प्रधानमंत्री के पद के लिए किसी ‘सर्वमान्य’ नेता के नाम पर उन्हें चमकाने लगेंगी। अपने-अपने दल छोड़कर भाजपा में शामिल होने वाले ‘राष्ट्रसेवकों’ की ‘भगीरथ’ इच्छा केवल सत्ता प्राप्त करने की ही है। मोदी जानते हैं कि जो दल और दलबदलू उन्हें सहयोग प्रदान कर रहे हैं, वे तो कम से कम संघ के किसी अनुशासन से नहीं बंधे हुए हैं।
[dc]अ[/dc]त: मोहन भागवत जब बेंगलुरु में यह कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजनीतिक दल नहीं है और उसका काम देश के सामने सिर्फ राष्ट्रीय हित के मुद्दे उठाना है तो मान लेना चाहिए कि संघ ने अपनी वर्तमान भूमिका में असामयिक ‘संशोधन’ के साथ-साथ चुनावों के बाद उत्पन्न् हो सकने वाली परिस्थितियों से निपटने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। नरेंद्र मोदी की दिक्कत यह है कि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार को इतने ऊंचे मंच पर पहुंचा दिया है कि संघ की मंशानुसार उसकी ‘हाइट’ कम करने पर वे केवल पार्टी को ही नजर आएंगे, जनता को नहीं।

आकांक्षाएं राष्ट्रीय, राजनीति क्षेत्रीय

[dc]सु[/dc]श्री जयललिता अगर भारत राष्ट्र का प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को पूरा नहीं कर पाती हैं तो इस खतरे के लिए देश को तैयार रहना चाहिए कि वे फिर तमिलनाडु को, अघोषित तौर पर ही सही, एक स्वायत्त ‘तमिल राष्ट्र’ में परिवर्तित करने की हिम्मत जुटा सकती हैं। तमिल अस्मिता के नाम पर तमिलनाडु के क्षेत्रीय दल भी इस काम में उनका साथ दे देंगे और राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां डर के मारे सन्नाटा ओढ़े कांपती हुई खड़ी रह जाएंगी। पिछले साल नवंबर में कोलंबो में हुए राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन (चोगम) के दौरान अगर डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी जयललिता और अन्य तमिल नेताओं के दबाव में न आकर अपनी रीढ़ की हड्डी को झुकाने से इनकार भर ही कर देते तो दिल्ली की सत्ता को चुनौती देने की जो अप्रिय स्थितियां आज बन रही हैं, वे नहीं बनतीं। जयललिता के नेतृत्व में तमिल दलों ने प्रधानमंत्री से तब मांग की थी कि श्रीलंका में तमिलों के साथ हुई ज्यादतियों और मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाओं को देखते हुए वे कोलंबो सम्मेलन का बहिष्कार कर दें और मनमोहन सिंह की बोलती बंद हो गई थी। तमिल धमकी के आगे प्रधानमंत्री ने अंतत: कोलंबो सम्मेलन में भाग नहीं लिया, वे दिल्ली में ही दुबके रहे और विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को अपने स्थान पर भेज दिया। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी कमजोरी के जरिए राष्ट्रमंडल देशों को यही संदेश पहुंचाया कि भारत का केंद्रीय नेतृत्व कितना डरपोक है।
[dc]स[/dc]वाल यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के फैसले पर हाल-फिलहाल के लिए रोक लगा दी है और जयललिता देश के पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को तत्काल रिहा नहीं कर पाएंगी। पर उससे क्या होता है? केंद्र की कमजोर सत्ता को चुनावों की पूर्व संध्या पर चुनौती देकर तमिलनाडु ने बाकी राज्य सरकारों के लिए रास्ता खोल दिया है। आगे चलकर पंजाब से भी मांग उठ सकती है कि बेअंत सिंह की हत्या के गुनहगारों को भी रिहा किया जाए। मौत की सजा पाए लोगों की दया याचिकाओं पर वक्त रहते फैसले करने के बजाय उन पर खादी की चद्दर ढंककर तुष्टिकरण की जो राजनीति कांग्रेस सरकार करती रही, वही अब उस पर भारी पड़ रही है। दबंग राज्य सरकारें केंद्र से अब किसी चीज के लिए प्रार्थना नहीं करतीं, दिल्ली को धमकाती हैं। माफी मंगवाती हैं।
[dc]रा[/dc]जीव गांधी जैसी राष्ट्रीय शख्सियत के हत्यारों की रिहाई के मामले को राज्य के अधिकार क्षेत्र का विषय बनाकर तमिलनाडु सरकार समूचे देश की भावनाओं को क्षेत्रवाद का जूता सुंघाना चाहती है। तमिलनाडु सरकार ने जो कुछ भी किया वह अपनी जगह, जो चीज ज्यादा बेरहमी के साथ उजागर हुई है, वह भारतीय जनता पार्टी सहित तमाम विपक्षी दलों का आचरण है। चारों ओर से प्रहार होने के चौबीस घंटों के बाद भाजपा ने बिना जयललिता या तमिलनाडु सरकार का स्पष्ट तौर पर नाम लिए आतंकवादी कार्रवाई में लिप्त हत्यारों को रिहा करने की पहल की आलोचना भर की। मानवाधिकारों का ढिंढोरा पीटने वाले वामपंथी दल पूरी तरह से खामोश हैं। उन्होंने हाल ही में जयललिता के साथ चुनावी समझौता किया है। बाकी दलों को भी चुनावी गठबंधनों का सांप सूंघ गया है।
[dc]त[/dc]मिलनाडु सरकार के निर्णय के खिलाफ केंद्र की याचिका पर 6 मार्च को या उसके बाद की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट चाहे जो भी फैसला करे, एक बात जो तय है वह यह है कि एक संवेदनशील मुद्दे पर तमिल जनता की भावनाओं को उभारकर अपने पक्ष में करने की जयललिता की रणनीति कुछ हद तक सफल हो गई है। तमिलनाडु की जनता को उन्होंने केंद्र सरकार के विरुद्ध लगभग एकजुट कर दिया है। उसके इस काम में 2-जी की जली द्रमुक भी साथ हो गई है। पर साथ ही, दूसरी ओर जयललिता ने अपने एक कदम से स्वयं के लिए जो नुकसान किया, वह भी कम नहीं। वह यह है कि लोकसभा चुनावों में तात्कालिक लाभ के लिए उन्होंने अपने दूरगामी हितों को दांव पर लगा दिया। राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई की पैरवी कर जयललिता ने कभी कालांतर में समूचे देश की जनता की नेता बनने की संभावनाओं पर आगे बढ़कर पलीता लगवा लिया। नहीं चाहते हुए भी उन्होंने कांग्रेस को यह फायदा पहुंचा दिया कि चुनाव परिणामों की परवाह किए बगैर एक गलत फैसले के खिलाफ राहुल गांधी ने पहली बार कोई स्टैंड तो लिया। केंद्र सरकार ने भी हिम्मत करके सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। ऐसा किया जाना देश के हित में जरूरी भी था। इस बात का जिक्र भी यहां किया जा सकता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली तेरह महीनों की सरकार ने वर्ष 1999 में संसद का विश्वास केवल एक मत से केवल इसलिए खो दिया था कि जयललिता की पार्टी ने अपना समर्थन वापस ले लिया था। अपनी ताजा जरूरतों और नए नेतृत्व के चलते भारतीय जनता पार्टी अगर पंद्रह साल पुराने हादसे को अब भूल जाना चाहती है तो उसकी मजबूरियों पर गौर करते हुए आश्चर्य नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए। भाजपा के लिए वाजपेयी आदर्श पुरुष भी बने रहेंगे और साथ ही जयललिता की राजनीतिक जरूरत भी उसे हमेशा बनी रहेगी। भाजपा उम्मीद नहीं छोड़ेगी कि मोदी की सरकार बनाने में अगर टेके की जरूरत पड़ी तो अन्नाद्रमुक की मदद उसे मिलेगी। कपिल सिब्बल के सवाल उठाने से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अफजल गुरु के लिए फांसी की मांग उठाते रहने वाली भाजपा राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई के मुद्दे पर मुखर होकर क्यों नहीं बोलना चाहती? क्या अरुण जेटली और प्रकाश जावड़ेकर ने उक्त विषय पर जितना कुछ कह दिया, उसे ही पर्याप्त मान लिया जाए?
[dc]पू[/dc]रे एपिसोड की एक उपलब्धि यह अवश्य मानी जा सकती है कि जयललिता कम से कम वर्ष 2014 के चुनावों के लिए तो प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर हो गई हैं। दूसरे यह कि वे किसे समर्थन देंगी, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण अब यह हो गया है कि उनके सहयोग का जोखिम कौन लेना चाहेगा। तेलंगाना को लेकर चल रहा संघर्ष तो आगे-पीछे शांत हो जाएगा, पर जयललिता ने जिस लड़ाई की शुरुआत की है, वह लंबी चल सकती है।