'विपक्ष' के 'सरकार' बन जाने तक प्रतीक्षा कीजिए!

[dc]भा[/dc]रतीय राजनीति के पिछले डेढ़ दशक का लेखा-जोखा अगर खंगालें तो अरुण जेटली ने अटलजी की सरकार के मंत्री के रूप में वर्ष 1999 से 2004 के बीच कई मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। इनमें सूचना एवं प्रसारण, विनिवेश, कानून, न्याय और कंपनी मामले, उद्योग एवं वाणिज्य, जहाजरानी आदि मंत्रालय शामिल हैं। पर वित्त से अरुण जेटली का संबंध इस तरह का ज्यादा रहा कि राज्यसभा में भाजपा के सदस्य-नेता के रूप में वे बहुत ही अधिकारपूर्ण तरीके से 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के बजटों की धज्जियां उड़ाते रहे। शायद इसीलिए एनडीए के ताकतवर वित्त मंत्री के रूप में जब अरुण जेटली गुरुवार को मोदी सरकार का पहला (अंतरिम) बजट पेश कर रहे थे, तब पूरी तरह से सहज नहीं नजर आ रहे थे। वे बजट भाषण ‘पढ़’ रहे थे। शब्द ‘स्लिप’ भी हो रहे थे। वाक्य टूट भी रहे थे। वे पानी भी पी रहे थे। और फिर (स्वास्थ्य संबंधी कारणों से) बीच में पांच मिनट का ब्रेक भी स्पीकर की अनुमति से लिया गया। बजट भाषण के बीच न तो कविताएं या शेर-ओ-शायरी हुई और न ही विपक्ष की ओर से भी वैसा कोई शोर-शराबा और हल्ला मचा, जैसा यूपीए के कार्यकाल में भाजपा और दूसरी विपक्षी पार्टियां करती थीं। इस बार वैसे भी कोई विपक्ष संसद में नहीं बचा है।
[dc]वि[/dc]त्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली के समक्ष तीन बड़ी चुनौतियां थीं जिनके कि बीच उन्हें कोई दुर्घटना किए बिना अपना बजट भाषण पूरा करना था। पहली चुनौती तो यह थी कि यूपीए द्वारा विरासत में छोड़ी गई सरकार की दुर्बल माली हालत को देखते हुए जेटली राहतों के गुब्बारे हवा में उड़ाने की हालत में नहीं थे। दूसरी यह कि देश को ‘अच्छे दिन आएंगे’ की मीनार पर चढ़ा देने के बाद योजनाओं के लिए धन जुटाने के नाम पर जनता पर किसी तरह के कर वे नहीं लाद सकते थे। मनरेगा जैसी योजनाओं के कारण ”मजदूरों की कमी हो जाने या मजदूरी की दरें बढ़ जाने” के तर्कों के बावजूद योजना को संशोधनों के साथ बजट में जारी रखा गया है। सामाजिक क्षेत्र में आवंटन को कम करने या ‘युक्तिसंगत’ बनाने की जोखिम भी नहीं उठाई गई। तीसरी चुनौती जेटली के समक्ष इस तरह का कोई भी इंप्रेशन ‘नहीं’ छोड़ने की थी कि मोदी सरकार ने अपना बजट उद्योग जगत को समर्पित कर दिया। बजट के बाद शेयर बाजार का उतरा हुआ चेहरा इसका गवाह भी है। जेटली ने तीनों ही चुनौतियों को कुशलतापूर्वक निपटाने की कोशिश की। अत: बजट को पैंतालीस दिनों की सरकार की आने वाले महीनों और सालों में सकारात्मक नीयत की अभिव्यक्ति के तौर पर ही स्वीकार किया जाना चाहिए। उससे ज्यादा नहीं। आश्चर्य नहीं कि जेटली ने अपने किसी भी प्रस्ताव में रेल मंत्री सदानंद गौड़ा की तरह साठ हजार करोड़ की कोई बुलेट ट्रेन नहीं दौड़ाई। अरुण जेटली का बजट इन मायनों में ज्यादा यकीनी और जमीनी कहा जा सकता है कि इसमें अतिरंजना के बजाय अर्थव्यवस्था की हकीकतों पर ज्यादा भरोसा किया गया है। उन बिंदुओं को जोर देकर छुआ गया है, जिनके जरिए आम जनता को तंग किए बगैर देशी और विदेशी पूंजी निवेश की मदद से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले कम से कम किया जाकर सात प्रतिशत की विकास दर पर पहुंचने का सपना देखा जा सकता है। बहुत मुमकिन है कि अगले साल फरवरी के अंत में जब अरुण जेटली अपना पूरा बजट पेश करें, तब तक मोदी सरकार के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरा नक्शा भी साफ हो जाए और पिछले 10 वर्षों से विपक्ष की भूमिका निभा रही भाजपा भी पूरी तरह से अपने ‘सरकार स्वरूप’ को आत्मसात कर ले। तब तक हमें भी धैर्य के साथ प्रतीक्षा करना चाहिए।

जमीनी उम्मीदों के पहले सपनीला सफर?

[dc]मो[/dc]दी सरकार के ‘स्वप्निल’ रेल बजट पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए कुछ समय प्रतीक्षा करनी चाहिए। रेल मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा द्वारा पेश किया गया बजट इस मायने में ‘स्वप्निल’ है कि उसमें सरकार ‘रील लाइफ’ को ‘रीयल लाइफ’ में बदलने का साहस दिखाना चाहती है। निश्चित ही ऐसा सपना भी कोई गुजराती उद्यमी ही देख और दिखा सकता है। पूछा जा सकता है कि इस तरह के रेल बजट नीतीश, लालू और ममता बनर्जी कभी क्यों नहीं पेश कर सके! क्या इसका कारण इन पूर्व रेल मंत्रियों का बैकग्राउंड हो सकता है? इसका दूसरा पक्ष यह सवाल है कि रेल मंत्री आम भारतीय नागरिक को तेज गति के जिस रेललोक में ले जाना चाहते हैं, वह वास्तव में उसका है भी कि नहीं? मसलन देशभर में पटरियों पर दौड़ने वाली कोई साढ़े बारह हजार यात्री गाड़ियों के डिब्बों में हर रोज ऑस्ट्रेलिया की समूची आबादी से ज्यादा जो ‘स्वदेशी’ शरीर और आत्माएं भीड़ के धक्कों के साथ अंदर और बाहर होती रहती हैं, उनकी जरूरतें निश्चित ही तेज गति की बुलेट ट्रेनों से अलग हैं। रेल मंत्री गौड़ा अपने बजट भाषण की शुरुआत में कौटिल्य के अर्थशास्त्र को उद्धृत करते हुए कहते जरूर हैं कि : ”जनता की खुशियों में शासक की खुशी निहित होती है। उनका (जनता का) कल्याण उसका (शासक का) कल्याण होता है। जिस बात से शासक को खुशी होती है वह उसे ठीक नहीं समझेगा। परंतु जिस किसी बात से जनता खुश होती है शासक उसे ठीक समझेगा।” पर निश्चित ही समूचे रेल बजट को बुलेट ट्रेन तक सीमित कर खारिज भी नहीं किया जाना चाहिए। रेल प्रस्ताव संकेत हैं कि दो दिन बाद अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले आम बजट का, जिसमें वित्त मंत्री बताएंगे कि नरेंद्र मोदी अपने सपनों के भारत को कितनी तेज गति के साथ दुनिया के नक्शे पर उतारना चाहते हैं।
[dc]रे[/dc]ल बजट में दूसरा बड़ा संकेत यह है कि बेहतर, साफ-सुथरी, वाई-फाईदार और तीव्र गति की सुरक्षित सुविधाओं के लिए रेलयात्रियों को भी अब पेट्रोल-डीजल और खाना पकाने की गैस की कीमतों की तरह ही बाजार-आधारित भाड़ों की हकीकत से रूबरू होना ही पड़ेगा। यात्री किराए में 14.2 प्रतिशत और माल भाड़े में 6.5 प्रतिशत वृद्धि का बजट-पूर्व जुलाब उसी दिशा में पहला कदम था। सरकार की मंशा हो सकती है कि सार्वजनिक क्षेत्र के निकायों का ‘डिस्इन्वेस्टमेंट’ हो और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मार्फत रेलवे का यथासंभव निजीकरण। यानी कि प्रति पैसेंजर/किमी 23 पैसे के वर्तमान घाटे को कम करके यात्री किराए को एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी मानकों के करीब लाया जाए। रेल मंत्री ने कांग्रेस को भी यह जानकारी दी कि तालियां बजवाने के लिए यूपीए के पिछले दस वर्षों के शासनकाल में साठ हजार करोड़ रुपए लागत की 99 नई रेल लाइन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, पर आज तारीख तक मात्र एक ही पूरी हो पाई है। अत: रेल बजट का लब्बो-लुआब यही माना जा सकता है नरेंद्र मोदी को कड़वे फैसले लेते समय न तो तालियां कुटवाने की परवाह रहेगी और न ही इस बात की कि सदानंद गौड़ा के बजट के बाद कोई दूसरा बहादुर विपक्षी सांसद अरुण जेटली की नामपटि्टका को अपने चमकीले जूतों से कुचलते हुए फोटो खिंचवाने का उपक्रम करे। नरेंद्र मोदी ने रेल मंत्री के मुंह से कहलवा दिया है ‘यत्तदग्रे विषमिव, परिणामे अमृतोपमम्’ (दवा खाने में तो कड़वी लगती है लेकिन उसका परिणाम मधुर होता है।) अत: देश को अच्छे दिनों की प्रत्याशा में चाहे कुछ समय के लिए ही सही, खराब दिनों के वास्ते भी तैयार रहना चाहिए।

'क्योंकि' कांग्रेस चुनाव हार गई है!

[dc]कां[/dc]ग्रेस पार्टी अपने लिए तो इन सामंतवादी संस्कारों से मुक्ति नहीं पाना चाहती है कि शासन तो कोई ‘कम पढ़ा’ भी चला सकता है और कि उत्तराधिकारी की ‘अयोग्यता’ पर उसके स्थापित चापलूस भी अंगुली नहीं उठा सकते। पर स्मृति ईरानी की केवल ‘बारहवीं पास’ पढ़ाई और मानव संसाधन मंत्रालय जैसी जिम्मेदारी उठा पाने की काबिलियत को लेकर वे तमाम पढ़े-लिखे नेता सवाल उठा रहे हैं, जिन्होंने दुनिया के नंबर वन डिग्रीधारी डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में काम करके भी कुछ हासिल नहीं किया। कांग्रेस ने देशभर से उतनी भी सीटें हासिल नहीं कीं, जितनी कि स्मृति की पार्टी ने अपेक्षाकृत कम पढ़े-लिखों के दम पर केवल एक ही राज्य से जीत लीं। मणिशंकर अय्यर ने ‘चाय वाले’ की योग्यता के लिए कांग्रेस पार्टी के दफ्तर के बाहर जगह देने की पेशकश की थी। उसका परिणाम सामने है। अजय माकन और अभिषेक मनु सिंघवी स्मृति की शैक्षणिक योग्यता को शायद इसलिए चुनौती दे रहे हैं, ‘क्योंकि’ एक ‘चाय वाले’ ने ईरानी को अमेठी में ‘उत्तराधिकार’ की परंपरा को चुनौती देने की जिम्मेदारी सौंप दी थी। इधर नई सरकार अपने अगले सौ दिनों का एजेंडा तय करने में जुटी है और उधर ‘पुरानी सरकार’ अपने पिछले ‘सवा सौ महीनों’ के एजेंडों से ही अपने को आजाद नहीं कर पा रही है। कांग्रेस के सिपहसालार इस हकीकत को अभी भी हजम नहीं कर पा रहे हैं कि 16 मई 2014 को देश को जो आजादी मिली, उसमें सत्ता की बागडोर उन ‘देसी’ लोगों के हाथों में पहुंच गई है, जिनमें ‘केवल साक्षर’ और ‘निरक्षर’ भी शामिल हैं। यानी उनमें ‘धीरूभाई अंबानी’ भी हैं और ‘ज्ञानी जैलसिंह’ भी। ज्ञातव्य है कि देश के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह कभी स्कूल भी नहीं गए, पर उन्होंने राजीव गांधी सरकार की संवैधानिक तथ्यों के आधार पर सबसे ज्यादा खिंचाई की थी। और कभी कॉलेज में पैर नहीं रखने वाले धीरूभाई अंबानी को ‘नेतृत्व का अप्रतिम उदाहरण’ पेश करने के लिए अमेरिका के पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध व्हार्टन स्कूल द्वारा जून 1998 में उनके मुंबई स्थित निवास पर जाकर डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित किया गया था।
[dc]स[/dc]च्चाई यह है कि चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी जनता के चेहरों में अपने भविष्य को ढूंढ़ रही थी और अब जनता अपने लिए कांग्रेसियों के चेहरों में एक मजबूत विपक्ष के भविष्य की तलाश कर रही है। ऐसे विपक्ष की, जो जबरदस्त बहुमत के अहंकार में सत्ता पक्ष को ‘लोकतांत्रिक तानाशाही’ में तब्दील नहीं होने दे। पर इसके लिए कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को पराजय के ‘कोपभवन’ से बाहर निकलकर निराशा में डूबे अपने कार्यकर्ताओं की पीठें भी थपथपानी पड़ेंगी और चुनाव प्रचार दौरान के ‘चाय’ के बकाया बिलों का भुगतान भी करवाना पड़ेगा। स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता पर बहस छेड़कर कांग्रेस के नेता अपने लिए कुछ ‘एंगेजमेंट’ अवश्य ढूंढ़ पा रहे होंगे, पर इससे उनके खिलाफ चढ़ी हुई जनता की ‘सूजन’ को उतरने का बिलकुल ही मौका नहीं मिल रहा है। सूजन बल्कि और बढ़ती जा रही है। कांग्रेस के पास अपने स्वयं के अनुभव हैं कि ए. राजा, जो बीएससी, बीएल और एमएल थे, उन्होंने टू-जी (सोनिया ‘जी’ और राहुल ‘जी’) को क्या दिया और यूपीए-दो के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री दीनशा पटेल ने क्या योगदान दिया, जो कि सिर्फ मैट्रिक पास थे? कांग्रेस को वक्त की हकीकत को समझते हुए अपनी ‘मोदी विरोध’ की रणनीति में परिवर्तन करना चाहिए। उसने अगर ऐसा नहीं किया तो उसके प्रत्येक विरोध पर लोग फिर फिकरे कसने लगेंगे : “क्योंकि कांग्रेस चुनाव हार गई है!”

…यह उस क्षण का 'क्लाइमेक्स' था

[dc]को[/dc]ई चार हजार से अधिक विशिष्ट, अति-विशिष्ट और अति-अति-विशिष्ट आमंत्रितों की उपस्थिति में राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों और वहां स्थित ‘जयपुर स्तंभ’ के बीच में पसरे हुए खूबसूरत स्थान पर सोमवार शाम संपन्न् हुए बहुप्रतीक्षित समारोह की केवल दो खूबियां थीं। पहली तो थी: दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के ताकतवर राष्ट्र-प्रमुखों का दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पैदा हुए एक ‘चाय वाले’ के शपथ-ग्रहण में उपस्थित होना। और दूसरी थी: उस ‘चाय वाले’ के मुंह से निकलने वाला वह वाक्य, जिसे कि सुनने के लिए भारत के करोड़ों लोगों के साथ-साथ दुनियाभर के भारतीय भी लालायित थे, “मैं नरेंद्र दामोदरदास मोदी संघ के प्रधानमंत्री के रूप में…”। यह उस क्षण का ‘क्लाइमेक्स’ था, जिसने 15 सितंबर 2013 को आकार लेकर अपनी ‘अश्वमेध’ यात्रा शुरू की थी। यह भारत की आत्मा ग्रहण कर उस स्वप्न का कोई डेढ़ सौ से अधिक वर्षों के बाद पुनर्जन्म था, जो अत्यंत संपन्न् अमेरिकी समाज में भी दिल दहला देने वाली गरीबी में पैदा होकर अब्राहम लिंकन के रूप में वॉशिंगटन स्थित राष्ट्रपति निवास में पहुंचा था और जिसने विपन्न्ता की समूची परिभाषा को ही बदल दिया था। शपथ लेने के बाद आश्चर्यजनक रूप से नरेंद्र दामोदरदास मोदी के चेहरे पर किसी विजेता की मुस्कान नहीं थी। उन्होंने पूरे समारोह के दौरान एक बार भी अपना सिर ऊंचा करके ‘सिकंदर’ के भाव से उस समूह में बैठे चेहरों को पढ़ने की कोशिश नहीं की, जिन्हें कि पराजित करके वे राष्ट्रपति भवन के विशाल प्रांगण में पहुंचे थे। नरेंद्र मोदी ने अपने विरोधियों को हराने का साहस तो आसानी से जुटा लिया था, पर शपथ-ग्रहण के भव्य आयोजन की इस वास्तविकता के साथ तालमेल करना अभी शेष था कि उत्तरी गुजरात के मेहसाणा जिले के एक छोटे-से शहर वडनगर का गुजराती अब सवा सौ करोड़ की आबादी वाले लोकतंत्र का पंद्रहवां प्रधानमंत्री है। और कि अब उसे गुजरात भवन छोड़कर 7 रेसकोर्स रोड पर जाना पड़ेगा तथा अपनी रातें गांधीनगर में नहीं, बल्कि नई दिल्ली में गुजारनी पड़ेंगी। लंदन से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार ‘द गार्जियन’ ने चुनाव परिणामों के दो दिन बाद लिखा था कि “सोलह मई का दिन भारत के इतिहास में एक ऐसे दिन की तरह याद रखा जाएगा, जब आखिरकार इस देश से अंग्रेजों की विदाई हुई।” 26 मई की शाम को वह काम पूरा भी हो गया।
[dc]दु[/dc]नियाभर में कहा और लिखा जा रहा है कि ‘सोलहवीं लोकसभा’ के लिए चुनावों में जीत ‘पंद्रहवें प्रधानमंत्री’ के व्यक्तिगत खाते में दर्ज की गई है। मंत्रिमंडल के गठन के बाद सरकार का जो चेहरा व्यक्त हो रहा है, उसमें भी केवल मोदी ही दिखाई दे रहे हैं। अटलजी के मंत्रिमंडल में दूसरे क्रम पर आडवाणी थे। उसमें आगे के क्रमों पर भी कुछ चेहरे थे। पर सोमवार को जिस मंत्रिमंडल ने नई दिल्ली में शपथ ली है, उसमें ‘एक से पैंतालीस’ तक नरेंद्र मोदी ही हैं। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक व्यक्ति के प्रभाव और जनता की उसी से सारी उम्मीदों का यह पहला प्रयोग है। अब इस प्रयोग का सफल होना इसलिए जरूरी है कि अगर ऐसा हो गया तो यह समूचे दक्षिण एशिया की शक्ल बदल देगा। पड़ोसी राष्ट्र-प्रमुखों की उपस्थिति में मोदी का शपथ-ग्रहण समूचे दक्षिण एशिया के नागरिकों के विश्वास को भी मजबूत करेगा कि भारत के साथ-साथ अब उनके भी अच्छे दिन आने वाले हैं। अत: नरेंद्र दामोदरदास मोदी की भारत के पंद्रहवें प्रधानमंत्री के रूप में सफलता की कामना की जानी चाहिए।

शरीफ का साहस वाजपेयी युग की वापसी है

[dc]तृ[/dc]णमूल कांग्रेस की तेज-तर्रार नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आ रही हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपनी तमाम घरेलू दिक्कतों के बावजूद नई दिल्ली पहुंचने का फैसला कर लिया है। नवाज शरीफ को उनके साहस के लिए सेल्यूट किया जा सकता है। नवाज शरीफ ने इसके पहले हिम्मत तब दिखाई थी जब फरवरी 1999 में उन्होंने भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की वाघा सीमा पर पहुंचकर ऐतिहासिक अगवानी की थी। नवाज शरीफ के साथ उस समय वाघा पर मौजूद जनरल मुशर्रफ ने अक्टूबर आते-आते नवाज शरीफ को अपदस्थ कर नजरबंद कर दिया था और खुद सत्ता पर काबिज हो गए थे। अत: शरीफ के मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचने और न पहुंचने के फैसले दोनों ही भारत-पाक संबंधों के भविष्य का नया मजमून लिखने वाले थे। नवाज शरीफ के भाई और पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख जनरल रहील शरीफ के बीच दो दिन पहले तक लाहौर में इसी बात पर सहमति बनी थी कि नवाज शरीफ के स्थान पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ही दिल्ली जाएगा। पर नवाज ने फैसला बदल दिया। माना जाना चाहिए कि मोदी और पाक प्रधानमंत्री दोनों ही इतिहास के उस सफे को आगे ले जाना चाहते हैं जो 21 फरवरी 1999 को वाजपेयी और शरीफ ने ‘लाहौर घोषणा-पत्र’ के रूप में दोनों मुल्कों की जनता और दुनिया को दिया था। पर उसके बाद डेढ़ दशक का वक्त आतंकी हमलों से निपटने और बहादुर सैनिकों के शवों को आंसुओं की चादरों से ढंकने में ही खर्च हो गया। नवाज शरीफ और श्रीलंका के राष्ट्रपति को आमंत्रण दोनों ही नई सरकार की पारी की एक बहादुर शुरुआत है। मनमोहन सिंह की तरह, मोदी के सामने गठबंधन की मजबूरियां नहीं हैं पर तमिलनाडु जैसा महत्वपूर्ण दक्षिणी राज्य जहां कि भाजपा को केवल एक सीट मिली है वहां की तमिल राजनीति के भावनात्मक दबाव को नजरअंदाज करने की जोखिम उठाकर श्रीलंका के राष्ट्रपति की अगवानी करने का फैसला उतना ही साहस भरा है जितना कि अपने यहां के अंदरूनी दबावों को दरकिनार कर शरीफ का भारत आना कबूल करना। अपने चुनाव प्रचार के दौरान मोदी कहते रहे हैं कि आतंकवादी कार्रवाई और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते या कि गोला-बारूद के शोर में बातचीत सुनाई नहीं पड़ती। इसी तरह नवाज शरीफ सहित सभी पाकिस्तानी नेताओं का कहना रहा है कि भारत के साथ होने वाली किसी भी बातचीत में कश्मीर मसले का हल भी शामिल होना चाहिए। अब मोदी अगर अपने कहे को ही बदलना चाह रहे हैं तो भारत के नए विदेश मंत्री के लिए चुनौतीपूर्ण दायित्व समझा जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ कितनी गर्मजोशी के साथ पेश आते हैं इस बात पर लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में नजर रखना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं के लिए भी नया अनुभव होगा। संघ ही क्यों, क्रिकेट मैच सहित पाकिस्तान के साथ सभी तरह के रिश्तों की मुखालफत करने वाले भाजपा के महत्वपूर्ण घटक शिवसेना के आक्रामक नेता उद्धव ठाकरे के लिए भी नवाज शरीफ की यात्रा बहुत कुछ छोड़कर जाने वाली है। सवाल यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी को अगर अपने दम पर बहुमत प्राप्त नहीं होता तो क्या नरेंद्र मोदी नवाज शरीफ और राजपक्षे को आमंत्रित करने की जोखिम उठाना चाहते? बहुत मुमकिन है वे तब भी ऐसा करने का साहस दिखा देते।

अब माफी मांगने का वक्त भी गलत चुना

[dc]दि[/dc]ल्ली की जनता के विश्वास के साथ की गई ‘धोखाधड़ी’ के लिए ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता अरविंद केजरीवाल ने तिहाड़ जेल में प्रवेश करने से पहले देश से माफी मांगी है। लोकसभा चुनाव में ‘आम आदमी पार्टी’ के अपेक्षित या अनपेक्षित सफाये के बाद केजरीवाल को इलहाम हुआ कि दिल्ली में सरकार के गिरने से देश की जनता उनसे काफी नाराज है। दिल्ली में सरकार बन जाने के बाद अरविंद अचानक से घोड़ों पर सवार हो गए थे और उन्हें लगने लगा था कि इस तरह से तो वे देश में भी सरकार बना सकते हैं। वे शायद इन्हीं इरादों के साथ वाराणसी भी पहुंचे थे। उन्हें यकीन था कि जिस तरह से दिल्ली में उन्होंने शीला दीक्षित को हरा दिया, वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी हरा देंगे। अरविंद अपने नाम कोई नया इतिहास लिखना चाहते थे। ‘आम आदमी पार्टी’ ने पहली भूल दिल्ली की जनता के दिल को पढ़ने में की और दूसरी देश की जनता की ‘मैच्योरिटी’ की थाह लेने में।उसे गलतफहमी हो गई थी कि कोई 129 साल जूनी कांग्रेस और पैंतीस वर्षों की अनुभवी भारतीय जनता पार्टी (या और भी अधिक वर्षों के अनुभव वाली जनसंघ) को तीन-चार साल के सड़कीय तजुर्बे के दम पर सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। जूता सुंघाकर मिर्गी की बीमारी का इलाज करने जैसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अंतत: वही हश्र हुआ, जो होना था। देश किसी चमत्कारिक नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तो तैयार था, लेकिन ऐसे किसी चमत्कार को हकीकत मानने के लिए तैयार नहीं था, जिसमें आंखों के सामने से ताजमहल गायब कर दिया जाए। अरविंद केजरीवाल को माफी वास्तव में अपनी इस गलती के लिए मांगना चाहिए कि उन्होंने मान लिया कि जनता केवल बिजली और पानी के बिलों को कम करवाना चाहती है और भ्रष्टाचार के खिलाफ चौबीसों घंटे सड़कों पर ही लड़ाई लड़ते रहना चाहती है। देश की जनता की ‘मैच्योरिटी’ इस सच्चाई में निहित है कि कांग्रेस के प्रति उसकी सुनामी नाराजगी और विद्रोह के बावजूद उसे 44 सीटें प्राप्त हो गईं। वर्ष 1984 के चुनावों को याद किया जाए कि तब कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को कितने स्थान लोकसभा में प्राप्त हुए थे? परिपक्व राजनीतिक दलों के बीच इस तरह के उतार-चढ़ाव चलते रहते हैं। दिक्कत यह है कि अरविंद केजरीवाल जिस तरह की तूफानी जल्दबाजी में 14 फरवरी 2014 को थे, जब उन्होंने ‘जनलोकपाल बिल’ को मुद्दा बनाकर दिल्ली में अपनी बनी-बनाई सरकार गिराई थी, वैसी ही जल्दबाजी में वे आज फिर से हैं। वे शायद उम्मीद करना चाहेंगे कि तिहाड़ से जब से बाहर आएं तो दिल्ली के नागरिकों का सैलाब उस तरह से उनकी अगवानी करे, जैसी अण्णा हजारे की तीन साल पहले की गई थी। बहुत मुमकिन है, ऐसा कुछ हो जाए। और न हो तो भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दिल्ली के हालात अब काफी बदल चुके हैं। राजधानी इस समय जश्न की तैयारियों में मग्न है। बनारस और वडोदरा से लाखों मतों की जीत दर्ज कराकर दिल्ली पहुंचे नरेंद्र मोदी का राज्याभिषेक होने जा रहा है। मोदी और केजरीवाल दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। दोनों में काफी फर्क हो गया है। केजरीवाल अपनी यात्रा वहीं से वापस शुरू करना चाहते हैं, जहां उन्होंने 14 फरवरी 2014 को छोड़ दी थी। नरेंद्र मोदी ने 21 मई 2014 को गांधीनगर और गुजरात को पूरी तरह से विदा कह दिया है और उनके वहां वापस लौटने की संभावना नहीं है। कहा जा सकता है कि अरविंद ने अपनी सरकार भी गलत वक्त पर गिराई और क्षमा मांगने का वक्त भी सही नहीं चुना। आम आदमी पार्टी के जो समर्थक तिहाड़ के बाहर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं, उनकी ईमानदारी पर तो निश्चित ही संदेह नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए। उन्हें पता है कि दिल्ली में सरकार बदलने जा रही है।

'बहुमत' के बाद की जगह में भाजपा!

[dc]मो[/dc]दी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सुनामी विजय को लेकर अलग-अलग अनुमान लगाए जा रहे हैं। एक अनुमान यह भी है कि जीत का ज्यादातर श्रेय भावी प्रधानमंत्री की ‘मार्केटिंग व मीडिया स्ट्रेटेजी’ और कॉर्पोरेट्स द्वारा खर्च की गई हजारों करोड़ की धनराशि को दिया जाना चाहिए। इस तरह के अनुमानों में कुछ तथ्य है या केवल यही तथ्य है, यह शोध का विषय है। सबकुछ अगर मार्केटिंग और मीडिया स्ट्रेटेजी और पैसों का ही कमाल था तो क्या यह ‘विकल्प’ कांग्रेस को उपलब्ध नहीं था? अगर मार्केटिंग रणनीति और धन की ही बात थी तो क्या प्रधानमंत्री के पद की आकांक्षा रखने वाले भाजपा के अन्य नेता उसका इस्तेमाल करके ऐसा ही चमत्कार कर सकते थे? अलावा इसके कि मोदी ने एक ‘मजदूर’ की तरह चुनाव प्रचार में रात-दिन एक कर दिया, प्रचार-प्रसार के काम को अत्याधुनिक सुविधाओं से सज्जित ‘प्रोफेशनल्स’ की टीम के हवाले कर दिया गया और देश-विदेश के कॉर्पोरेट्स ने मोदी के पक्ष में संसाधनों के ढेर लगा दिए, ऐसा कुछ और भी होना चाहिए, जिसने मोदी के पक्ष में काम किया है और कांग्रेस उसे समझ नहीं पाई।

[dc]मो[/dc]दी की जीत को समझने के लिए चुनाव परिणामों को पांच परिदृश्यों में बांटना पड़ेगा। पहला परिदृश्य वे राज्य हैं, जहां वर्तमान में पूरी तरह से भाजपा की सरकारें हैं। ये हैं : गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा। इन राज्यों में लोकसभा की कुल 93 सीटें हैं। भाजपा को इनमें से 90 सीटें मिली हैं। पिछले चुनाव में उसे 46 सीटें ही इन राज्यों से मिली थीं। यानी 44 सीटों का इजाफा हुआ। इसका पूरा श्रेय राज्य सरकारों और प्रदेश संगठनों को दिया जा सकता है। गुजरात में तो पूरा चुनाव मोदी की अनुपस्थिति में ही लड़ा गया और 26 में से 26 सीटें मिलीं, जिनमें बड़ौदा की सीट भी है, जो रिकॉर्ड पांच लाख सत्तर हजार मतों से जीती गई। राजस्थान ने भी सभी 25 सीटें मोदी की झोली में डाल दीं।
[dc]मो[/dc]दी की जीत का दूसरा परिदृश्य है, वे राज्य जहां वर्तमान में कांग्रेस की सरकारें हैं या कांग्रेस जहां सहयोगी है या कभी सत्ता में रही है। ये राज्य हैं : महाराष्ट्र, कर्नाटक, असम, हरियाणा, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और झारखंड। इन राज्यों में सीटों की संख्या 165 है। इन राज्यों में केंद्र के खिलाफ वैसी ही जबर्दस्त एंटी-इंकंबेंसी थी, जैसी कि हाल के विधानसभा चुनावों में अशोक गेहलोत व शीला दीक्षित के खिलाफ राजस्थान व नई दिल्ली में व्यक्त हुई थी। इन राज्यों में एंटी-इंकंबेंसी के चलते 2009 की केवल 43 सीटों के मुकाबले 78 सीटें मोदी लहर के कारण केवल भाजपा को मिलीं। सहयोगी दलों – शिव सेना व तेलुगुदेशम – की सीटें अलग हैं। इन राज्यों में भी मोदी को ‘स्ट्रेटेजिकली’ ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ा। केंद्र के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी ने ही मोदी के पक्ष में अपना काम कर दिया। हालांकि भाजपा-शासित राज्यों के मुकाबले उपलब्धि कमजोर रही। (आश्‍चर्यजनक रूप से आंध्र में मोदी को विशेष समर्थन नहीं मिल पाया। भाजपा को 42 में से 3 सीटें ही मिलीं।)
[dc]ती[/dc]सरा परिदृश्य दिल्ली का है, जहां ‘आम आदमी पार्टी’ के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी ने काम किया। कांग्रेस के खिलाफ तो यह एंटी-इंकंबेंसी पिछले विधानसभा चुनावों के समय से ही थी। पिछले लोकसभा चुनाव में यहां की सातों सीटें कांग्रेस के पास थीं। इस बार सातों सीटें भाजपा को मिलीं। केजरीवाल की पार्टी का भी कांग्रेस के साथ-साथ सफाया हो गया।
[dc]चौ[/dc]था परिदृश्य बिहार का है, जहां पहले नीतीश कुमार और भाजपा की मिली-जुली सरकार थी। बाद में मोदी के मुद्दे पर नीतीश भाजपा से अलग हो गए। नीतीश ने बिना यह महसूस किए कि बिहार में उनके खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी बढ़ रही है और भाजपा, जद(यू) से ज्यादा प्रभावशाली है, नरेंद्र मोदी पर अपने हमले जारी रखे। पिछले चुनाव में वहां की 40 सीटों में से भाजपा को 12 सीटें मिली थीं। इस बार अकेले भाजपा को 22 सीटें मिलीं। दिल्ली व बिहार को मिलाकर मोदी को 17 सीटें ज्यादा मिलीं। यानी दोनों स्थानों की 47 सीटों में से 29 सीटें मोदी लहर के नाम हुईं। बिहार में सहयोगी दलों की सीटें अलग हैं। नीतीश को केवल दो सीटें मिलीं और अब वहां तूफान उठ रहा है।
[dc]मो[/dc]दी की जीत का सबसे अहम हिस्सा उत्तर प्रदेश है, जहां 80 सीटें हैं। पिछली बार यहां से भाजपा को केवल 10 सीटें मिली थीं। इस बार वहां से 71 सीटें मिलीं। अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी पूरी ताकत यहीं झोंकी और प्रदेश के पुराने पार्टी नेतृत्व को अलग बैठा दिया। उत्तर प्रदेश में जो चमत्कार हुआ, वास्तव में उसी ने मोदी को हीरो बनाया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अमेठी और रायबरेली तक सिमटकर रह गई। मोदी जानते थे कि देश जीतने के लिए उत्तर प्रदेश जीतना जरूरी है। वे यह भी जानते थे कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के खिलाफ जबरदस्त एंटी-इंकंबेंसी है। यानी उप्र में भाजपा डबल एंटी-इंकंबेंसी का लाभ लेना चाहती थी – केंद्र में कांग्रेस के खिलाफ व प्रदेश में अखिलेश यादव के खिलाफ। मोदी ने अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी अमित शाह को इसीलिए काम पर लगाया। अमित शाह जानते थे कि आजम खान और इमरान मसूद जैसे मुस्लिम कट्टरपंथी नेता उनका काम और आसान कर देंगे और मुलायम सिंह हालात संभाल नहीं पाएंगे। हुआ भी वही। अखिलेश ने समाजवादी पार्टी को चारा बनाकर आजम खान की भैंसों के हवाले कर दिया। मुजफ्फरनगर के दंगों को निशाना बनाकर मुलायम के मुस्लिम दादाओं ने मतदाताओं का धु्रवीकरण कर दिया। भाजपा को शायद इसी की जरूरत थी। परिणाम सामने है। भाजपा ने न सिर्फ मुजफ्फरनगर में शानदार जीत दर्ज कराई, समूचे प्रदेश में समाजवादी पार्टी को पांच सीटों पर सीमित कर दिया। बसपा का तो पूरा सफाया हो गया। कांग्रेस का तो होना ही था। उत्तर प्रदेश की हवा ने तय कर दिया कि मोदी ही देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे।
[dc]ऊ[/dc]पर के विश्‍लेषण पर गौर करें तो भाजपा को देश के 16 राज्यों में लोकसभा की 385 सीटों में से 268 पर अपने दम पर विजय मिल गई। सहयोगी दलों तेलुगुदेशम, शिवसेना, अकाली दल, लोक-जनशक्ति पार्टी, ‘अपना दल’ आदि की सीटें अलग हैं। देश के शेष राज्यों की बची 158 सीटों का गणित भी समझना जरूरी है।
[dc]दे[/dc]श के अन्य राज्यों में प्रमुख हैं : तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और केरल। इन चार राज्यों की कुल सीटों की संख्या 122 है। इन चार राज्यों से भाजपा को वर्ष 2009 के चुनावों में केवल एक सीट मिली थी। इस बार सीटों की संख्या बढ़कर केवल चार हुई है। पार्टी को तमिलनाडु में एक, ओडिशा में एक व पश्चिम बंगाल में दो स्थान मिले हैं। केरल में कोई सीट नहीं मिली। यानी मोदी लहर का असर यहां नहीं पहुंचा। पंजाब की तेरह सीटों का अलग से जिक्र होना चाहिए। वहां भाजपा का अकाली दल से तालमेल है। अकालियों के खिलाफ वहां जबरदस्त एंटी-इंकंबेंसी है, जिसका खामियाजा भाजपा को न सिर्फ अरुण जेटली की हार के रूप में भुगतना पड़ा, बल्कि उसे वहां केवल दो सीटें मिलीं। पिछली बार से केवल एक ज्यादा। यानी पंजाब में भी मोदी लहर ने काम नहीं किया। यहां अकालियों के प्रति नाराजगी समूची सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी में बदल गई और भाजपा भी उसका शिकार हो गई। आम आदमी पार्टी को यहां चार सीटें मिल गईं। इसका अर्थ है उक्त पांच राज्यों की 135 सीटों में से भाजपा को केवल छह सीटें मिलीं।
[dc]अ[/dc]ब हम शेष राज्यों (विशेषकर उत्तर-पूर्व के) और केंद्रशासित प्रदेशों की तरफ नजर करें। अरुणाचल, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, अंडमान-निकोबार, चंडीगढ़, दादरा और नागर हवेली, दमन और दीव, लक्षद्वीप, पुड्डुचेरी में कुल मिलाकर 23 सीटें हैं। वर्ष 2009 के चुनाव में भाजपा को इन स्थानों से केवल तीन सीटें प्राप्त हुई थीं। इस बार के चुनाव में सीटों की संख्या बढ़कर आठ हो गई। इनमें तीन जम्मू-कश्मीर की व एक सीट चंडीगढ़ की है। उत्तर-पूर्व के राज्यों में उसे अरुणाचल में एक सीट मिली है।
[dc]उ[/dc]क्त गणित का अर्थ यह है कि सोलह राज्यों की 385 सीटों में से भाजपा को 268 सीटें प्राप्त हुईं और शेष 19 राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों की 158 सीटों में से भाजपा को पिछली बार की पांच सीटों के मुकाबले 14 सीटें मिलीं। यानी पिछली बार की तरह ही इस बार भी देश का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के स्पर्श से अछूता रह गया। एक अन्य विश्‍लेषण यह हो सकता है कि अकेले भाजपा को प्राप्त कुल 282 सीटों में से 190 सीटें भाजपा-शासित पांच राज्यों तथा उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली से मिली हैं। इन राज्यों की कुल सीट संख्या 220 है। बाकी बची 92 सीटें पार्टी को शेष देश की 323 सीटों में से प्राप्त हुई हैं। अत: नरेंद्र मोदी की समूचे देश को सही अर्थों में जीतने की चुनौती अगले चुनाव तक कायम रहने वाली है। मोदी को अगर चुनाव प्रचार करने का थोड़ा लंबा समय मिल पाता तो तस्वीर बाकी देश में भी बदल सकती थी। फिर भी भाजपा मणिशंकर अय्यर का इतना आभार तो व्यक्त कर ही सकती है कि बड़बोले कांग्रेस नेता न तो एक ‘चाय बेचने वाले’ के स्वाभिमान को ललकारते और न कांग्रेस को आज ये दिन देखने पड़ते।

ऐतिहासिक विजय, विराट दायित्व

[dc]शु[/dc]क्रवार, 16 मई 2014 का दिन ऐतिहासिक बन गया है। देश में राजनीति की अब एक नई इबारत लिखी जाने वाली है। उस इबारत के शिल्पी नरेंद्र मोदी होंगे। नई दिल्ली, नरेंद्र मोदी के आगमन की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही है। तय हो गया है कि अब वे ही भारत देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह उपलब्धि विशेष महत्व की है। उसे अपने दम पर भी लोकसभा में बहुमत मिल गया है। ऐसा पहली बार हुआ है। परिणामों तक पहुंचने से पहले समूचे देश को नौ चरणों के ‘कटुतापूर्ण’ चुनाव प्रचार और उसके दौरान व्यक्त-अव्यक्त पीड़ा के अनुभवों से गुजरना पड़ा। चुनाव और उससे निकले परिणाम इन मायनों में अलग साबित हुए हैं कि इसने कई महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय दलों के अंदरूनी ढांचे को छिन्न्-भिन्न् कर दिया, मसलन कांग्रेस, वाम दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) व अन्य। निश्चित ही भाजपा खुद भी अब पहले जैसी नहीं रहने वाली। यह एक सर्वथा व्यक्ति-केंद्रित चुनाव था, जिसकी कि व्यथा और आभा दोनों को ही मोदी ने न तो किसी और के साथ बांटा, न ही अपने से कभी अलग होने दिया। मोदी को पता था कि वे अगर सरकार नहीं बना पाएंगे तो पराजय का ठीकरा भी उनके सिर पर ही फूटने वाला है। अत: यह ऐतिहासिक विजय भी उन्हीं के नाम लिखी जानी चाहिए। कहना होगा कि नरेंद्र मोदी ने अपने आक्रामक चुनाव प्रचार के मार्फत जनता की महत्वाकांक्षाएं इतनी जगा दी हैं कि अब उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही निभानी है। नरेंद्र मोदी दक्षिण एशियाई राजनीति में इस तरह का अद्भुत प्रयोग और अनुभव बनकर उभरे हैं कि कोई अगर ठान ही ले तो सवा सौ साल से अधिक की बुनियादों पर खड़ी कांग्रेस जैसी पार्टी को भी उसकी जड़ों से हिला सकता है। मोदी ने वही करके दिखाया। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस का परफॉर्मेंस इससे और ज्यादा शर्मनाक नहीं हो सकता था। उसे सिर उठाने के लिए दक्षिण भारत में भी जगह नहीं मिली। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने खासकर उत्तर प्रदेश में जिस तरह से सांप्रदायिक और जातिगत ध्रुवीकरण किया, उसकी उन्हें पर्याप्त सजा मिल गई। शोध प्रबंध लिखे जा सकते हैं कि ये चुनाव अगर मोदी की गैर-मौजूदगी में आडवाणी-सोनिया के परंपरागत तरीकों से भाजपा-कांग्रेस द्वारा लड़े जाते तो उसके किस तरह के परिणाम प्राप्त होते। निश्चित ही कांग्रेस सहित तमाम गैर-भाजपाई दलों को अगले चुनावों की तैयारी में आज से ही अपनी जानें झोंकना पड़ेंगी, जो कि आसान काम नहीं होगा। मोदी ने तो चुनावों को लड़ने के सारे हथियार और कानून-कायदे ही बदलकर रख दिए हैं। इस हद तक कि कांग्रेस को मजबूरन अपने आपको खत्म करने के कगार पर पहुंचकर ही दम लेना पड़ा। निश्चित ही मौजूदा एनडीए की स्थिति 1977 से अलग भी है और ज्यादा मजबूत भी। दूसरी ओर, कांग्रेस के पास 1980-81 को दोहराने के लिए इंदिरा गांधी नहीं हैं, केवल ‘परिवार’ को घेरे रखने वाले चापलूसों का एक दृश्य-अदृश्य आत्मघाती दस्ता है। पर निश्चित ही कांग्रेस के इस तात्कालिक पतन मात्र से ही मोदी की चुनौतियां खत्म नहीं हो जातीं।
[dc]16 मई[/dc] 2014 के दिन का अनुभव इसलिए अनूठा है कि वाजपेयी युग के सामूहिक नेतृत्व के अनुभव को मोदी ने एक व्यक्ति द्वारा किए गए लोकतांत्रिक तख्तापलट में परिवर्तित कर दिया। इसे इंदिरा गांधी के लौह नेतृत्व का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अवधारणाओं के लालन-पालन में प्रशिक्षित हुए नरेंद्र मोदी के रूप में अवतरण भी माना जा सकता है। मोदी की तरह ही इंदिरा गांधी भी पार्टी के भीतर और बाहर की सभी लड़ाइयां अकेले दम पर लड़ती थीं। मोदी ने बाहर का युद्ध तो जीत लिया है, पर अंदर की लड़ाइयों का पटाक्षेप किया जाना अभी शेष है। राहुल गांधी को तो चुनाव लड़ने के लिए एक ऐसी कांग्रेस विरासत में मिली थी, जो पिछले सवा सौ साल के दौरान पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक एक राष्ट्रीय सहमति के रूप में स्थापित हो चुकी थी, पर वे उसका लाभ नहीं ले पाए। पर मोदी के साथ ऐसा नहीं था। चुनाव परिणामों में भी मोदी के लिए चुनौती स्पष्ट है कि देश के कितने राज्यों और आबादी के कितने बड़े हिस्से तक एक राष्ट्रीय सहमति और स्वीकृति के रूप में भाजपा का पहुंचना अभी बाकी है।
और अंत में यह कि चुनाव प्रचार के दौरान इतने ‘जहर’ का आदान-प्रदान हो चुका है कि एक ‘सहनशील’ सरकार और एक ‘सहयोगात्मक’ विपक्ष की संभावनाएं निरस्त-सी नजर आती हैं। पर यह सिद्ध करने के लिए कि कोई भी वैमनस्य स्थायी नहीं होता, उम्मीद की जा सकती है कि मोदी एक सशक्त विपक्ष की संसद और देश दोनों ही में उपस्थिति को प्रोत्साहित करते रहना चाहेंगे और साथ ही अपनी स्वयं की पार्टी के भीतर भी आंतरिक लोकतंत्र और असहमति की गुंजाइश बनाए रखेंगे। दोनों ही अपेक्षाएं उनके प्रचारित स्वभाव के खिलाफ मानी जा सकती हैं। पर भावी प्रधानमंत्री से ज्यादा कोई और गांधीनगर और दिल्ली की जरूरतों के बीच के फर्क को नहीं समझ सकता। इस विराट विजय के लिए मोदी का अभिनंदन किया जाना चाहिए।

प्रियंका को भी गुस्सा आता है!

[dc]प्रि[/dc]यंका गांधी का अपने आपको ‘आहत’ महसूस करना कांग्रेस के लिए संकट में राहत के सामान की तरह उपस्थित हुआ है। भारत की राजनीति अपनी बहुत सारी प्रेरणाएं (और चालें भी) महाभारत की कथाओं से प्राप्त करती है। पात्रों का पहले ‘आहत’ होना और फिर सत्य की रक्षा में प्रतिशोध की भावना के साथ कुरुक्षेत्र में उतर जाना ही महाभारत के मूल में है। अमेरिकी अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रॉबर्ट वाड्रा पर खबर कि प्रियंका के दसवीं पास पति किस तरह से एक लाख के दम पर लगभग सवा तीन सौ करोड़ की संपत्ति के मालिक बन गए, अगर मतदान के पहले चरण के पूर्व हाजिर हो जाती तो ताजा लोकसभा चुनाव के तेवर ही अब तक बदल जाते। पर अमेरिका में सारे काम घड़ी के कांटे और कैलेंडर की तारीख देखकर ही किए जाते हैं। अत: माना जा सकता है कि ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की खबर के फूटने और उसे लेकर रॉबर्ट वाड्रा पर हमले होने का वक्त भी पहले से निर्धारित था। किसी का इंकार नहीं कि अमेरिका की भारत के चुनाव परिणामों में उसके अपने हितों के मुताबिक काफी रुचि है। वाड्रा की जमीनों को लेकर जब आईएएस अफसर अशोक खेमका अकेले ही लड़ाई लड़ रहे थे और हरियाणा की कांग्रेसी सरकार उन्हें हर तरह से लगातार अपमानित कर रही थी, तब खेमका का साथ केजरीवाल के अलावा किसी अन्य ने नहीं दिया था और न ही ‘राष्ट्र की संपत्ति’ का हिसाब भी इतनी ऊंची आवाजों में मांगा गया था। आज केजरीवाल वाड्रा मामले में चुप्पी साधे हुए हैं और भाजपा शोर मचा रही है। कांग्रेस ‘पार्टी’ ने भी तब वाड्रा को एक ‘प्राइवेट सिटीजन’ करार देकर अपना पल्ला झाड़ लिया था। पर अब प्रियंका के मुंह से यह संकल्प जाहिर होते ही कि ”जितना जलील करेंगे, उतनी ही दृढ़ता से लडूंगी” कांग्रेस में जैसे जान आ गई। पार्टी नेताओं को अचानक लगने लगा कि अपमान रॉबर्ट वाड्रा का नहीं, बल्कि पूरी कांग्रेस का हो रहा है। उन्हें अब प्रतीक्षा है कि प्रियंका अपने पति और परिवार पर हो रहे हमलों के जवाब में पार्टी को बचाने में जुट जाएंगी और रायबरेली तथा अमेठी से बाहर भी निकलने का फैसला कर लेंगी। रायबरेली संसदीय क्षेत्र में मंगलवार को सभाओं को संबोधित करते हुए प्रियंका कई बार काफी भावुक हो गईं और उन्होंने अपनी दादी इंदिरा गांधी के संघर्ष का हवाला भी दिया। उन्होंने कहा कि उनके परिवार पर राजनीतिक हमले हो रहे हैं। चुनाव परिणामों को लेकर निराशा में डूबते जा रहे कांग्रेस के नेता निश्चित ही चाहेंगे कि भाजपा के हमले इसी तरह से जारी रहें और प्रियंका ने जो शुरुआत की है, उसे वे किसी ‘लॉजिकल कन्क्लूजन’ पर भी ले जाएं। खेल में वैसे भी अभी काफी जान बाकी है। पांच चरणों में अभी केवल दो सौ बत्तीस सीटों पर मतदान हुआ है। चार चरणों में तीन सौ ग्यारह सीटों के लिए वोट पड़ना बाकी है। जहां वोट पड़ने हैं, वे महत्वपूर्ण राज्य हैं और उनमें उत्तर प्रदेश व बिहार भी शामिल हैं। ये ही तीन सौ से ज्यादा सीटें 16 मई को जाहिर होने वाले परिणामों के जरिए बनने वाली सरकार का भविष्य भी तय करेंगी। अत: देखना दिलचस्प रहेगा कि प्रियंका ने जिस दृढ़ता के साथ ‘राजनीतिक हमलों’ का मुकाबला करने का संकल्प व्यक्त किया है, उस पर वे अपनी पार्टी की उम्मीदों के मुताबिक अंत तक टिकी रहती हैं या नहीं। अगर ऐसा हो जाता है तो फिर समूची लड़ाई अब मोदी विरुद्ध प्रियंका गांधी में बदल जाएगी।

'अच्छे दिन' आसानी से नहीं आएंगे

[dc]न[/dc]रेंद्र मोदी देश के मुसलमानों को अपने नजदीक लाना चाहते हैं, पर उनकी ही पार्टी और संघ परिवार से जुड़े कट्टरवादी संगठनों के कुछ नेता अपना पूरा प्रयास कर रहे हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री को अगर देश का प्रधानमंत्री पद संभालना है तो उन्हें एक हिंदूवादी नेता ही बने रहना पड़ेगा। ये नेता नहीं चाहते कि मोदी बनारस पहुंचकर मुस्लिमों का दिल जीतने में जुट जाएं और फिर मुसलमान भी अपना गुस्सा थूककर उनसे प्यार करने लगें। मोदी ने हाल ही में कहा था : ”एक बार जब मैं उनसे (मुस्लिमों से) मिलूंगा तो वे भी मुझसे प्यार करने लगेंगे।” बिहार के नवादा जिले से भाजपा की ओर से जोर-आजमाइश कर रहे तिलकधारी नेता गिरिराज सिंह और विश्व हिंदू परिषद के महासचिव प्रवीण तोगड़िया के ताजा बयानों पर गौर किया जाए तो दोनों ही अपनी इन कोशिशों में सफल होते नजर आ रहे हैं कि देश के मुसलमान मोदी के नजदीक नहीं फटकने पाएं। गिरिराज सिंह का कहना है कि मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए और तोगड़िया का कहना है कि बहुसंख्यकों की आबादी वाले इलाकों से अल्पसंख्यकों को अपने मकान खाली कर देना चाहिए। डॉ. तोगड़िया यह भी समझाते हैं कि अगर ऐसा नहीं होता है तो आगे क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। वे संभवत: देश के भीतर ही छोटे-बड़े ‘पाकिस्तान और हिंदुस्तान’ बनवा देना चाहते हैं। भाजपा और संघ का बहादुर नेतृत्व गिरिराज सिंह और डॉ. तोगड़िया के खिलाफ कोई कार्रवाई करने में अपने आपको इतना असहाय महसूस कर रहा है कि सार्वजनिक रूप से उनकी भर्त्सना भी नहीं करना चाहता। डॉ. तोगड़िया भी भाजपा की मौजूदा कमजोरी को अच्छे-से समझते हैं। उन्हें पता है कि चुनावों के बाद मोदी अपने विरोधियों के साथ किस तरह से निपटने वाले हैं, पर भाजपा और संघ अगर आज कोई कार्रवाई करने की हिम्मत दिखाते हैं तो बाकी बची महत्वपूर्ण सीटों के लिए होने वाले मतदान पर उसका असर कट्टरपंथी हिंदुओं की नाराजगी में व्यक्त हो सकता है। यानी कार्रवाई न करने पर मुस्लिम वोट और करने पर हिंदू वोट मोदी के हाथ से जा सकता है। भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों में उपस्थित मोदी-विरोधियों की कोशिश यही दिखाई पड़ती है कि गुजरात के मुख्यमंत्री को दिल्ली की सत्ता में नहीं आने देने के प्रयास में विपक्षी दलों को परोक्ष रूप से सहयोग पहुंचाया जा सकता है। जो लोग गुजरात के राजनीतिक मॉडल से परिचित हैं, उन्हें पता है कि नरेंद्र मोदी ने डॉ. तोगड़िया और विश्व हिंदू परिषद के प्रभाव को किस तरह से नियंत्रित करके रखा था। नरेंद्र मोदी देश को यह जताने में रात-दिन एक कर रहे हैं कि चूंकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल उनके नेतृत्व से खौफ खाते हैं, इसीलिए वे उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक रहे हैं। प्रवीण तोगड़िया का ताजा बयान संकेत है कि मोदी को रोकने की कोशिशें वास्तव में तो उनके ही खेमों से ज्यादा हो रही हैं, विपक्षी दल तो केवल हवा देने के काम में लगे हैं। अत: तमाम अवरोधों के बावजूद अगर नरेंद्र मोदी सत्ता में आ जाते हैं तो उन्हें पता है कि जिस सफाई की बात वे कर रहे हैं, उसकी शुरुआत उन्हें अंदर से ही करना पड़ेगी, जो कि वर्तमान से ज्यादा कठिन काम होगा। मोदी के अच्छे दिन आसानी से नहीं आएंगे।