विकास के एजेंडे में सुरक्षा की तलाश

[dc]एक[/dc] राष्ट्रीय सार्वभौम सत्ता के रूप में हम मजबूत होते जा रहे हैं और हम ऐसा सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने व्यक्त भी कर रहे हैं, पर एक अकेले नागरिक के तौर पर हम अपने आपको लगातार कमजोर होता हुआ और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बहुत मुमकिन है, ऐसा अन्य राष्ट्रों में भी हो रहा हो। नागरिकों का अकेलापन या उनके अंदर पनपता असुरक्षा का भाव देश के सकल घरेलू उत्पाद में कभी परिलक्षित नहीं हो पाता। ठीक वैसे ही, जैसे जमीन के गहरे अंदर, सुरंगों को भेदते हुए, काले सोने की खुदाई में जो मजदूर और इंजीनियर जुटा रहता है, वह सकल घरेलू उत्पाद में उल्लेखनीय योगदान देते हुए भी अपने आपको तब तक असुरक्षित महसूस करता रहता है, जब तक कि वह खुले आकाश के नीचे खुली हवा में नहीं पहुंच पाता। हममें किसी किस्म का ज्वर होने के प्रकट लक्षण नहीं हैं, चिकित्सक भी हमारा इलाज करने को लेकर सहमत नहीं हैं, पर हमें लगातार लगता रहता है कि हमारे हाथ तप रहे हैं। डॉक्टर मानते हैं कि हमें दवा की नहीं, मनोचिकित्सा की जरूरत है और हम डॉक्टर को अयोग्य मानते रहते हैं।
[dc]देश[/dc] की विकास दर में वृद्धि के दावे किए जा रहे हैं, जो काफी हद तक सही भी हो सकते हैं। कहा जा रहा है कि हमारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ रहा है, महंगाई घट रही है। पर ऐसा क्यूं है कि देश की एक बड़ी आबादी को यह भाषा पल्ले ही नहीं पड़ रही है? उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि उसके हिस्से की दुनिया कैसे ज्यादा रहने काबिल बन रही है। उसे यही लगता है कि वह विकास की दौड़ से बाहर सड़क के किसी एक किनारे पर दर्शकों की भीड़ का हिस्सा बनकर खड़ा है और उसे तालियां बजाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। उसे अहसास है कि भीड़ से अलग होते ही वह अपने आपको फिर से अकेला और असुरक्षित महसूस करने लगेगा। यह केवल एक मिथ है कि विकास व्यक्ति को सुरक्षा भी प्रदान कर सकता हैै। अगर ऐसा होता तो दुनिया भर में इतनी हिंसा नहीं बढ़ती। जब विकास की गति व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होने लगती है तो इसके कारण पैदा होने वाला सामाजिक घर्षण पहले असुरक्षा को और फिर उससे प्रतिरक्षा के लिए हिंसा को उत्पन्न् करता है।
[dc]इस[/dc] बात की समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पड़ताल की जा सकती है कि क्या धार्मिक या मजहबी कट्टरवाद के इतनी तेजी के साथ फैलने का कोई संबंध एक राष्ट्रीय नागरिक में व्यक्ति के रूप में अपने अंदर पनप रहे अकेलेपन के भय से है? व्यक्ति को क्या ऐसा लगता है कि एक वृहत् नागरिक समाज के बजाय धर्म की बुनियाद पर की जाने वाली संगठित सौदेबाजी कहीं ज्यादा सुरक्षा प्रदान कर सकती है, चाहे फिर उसके लिए उसे चेहरे पर नकाब ओढ़कर हिंसा का भी सहारा लेना पड़े?
[dc]अपने[/dc] बचपन के दिनों में झांककर देखने पर याद आता है कि पचास-साठ साल पहले भगवान गोगादेव की जयंती पर शहर के अत्यंत ही पिछड़े तबके के लोगों का एक छोटा-सा समूह पारंपरिक रूप से जुलूस बनाकर निकलता था। गिने-चुने लोग ही होते थे उसमें। आज जो जुलूस निकलता है, उसमें सैकड़ों लोग होते हैं और उसमें भी नौजवानों की बड़ी तादाद होती है। यही स्थिति मोहर्रम के अवसर पर होने वाले प्रदर्शनों की है, जिनमें कम उम्र के युवाओं को गर्वपूर्वक अपनी पीठ लहूलुहान करते देखा जाता है। हिंदू समाज से जुड़े संगठनों में युवाओं की बढ़ती भागीदारी और धार्मिक कट्टरता संदेह पैदा करती है कि इस एकजुटता का संबंध सुरक्षा की सामूहिक दीवारें खड़ी करने से भी हो सकता है, इस बात की परवाह किए बगैर कि जातिगत और धार्मिक एकजुटता के कारण हिंसा में इजाफा हो रहा है तथा एक अखंड राष्ट्र के तौर पर हमारी विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है। नागरिकों की एक बड़ी जमात अपने आपको कबीलाई निशानों से दागे जाने पर गौरवान्वित महसूस कर रही है। धार्मिकता को नए तरीके से परिभाषित किए जाने के आंदोलनों और उसके पक्ष में चलने वाले संगठित प्रचार अभियानों को अगर इतना व्यापक समर्थन प्राप्त हो रहा है तो उसके कारणों की भी वैज्ञानिक खोज की जानी चाहिए। क्या यह संभव नहीं कि नागरिकों को उनकी सुरक्षा के संबंध में इस तरह से भयभीत किया जा रहा हो कि वे संगठित रूप से राजनीतिक या धार्मिक सत्ताओं के तीमारदार बन जाएं। और फिर इसी ‘असुरक्षा’ के हथियार का इस्तेमाल महिलाओं की आजादी के खिलाफ फतवे जारी करने में किया जाने लगे। यह काफी खतरनाक और आतंकित करने वाली शुरुआत है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में व्यक्ति राज्य की कानून-व्यवस्था पर से अपना भरोसा उठा रहा है। वह अब अपने जाति संगठनों, धार्मिक और खाप पंचायतों और सांप्रदायिक शक्तियों की शरण ले रहा है। व्यक्ति और व्यक्ति के बीच नजरों के अविश्वास की जो दीवारें खड़ी की जा रही हैं, वह उस हिंसा को जन्म दे रही है, जो विभाजन की सांप्रदायिक हिंसा से काफी अलग है। हिंसा के जिस सांप्रदायिक चेहरे से हमारा गणतंत्र आजादी के बाद से मुखातिब रहा है, वह तात्कालिक परिस्थितियों अथवा परिस्थितिजन्य उकसावों की उपज रही और सड़कों पर पैदा होकर वहीं खत्म भी होती रही। पर यह जो नई हिंसा है, वह सोची-समझी साजिशों के तहत एक ऐसे औजार के रूप में विकसित की जा रही है कि जिसका जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल राजनीतिक सत्ताओं की रक्षा अथवा परिवर्तनों के लिए किया जा सके। ऐसा कोई चुपचाप नहीं हुआ होगा कि भीड़ में व्यक्ति के अकेलेपन के साथ जुड़े सारे संदर्भ बदल दिए जाएं। देखते-देखते भीड़ में अकेलेपन में भी अपने आपको सुरक्षित समझने वाला व्यक्ति अब केवल भीड़ की ही सुरक्षा चाहता है और अपने को अकेला नहीं देखना चाहता। उसे अब भीड़ भी अपनी ही पसंद और विश्वास की चाहिए। एक ऐसा गणतंत्र, जो विकास की नई ऊंचाइयों का स्पर्श करने के लिए बेताब है, ‘सामूहिक’ राजनीतिक नेतृत्व की नई स्थापनाओं के प्रति व्यापक जनसमर्थन की आकांक्षाएं व्यक्त कर रहा है, उसे अपने नागरिक के अकेलेपन और सुरक्षा के प्रति उसकी चिंता को भी विकास के एजेंडे में शामिल करना पड़ेगा। नागरिक को अपनी सुरक्षा को लेकर बढ़ती हिंसा के प्रति संरक्षण विकास के जमीनी ब्लूप्रिंट में मिलना चाहिए, भीड़ की हिंसा में नहीं।

'दंभ' के दायरों से बाहर आए कांग्रेस

[dc]पुराने[/dc] जमाने की हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट का यह एक अहम दृश्य होता था कि हीरो या हीरोइन की बूढ़ी मां को किसी ‘ट्रेजेडी’ के बाद इतना गहरा सदमा लगता है कि वह जड़ हो जाती है। उसका बोलना-चालना या खाना-पीना बंद हो जाता है। फिल्म की पटकथा में तब एक नकली किस्म का डॉक्टर प्रकट होता है। सफेद डॉक्टरी चोगा और गले में माला की तरह स्टेथेस्कोप लटकाए हुए यह डॉक्टर नजदीकी रिश्तेदारों को कमरे या वार्ड के बाहर सलाह देता नजर आता है कि मरीज को कोई गहरा सदमा लगा है, जो इनकी ऐसी हालत हो गई है। इन पर कोई भी दवा असर नहीं करेगी। इन्हें आप किसी भी तरह से रुलाइए। इनका रोना बहुत जरूरी है। इनका रोना ही इनका इलाज है।
[dc]अट्ठाइस[/dc] दिसंबर 1885 को स्थापित हुई एक सौ अट्ठाइस साल बूढ़ी और पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक देश भर में फैले हुए लाखों कार्यकर्ताओं (और नेताओं) की IमांO कांग्रेस को भी चुनावी मैदान में मिल रही पराजयों से इतना गहरा सदमा लगा है (और जारी है) कि पार्टी पूरी तरह से किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई है। सन्निपात की स्थिति में जैसे मरीज कुछ भी बड़बड़ाने लगता है, वैसा ही हाल पार्टी के जिम्मेदार नेताओं का हो गया है। कांग्रेस पार्टी भी एक पुरानी फिल्म की तरह ही पेश आ रही है। डॉक्टरी सलाह के अनुसार उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बहनी चाहिए पर वह पथरीली बनी हुई है।
[dc]देश[/dc] में एक मजबूत राष्ट्रीय विपक्ष की जरूरत की चिंता करें तो कांग्रेस को उसके वर्तमान सदमे से बाहर निकालकर उसे हकीकत में भी रुलाने की जरूरत आन पड़ी है, पर पार्टी अपने आपको सामान्य करने के लिए तैयार नहीं दिखाई पड़ती। ऐसा लगता है जैसे पूरी तरह से मैदान से बाहर होने से पहले वह संगठन के जनता से संवाद के सारे माध्यमों को अपने अहंकारी बारूद से नेस्तनाबूद कर देना चाहती है। कांग्रेस पार्टी के बारे में किसी समय कहा जाता था कि उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं में देशप्रेम और ईमानदारी कूट-कूटकर भरी है। आज पार्टी चाटुकारिता और भ्रष्टाचार के नशे की गिरफ्त में आ गई है और उससे मुक्त भी नहीं होना चाहती। डॉ. मनमोहन सिंह और पृथ्वीराज चव्हाण, दोनों की मजबूरियों के बीच जैसे कोई फर्क नहीं रह गया। डॉ. मनमोहन सिंह गठबंधन की मजबूरियों के चलते 2-जी और कोयला खदानों के आवंटन के मामलों में कोई कार्रवाई नहीं कर पाए और पृथ्वीराज आदर्श सोसायटी को लेकर। पृथ्वीराज ने जब मुंह खोला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
[dc]महाराष्ट्र[/dc] के चुनाव परिणाम इस मायने में संकेत हैं कि कांग्रेस पार्टी की नीयत में अगर ईमानदारी हो तो घर की सफाई दीपावली के बाद भी की जा सकती है या ठेके पर देकर भी करवाई जा सकती है। पार्टी का अभी सबकुछ बर्बाद नहीं हुआ है। शिवसेना के भाजपा से अलग होकर अकेले दम पर चुनाव लड़ने की कहानी अलग है। पर शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल की महत्वाकांक्षाएं Iपृथ्वीO के Iगुरुत्वाकर्षणO को छोड़ अगर ऊंची उड़ानें नहीं भरतीं और कांग्रेस-राकांपा का गठबंधन कायम रहता तो मुंबई के शेयर बाजार का नक्शा कुछ और होता। कहा जा सकता है कि कांग्रेस के साथ चुनावी समझौता तोड़ने के बावजूद शरद पवार के IकेलकुलेशंसO गलत पड़ गए। राकांपा को उम्मीद रही होगी कि कांग्रेस-राकांपा के मतों में बंटवारे के बाद भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा, पर वैसा नहीं हुआ। कांग्रेस फिर भी तीसरे नंबर पर आ गई। महाराष्ट्र पूरी तरह से Iकांग्रेसमुक्तO नहीं हो पाया। शरद पवार की पार्टी ने हड़बड़ी में भाजपा को सरकार बनाने में बाहर से समर्थन देने की भी घोषणा कर दी। महाराष्ट्र में सरकार निश्चित रूप से भाजपा की ही बनेगी, पर वह हरियाणा जैसी तो नहीं ही रहेगी। शिवसेना सरकार बनाने में भाजपा का दाहिना पैर बनना चाहती है, भाजपा के लिए बाएं हाथ की बैसाखी नहीं। भाजपा को ज्यादा तलाश बैसाखी की है और वह शरद पवार भी दे सकते हैं।
[dc]कांग्रेस[/dc] नेतृत्व के साथ नई दिक्कत यह है कि उसे अब भाजपा के द्वारा किए जाने वाले हमलों के कम और अपनी ही पार्टी के लोगों द्वारा किए जा रहे प्रहारों के ज्यादा जवाब देना हैं। कुमारी सैलजा द्वारा भूपिंदर सिंह हुड्डा के खिलाफ दिया गया बयान या कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में मंत्री दिनेश गुंडूराव द्वारा Iदिल्ली के पार्टी नेतृत्वO के खिलाफ की गई सार्वजनिक टिप्पणी बताती है कि मवाद फूटकर बाहर तो आ रहा है, पर पार्टी नेतृत्व अभी भी आंसू बहाने या पोंछने को तैयार नहीं है।
[dc]गौर[/dc] करने की बात है कि भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अपनी भाषा, चेहरों और प्रस्तुतिकरण में लोकसभा चुनावों के पहले की आक्रामकता और तेवरों को विनम्रता में तब्दील करते हुए जनता के ज्यादा नजदीक होने की कोशिशों में हैं। वहीं दूसरी ओर आनंद शर्मा, अभिषेक मनु सिंघवी और मनीष तिवारी के तेवर और अंदाज यही बताने की कोशिशों में लगे रहते हैं कि कांग्रेस अभी भी सत्ता में बनी हुई है या फिर जल्द ही फिर से वापसी करने वाली है। हकीकत में कांग्रेस का IरिवायवलO पार्टी का अपने अतीत से मुक्त होने में छुपा है। कांग्रेस ने राजाओं के प्रिवीपर्स तो बंद कर दिए, पर अपने आपको सामंती अतीत से मुक्त नहीं कर पाई। उसके संग्रहालयों में अभी भी शिकार किए गए शेरों की खालें, बारहसिंघों के सिर और म्यानों में कैद जंग खा चुकी तलवारें प्लास्टर छोड़ती दीवारों से चिपकी हुई नजर आ जाएंगी।
[dc]कांग्रेस[/dc] की आंखों में आंसू पैदा करने के लिए किसी फिल्मी किस्म के नकली डॉक्टर की नहीं, बल्कि एक असली चाय बेचने वाले की जरूरत है। सवाल यह है कि जो पार्टी 128 वर्षों में भी उसे नहीं तलाश पाई तो अब कैसे कर पाएगी! अगर कांग्रेस को अपने से भारत को मुक्त नहीं होने देना है तो यह चमत्कार भी करके दिखाना पड़ेगा। वैसे लोकसभा चुनाव के मुकाबले महाराष्ट्र के परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो कांग्रेस के लिए सदमा उतना गहरा भी नहीं है, जितना कि उसे बनाया और बताया जा रहा है।

गांधी की याद आने के मायने

[dc]एक[/dc] ऐसे राष्ट्र के जीवन में, जिसने विकास की उपलब्धियों से साक्षात्कार कर लिया है और जो संपन्‍नता के रास्तों पर दौड़ लगाते हुए विकसित व्यवस्थाओं की जमात में अपने आपको शामिल देखने के लिए बेचैन हो उठा है, आने वाला समय परीक्षा की घड़ी पेश कर सकता है। बहुत मुमकिन है विकास की जद्दोजहद में नागरिक इतने थक जाएं कि वे सवालों के सही जवाब ढूंढ़ने में अपने आपको असहाय पाने लगें। ऐसी कोई भी परिस्थिति आश्चर्य पैदा करने वाली नहीं होगी। यह भी मानना गलत होगा कि किसी भी राष्ट्र के जीवन में ऐसा पहली बार होगा या हो रहा है। ऐसा पहले भी होता रहा है। डर यह है कि एक प्रभुतासंपन्न राष्ट्र के रूप में हमसे सवाल किया जा सकता है कि विकास की दौड़ में हम किन साधनों का उपयोग करने जा रहे हैं अथवा कर रहे हैं। इसका दूसरा अर्थ इस बात का जवाब देना होगा कि स्वाधीनता प्राप्ति के लिए हम जिस तरह के अहिंसक धैर्य की एक लंबी और कठिन परीक्षा से संकल्पपूर्वक गुजरे थे, क्या उस पर हम अब भी कायम हैं या उसमें किसी प्रकार का संशोधन करने को तैयार हो गए हैं? सवाल का संबंध हिंसा के औचित्य से नहीं, बल्कि अहिंसा को ही साधन के रूप में अंतिम स्तर तक इस्तेमाल करते रहने के प्रति उस राष्ट्रीय प्रतिबद्धता से है, जिसके कि लिए हम हमेशा से दुनियाभर में पहचाने जाते रहे हैं। सही पूछा जाए तो हमारी सार्वभौमिक पहचान या ‘आइडेंटिटी’ भी वही है। ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि एक राष्ट्र के रूप में हमारे व्यक्तित्व में जिस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं, कदमों में तीव्रता आ रही है, हम अपनी इच्छाओं के प्रति आपा खो रहे हैं, वह सब अहिंसा की सैद्धांतिक आवश्यकता का तिरस्कार करते प्रतीत होते हैं। हम साध्य की बात, साधनों की शुचिता के मुकाबले ज्यादा जोर से, मोटी आवाजों में करने लगे हैं। यह एक ऐसी परिस्थिति है, जिसमें चलती-फिरती आत्माओं और शरीरों का स्थान चालकरहित यंत्र लेने लगते हैं। यंत्र, हिंसा और अहिंसा के बीच कोई फर्क नहीं करते। यंत्रों का समूचा ‘ध्यान’ साध्य पर रहता है। वे चेहरों को नहीं पहचानते। मनुष्यों को उनके एकल स्वरूप, और समूह में समूचे राष्ट्र को यंत्रों में तब्दील करने की शर्त यही है कि उन्हें जड़वत या संवेदनाशून्य कर दिया जाए। उनके भीतर से महसूस करने की शक्ति और संभावना को पूरी तरह से निरस्त कर दिया जाए। देश और दुनिया में ‘आदिवासियों’ या ‘आदिम जातियों’ के कुछ ऐसे समूह अभी भी कायम हैं, जो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध ‘अंधेरे’ की सीमाओं को लांघकर ‘बाहर की रोशनी’ से साक्षात्कार करने के लिए भी किसी भी लालच पर तैयार नहीं हैं। उनका साम्राज्य तमाम तरह के कानून-कायदों, अदालतों और संविधानों से अभी भी अछूता है। जनगणनाओं में वे हमारे बीच हैं, लेकिन यथार्थ में नहीं हैं। पर इससे क्या फर्क पड़ता है? एक बड़ी जनसंख्या ने तो अपने आपको बदलने का फैसला कर ही लिया है। मुद्दा यह है कि बदलने की शर्तें साध्य से तय की जा रही हैं या कि साधनों से, इस बात की स्पष्टता नहीं होने दी जा रही है। कभी होगी भी नहीं। न तो कोई इस बारे में स्पष्टीकरण मांगेगा और न कोई देगा ही।
[dc]विकास[/dc] को जब एक युद्ध में बदल दिया जाता है तो साधारण से साधारण व्यक्ति से भी अपेक्षा की जाने लगती है कि उसमें ऐसे सैनिक के गुण आ जाएं, जो केवल हुक्म का ही पालन करना जानता हो, किसी तरह के सवाल नहीं पूछता। भय यह लगता है कि विकास की यात्रा के औजारों के बारे में सवाल पूछने का मतलब विकास की अवधारणा के प्रति असहमति व्यक्त करना स्थापित किया जा सकता है। उसे अनुशासन-भंग करना करार दिया जा सकता है। इस तरह की परिस्थितियों के बाद ही यह तय किया जाता है कि वैचारिक रूप से असहमति रखने वाले ‘अल्पसंख्यकों’ को विकास की संपन्न्ता में भागीदारी दी जाए अथवा नहीं।
[dc]शासकों[/dc] की रणनीति का यह हिस्सा हो सकता है कि वे जनता के बीच किसी भी तरह की ‘वैचारिक असहमति’ को पनपने ही न दें। अगर पनपने की कोई कोशिश हो तो उसे ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के नाम पर विकास के फायदों को बटोरने में व्यस्त उस भीड़ के हवाले कर दें, जो एक बिंदु के पश्चात ‘चालक रहित” होकर कुछ भी महसूस करना बंद कर देती है। दुनिया के अनेक राष्ट्रों में ऐसा हो रहा है। कारागारों और उनमें भेजे जाने वाले ‘असहमत’ नागरिकों की बढ़ती हुई संख्या इसी बात का प्रमाण है कि विकास के लिए अपनाए जाने वाले मॉडलों में कहीं न कहीं कोई गंभीर चूक है। और कि विकास के जरिये पैदा होने वाली संपन्नता का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हो पा रहा है। अगर ऐसा सच नहीं होता तो अब तक तो कारागारों की जरूरत ही लगभग समाप्त हो जानी चाहिए थी।
[dc]विकास[/dc] की अवधारणा में साधन और साध्य के बीच के फर्क को जानबूझकर नजरअंदाज किए जाने के फलस्वरूप ही ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं। और यह फर्क उस समय पूरी तरह से गौण होने लगता है, जब बाहरी हमलों से अपने नागरिकों और संवैधानिक संस्थानों की सुरक्षा की आड़ में राज्य की शक्ति के सार्वजनिक प्रदर्शन को नागरिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक मान्यता प्राप्त होने लगती है। और फिर हिंसा की क्षमता पर आश्रित राज्य की इस शक्ति पर सामान्य नागरिक बिना यह संदेह व्यक्त किए गर्व और यकीन करने लगता है कि ‘वैचारिक असहमति या अल्पमतता’ की स्थिति में भी उसका इस्तेमाल उसी के खिलाफ कभी नहीं किया जाएगा। आश्चर्यजनक नहीं है कि राष्ट्रों की स्वतंत्रता के साथ-साथ नागरिक अधिकारों के सीमित होने के उदाहरण भी लगातार बढ़ रहे हैं।
[dc]मोहनदास[/dc] करमचंद गांधी की याद हमें आज के दिन इसलिए ज्यादा आती है कि वे अंग्रेजी हुकूमत की इस मंशा के प्रति सोते-जागते सचेत रहते थे कि वह राज्य की हिंसा को संस्थागत स्वरूप प्रदान कर उसे स्थायी बनाने की कानूनी गलियां ईजाद करने के बहाने नहीं ढूंढ़ ले। और साथ ही गांधी नागरिक समाज की इन कमजोरियों के प्रति भी संवेदनशील रहते थे कि साध्य तक पहुंचने की जल्दबाजी में वह धैर्य खोकर हिंसा का भी सहारा ले सकता है। इसीलिए चौरी-चौरा जैसा जब कोई कांड होता और शासन के विरुद्ध हिंसा का भी उपयोग करने के लिए नागरिक तत्पर हो उठता तो गांधी अपने देशव्यापी अहिंसक सत्याग्रह आंदोलन को भी वापस ले लेते थे। वे अंग्रेजों को अवसर ही नहीं देते थे कि वे राज्य की हिंसा का कानूनी हथियार के रूप में इस्तेमाल कर स्वतंत्रता प्राप्ति के समूचे आंदोलन की प्रामाणिकता को ही भंग कर दें।
[dc]दुर्भाग्यपूर्ण[/dc] है कि विकास के सपनों को साकार करने के प्रयासों के बीच आकार लेती हिंसा के साम्राज्य को भी नागरिकों की मौन स्वीकृति प्राप्त हो रही है। उसे नियंत्रित करने की आवश्यकता गांधी की अनुपस्थिति के साथ ही गैर-जरूरी मानी जा रही है। ये ही परिस्थितियां कालांतर में राज्य की सत्ता को अवसर प्रदान करती हैं कि वह तात्कालिक हिंसा से निपटने के लिए अपनाए जाने वाले अस्थायी उपायों को नागरिक समाज की कमजोर स्मरण शक्ति का लाभ लेते हुए छद्म तरीकों से स्थायी कर दे। ऐसा दुनिया के अनेक मुल्कों में हो रहा है। अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देश में आतंकी हमले की घटना के बाद ऐसा ही हुआ। नागरिक अधिकारों और आजादी के लिए लंबे संघर्ष करना पड़ते हैं। पर विकास और सुरक्षा की जरूरत जब उन्हीं अधिकारों और स्वतंत्रताओं को सीमित कर देती है तो आहट तक नहीं सुनाई देती। हम गांधी को शायद इसीलिए याद करना या दोहराना नहीं चाहते कि ऐसा करने पर हमें ऐसे बहुत सारे असुविधाजनक सवालों के उत्तर तलाशना पड़ेंगे, जिनका कि सामना करने के लिए हम तैयार नहीं हैं। पर गांधी हमारा कभी पीछा छोड़ने वाले भी नहीं हैं।
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देश और भाजपा हित में अच्छे नतीजे

[dc]उपचुनावों[/dc] के नतीजों पर प्राप्त हो रही प्रतिक्रियाओं का रुख लगभग सही दिशा में ही है। योगी आदित्यनाथ के तेवर ठंडे पड़ गए हैं और उद्धव ठाकरे के चेहरे पर मुस्कराहट है। पर, प्राप्त परिणामों से इस आशय के कयास भी नहीं लगाए जाने चाहिए कि सरकार के सौ दिन पूरे होते ही विपक्ष के अच्छे दिन आ गए हैं। कुल जमा बत्तीस सीटों में से बीस पर भाजपा की हार का प्रारंभिक संकेत यही है कि विपक्ष वेंटीलेटर से उठकर आईसीयू में पहुंच गया है। भारतीय राजनीति के लिए यह एक शुभ संकेत है कि विपक्षी पार्टियां अपने को अभी लड़ाई के मैदान में कायम रखना चाह रही हैं। पिछले चुनाव में लालू और नीतीश ने एक सर्वथा असंभावित गठबंधन को साकार कर भाजपा के लोकसभाई ‘अहंकार’ को नियंत्रित किया था। इस उपचुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने अपने को मैदान से बाहर रखकर समाजवादी पार्टी को कुल ग्यारह में से आठ सीटों पर जीत प्राप्त करने में मदद कर दी। विपरीत ध्रुवों वाले विपक्षी दलों के बीच अप्रत्याशित गठबंधनों की पहल के नतीजे सामने हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार भारतीय जनता पार्टी के सपनों के साम्राज्य हैं। लोकसभा चुनावों में भी इन दोनों राज्यों से ही सबसे ज्यादा चौंकाने वाले नतीजे प्राप्त हुए थे। ताजा परिणाम हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभाओं के लिए अक्टूबर में होने वाले चुनावों को किस हद तक प्रभावित कर पाते हैं, देखना इसलिए दिलचस्प होगा कि अब सभी पक्ष अपनी समूची ताकत उनमें झोंकने वाले हैं। उपचुनावों के नतीजे इन मायनों में हितकारी साबित हो सकते हैं कि इनसे भारतीय जनता पार्टी को अपने सहयोगी दलों के प्रति ज्यादा उदारता बरतने में मदद मिलेगी। और शायद यह भी कि सत्तारूढ़ दल अपनी कार्यप्रणाली को और ज्यादा प्रजातांत्रिक बनाएगा।
[dc]देश[/dc] की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पांच वर्षों तक शासन करने का अधिकार दिया है। अत: यह मानने की भूल नहीं की जानी चाहिए कि जनता का सरकार से मोहभंग हो गया है या कि होने जा रहा है। ऐसा बिलकुल नहीं है। पर यह जरूर सिद्ध हुआ है कि, खासकर उत्तर प्रदेश में, भारतीय जनता पार्टी की चुनावी ‘रणनीति’ विफल हो गई। वह रणनीति अगर ‘हिंदुत्व’ के मुद्दे के आधार पर प्रदेश का ध्रुवीकरण कर ज्यादा सीटें जीतने तक ही सीमित थी तो उसका विफल होना व्यापक संदर्भों में स्वागतयोग्य भी है। राष्ट्रीय क्षितिज पर नरेंद्र मोदी का ‘अवतरण’ एक ऐसे विकास-पुरुष के रूप में हुआ था, जिसने गुजरात में समृद्धि का एक मॉडल खड़ा किया है। और कि उस मॉडल को देशभर में दोहराया जा सकता है। उपचुनावों के नतीजे अगर भाजपा को उसके विकास के एजेंडे पर लौटने के लिए मजबूर करते हैं तो उसे इन उपचुनावों की बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। लोकसभा चुनावों में मिले प्रचंड बहुमत के बाद अगर इन विधानसभा उपचुनावों में भी भाजपा को वैसा ही समर्थन प्राप्त हो जाता तो हमारे नए शासक जनता से और ज्यादा दूर निकल जाते। ताजा मेंडेट जनता के स्तर पर तो ध्रुवीकरण की कोशिशों पर लगाम कसेगा ही, भाजपा के अंदर भी वैचारिक विभाजन को मजबूती नहीं पकड़ने देगा। अत: भारतीय जनता पार्टी को तो चुनाव परिणामों का देश और पार्टी हित में स्वागत ही करना चाहिए। वैसे अब उत्तर प्रदेश में ज्यादा शांति की उम्मीदें की जा सकती हैं।

सभी पड़ोसी बराबर हैं, नहीं भी हैं!

[dc]पाकिस्तान[/dc] के साथ विदेश सचिव स्तर की बातचीत को रद्द करके मोदी सरकार ने इस्लामाबाद को जो संदेश दिया है, उसके मायने साफ हैं। पहला तो यही है कि कोई तीन महीने पहले नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ के मौके पर नवाज शरीफ की मौजूदगी से दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों के जमीनी हकीकतों से ज्यादा घने जो ‘बादल” निर्मित किए गए थे, उनका वक्त रहते छंटना स्वाभाविक था। नवाज शरीफ वैसे भी इस वक्त अपने ही देश के आंतरिक संकट में काफी उलझे हुए हैं और तय नहीं है कि उससे किस तरह से और कब उबर पाएंगे। हकीकत यह भी है कि भारत के संबंध में नवाज शरीफ सरकार का एजेंडा या तो वहां की सेना और आईएसआई तय करती है या फिर हाफिज सईद जैसी कट्टरपंथी ताकतें। नौकरशाही के स्तर पर बातचीत की औपचारिकताओं का प्रदर्शन करते रहने के लिए हमेशा की तरह एक संकरी गली इस बार भी मौजूद थी, पर अब वह भी बंद हो गई है। ऐसी परिस्थतियों में तात्कालिक रूप से दोनों देशों के बीच, अप्रिय विकल्पों को छोड़ दें तो, यही रास्ता बचता है कि किसी तीसरे शक्तिशाली राष्ट्र के मार्फत एक-दूसरे के खिलाफ दबाव की कूटनीति का प्रयोग करें। अमेरिका ने इस काम में पहले से सिद्धहस्तता प्राप्त कर रखी है। अप्रिय विकल्पों में जाएं तो एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य शक्ति का उपयोग ही बाकी बचता है। ताजा घटनाक्रम के पूर्व नवाज शरीफ कश्मीर को लेकर अपने देश में बयान दे चुके थे। नरेंद्र मोदी भी लेह में कह चुके थे कि पाकिस्तान भारत के साथ सीधे युद्ध करने की हिम्मत खो चुका है, इसलिए वह आतंकवादी गतिविधियों के जरिए छद्म युद्ध जारी रखे हुए है। पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बना सकता है कि नवाज शरीफ की नई दिल्ली यात्रा, शॉलों और साड़ियों के आदान-प्रदान के जरिए बनी सद्भावनाओं के बाद विदेश सचिवों की प्रस्तावित इस्लामाबाद वार्ता को केवल इसी आधार पर रद्द कर दिया जाए कि अब्दुल बासित कश्मीरी अलगाववादियों के साथ मुलाकातें कर रहे थे।
[dc]इस[/dc] बात में कोई शक नहीं कि पाकिस्तानी उच्चायुक्त द्वारा अलगाववादियों से मुलाकात करने का फैसला नई दिल्ली में नहीं, बल्कि इस्लामाबाद में लिया गया होगा। इसके पीछे इरादा भी साफ रहा होगा कि पाकिस्तान विदेश सचिव स्तर की बातचीत का एजेंडा अलगाववादियों की मंशा अनुसार ही आगे बढ़ाने की नीयत रखता है। भारत सरकार द्वारा बातचीत को रद्द कर देने जैसा कठोर कदम उठाने के बावजूद अगर पाकिस्तानी उच्चायुक्त कश्मीरी अलगाववादियों के साथ मुलाकातें जारी रखते हैं और अपने कदम का बचाव करते हैं तो समझा जा सकता है कि इस्लामाबाद ने भारत के खिलाफ अपना कितना कुछ दांव पर लगा रखा है। और यह भी कि पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमेंट भारत की नाराजगी तो बर्दाश्त करने को तैयार है, पर कश्मीर के अलगाववादी तत्वों की नहीं।
[dc]भारत[/dc] की ओर से जो ‘रिस्क” ली गई है, उसके परिणाम दूरगामी भी हो सकते हैं। दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने की दिशा में नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के साथ जो पहल प्रारंभ की थी, उसमें पाकिस्तान की ओर से अस्थायी तौर पर व्यवधान उपस्थित हो सकता है। अपनी घरेलू चुनौतियों से जनता का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमेंट भारत के साथ तनाव को जरूरत से ज्यादा महत्व दे सकता है। नवाज शरीफ की भारत-यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच अमन की आशा रखने वाले एक बड़े तबके को वार्ता के रद्द होने से निराश होना पड़ सकता है।
[dc]ताजा[/dc] घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में इस सच्चाई की भी समीक्षा की जा सकती है कि अपने पड़ोसियों द्वारा सीमा क्षेत्रों पर की जाने वाली हरकतों के मामले में हम पाकिस्तान के प्रति जितने संवेदनशील बने रहते हैं, उतने चीन को लेकर नहीं होते। चीन के प्रति नरमी का यह नजरिया पिछली सरकारों में भी कायम था और वर्तमान हुकूमत भी उन्हीं नीतियों पर चलती दिखाई पड़ती है। 1962 के युद्ध के बाद से ही चीन ने हमारा एक बड़ा भूभाग अपने कब्जे में कर रखा है। इसके साथ ही अरुणाचल प्रदेश को लेकर वह हमें लगातार चुनौतियां देता रहता है। लद्दाख के उत्तरी इलाकों या अरुणाचल प्रदेश में होने वाली चीनी घुसपैठों के प्रति भारतीय प्रतिरक्षा प्रतिष्ठानों का आमतौर पर रुख घटनाओं को सामान्य घटनाक्रम निरूपित करने या ज्यादा हवा नहीं देने का ही दिखाई देता है। उत्तरी लद्दाख में पच्चीस किलोमीटर तक चीनी घुसपैठ की ताजा खबरों को भी बहुत ज्यादा अहमियत नहीं दी गई। भारतीय मीडिया भी चीन के मुकाबले पाकिस्तान के प्रति ही ज्यादा संवेदनशील बना रहता है। सरकारी स्तर पर चीन की दादागिरी को उस तरह से नहीं ललकारा जाता, जैसा पाकिस्तान को लेकर होता है।
[dc]पिछले[/dc] वर्ष अक्टूबर अंत में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा की गई बीजिंग यात्रा के दौरान तय हुआ था कि दोनों देशों के बीच स्थित चार हजार किमी लंबी ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा” (एलएसी) पर शांति और सद्भावना बनी रहेगी। दोनों देशों ने सीमा रक्षा से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण समझौते ‘बॉर्डर डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट” पर हस्ताक्षर भी किए। पर समझौते के मंत्रों का चीन की ओर से शायद ही कभी ईमानदारी के साथ पालन किया गया हो।
[dc]इस्लामाबाद[/dc] के मुकाबले बीजिंग के प्रति हमारे रवैये में लचीलेपन का कारण यह भी माना जा सकता है कि चूंकि चीन विश्व की एक बड़ी आर्थिक और सैन्य ताकत है, हमें उसके साथ अलग तरीके से ही पेश आना होगा। भारत ने कई मर्तबा कई मंचों पर व्यक्त भी किया है कि चीन हमारा सबसे बड़ा पड़ोसी और विश्वभर में उपस्थिति रखने वाला महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोगी है। इन अनुमानों के विपरीत अगर नरेंद्र मोदी की हाल की काठमांडू यात्रा से यह संदेश पहुंचा हो कि चीन की नाराजगी की कीमत पर भी भारत नेपाल को अपने करीब लाने को उत्सुक है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान के प्रति हमारे ताजा फैसले से चीनी नेताओं तक भी संदेश पहुंचेगा कि भारत के साथ रिश्तों को लेकर बीजिंग को अपना दृष्टिकोण आगे या पीछे बदलना ही पड़ेगा।

परिवर्तनों का श्रेय औरों को देने के खतरे

[dc]अपने[/dc] आसपास जो कुछ भी परिवर्तन होता हुआ हम देख रहे हैं, उसे लेकर हम अभिभूत तो हैं पर साथ ही आशंकित भी। अभिभूत इसलिए कि हम हालातों को लेकर बहुत ही चिंतित और परेशान थे। हमें लगने लगा था कि सबकुछ यंत्रवत हो गया है, चेहरे भी और अवधारणाएं भी। कुछ भी बदलने का नाम नहीं ले रहा। या यूं कहें कि बदल पाने का साहस नहीं जुटाया जा रहा है। और फिर, हमें अचानक लगने लगा कि हम केवल एक मशीनी भीड़ भर नहीं हैं, जीते-जागते समूह हैं। हमारी भी कुछ पहचान है, अस्मिता है। हम चीजों को उनकी स्थापित जगहों से हटा भी सकते हैं। वे प्रतिमाएं, जो हमारी आंखों को लगातार चुभ रही थीं, उनके चेहरों को विपरीत दिशाओं में मोड़ भी सकते हैं। अगर चाहें तो उन्हें अपने रास्तों से हटा भी सकते हैं। हमें डराया गया कि प्रतिमाएं तो स्थापित परंपराओं की तरह होती हैं। उनके साथ खिलवाड़ नहीं किया जाता। उन्हें ढोते रहना हमारी नियति है। वे हमारी नागरिकता और प्रतिबद्धता की प्रमाण हैं। और कि इतिहास में जब-जब भी प्रतिमाओं, प्रतिबद्धताओं, प्रमाणों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की गई, राष्ट्र के राष्ट्र विनाश के रास्तों पर भटक गए। हमें बार-बार अपने शानदार अतीत, अपने गौरवशाली इतिहास और उसके पन्नों में जगह पाते नायकों और उनकी विजय-पताकाओं के हवाले दिए गए। पर हमने तो अब जैसे समूचे परिवेश को हर तरह की कीमत पर बदल देने का संकल्प ही कर लिया है। जैसे कि हम सत्ताओं की आत्माओं में चीजों को जड़-मूल से बदल देने की अपनी क्षमताओं के प्रति खौफ पैदा करना चाह रहे हों। हमें वास्तव में तो केवल अभिभूत होना चाहिए कि हम अपने संकल्पों को हकीकतों में बदलता हुआ देखने में सफल हो रहे हैं। या फिर, हमें ऐसा अनुभव होना चाहिए कि जो काम हमने हाथों में लिया था, वह पूरा भी किया जा सकता है। पर संभवत: एक ऐसे राष्ट्र के रूप में, जिसने विश्वयुद्धों की विभीषिका को वैसे अनुभूत नहीं किया, जैसा कि पश्चिम के देशों ने भुगता, या फिर ऐसे नागरिकों के रूप में, जो एक पश्चिमी राष्ट्र की गुलामी से मुक्त होने के लिए ज्यादातर अहिंसक लड़ाइयां लड़ते रहे, हमारी इस परेशानी का कोई दबा हुआ कारण हो सकता है कि हम अपने वर्तमान को लेकर हमेशा ही आशंकित बने रहते हैं। हमारा शायद स्वभाव बन गया है कि यथास्थितिवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने की उत्कट आकांक्षा रखते हुए भी हम प्राप्त परिणामों के स्थायित्व को लेकर आशंकाओं के कृत्रिम बादलों के निर्माण में जुटे रहते हैं। अपने वर्तमान के प्रति बहुत जल्दी व्याकुल और अधीर हो उठते हैं। शायद, यही कारण हो सकता है कि अपनी ही कोशिशों से हो रहे परिवर्तनों को लेकर भी हम फिर से उदास होने के बहाने ढूंढ़ना चाहते हैं, प्रयासपूर्वक आशंकित होते रहना चाहते हैं। जो कुछ भी हमें अब तक प्राप्त नहीं हुआ, या जिन स्वप्‍नों से वर्षों तक हमें दूर रखा गया, हम उन्हें हासिल करने का यह कहते हुए अधिकार जताना चाहते हैं कि हमें ऐसा ही आश्वस्त किया गया था। पर यह सत्य नहीं है। सत्य हो तो भी उसे सच के रूप में इसलिए स्थापित नहीं होने देना चाहिए कि परिवर्तन की जरूरत का इस्तेमाल ‘किराए की कोख’ की तरह नहीं हो सकता। तब तो ‘क्रांतियों’ के ‘मातृत्व’ और उनके ‘नायकों’ की वैधानिकता को लेकर सवाल उठने लगेंगे। इस तरह के खतरों के प्रति सावधान रहने की जरूरत है। एक लंबी प्रतीक्षा के बाद प्रारंभ हुई यात्रा के ठहरने के लिए रास्तों में छोटे-छोटे मुकाम खड़े करने के लोभ से कुछ फासलों के तय हो जाने तक बचना चाहिए। यह स्थापित किया जाना जरूरी हो गया है कि जो कुछ भी परिवर्तन हो रहे हैं, उसके सूत्रधार या रचनाकार हम ही हैं, कोई और नहीं। आगे भी ऐसा ही रहने वाला है। जो कुछ भी बदल रहा है या आगे बदलना चाहिए, वह आयातित नहीं है। आयातित क्रांतियां न तो स्थायी होती हैं और न ही देशी लोकतांत्रिक
संस्थाओं को मजबूत ही करती हैं। अपने परिवर्तनों का श्रेय किसी और को देने का अर्थ लोकतंत्र के नकाब में तानाशाही को आमंत्रित करने जैसा होगा। पंद्रह अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को जिस परिवर्तन को हमने आत्मसात किया था, उसके पीछे अहिंसक धैर्य की एक लंबी और कठिन परीक्षा थी। अत: यह घड़ी परिवर्तन के परिणामों के प्रति आशंकित होने की नहीं, बल्कि जश्न मनाने की है।

अब नटवर की 'अंतरात्मा ' की आवाज

[dc]कुंअर[/dc] नटवर सिंह की बहुचर्चित, बहुप्रतीक्षित और बहुत विवादित बनने वाली अंग्रेजी किताब ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ : एन ऑटोबायोग्राफी’ को हिंदी में समझने के लिए ‘ऐसी कांग्रेस फिर ना मिलेगी दोबारा : कहानी गांधी परिवार की’ कहा जा सकता है। वह इसलिए कि नटवर सिंह ने अपनी उम्र के तिरासी वर्ष पूरे कर लिए हैं और, बकौल उनके, वे अपने पारिवारिक उत्तराधिकारियों के लिए किसी तरह के संदेह के बादल नहीं छोड़कर जाना चाहते थे। गांधी परिवार के साथ अपने रिश्तों की गांठों की परतों को खोलने का उनके लिए इससे बेहतर और कोई वक्त नहीं हो सकता था। क्योंकि कांग्रेस इस समय आजादी के बाद से अपने सबसे कमजोर विकेट पर है और नटवर सिंह उम्मीद कर सकते हैं कि पार्टी उनके जीवनकाल में तो वापस सत्ता में नहीं आएगी। अब सोनिया गांधी ने भी धमकी दे दी है कि वे भी किताब लिखकर समूचे सच को उजागर कर देंगी। नटवर सिंह के धैर्य की दाद दी जा सकती है कि गांधी परिवार के साथ जुडे अपने सच को उजागर करने में उन्होंने इतने वर्षों तक इंतजार किया। इतना इंतजार कि पांच सौ तिरालिस सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को अपने अब तक के इतिहास की सबसे कम 44 सीटें प्राप्त हुईं।
[dc]नटवर[/dc] सिंह की किताब की क्या विशेषता हो सकती है? क्या यह कि इराकी तेल सौदे पर वोल्कर रिपोर्ट पर बैठाई गई आरएस पाठक जांच कमेटी के निष्कर्षों के आधार पर उनके खिलाफ की गई ‘एकतरफा’ कार्रवाई से वे इतने खफा थे कि अपने प्रति हुए ‘अन्याय’ का बदला लेना चाहते थे? नटवर सिंह इस रहस्योद्घाटन से क्या सिद्ध करना चाहते हैं कि वर्ष 2004 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का ‘अंतरात्मा’ की आवाज पर नहीं, बल्कि अपने बेटे राहुल के चौबीस घंटे के अल्टीमेटम के तहत त्याग किया था? एक बेटे के रूप में राहुल को तब डर था कि अगर उनकी मां प्रधानमंत्री बन गईं, तो उनका भी वही हश्र हो सकता है, जो उनकी दादी और पिता का हुआ था। पर क्या वर्ष 2004 में सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन ही जातीं तो डॉ. मनमोहन सिंह के मुकाबले अपने आपको इतना बेहतर साबित कर पातीं कि पार्टी को 2009 में फिर से विजयी करवा देतीं? नटवर सिंह के रहस्योद्घाटन से दो बातें हुई हैं। एक तो यह कि राहुल गांधी के प्रति जनता की सहानुभूति बढ़ गई है। दूसरे यह कि वर्ष 2004 में सोनिया गांधी को सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा आमंत्रित नहीं करने को लेकर अफवाहों का जो साम्राज्य स्थापित किया गया था, उसे नटवर सिंह ने अपनी किताब से ध्वस्त कर दिया। तब अफवाहों में यह भी शामिल था कि सोनिया गांधी की ‘भारतीयता’ व उनके ‘विदेशी मूल’ को लेकर राष्ट्रपति भवन में आपत्तियां दर्ज करवाई गई थीं, जिनके कि कारण उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अपना इरादा त्यागना पड़ा।
[dc]नटवर[/dc] सिंह ने जाहिर किया है कि सोनिया गांधी उन्हें अपने नजदीक के लोगों में इस हद तक मानती थीं कि जिन बातों का उन्होंने प्रियंका और राहुल के साथ भी कभी जिक्र नहीं किया, उन्हें उनके साथ बांटती रहीं। इस तथ्य के बावजूद जब सोनिया गांधी बेटी प्रियंका के साथ नटवर सिंह द्वारा निर्धारित समय और तारीख को मई 2014 में उनके घर पर इस अनुरोध के साथ पहुंचीं कि किताब से प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के राहुल संबंधी विवरण को हटा दिया जाए, तो उन्होंने (नटवर सिंह ने) अस्वीकार कर दिया। नटवर सिंह के रहस्योद्घाटन से सोनिया गांधी के इस पक्ष के प्रति सहानुभूति बढ़नी चाहिए कि वे अपने किए के प्रति खेद व्यक्त करने की क्षमता भी रखती हैं और अनुरोध करने के लिए कहीं भी जा सकती हैं। नटवर सिंह को यह भी बताना चाहिए कि वर्ष 2004 में जब कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं था (145 सीटें) और पार्टी सहयोगी दलों (लालू, मुलायम, वाम पार्टियां आदि) के साथ सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब क्या सोनिया गांधी को सार्वजनिक रूप से यह बयान देना चाहिए था कि उनका ही बेटा उन्हें प्रधानमंत्री पद नहीं लेने दे रहा है? और कि राहुल अपनी मां की सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित हैं? सोनिया गांधी ने ‘अंतरात्मा’ की आवाज का हवाला देते हुए (डॉ. शंकरदयाल शर्मा के मना करने पर) मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार करके क्या देश के साथ धोखा किया?
[dc]नटवर[/dc] सिंह कोई दो दशकों तक कांग्रेस पार्टी के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। भारतीय विदेश सेवा की नौकरी से वर्ष 1984 में त्यागपत्र देने के बाद से 2005 तक वे कांग्रेस के एक बड़े नेता के रूप में गांधी परिवार के ‘खास’ बने रहे। भारतीय विदेश सेवा में तीन दशकों के कार्यकाल के दौरान भी श्रीमती इंदिरा गांधी के नजदीकी लोगों में उनका शुमार रहा। पर गांधी परिवार को लेकर इस तरह की अंदरूनी बातें उन्होंने हमेशा अपने सीने तक ही सीमित रखीं। सोनिया गांधी के परिवार के प्रति नटवर सिंह की इतनी वफादारी थी कि प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के साथ मतभेदों के चलते उन्होंने नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह के साथ कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) का गठन कर लिया था। वर्ष 1998 में नरसिंह राव के कांग्रेस पार्टी में सूर्यास्त और सोनिया गांधी के सूर्योदय के साथ ही नटवर सिंह फिर से कांग्रेस में आ गए थे। अगर ‘ऑइल फॉर फूड’ भ्रष्टाचार में नटवर सिंह का नाम नहीं उछलता और उन्हें ‘असम्मानजनक’ तरीके से कांग्रेस नहीं छोड़ना पड़ती या सोनिया गांधी अपने फैसले को लेकर काफी पहले ही पूर्व विदेश मंत्री से खेद व्यक्त कर देतीं (7 मई 2014 को नहीं) तो क्या ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ’ की पूरी स्क्रिप्ट बदल जाती?
[dc]नटवर[/dc] सिंह की किताब की पीड़ा इन शब्दों में व्यक्त होती है कि 45 वर्षों तक वे गांधी परिवार के प्रति वफादार रहे, पर उनके साथ ऐसा व्यवहार कोई ‘भारतीय’ तो निश्चित ही नहीं कर सकता था। तो क्या नटवर सिंह की किताब को सोनिया गांधी के खिलाफ उनकी व्यक्तिगत नाराजगी का दस्तावेज करार देकर खारिज कर दिया जाए?
[dc]उपसंहार:[/dc] श्रीमती सोनिया गांधी को अपनी किताब जरूर लिखना चाहिए, यह सिद्ध करने के लिए कि उन्होंने अपनी ‘अंतरात्मा’ की आवाज पर ही प्रधानमंत्री पद ठुकराया था, राहुल की धमकी के चलते नहीं। क्योंकि ‘भारतीय’ राजनीति में उनकी यही सबसे बड़ी ‘उपलब्धि’ और ‘योगदान’ भी है। वरना सवाल कायम रह जाएगा कि प्रधानमंत्री पद ठुकराने के बाद भी वे मनमोहन सिंह के कार्यालय से फाइलें क्यों मंगवाती रहीं और ऐसा करने से तब राहुल ने उन्हें क्यों नहीं रोका? साथ ही, अगर प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से सोनिया गांधी की जान को खतरा था तो राहुल स्वयं कैसे आगे चलकर उसी पद के लिए दावेदार हो गए?

'कांग्रेसमुक्त भारत' या 'भारतमुक्त कांग्रेस'

[dc]वर्ष[/dc] 1984 के चुनावों में भाजपा को मात्र दो सीटें मिली थीं, पर इसके बावजूद पार्टी में कोई विद्रोह नहीं हुआ। पार्टी नेतृत्व को हार के लिए सार्वजनिक रूप से नहीं कोसा गया। न ही लोगों ने पार्टी छोड़कर कोई तूफान मचाया। कांग्रेस को 2014 के चुनावों में 44 सीटें प्राप्त हुई हैं पर पार्टी पूरे देश में मातम मना रही है। ऐसा जताया जा रहा है, जैसे सत्ता के जाते ही पार्टी का सबकुछ लुट गया है।
[dc]श्रीमती[/dc] इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1984 में हुए चुनावों में जिन दलों का लगभग सफाया हो गया था, उनमें भारतीय जनता पार्टी भी थी। राजीव गांधी के नेतृत्व में तब कांग्रेस को 414 सीटें मिली थीं। जनता पार्टी के विघटन के बाद अपना पहला चुनाव लड़ रही भारतीय जनता पार्टी को तब केवल दो सीटें प्राप्त हुई थीं। इनमें एक सीट आंध्र प्रदेश में हनमकोंडा की थी, जहां से सीजे रेड्डी ने पीवी नरसिंह राव को एक ऐसे समय हराया था, जब समूचे देश में कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति की लहर चल रही थी। यह हार उन्हीं नरसिंह राव की हुई थी, जो कि सात वर्षों के बाद प्रधानमंत्री बनने वाले थे और जिनके कि दरबार में डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री का भार संभालकर नई आर्थिक नीतियों की देश में शुरुआत करना थी। दूसरी सीट भाजपा को गुजरात के मेहसाणा से मिली थी, जहां उसके उम्मीदवार अमृतभाई पटेल जीते थे। बस, भाजपा का खेल इतने पर खत्म हो गया था। तब चुनाव हारने वालों में अटल बिहारी वाजपेयी (ग्वालियर), सुषमा स्वराज (करनाल), वसुंधरा राजे (भिंड), उमा भारती (खजुराहो), स्व. प्रमोद महाजन (मुंबई उत्तर-पूर्व), राम जेठमलानी (मुंबई उत्तर-पश्चिम), मुरली मनोहर जोशी (अलमोड़ा) और राजनाथ सिंह (मिर्जापुर) शामिल थे। पर इतनी बड़ी हार के बावजूद भारतीय जनता पार्टी में कोई विद्रोह नहीं हुआ। पार्टी नेतृत्व को हार के लिए सार्वजनिक रूप से नहीं कोसा गया। एक-दूसरे पर कीचड़ नहीं उछाला गया। न ही लोगों ने पार्टी छोड़कर कोई तूफान मचाया। नेता और कार्यकर्ता 1989 की तैयारियों में जुट गए। उन्होंने कोई भविष्यवक्ता भी यह बताने के लिए नहीं तलाशा कि वर्ष 1991 में कांग्रेस की सरकार उसी व्यक्ति के नेतृत्व में बनेगी, जिसे भाजपा के उम्मीदवार ने वर्ष 1984 में हराया था।
[dc]कांग्रेस[/dc] को 2014 के चुनावों में 44 सीटें प्राप्त हुई हैं पर पार्टी पूरे देश में मातम मना रही है। 16 मई को मतों की गिनती पूरी हो चुकी थी। दो महीनों से ज्यादा का वक्त गुजर जाने के बाद भी कांग्रेस के आंगन में शोक की बैठकें चल रही हैं। असम से महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर से हरियाणा तक पार्टी में विद्रोह की चिंगारियां फूट रही हैं। सोनिया और राहुल गांधी के आवासों की चौखटों पर मुलाकातों के लिए सिर कूटने वाले नेता, नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। पार्टी की हार के लिए राहुल गांधी को दोषी करार दिया जा रहा है। ऐसा जताया जा रहा है, जैसे सत्ता के जाते ही पार्टी का सबकुछ लुट गया है।
[dc]कल्पना[/dc] ही की जा सकती है कि वर्ष 1984 के चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन की तरह कांग्रेस को अगर इस बार दो सीटें ही मिलतीं और 1977 के चुनावों में जिस तरह से श्रीमती इंदिरा गांधी और संजय गांधी हार गए थे, वैसे ही इस बार सोनिया गांधी और राहुल गांधी हार जाते तो कांग्रेस पार्टी की आज हालत और कितनी खराब बनती! वर्ष 1977 के चुनावों में कांग्रेस की कोई दो सौ सीटें (197) कम हो गई थीं और इंदिरा गांधी भी सत्ता से बाहर हो गई थीं, पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पार्टी के अंदर और बाहर की लड़ाई को वे हिम्मत के साथ लड़ती रहीं और 1980 के चुनावों में जिस तरह के बहुमत के साथ वे लौटकर सत्ता में आईं, वह भी एक इतिहास है।
[dc]कांग्रेस[/dc] को सत्ता में रहते हुए इतना लंबा अरसा हो गया था कि सरकार से बाहर रहकर एक मजबूत विपक्षी की भूमिका निभाना उसके लिए अब दूभर बन रहा है। कांग्रेसी सुख के दिनों में तो सुखी रहना ही चाहते हैं, दु:ख में भी सुख की लालसा बनाए रखना चाहते हैं। कांग्रेस में केंद्रीय नेतृत्व को वर्तमान में दी जा रही चुनौतियां और महाराष्ट्र, असम आदि राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन की मांग उसी दु:ख के व्यापक होने के संकेत हैं। कांग्रेस की दिक्कत यह कही जा सकती है कि वह राहुल गांधी (और सोनिया गांधी भी) के नेतृत्व से अपने को मुक्त भी करना चाहती है और उसके पास माथा टेकने के लिए और कोई चौखट भी नहीं है। राहुल गांधी और सोनिया गांधी अगर अपना नेतृत्व जारी रखने से इंकार कर दें तो कांग्रेस का माई-बाप कौन होगा, किसी को पता नहीं।
[dc]सही[/dc] पूछा जाए तो सोलहवीं लोकसभा के लिए हुए चुनावों के बाद देश को कांग्रेस में जिस विपक्ष की तलाश थी, वह थोथी साबित होती जा रही है। कांग्रेसी नेताओं की जुबानों और मुख-मुद्राओं से वही अहंकार टपक रहा है, जो यूपीए शासनकाल के दौरान दस वर्षों तक देखा गया। संसद के भीतर और उसके बाहर कांग्रेस का देश की जनता के प्रति कृतज्ञता का कोई भाव नहीं है। ऐसा जाहिर होता है कि कांग्रेस सत्ता से बाहर होते हुए भी देश और सरकार पर शासन जारी रखना चाहती है। उसकी इस कोशिश का परिणाम यही हो रहा है कि सत्तारूढ़ दल से निपटने में बाकी विपक्षी पार्टियां भी अपने आपको असहाय पा रही हैं। मुलायम सिंह जब कांग्रेस को ललकारते हैं कि वह अब सड़कों पर आकर जनता की लड़ाई लड़े तो कांग्रेस के नेता उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर समाजवादी पार्टी की धज्जियां उड़ाने लगते हैं। कांग्रेस अपने साथ शेष विपक्ष को भी लेकर डूबना चाहती है।
वर्ष 1984 के चुनावों में कांग्रेस को 414 सीटें मिली थीं, पर राजीव गांधी इतने बड़े बहुमत को संभाल नहीं पाए। पांच साल बाद हालात फिर कांग्रेस के खिलाफ हो गए। वैसी ही स्थिति हाल के चुनावों में प्रकट हुई। दस वर्षों तक सत्ता में बने रहने के बाद पार्टी को इतने अपमानजनक तरीके से बाहर होना पड़ेगा, इसका संकेत भी कांग्रेस ने बाहर नहीं आने दिया। 1977 के लोकसभा चुनावों में जनता इंदिरा गांधी और संजय गांधी से आपातकाल की ज्यादतियों का बदला लेना चाहती थी। समूचा देश गुस्से से भरा बैठा था। जयप्रकाश नारायण उस नाराजगी का नेतृत्व कर रहे थे। इसके बावजूद भी कांग्रेस 34.52 प्रतिशत मतों के साथ 153 सीटें प्राप्त करने में कामयाब रही थी। तब क्या यह निष्कर्ष निकाल लिया जाए कि कांग्रेस के प्रति इस बार की नाराजगी आपातकाल के दिनों से भी ज्यादा गहरी थी?
[dc]इसमें[/dc] दोमत नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस का बने रहना भी जरूरी है और संसद में उसकी एक प्रमुख विपक्षी दल के रूप में भूमिका भी देशहित में आवश्यक है। एक ऐसी स्थिति तो स्वयं भारतीय जनता पार्टी के हितों के खिलाफ होगी कि समूची संसद विपक्षरहित हो जाए और संसद के भीतर उसके ही सांसदों को और बाहर आम जनता को विरोधी पक्ष की भूमिका भी निभानी पड़े। पर अगर कांग्रेस की बीमारी इसी तरह से कायम रहती है तो आश्चर्य नहीं कि अगले चुनावों तक संसद में प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी दलों की जगह क्षेत्रीय दलों की कतरनें ही नजर आएं। यह चिंता का विषय हो सकता है कि सत्ता से बाहर हो जाने के बावजूद कांग्रेस की चाल-ढाल, आवाज और तेवरों में तो ज्यादा फर्क नहीं आया है पर इधर हमारे नए शासनकर्ताओं के अंदाज और स्वर तेजी से बदलने लगे हैं। नरेंद्र मोदी ने चुनावों के दौरान नारा ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ का दिया था। मोदी तो अपने नारे को भुला बैठे हैं, पर कांग्रेसी उसे अब ‘भारत से मुक्त कांग्रेस’ में बदलते दिखाई पड़ रहे हैं।

वैदिक प्रकरण : सरकार दिखाए साहस

[dc]डॉ.[/dc] वेदप्रताप वैदिक को ‘देशद्रोही’ करार देते हुए उनकी गिरफ्तारी करने की मांग सरकार से की जा रही है। जनता को ‘शिक्षित’ किया जा रहा है कि डॉ. वैदिक ने लाहौर में भारत देश के खिलाफ वैसा ही अपराध किया है, जैसा कि अजमल कसाब ने मुंबई में किया था। सवाल किए जा रहे हैं कि डॉ. वैदिक पाकिस्तान क्यों गए? किसके आमंत्रण पर गए? किसके खर्चे पर वहां रुके? और सैकड़ों लोगों की हत्या के गुनहगार तथा मुंबई हमले के सरगना हाफिज सईद से उन्होंने मुलाकात किस इरादे से की? डॉ. वैदिक पर हो रहे हमले में कांग्रेस, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एक हो गए हैं। वैसे भी मामला मुंबई हमले के ‘मास्टरमाइंड’ से मुलाकात करने को लेकर मुंबई की भावनाओं के साथ जुड़ गया है और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव सिर पर खड़े हैं।
[dc]डॉ.[/dc] वैदिक की यह ‘गलतफहमी’ अब तलक दूर हो चुकी होगी कि वे देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के ‘डार्लिंग’ हैं। उनके सभी तथाकथित पूर्व प्रधानमंत्री ‘मित्र’ इस समय सन्नाटा ओढ़े हुए ‘चुप’ हैं। इनमें वैसे ही कम बोलने वाले डॉ. मनमोहन सिंह और अपने प्रधानमंत्रित्व काल में डॉ. वैदिक से लगातार हिंदी सीखने वाले एचडी देवेगौड़ा को शामिल करना जरूरी है। देश के वरिष्ठ पत्रकारों की एक बड़ी जमात सत्तर वर्षीय डॉ. वैदिक से जवाब-तलब कर रही है कि आतंकवादी हाफिज सईद से मुलाकात के फोटो में उनके हाथों में कोई कलम, नोटबुक या टेपरिकॉर्डर क्यों नहीं दिखाई दे रहा है? अत: उन्हें पत्रकार कैसे माना जा सकता है? मांग की जा रही है कि डॉ. वैदिक आतंकवादी सरगना के साथ हुई अपनी बातचीत का पूरा हिसाब-किताब देश के समक्ष पेश करें। ‘नवभारत टाइम्स’ हिंदी दैनिक तथा ‘भाषा’ संवाद एजेंसी के पूर्व संपादक तथा देशभर के समाचार-पत्रों के लिए प्रतिदिन लेखन करने वाले डॉ. वैदिक से उनका पत्रकारिता करने का लाइसेंस जब्त करने की तैयारियां की जा रही हैं। कांग्रेस पार्टी इंदिरा गांधी की अनुपस्थिति और सत्ता से बाहर कर दिए जाने के बावजूद देश में फिर से ‘आपातकाल’ लगवाकर लिखने-पढ़ने और बोलने की आजादी को सीमित करवाने के लिए मोदी सरकार पर दबाव बनाना चाहती है। कांग्रेस के कोई पचास से अधिक वर्षों के शासनकाल में डॉ. वैदिक और उनके जैसे (या उनसे अलग भी) दूसरे पत्रकार और राजनीतिक विषयों के जानकार पचासों बार पाकिस्तान गए होंगे, कई लोगों से वहां मिले भी होंगे, वहां से लौटने के बाद कुछ लिखा भी होगा और काफी कुछ नहीं भी लिखा होगा, पर एक ‘देशद्रोही’ की तरह का वैसा सलूक कभी किसी के साथ नहीं हुआ होगा, जैसा कि वर्तमान में डॉ. वैदिक के साथ किया जा रहा है। हजारों लोगों की सभा को देशभक्ति के मंत्रोच्चारों से संस्कारित करते रहने वाले एक कट्टर आर्यसमाजी और महर्षि दयानंद सरस्वती के अनुयायी डॉ. वैदिक को एक अपराधी करार देते हुए भीड़ के हवाले किया जा रहा है।
[dc]डॉ.[/dc] वैदिक का अपराध यह है कि मध्य प्रदेश के इंदौर जैसे एक छोटे-से शहर के साधारण बनिया परिवार में जन्म लेने के बावजूद वे अपनी योग्यता के दम पर ‘अंग्रेजी’ के आधिपत्य वाली राजधानी दिल्ली में हिंदी को प्रतिष्ठापित करने में सफल हो गए। और फिर उन्हें दिल्ली में राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी जैसे प्रतिभाशाली ‘इंदौरियों’ का सान्न्ध्यि भी प्राप्त हो गया। डॉ. वैदिक इस ‘महत्वाकांक्षा’ के अवश्य ही अपराधी हैं कि जिन ऊंचाइयों को प्राप्त करने की योग्यता को हासिल करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वे वहां से हमेशा नीचे धकेले जाते रहे। आरएसएस और भाजपा को बताया जाता रहा कि डॉ. वैदिक तो मनमोहन सिंह के दोस्त और राहुल गांधी के प्रशंसक हैं और कांग्रेस के नेताओं तक डॉ. वैदिक के बाबा रामदेव और सुदर्शनजी और मोहन भागवत जैसे संघ के दिग्गजों के साथ संबंधों का ब्योरा पहुंचता रहा। नतीजतन, डॉ. वैदिक अपने ही ‘बड़बोलेपन’ के शिकार होकर संकट की घड़ी में अकेले पड़ गए। जिन भी बड़ी-बड़ी हस्तियों से अपने व्यक्तिगत संबंध होने का या उन लोगों के अपने घर आने-जाने का डॉ. वैदिक सही या अतिरंजित ब्योरा बांटते रहे हों, उद्धव ठाकरे, संजय राऊत, डीपी त्रिपाठी, गुलाम नबी आजाद और मुख्तार अब्बास नकवी के हमलों के दौरान डॉ. वैदिक के समर्थन में कोई भी सार्वजनिक रूप से प्रकट नहीं हुआ। पहले पाकिस्तान में एक ‘गलत आदमी’ के साथ मुलाकात करना, फिर उस मुलाकात को ‘सोशल मीडिया’ के जरिए एक बड़ी ‘उपलब्धि’ और ‘स्कूप’ की तरह ‘ग्लैमराइज’ करना और फिर अपने किए का एक अतिरंजित आत्मविश्वास के साथ इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर बचाव करना डॉ. वैदिक और उनके शुभचिंतकों के लिए अंतत: भारी पड़ गया। लेखन से मिलने वाले पारिश्रमिक के जरिए जीविका चलाते हुए दिल्ली की मेट्रो में सफर करने वाले, कई पुस्तकों के रचयिता डॉ. वैदिक क्या वर्तमान संकट से मुक्त होने के बाद अपने आपको बदल डालेंगे? ‘स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज’ में डॉक्टरेट के दौरान वैदिक द्वारा अपना शोध प्रबंध हिंदी में लिखने की जिस लड़ाई को डॉ. राममनोहर लोहिया ने सफलतापूर्वक संसद में उठाया था, वे डॉ. वैदिक कोई चार दशकों के बाद उसी संसद में हो रही अपनी आलोचना के बाद क्या अपने तेवरों को यमुना में तिरोहित कर देंगे? वे पत्रकारिता करना बंद कर देंगे या फिर राजनीति करना? डॉ. वैदिक ने ‘गलती’ जरूर की है, पर देश के हितों के प्रति कोई ‘अपराध’ नहीं किया है। हिंदी की पताका हाथ में लिए दस-बारह साल की उम्र के वैदिक जब इंदौर से पंजाब की जेल काटने के लिए रवाना हुए थे, तब उस क्षण के गवाह लोग इंदौर नगर में आज भी मौजूद हैं। सरकार में अगर डॉ. वैदिक का बचाव करने का साहस नहीं है तो फिर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजने की हिम्मत दिखानी चाहिए। समूचे घटनाक्रम का कुछ संदेश तो भारत और पाकिस्तान की जनता तक पहुंचना ही चाहिए।

अर्जेंटीनी 'स्वप्न' और जर्मन 'यथार्थ!'

[dc]अ[/dc]पनी उपलब्धियों को हर्ष के अतिरेक और विफलताओं को आंसुओं के समंदर में तब्दील कर देने के मामले में भारत और ब्राजील-अर्जेंटीना की आत्माओं के बीच अद्भुत समानताओं का बखान किया जा सकता है। जर्मनी और अर्जेंटीना के बीच विश्व कप फुटबॉल का फाइनल मुकाबला शुरू होने के पहले विदेशी विशेषज्ञों की टिप्पणियों के बीच टीवी चैनल पर ‘हार्ट’ और ‘हेड’ को लेकर जो ट्वीट चल रहे थे, उनमें लगभग सभी दर्शक अर्जेंटीना को जीता हुआ और मैसी को ‘मसीहा’ बता रहे थे। अर्जेंटीना पर जर्मनी की जीत के पहले (जर्मनी और नीदरलैंड्स के हाथों) दो बार पिट चुका समूचा ब्राजील रो रहा था। जर्मनी से हार के बाद अब समूचे अर्जेंटीना के आंसू नहीं थम रहे हैं। भारत के फुटबॉलप्रेमियों को लग रहा है, जैसे रियो डी जेनेरियो में अर्जेंटीना की नहीं, बल्कि पराजय भारत की हो गई है। पर इमोशंस से केवल लोगों के दिल जीते जा सकते हैं, युद्ध नहीं। जर्मनी की टीम रियो में ‘विश्वयुद्ध’ लड़ने के लिए मैदान में उतरी हुई थी। वह लातीन अमेरिका के सांबा डांस और शकीरा की मोहक प्रस्तुति के प्रति उदासीन थी। दो-दो विश्वयुद्धों की आग और अपने लाखों देशवासियों की आहुतियों की राख से उबरकर खड़े हुए जर्मन राष्ट्र की फुटबॉल टीम के खिलाड़ी अपने अर्जेंटाइन विरोधियों के प्रति मैदान में पूरी तरह से ‘क्रूर’ और ‘संवेदनाशून्य’ थे। पूरे एक सौ बारह मिनट तक दुनियाभर के फुटबॉलप्रेमियों की सांसें किसी फैसले की प्रतीक्षा में थमी रहीं। पर एक सौ तेरहवें मिनट में 19 नंबर की जर्सी पहने जर्मन टीम का मारियो गोइत्जे नामक लगभग अज्ञात-सा खिलाड़ी मैदान पर प्रकट हुआ। उसने अपनी ही टीम के आंद्रे शुर्ले से मिले पास पर फुटबॉल को पहले अपने सीने पर लिया, और फिर आक्रामक तरीके से उसे समूचे लातीन अमेरिका के सीने में उतार दिया। जर्मनी ने नया इतिहास लिख दिया। दर्शक-दीर्घा में बैठीं जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने उस अद्भुत क्षण का गवाह बनने के लिए रियो में अपनी उपस्थिति को सार्थक कर दिया।
[dc]ज[/dc]र्मन टीम ने रियो में बताया कि मैदान चाहे युद्ध का हो या फुटबॉल का, संघर्ष को पहले सीने पर झेलना पड़ता है। और यह भी कि संघर्ष समूची टीम का होता है, एक व्यक्ति का नहीं। जर्मनी की ओर से ग्यारह खिलाड़ियों की टीम मैदान पर थी, पर दूसरी ओर समूचे अर्जेंटीना की नजरें केवल मैसी के चमत्कार पर ही टिकी थीं कि वे ही मैराडोना के 1986 विश्व कप के इतिहास को फिर से दोहराएंगे। जर्मन टीम का मैनेजर पूरी तरह से ‘कूल’ था, अर्जेंटीना का पूरे समय ‘बेचैन।’ कूल तो मैसी भी थे, पर शायद अपने स्वभावगत कारणों से। जर्मन खिलाड़ी फुटबॉल को फिरकाते हुए व्यवस्थित तरीके से ‘पास’ को मैदान में विरोधी के गोल की तरफ आगे धकेल रहे थे। अर्जेंटीना के खिलाड़ी ‘पास’ को पीछे की ओर धकेलते हुए आगे ले जाना चाहते थे। विश्व कप फुटबॉल का यह फाइनल मैच अंतत: जर्मनी का ही होना था। केवल इसलिए ही नहीं कि जर्मन टीम का प्रत्येक खिलाड़ी अपने आत्मविश्वास को लेकर संकल्प से भरा था। एक राष्ट्र के रूप में जर्मनी ने पश्चिमी यूरोप में जिस तरह से एक आर्थिक शक्ति के रूप में अपना वर्चस्व कायम किया है, रियो की उपलब्धि उसका भी एक प्रतीक थी। जर्मनी की टीम को पता था कि उसे वापस लौटकर अपने देशवासियों का सामना करना है। मैच खत्म होने के ठीक पहले मैसी को भी अंतिम अवसर मिला था, पर वे अपने शॉट को गोइत्जे की तरह निर्णायक गोल में नहीं बदल पाए। और इसके तत्काल बाद जैसे अर्जेंटीना की दुनिया ही बदल गई। उसे भी ब्राजील के साथ दु:ख में शरीक हो जाना पड़ा। अर्जेंटीना के लिए 32 साल के बाद यह दूसरा ‘फॉकलैंड वॉर’ था, जिसमें सामने इंग्लैंड की जगह जर्मनी था। 27 साल के मैसी तब जन्मे भी नहीं थे। और इस बार मैराडोना मैदान में मौजूद नहीं थे।