When Promises Tend to Outrun Performance

[dc]Has[/dc] the Narendra Modi government abysmally failed to deliver anything substantial during the past one year? Has the Prime Minister personally failed to live up to the aspirations and hopes that he himself raised during his euphoria inducing election campaign?
[dc]Narendra[/dc] Modi, while on his campaign rampage, may scarcely have imagined, let alone expected, a mandate of such magnitude, requiring him to not merely perform, but outperform his “Achhe Din” dream platter. As a result he is perhaps caught off guard by the possible fall out of not fulfilling all his promises.
[dc]Modi[/dc] may have failed on a number of fronts and his detractors can confidently produce, for public consumption, reams of statistics to prove their view point. But, at the same time, there is no denying the fact that Modi had inherited a totally paralyzed and lacklustre regime from the previous UPA Government.The sell out dream slogan –“Achhe Din Aayenge” — implied a rather miraculous recovery which embedded a glimmer of hope in the hearts of millions of Indians who voted for the NDA as an investment for country’s future.
[dc]Narendra[/dc] Modi has landed in Delhi with the resolve to stay in the Union Capital for a long innings. His track record of administration and organizational work bear testimony to the fact that he is not a man who would ever accept defeat. Therefore, there are no chances of his returning to Gandhinagar or to the organizational fold of the Rashtriya Swayamsewak Sangh (RSS). The Prime Minister must also be aware that for the kind of aura that he has created for himself will require him to act faster than he has in the last 365 days. Otherwise his government will take a battering that could leave it badly scarred, dented and damaged.
[dc]Without[/dc] joining the debate on the NDA government’s performance and how much has been done for the good of the “120 Crore Bhartiyas”, one thing emerges clearly. Modi has single-handedly and strategically changed the dynamics and rules of politics in India. The Prime Minister, without making any noise, also effected changes in the body language of the Bharatiya Janata Party at the national level. Not surprisingly, he did not face any resistance from any quarter as everyone was, rightly or wrongly, given the impression that all was being done with the blessings of Nagpur.
[dc]It[/dc] must not have been an easy task for Modi to systematically sideline the established party stalwarts and create a hierarchy of his own trusted lieutenants. Undoubtedly, the carefully calculated exercise ultimately did lead to creating a fear psychosis within the ranks of the BJP while simultaneously giving rise to suspicion in some quarters of the Sangh about the actual agenda of the Prime Minister. That Modi very selectively trusts people in Delhi, whether in the party or in the bureaucracy, dogs his every step.The induction of Amit Shah as a close confidant has added to the general opinion of Modi’s preference for close allies, irrespective of the general perception about them.
[dc]The[/dc] report cards of Modi’s cabinet colleagues, being presented, circulated and shown on TV channels, claim that most of the ministers have either not performed or have performed below the level of expectations. Who should be asked to shoulder the blame for this situation? When asked about this, a senior member of the party maintained: Modiji wants to do hundreds of things. There are senior ministers in his cabinet who were in the race for the prime ministership. There are some Chief Ministers who were also publicly projected as equally competent for the top post and their performance is not being questioned. There are governments in some of the States which are being ruled by the parties opposed to BJP in general and Modi in particular. All these factors are not being taken into account while assessing the performance of the government in the last one year.
[dc]But[/dc],on the other hand,it is also being alleged that the Prime Minister has not succeeded in imparting confidence to his Cabinet colleagues and bureaucrats for taking ownership of any decisions they may take.
[dc]What[/dc] would happen to the report cards when the government completes its second year? Or may be its entire five-year term! The World Bank had in January this year predicted that India would become world’s fastest growing economy in the fourth year of Modi’s government, clocking a seven per cent rise in GDP in 2017. Would these predictions come true? Let us hope that Modi himself is strictly marking his own government’s performance, unbiasedly and objectively.
[dc]The[/dc] question therefore remains—if not Modi, who else could take over as the Prime Minister? Do we have enough choices available? Who from within and without the NDA can be trusted for taking over the responsibility? Rahul Gandhi? Arvind Kejriwal? Nitish Kumar? Jayalalithaa? Mamata? Mulayam Singh? The millions of people who had reposed their confidence in Modi and brought him to power in the hope that only he is the best bet to meet their aspirations, will ultimately force the Government to act more vigorously. After all Modi’s promise versus Modi’s performance will be the acid test. The people will also force Modi to change himself and at least appear to be liberal in accommodating opponents who carry dissenting opinions.

केजरीवाल जंग

[dc]दिल्ली[/dc] के उपराज्यपाल नजीब जंग और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के बीच अपने अधिकारों को लेकर जिस तरह के टकराव की शुरुआत हुई है वह अब थमने वाली नहीं है। यह चलती रहेगी। केजरीवाल चाहेंगे भी कि वह चलती रहे. इससे उन्हें दिल्ली की जनता को यह समझाने का अवसर मिलेगा कि उनके नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार को ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शह’ पर काम नहीं करने दिया जा रहा है।
केंद्र सरकार ने अब अपनी अधिसूचना जारी करके नजीब जंग की कार्रवाई का खुला समर्थन भी कर दिया है। अधिसूचना में कहा गया है कि अखिल भारतीय सेवाओं के मामले में सारी शक्तियां उप राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में ही रहेंगी.
[dc]नजीब[/dc] जंग और केजरीवाल के बीच चल रही जंग का एक दिलचस्प पहलू यह है कि दोनों में से एक की भी पृष्ठभूमि राजनीति की नहीं रही है. दोनों ही नौकरशाही के अनुभव के चश्मे से साथ अपने मौजदा मुकामों पर पहुंचे हैं. दोनों में से एक भी अगर राजनेताओं के कद का होता तो आपसी संवाद और समझौते की राह निकाल लेता जैसा कि अधिकांश राज्यों में निर्वाचित मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच आम तौर पर होता है।
[dc]दोनों[/dc] ही अपने अपने नौकरशाही के संस्कारों के साथ राजनितिक परिणामों वाले टकराव में जुटे हुए हैं। नजीब जंग भारतीय प्रशासनिक सेवा के लम्बे अनुभव के बाद अपने वर्तमान पद पर पहुंचे हैं और केजरीवाल भारतीय राजस्व सेवा में अपनी सेवाएं देने के बाद। अतः दिल्ली सरकार की नौकरशाही पर नियंत्रण का मामला आसानी से निपटने वाला नहीं है।
केजरीवाल यह समझते हैं कि चूँकि दिल्ली की जनता का समर्थन उन्हें पूरी तरह से प्राप्त है इसलिए वे अपनी लड़ाई को चाहे जितनी दूरी तक ले जा सकते हैं। आखिरकार उन्हें सत्तर में से ६७ सीटें जो प्राप्त हुई हैं।
[dc]दिल्ली[/dc] के मामले में विशेषाधिकार प्राप्त उप राज्यपाल कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति में अगर मुख्यमंत्री की सलाह की थोड़ी सी भी परवाह कर लेते तो मामला इतना बढ़ता ही नहीं, पर ऐसा नहीं हुआ, इसीलिए केजरीवाल भी भारतीय जनता पार्टी को शायद यह बताना चाहते हैं की वे पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों मदन लाल खुराना या साहिब सिंह वर्मा की तरह कमजोर नहीं दिखाई देना चाहेंगे। अतः केजरीवाल और जंग के बीच टकराव का मुख्य मुद्दा केवल दस दिनों के लिए एक कार्यवाहक मुख्य सचिव के रूप में शकुंतला गैमलिन की नियुक्ति का हो ही नहीं सकता था।
[dc]प्रशान्तभूषण[/dc] और योगेन्द्र यादव के खिलाफ की गई कार्रवाई के बाद केजरीवाल को शायद एक ऐसे मुद्दे की तलाश थी जो उन्हें लगातार चर्चा में बनाये रख सके। वास्तव में केजरीवाल अपने आपको एक ऐसी राजनितिक शख्सियत के तौर पर स्थापित करना चाहते हैं जो अकेले दम पर ही मोदी सरकार से लड़ने की हिम्मत रखता है। केजरीवाल इसी क्रम में मीडिया के साथ टकराव करने की जोखिम भी उठा रहे हैं।
[dc]विचार[/dc] का मुद्दा यह है कि अरविन्द केजरीवाल अगर पार्टी के भीतर और बाहर टकराव की राजनीति को ही हथियार बनाकर अपने आपको पांच वर्षों तक सत्ता में बनाये रखना चाहते हैं तो एक राजनीतिक दल के रूप में आम आदमी पार्टी का भविष्य अंततः क्या बनेगा? दूसरे यह कि केजरीवाल अपनी ही नौकरशाही और केंद्र के साथ टकराव की राजनीति करते हुए दिल्ली की जनता के साथ किये गए वायदों को पूरा कर पाएंगे क्या? और अंत में यह कि देश के अन्य विपक्षी दल और उनके राजनितिक रूप से परिपक्व नेता, भाजपा के खिलाफ भविष्य की अपनी किसी लड़ाई में केजरीवाल को भी साथ लेना चाहेंगे कि नहीं ? केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने ४९ दिनों के पहले अवतार में भी टकराव की राजनीति को ही हथियार बनाया था और उसके परिणामों से भी उन्हें रूबरू होना पड़ा था। अपने दूसरे कार्यकाल में भी वे उसी रस्ते पर चल रहे हैं। हैरत नहीं कि आम आदमी पार्टी के बाकी नेता भी केजरीवाल के समर्थन में न सिर्फ चुपचाप खड़े हैं बल्कि उनके निर्यणों के प्रति हामी भर रहे हैं।
[dc]दिल्ली[/dc] की जनता को राजधानी की सड़कों पर एक नए आंदोलन का साक्षी बनने के लिए तैयार रहना चाहिए। केंद्र की अधिसूचना पर केजरीवाल ने जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है उससे तो इसी प्रकार के संकेत मिल रहे हैं।

केजरी को अपना 'आपा' खोने की छूट..?

[dc]अरविंद[/dc] केजरीवाल अगर ‘तानाशाहों’ की तरह से काम करते हुए ‘आम आदमी पार्टी’ को चलाना चाहते हैं और अपने विरोधियों के साथ उसी तरह का व्‍यवहार करना चाहते हैं जैसा कि शनिवार को नई दिल्‍ली में पार्टी के कतिपय प्रमुख संस्‍थापक सदस्‍यों के साथ किया गया तो उन्‍हें ऐसा करने की छूट मिलनी चाहिए। अरविंद केजरीवाल को अपने काम करने का तरीका प्रजातांत्रिक रखना चाहिए या नहीं, इसका फैसला अब दिल्‍ली की जनता पर छोड़ देना चाहिए। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार और अजीत झा को पार्टी की राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया और दिल्‍ली की जनता ने इसका कोई विरोध नहीं किया, सड़कों पर प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त नहीं हुई। मान लिया जाना चाहिए कि अरविंद जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे दिल्‍ली के मतदाताओं का समर्थन प्राप्‍त है। सिद्ध हो रहा है कि जनता की नब्‍ज़ पर अरविंद की पकड़ प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के मुकाबले ज्‍यादा मजबूत है। अरविंद जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे उनकी तात्‍कालिक मजबूरी भी माना जा सकता है। उन्‍हें पार्टी भी चलाना है और जनता से किए गए वायदों को पूरा करके भी दिखाना है। और फिर आंतरिक प्रजातंत्र और पारदर्शिता आज किसी और पार्टी में भी तो नहीं है। आज की तिकड़मी राजनीति में बने रहने के लिए अरविंद केजरीवाल अगर दूसरी पार्टियों की तरह के हथकंडे अपनाना चाहते हैं तो समझ लिया जाना चाहिए कि उनके निशाने पर प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव नहीं, बल्कि वे ताकतें हैं जो आम आदमी पार्टी को सत्‍ता से हिलाना चाह रही हैं। केजरीवाल की ‘दाद’ दी जा सकती है कि वे सोनिया गांधी, नरेंद्र मोदी, मुलायम सिंह, मायावती, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी आदि की तरह ही ताकतवर बनकर उभरना चाह रहे हैं।
[dc]प्रशांत[/dc] भूषण, योगेंद्र यादव आदि के खिलाफ हुई कार्रवाई को लेकर अरविंद आदि के प्रति मीडिया के एकतरफा आक्रमण के पीछे छुपे संदर्भों को भी पढ़ा और समझा जा सकता है। जो कुछ भी चल रहा है, वह भारतीय राजनीति के वर्तमान चरित्र के अनुरूप ही है। थोड़े वक्‍त के बाद सबकुछ ठंडा पड़ जाएगा। आगे चलकर इस तरह के आरोप भी लगाए जा सकते हैं कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव विपक्षी दलों के इशारे पर आम आदमी पार्टी को कमजोर करने में लगे हुए हैं। कारण यह कि लड़ाई के मुद्दों को लेकर इन संस्‍थापक सदस्‍यों ने आवाज उठाने में थोड़ी जल्‍दबाजी कर दी। पार्टी और सरकार को थोड़ा जमने और अरविंद केजरीवाल को आगे बढ़कर गलतियां करने का वक्‍त दिया जा सकता था। जिस तरह के ‘अहंकारी’ बहुमत के साथ अरविंद सत्‍ता में काबिज हुए हैं, उन्‍हें उन मुद्दों के दम पर निश्चित ही चुनौती नहीं दी जा सकती है, जिनमें कि दिल्‍ली की ‘आत्‍मकेंद्रित’ जनता को कोई रुचि नहीं है। ‘आम आदमी पार्टी’ का प्रयोग अगर किन्‍हीं भी कारणों से कमजोर या विफल होता है तो विपक्षी दलों के एक होने की संभावनाओं पर भी पाला पड़ जाएगा। अन्‍य दलों की ‘तानाशाही’ व्‍यवस्‍था के साथ बराबरी का मुकाबला करने के लिए अरविंद केजरीवाल अगर अपनी प्रतिष्‍ठा और आम आदमी पार्टी की भविष्‍य की संभावनाओं को दांव पर लगा रहे हैं तो उन्‍हें इस तरह की ‘हाराकिरी’ की स्‍वीकृति दी जानी चाहिए। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार और अजीत झा आदि ‘आप’ नेता द्वारा अपना ‘आपा’ खोकर असंयत शब्‍दों का इस्‍तेमाल करने की वजह बन सकते हैं, पर अरविंद केजरीवाल के विकल्‍प के रूप में स्‍वीकार नहीं किए जा सकते। इन अरविंद विरोधी नेताओं को स्‍वीकार कर लेना चाहिए कि आम आदमी पार्टी के संदर्भ में उनसे जितनी भूमिका की अपेक्षा की जा रही थी, वह अब पूरी हो चुकी है। अण्‍णा हजारे इनसे ज्‍यादा बुद्धिमान साबित हुए। अरविंद केजरीवाल आगे किस दिशा में बढ़ना चाहते हैं, इसका उन्‍हें पहले ही अनुमान और भान हो गया था और वक्‍त रहते उन्‍होंने अपने आपको अलग भी कर लिया।

दिल्ली को पूरा देश न समझे 'आप'

[dc]अरविंद[/dc] केजरीवाल के बेंगलुरू से स्व स्था होकर वापस दिल्लीक लौटने के साथ ही आम आदमी पार्टी की महत्वाजकांक्षाओं ने अखिल भारतीय स्व्रूप को प्राप्त् करने की अंगड़ाइयां लेना शुरू कर दिया है। इसमें अनुचित भी कुछ नहीं है। एक प्रभावशाली पार्टी के रूप में कांग्रेस पार्टी के समाप्त़प्राय हालातों में पहुंच जाने के बाद एक मजबूत विपक्ष के नाम पर देश में लगभग सन्नारटा-सा व्यााप्तय है। कोई दल ऐसी स्थिति में नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी को उस तरह से चुनौती दे सके, जैसी कि आम आदमी पार्टी ने दिल्लीं विधानसभा के लिए हुए चुनावों में दी थी। पर सवाल यह है कि क्यात आम आदमी पार्टी अपने आपको दिल्लील की घोर स्था नीयता के उन संस्काीरों से मुक्तय कर पाएगी, जो वास्तपव में उसकी ताकत और कमजोरी दोनों के रूपों में व्यकक्ती हो चुके हैं। एक समय था, जब केजरीवाल आम आदमी पार्टी को दिल्लीर तक ही सीमित रखना चाहते थे। पर दिल्लीस विधानसभा के चुनावों में प्राप्तर हुई ‘अहंकारी’ विजय ने आम आदमी पार्टी के स्थाापित चरित्र को ही बदलकर रख दिया। अब पार्टी अन्य् राज्योंज से भी चुनाव लड़ने का इरादा रखती है। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के साथ जिस तरह का व्यटवहार किया गया और उसके कारण अखिल भारतीय स्ततर पर पार्टी की छवि को क्षति पहुंची, उससे अरविंद केजरीवाल शायद चिंतित नजर आते हैं। हकीकत तो यह है कि आम आदमी पार्टी उन अवसरों को पहले ही गंवा चुकी है, जब वह भ्रष्टाहचार के खिलाफ लड़ी गई अपनी लड़ाई के दम पर देशभर में उपजी सहानुभूति को एक बड़े और व्यारपक संगठन के रूप में बदल सकती थी। अपनी-अपनी हथेलियों में मोमबत्तियां थामे हुए देश का युवा वर्ग बड़ी उम्मीखदों के साथ ‘इंडिया अगेंस्टन करप्शेन’ से उपजी रोशनी की तरफ देख रहा था। पर वैसा नहीं हुआ। भ्रष्टाकचार के खिलाफ लड़ाई की कोख से पैदा हुआ एक साफ-सुथरा आंदोलन अपने ही द्वारा पैदा किए गए विरोधाभासों का शिकार हो गया। अब मांग की जा रही है कि पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र और फैसलों में पारदर्शिता कायम करने की जरूरत है। आम आदमी पार्टी राष्ट्री य स्ततर पर एक सशक्तस विकल्पं के रूप में उभर सकती है, पर उसके लिए जरूरी होगा कि अरविंद केजरीवाल पहले उसे अपनी ‘हिरासत’ से आजाद करें। उसे उस तरह की एकाधिकार वाली पार्टी में नहीं तब्दीहल होने दें, जैसी कि स्थिति आज अन्य दलों में व्यांप्तत है। अरविंद केजरीवाल अगर दिल्ली् से बाहर नहीं निकलने के अपने फैसले को बदलने के लिए तैयार हुए हैं तो उसका एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पीएसी से बाहर करने और ऑडियो टेप्सण के उजागर होने के बाद पार्टी में जिस तरह के असंतोष का विस्फो ट हुआ है, वह दिल्लीउ में सरकार चलाने में भी मुश्किलें पैदा कर सकता है। अरविंद केजरीवाल किन्हीं और संदर्भों में की गई अपनी इस घोषणा को शायद अपनी ही पार्टी में अंजाम देने लगे हैं कि : ‘हां, मैं अराजकतावादी हूं।’ राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को जानकारी दी थी कि : ‘कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती है।’ आम आदमी पार्टी को अगर अरविंद केजरीवाल वास्तेव में राष्ट्रीसय स्तकर पर ले जाना चाहते हैं तो उन्हेंप उसे कांग्रेस की तरह बनने से बचाना होगा। जो लोग कांग्रेस के कमजोर होने का इतिहास जानते हैं, उन्हेंं पता है कि वहां भी शीर्ष नेतृत्व् चाटुकारों से घिरा रहा है और वहां भी ‘भूषण’ तथा ‘यादव’ जैसे लोगों को ‘नेताओं’ से मिलने का समय भी नहीं मिल पाया। प्रशांत भूषण ने केजरीवाल से एसएमएस के जरिये मिलने का समय मांगा था, पर ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता ने स्वरयं मिलने के बजाय अपने नजदीकी सलाहकारों को उनसे मिलने के लिए रवाना कर दिया। यह सही है कि दिल्लीम भी देश है, पर अर
विंद अगर देश को भी दिल्लीा ही समझ लेंगे तो फिर आम आदमी पार्टी सभी जगह अपना नुकसान कर लेगी।

कलम की ताकत को जानते थे विनोद मेहता

[dc]एक[/dc] ऐसे वक्त जब संपादकों की जमात लगातार छोटी होती जा रही हो, पत्रकारिता रात-दिन के फर्क के साथ उबासीपूर्ण अंगड़ाइयां ले रही हो, अंधेरे को अंधेरा साबित करना तो दूर उसके बारे में बातचीत करने से भी लोग कतरा रहे हों, केवल अपनी ही शर्तो पर पत्रकारिता करने वाले एक सर्वथा अनौपचारिक पत्रकार-संपादक के एक लंबी बीमारी के बाद अनुपस्थित हो जाने ईमानदारी के साथ महसूस किये जाने में वक्त भी लग सकता है. इस बात का पता करना एक कठिन और निराश करने वाली मेहनत साबित हो सकता है कि विनोद मेहता के कद वाले पत्रकार-संपादक कितनी संख्या में अब हमारे बीच बचे हैं. विनोद मेहता के साथ एक बार उनके दफ्तर में मुलाकात करने का मौका. एक बार पत्रकारों के दल के सदस्य के रूप में पाकिस्तान की यात्र पर जाने का मौका उनके साथ मिला था. दफ्तर में उन्हें रूप में देखा जैसी की उनकी छवि रही है. अपनी कुर्सी पर आराम से पसरे हुए और पैर टेबुल पर. पर, पाकिस्तान में विनोद मेहता एक सहभागी के रूप में पूरी तरह से अनौपचारिक और बिलकुल अपने जैसे. अंग्रेजी भाषा के पत्रकार विनोद मेहता देश के समस्त भाषा-भाषियों के बीच भी समान रूप से लोकप्रिय थे. एक उदारवादी धर्मनिरपेक्ष छवि का ऐसा पत्रकार-संपादक जो अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता पर अपने छोटे से छोटे रिपोर्टर की बात सुनने से कभी इनकार नहीं करता. विनोद मेहता की दृढ़ मान्यता थी कि पत्रकारों को पूरी तरह से पारदर्शी होना चाहिए. वे एक भरोसा किये जा सकनेवाले संपादक थे.
[dc]विनोद[/dc] मेहता एक ऐसे संपादक थे जिन्हें समाचार-पत्रों के मालिक चाहते तो थे पर एक लंबे समय तक उनसे निभा नहीं पाते थे. उनके साथ काम कर चुके या काम करने वाले सभी पत्रकार उनके साथ अंत तक जुड़े रहे. उन्होंने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा. इसका एक बड़ा कारण यह था कि एक अच्छे संपादक से जिस तरह के गुणों की उम्मीद की जा सकती है वे उनमें मौजूद थे. खबरों के प्रति गजब की समझ, पाठकों की अपेक्षाओं के प्रति ईमानदारी और अप्रतिम साहस-विनोद मेहता की विशेषता थी. उनके साथ जुड़े रिपोटर्स और सहयोगी अपनी खबरों को लेकर विनोद मेहता का हाथ हमेशा अनपी पीठ पर पाते थे. उन्होंने कई प्रकाशनों की शुरुआत की पर कई को अनपी इस अनूठी छाप के साथ छोड़ दिया कि उनके चारित्रक कोई और संपादक उनके जैसी सफलता के साथ नहीं चला सकता.
[dc]विनोद[/dc] मेहता की जीवन यात्र और उनकी पत्रकारिता का काफी कुछ दर्शन उनकी दो किताबों ‘लखनऊ ब्वॉय’ और ‘एडिटर अनप्लग्ड’ से हो जाता है. कल्पना से परे लग सकती है विनोद मेहता जैसे ‘सीरियस’ संपादक ने किसी समय अपनी पहली चुनौती के रूप में ‘डेबोनियर’ जैसी रंगीन पत्रिका के री-लांच को चुना होगा. ‘द पॉयनियर’ द संडे, द इंडिपेंडेंट व द इंडिया पोस्ट ऐसे प्रकाशन रहे, जिन्हें उन्होंने चुना और चर्चित बना दिया. पर ज्यादा समय तक नहीं जुड़े रह पाये. सबसे लंबा वक्त उन्होंने आउटलुक को ही दिया. द इंडिपेंडेंट की कहानी तो केवल इसलिए भी याद रखी जायेगी कि 1989 में उसे शुरू करने के बाद केवल 29 दिन तक ही वो उसमें रहे. महाराष्ट्र के सबसे ताकतवर नेता यशवंत राव चव्हाण के खिलाफ एक समाचार के प्रकाशन से मची उथल-पुथल के बाद उन्हें द इंडिपेंडेंट छोड़ना पड़ा.एक ईमानदार संपादक के रूप में विनोद मेहता अपनी सीमाओं से भी परिचित रहते थे और अपने कलम की ताकत से भी. उनकी कमी तो खलनेवाली है.

अपनी शर्तों पर पत्रकारिता करते थे विनोद मेहता

[dc]विनोद[/dc] मेहता का चले जाना इन मायनों में बड़ा नुकसान है कि अपनी शर्तों पर पत्रकारिता करने वाला उनके कद का संपादक-पत्रकार अब हमारे ‍बीच मौजूद नहीं रहेगा। देश में पत्रकारिता जिस तरह से पल-पल में करवटें बदल रही हैं, विनोद मेहता की कमी का सार्वजनिक रूप से स्मरण करना और उनके जैसा संपादक बनने का प्रयास करना भी एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहेगा।
[dc]विनोद[/dc] मेहता के साथ मुझे एक बार ‘आउटलुक’ के दफ्तर में भेंट करने और फिर पत्रकारों के एक दल के सदस्य के रूप में उनके साथ पाकिस्तान की यात्रा करने का अवसर मिला था। एडिटर्स गिल्ड की बैठकों में तो उनके तेवर अलग से देखने को मिलते ही थे।
[dc]एक[/dc] अच्‍छे और कुशल संपादक से जिस तरह के गुणों और साहस की उम्मीद की जा सकती है, वे सब विनोद मेहता में मौजूद थे। खबरों के प्रति गजब की समझ, ईमानदारी और साहस सभी कुछ उनमें मौजूद थे।
[dc]उनका[/dc] हाथ हमेशा अपने रिपोर्टर्स की पीठ पर मौजूद रहता था। वे पाठकों की जरूरत के मामले में अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं करते थे। उन्होंने कई प्रकाशनों की शुरुआत की और कई को अपनी इसी छाप के साथ छोड़ भी दिया कि उसे उनके अलावा कोई और इतनी सफलता के साथ उन्हें नहीं चला सकता।
[dc]उनकी[/dc] जीवनयात्रा और पत्रकारिता का काफी कुछ दर्शन उनकी दो किताबों ‘लखनऊ ब्वॉय’ और ‘एडिटर अनप्लग्ड’ से हो जाता है। कल्पना से परे लगता है ‘आउटलुक’ जैसे गंभीर प्रकाशन के संपादक विनोद मेहता ने अपनी पहली चुनौती को ‘डेबोनेयर’ जैसी रंगीन पत्रिका को ‘री-लांच’ करने से स्वीकार की होगी। ‘आउटलुक’ के साथ कोई सत्रह वर्षों तक जुड़े रहे और इसी दौरान उन्होंने टेलीविजन सहित दिल्ली की पत्रकारिता के प्रत्येक कोने को अपनी उपस्‍थिति से भर दिया।
[dc]वे[/dc] एक ऐसे संपादक थे जिस पर समाचार पत्र मालिक सफलता का भरोसा कर सकते थे, पर उनके साथ लंबी दूरी तय करने का साहस नहीं जुटा पाते थे। इसका सबसे बड़ा कारण विनोद मेहता की ‘किसी भी तरह का समझौता नहीं करने’ की पत्रकारिता को माना जा सकता है। विनोद मेहता ने इसके कारण कई बार नुकसान भी उठाए।
[dc]द पायोनियर[/dc], द संडे ऑब्जर्वर, द इंडिपेंडेंट, द इंडियन पोस्ट ऐसे प्रकाशन हैं जिन्हें केवल विनोद मेहता के लिए ही याद किया जाता रहेगा। ‘इंडिपेंडेंट’ अंग्रेजी समाचार पत्र की कहानी को केवल इसी तथ्य के कारण याद रखा जा सकता है‍ कि 1989 में उसे शुरू करने के केवल 29 दिनों में ही उन्हें उसे छोड़ना पड़ा था। इसका कारण उस समय के सबसे ताकतकर राजनीतिज्ञ यशवंतराव चव्हाण के खिलाफ उन्होंने एक जबर्दस्त समाचार करने की हिम्मत की थी।
[dc]विनोद[/dc] मेहता की एक ईमानदार संपादक के रूप में सबसे जबर्दस्त खूबी यही थी कि वे हमेशा इस बात से परिचित रहते थे कि वे स्वयं क्या हैं और किस तरह की मिट्टी से बने हैं। एक ऐसा संपादक जो दूसरों के विचारों को सुनने, समझने और समायोजित करने के लिए हमेशा उपलब्‍ध रहता है।

अरविंद केजरीवाल की चुप्पी उनकी ज़रूरत?

[dc]अरविंद[/dc] केजरीवाल अगर चाहते तो आम आदमी पार्टी के सामने खड़े हुए संकट को टाल सकते थे, उसे सुलझा सकते थे, उसका वक्‍त रहते समाधान कर सकते थे, पर उनका ऐसा नहीं करना उनकी मजबूरी थी और उससे भी ज्‍़यादा उनकी ज़रूरत थी। मजबूरी यह कि अरविंद के बारे में य‍ह लगभग स्‍थापित-सा हो गया है कि वे चुनौतियों का आमने-सामने मुकाबला करने से कतराते हैं, उनसे दूर भागते हैं। वे अपनी ‘भगोड़ा’ छवि को लेकर ज्‍़यादा नाखुश भी नहीं हैं। हाल के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के पक्ष में जिस तरह के परिणाम आए हैं, उससे उनकी यह धारणा पुष्‍ट हुई होगी कि उन्‍हें अपनी वर्तमान ‘सार्वजनिक’ छवि से मुक्‍त नहीं होना चाहिए। इस लिहाज़ से विश्‍लेषण करें तो अरविंद की सार्वजनिक छवि एक ऐसे व्‍यक्ति की है, जो पलटकर वार नहीं करता, विनम्रता का भाव अपने सभी तरह के विरोधियों के प्रति बनाए रखता है, ज्‍़यादा शिकायत नहीं करता। हरियाणा के साथ दिल्‍ली की सात लोकसभा सीटों के लिए होने वाले मतदान के पूर्व जब अरविंद केजरीवाल को थप्‍पड़ मारे जा रहे थे, या उन पर स्‍याही और अंडे फेंके जा रहे थे, तब भी आम आदमी पार्टी के इस नेता ने कोई क्रोध प्रकट नहीं किया। तब कहा गया कि चूंकि केजरीवाल ने मुख्‍यमंत्री पद छोड़कर जनता को धोखा दिया है, इसलिए उनके साथ ऐसा हो रहा है। कुछ नेताओं द्वारा तब यह भी कहा गया था कि मीडिया की सुर्खियों में बने रहने और जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए केजरीवाल स्‍वयं थप्‍पड़ लगवा रहे हैं। आम आदमी पार्टी तब सातों लोकसभा सीटों पर हार गई थी पर केजरीवाल ने हिम्‍मत नहीं हारी।
[dc]प्रशांत[/dc] भूषण और योगेंद्र यादव के सामने बैठकर केजरीवाल ने समस्‍याओं का समाधान करना उचित नहीं समझा और पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की बैठक से अपने आपको अनुपस्थित कर दोनों नेताओं के खिलाफ फैसले को भी होने दिया और उसके प्रति अपनी असहमति भी नहीं व्‍यक्‍त दी। उन्‍होंने इस संदेश को प्रसारित होने दिया कि जो कुछ भी हुआ है, वह उन्‍हीं के इशारे पर किया गया है। दोनों ने स्‍वेच्‍छा से इस्‍तीफे की पेशकश की थी, पर उन्‍हें हटाने का प्रस्‍ताव उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा पेश किया गया या उनसे ऐसा करवाया गया। मनीष के प्रस्‍ताव का समर्थन संजय सिंह द्वारा किया गया। अपनी पार्टी को एक ‘अप्राकृतिक’ संकट में पटककर केजरीवाल स्‍वयं ‘प्राकृतिक’ चिकित्‍सा के लिए बेंगलुरु पहुंच गए। पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मयंक गांधी ने सलाह दी है कि आम आदमी पार्टी के भविष्‍य के लिए केजरीवाल को आत्‍मचिंतन की जरूरत है। ‘केजरीवाल में भी कुछ खामियां हैं।’ अरविंद अपने बेंगलुरु प्रवास के दौरान ऐसे किसी ‘चिंतन’ या ‘चिंता’ के लिए समय निकाल पाएंगे, कहा नहीं जा सकता।
[dc]आम[/dc] आदमी पार्टी को जिस तरह का ‘प्रचंड’ बहुमत प्राप्‍त हो गया है, उसे देखते हुए अरविंद केजरीवाल की यह ‘राजनीतिक जरूरत’ बन गई है कि वे पार्टी में असहमति या विरोध को ज्‍़यादा जगह नहीं दें। खासकर ऐसी असहमति को जो सार्वजनिक रूप से भी व्‍यक्‍त हो रही हो। पार्टी में ‘अनुशासन’ बनाए रखने के लिए ऐसा किया जाना उन्‍हें जरूरी प्रतीत होता होगा। दूसरे राजनीतिक दलों के काम करने का भी लगभग यही तरीका बन गया है, अत: पार्टी के अंदरूनी स्‍तर पर केजरीवाल अपने आपको ‘सख्‍त’ छवि का ही पेश करना चाहते हैं। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के खिलाफ की गई कार्रवाई के जरूरी संदेश पार्टी की रगों के अंदर तक पहुंच भी गए हैं। अगर इतने बड़े और प्रतिष्ठित नेताओं के साथ इस तरह का व्‍यवहार हो सकता है तो फिर सबकुछ संभव है।
[dc]प्रशांत[/dc] भूषण, योगेंद्र यादव, मयंक गांधी या वे तमाम लोग, जिन्‍होंने मनीष सिसोदिया के प्रस्‍ताव के प्रति पीएसी की बैठक में असहमति व्‍यक्‍त की होगी, वे आम आदमी पार्टी या केजरीवाल को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे। केजरीवाल को पता है कि जिस ‘कांस्टिट्यूंसी’ का वे प्रतिनिधित्‍व करते हैं, उस तक केवल उन्‍हीं की पहुंच है। विधानसभा चुनावों के दौरान ‘लगभग’ सारा ‘मीडिया’ और दिल्‍ली का एक बड़ा ‘संभ्रांत’ वर्ग आम आदमी पार्टी की ‘एकतरफा’ छीछालेदर कर रहा था। पर जैसे-जैसे ‘ओपिनियन पोल’ के आंकड़े केजरीवाल के पक्ष में बदलते गए, सबकी आवाजें भी बदलती गईं। केजरीवाल जानते हैं कि उन्‍हें किसके लिए, कब और क्‍या करना है। उन्‍हें यह भी पता है कि पिछली बार जब बहुमत उनके पास नहीं था और वे कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार चला रहे थे, तब उनकी ही पार्टी के कुछ विधायक उनके नेतृत्‍व के खिलाफ किस तरह की आवाजें उठा रहे थे। केजरीवाल को वैसे इस बात का भी यकीन हो सकता है कि जिस तरह से उन्‍होंने अण्‍णा का हृदय परिवर्तन कर दिया, उसी तरह आगे या पीछे प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को भी मना लेंगे। पर आम आदमी पार्टी की घोषित छवि को जिस तरह का नुकसान होना था, वह तो हो ही चुका है।

दिल्ली की सीख अन्य राज्यों में भी पहुंचेगी

[dc]चुनाव[/dc] दिल्ली में हुए हैं और जश्न पटना, लखनऊ और कोलकाता में मनाये जा रहे हैं. मुख्यमंत्री पद पर अरविंद केजरीवाल काबिज होनेवाले हैं, पर पटना में राज्यपाल के आमंत्रण की प्रतीक्षा नीतीश कुमार कर रहे हैं. दिल्ली चुनाव के परिणामों से उत्पन्न हो रहे इस घटनाक्रम पर कोई आश्चर्य भी व्यक्त नहीं किया जाना चाहिए.
[dc] दिल्ली[/dc] के चुनाव पर देश-दुनिया के तमाम हिंदुस्तानियों, राजनेताओं और तमाम विपक्षी दलों की नजरें लगी थीं. भाजपा ने तो अपना सबकुछ ही दावं पर लगा दिया था. दिल्ली के परिणाम अगर उलटे पड़ जाते और भाजपा की सरकार बन जाती, तो पटना में मांझी की तकदीर भी बदल सकती थी. भाजपा अब मांझी के साथ अपने भाग्य को नहीं जोड़ सकती. राज्यपाल को भी अब फैसले बदली हुई परिस्थितियों के अनुसार लेना पड़ सकता है.
[dc] कुछ[/dc] संयोग हुआ है कि दिल्ली और बिहार में भाजपा का भाग्य परिवर्तन उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हुआ. नीतीश कुमार और लालू यादव ही नहीं, सभी विपक्षी दलों में जैसे कि नयी जान आ गयी है. भाजपा इसी बात से खुश है कि दिल्ली अब कांग्रेस मुक्त हो गयी है. कांग्रेस इस बात से प्रसन्न है कि भाजपा की दिल्ली में सरकार नहीं बनेगी. निश्चित ही दिल्ली के चुनाव देश की राजनीति बदलने की शुरुआत करनेवाले साबित हो सकते हैं. कहा जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां अपने अनियंत्रित अहंकार की शिकार हो गयीं. अपनी जीत के बाद अरविंद केजरीवाल ने कार्यकर्ताओं को अहंकार से बचने की ही सलाह दी. निश्चित ही केजरीवाल की सलाह का असर बिहार की राजनीति पर भी पड़ेगा. कार्यप्रणाली को लेकर नीतीश कुमार पर भी टिप्पणियां होती रही हैं.
[dc]दिल्ली[/dc] के चुनाव परिणाम भाजपा में कमजोर होते जा रहे आंतरिक लोकतंत्र की वापसी और ज्यादा लोकतांत्रीकरण की जरूरत के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालेगी. भाजपा में उस तरह के तत्व कमजोर होंगे, जिनकी अनावश्यक नारेबाजी के खिलाफ प्रधानमंत्री अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे थे और सार्वजनिक रूप से मौन बांधे रहते थे. दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के मुकाबले विपक्ष की वैसी ही स्थिति बन गयी है, जैसी कि लोकसभा के भीतर एनडीए के मुकाबले अन्य दलों की हैं. एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दोनों ही स्थितियां अच्छी नहीं मानी जा सकती. दिल्ली में भाजपा की हार का एक बड़ा कारण यही बना कि पार्टी को लोकसभा में प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सभी सातों सीटों पर विजय मिलने के बाद, विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान वह एक अतिरंजित आत्मविश्वास से ग्रसित हो गयी. इसकी परिणति किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करने में हुई. किरण बेदी का चुनाव में हार जाना भाजपा के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं कहा जा सकता.
[dc] दिल्ली[/dc] के चुनावों में भाजपा ने आप के खिलाफ उसी तरह की नकारात्मक प्रचार शैली का प्रयोग किया, जो उसने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के खिलाफ किया था. वर्ष 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ भी वैसी ही चुनाव प्रचार की शैली अपनायी थी, जैसी कि भाजपा ने अरविंद केजरीवाल के मुकाबले के लिए अपनायी. श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रचंड बहुमत से सत्ता में आये राजीव गांधी को 1989 में इस कारण से सत्ता छोड़नी पड़ी.
[dc] दिल्ली[/dc] के चुनाव को लेकर विपक्षी दल अगर इतने ज्यादा उत्साहित हैं, तो उसके पीछे के कारणों को समझा जा सकता है. दिल्ली चुनाव को मोदी सरकार के अबतक के कामकाज के प्रति जनमत संग्रह नहीं माना जाये, तब भी इतना तो तय है कि प्रधानमंत्री और भाजपा को अपने कामकाज के तरीके में परिवर्तन करना पड़ेगा और शायद उसकी शुरुआत हो चुकी है. दिल्ली के अनुभवों की सीख पटना, लखनऊ और कोलकाता तक भी आगे-पीछे अवश्य ही पहुंचेगी.

मलाला के मुल्क में मासूमों का कत्ल

[dc]शांति[/dc] का नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते हुए मलाला यूसुफजई जब अपने दिल के कहीं बहुत भीतर से कह रही थीं कि बच्चों के हाथों में बंदूकें देना आसान है पर किताबें देना मुश्किल, तब पाकिस्तान की स्वात घाटी की इस बहादुर बालिका को अंदाजा नहीं रहा होगा कि कुछ ही दिनों में समूची दुनिया को पेशावर में हद दर्जे की दहशतगर्दी से मुखातिब होना पड़ेगा। तालिबानी आतंकवादियों ने पेशावर के आर्मी स्कूल के मासूम बच्चों पर हमले को अंजाम देकर समूची दुनिया के बच्चों की आंखों और रातों में दहशत पैदा कर दी है।
[dc]आतंकवाद[/dc] का जो कहर उत्तरी वजीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई का बदला लेने के नाम पर बरपाया गया है, वह इसी मायने में अभूतपूर्व है कि मासूम और निहत्थे बच्चों को निशाने पर लिया गया। तालिबानी आतंकवादियों का इरादा बच्चों को बंधक बनाकर नवाज शरीफ सरकार या सेना के साथ किसी तरह की सौदेबाजी करने का नहीं था। वे बच्चों के खून से होली खेलना चाहते थे। तालिबानी आतंकवादियों ने पाकिस्तानी सेना की सबसे कमजोर नब्ज पर हमला किया है। बच्चों को पूछ-पूछकर निशाना बनाया गया कि कौन-कौन सेना के परिवारों से जुड़ा है। ऐसा तो दुनिया की किसी भी लड़ाई में अब तक नहीं हुआ। तालिबानियों द्वारा दी गई चुनौती पाकिस्तान की निहायत कमजोर साबित हो चुकी शरीफ सरकार और वहां की सेना के लिए ही नहीं, समूची दुनिया के लिए है। बच्चों के खिलाफ इस तरह की घृणित कार्रवाई का सफल हो जाना तमाम लोकतांत्रिक हुकूमतों के लिए खौफ पैदा करने वाला है। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में दो दिन पहले सामने आए आतंकवादी चेहरे से यह हजार गुना ज्यादा डरावना और भयावह है।
[dc]नवाज[/dc] शरीफ सरकार के साथ दिक्कत यह है कि उसे पता ही नहीं है कि अपने ही देश में ताकतवर हो रही आतंकवादी ताकतों और उनके कारण उपजने वाली व्यथा और दर्द से कैसे निपटा जाए। सत्ता में काबिज होने के बाद नवाज शरीफ मानकर चल रहे थे कि बातचीत के जरिये तालिबानी आतंकवाद पर काबू पाया जा सकता है। यह भी कि शरीफ सरकार अफगानिस्तान के तालिबानियों और पाकिस्तान के तालिबानियों के बीच फर्क नहीं कर पा रही थी। अफगानिस्तान में तालिबानियों ने अपनी कार्रवाई के दौरान निर्दोष बच्चों को इस तरह से निशाने पर नहीं लिया था। पाकिस्तान के तालिबानी ऐसा कर रहे हैं। पाकिस्तानी सेना अपनी ही सरकार की नीतियों से सहमत नहीं थी कि आतंकवाद का मुकाबला बातचीत के जरिये किया जा सकता है। यही कारण रहा कि उत्तरी वजीरिस्तान के ‘ट्रायबल’ इलाकों में पाकिस्तानी सेना ने जैसे ही तालिबान के खिलाफ अपनी कार्रवाई शुरू की, आतंकवादियों ने सेना के सबसे संवेदनशील पहलू पर हमला करने की कार्रवाई को अंजाम दे दिया। इसे पाकिस्तानी सेना की सबसे बड़ी नाकामी माना जा सकता है कि वह आतंकी मंसूबों को भांप तक नहीं सकी।
[dc]सवाल[/dc] यह है कि पाकिस्तानी सरकार इस चुनौती का अब कैसे जवाब देती है। वह सारी दुनिया को अपना मुंह कैसे दिखा पाती है कि सवा सौ से ज्यादा बच्चों के संहार को रोक पाने में वह क्यों विफल रही। भविष्य में हो सकने वाले इस तरह के हमलों को रोकने के लिए उसके पास क्या उपाय हैं? पाकिस्तान का उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत का इलाका कोई एक दशक से अधिक समय से आतंकवाद की चपेट में है और सैकड़ों लोगों की अब तक जानें ले चुका है। क्या पेशावर के ‘आर्मी स्कूल’ पर हमले के बाद तालिबान के खिलाफ कार्रवाई में सेना के हाथ और कदम थम जाएंगे?
[dc]पेशावर[/dc] में हुई घटना भारत के लिए इसलिए चिंताजनक बन जाती है कि पाकिस्तान की सरकार अगर तालिबानी आतंकवाद पर काबू पाने में नाकामयाब साबित हुई तो आग का धुआं हमारे सीमा क्षेत्र को भी असुरक्षित करेगा। पाकिस्तान की कोई सोलह करोड़ की आबादी पेशावर के हादसे पर किस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करती है, अभी सामने आना बाकी है। शरीफ सत्ता में बने रहते हैं या फिर पेशावर की आग में झुलसी सेना सरकार के सारे सूत्र अपने हाथों में ले लेती है या विपक्षी दल बच्चों की नृशंस हत्या को मुद्दा बनाकर कोई नया आंदोलन छेड़ देते हैं, यह भी अभी भविष्य के गर्भ में है।
[dc]आतंकवाद[/dc] के इस नए और क्रूर तालिबानी चेहरे का तब तक मुकाबला नहीं किया जा सकेगा, जब तक कि पाकिस्तानी सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी ताकतों को समर्थन देना बंद करके भारत और अफगानिस्तान के सहयोग से कार्रवाई करने का साहस नहीं जुटाती। नवाज शरीफ अपनी कमजोर सरकार के दम पर तो तालिबानी चुनौती का सामना नहीं कर पाएंगे।
[dc]पेशावर[/dc] की घटना के बाद मलाला ने कहा है कि मासूम बच्चों की नृशंस हत्या से उसका दिल टूट गया है। जिस समय तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के आतंकवादी पेशावर में अपनी हरकतों को अंजाम दे रहे थे, पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ क्वेटा में एक सैन्य परेड को संबोधित करते हुए दावा कर रहे थे कि नफरत और आतंक फैला रहे मुठ्ठीभर तत्वों को पूरी तरह से परास्त करके बलूचिस्तान प्रांत को अमन के वतन में तब्दील कर दिया जाएगा। जनरल शरीफ को इसके तत्काल बाद ही क्वेटा से पेशावर के लिए निकलना पड़ा।
[dc]सवाल[/dc] यह है कि जो सरकार और सेना अपने मासूम बच्चों की जिंदगी की ही हिफाजत नहीं कर सकती, उस पर पाकिस्तान के सोलह करोड़ नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए कैसे और कब तक भरोसा कर पाएंगे?

हमारी भूमिका कहां से शुरू कहां खत्म?

[dc]हरियाणा[/dc] रोडवेज की चलती हुई बस में जब पूजा और आरती नाम की दो बहनें अपने आपको ‘विवादास्पद’ छेड़छाड़ से बचाने के लिए संघर्ष कर रही थीं, तब बस में सवार दूसरे लोग मूकदर्शक बने हुए थे। यकीन किया जाए तो दोनों बहनों के नजदीक बैठी एक महिला ने हिम्मत करके छेड़छाड़ करने वालों का विरोध किया और घटनाक्रम को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर दुनियाभर में पहुंचा भी दिया। समूची घटना को लेकर विवाद अब इस बिंदु पर केंद्रित हो गया है कि दोनों बहनों के साथ छेड़छाड़ हुई थी या नहीं। विवादों के बीच ही हरियाणा सरकार ने ‘बहादुर’ बहनों का सम्मान करने की अपनी योजना को फिलहाल स्थगित कर दिया है और बस के ड्राइवर-कंडक्टर को बहाल कर दिया है। लगता है, दो साल पहले दिसंबर 2012 में राजधानी दिल्ली की चलती बस में हुए निर्भया कांड के बाद भी जैसे कहीं कुछ नहीं बदला है।
[dc]महिलाओं[/dc] के साथ होने वाले अत्याचारों के प्रति विरोध प्रकट करने का यह तरीका जैसे एक पैटर्न बन गया है कि एक अकेली महिला को संघर्ष तो अपने दम पर ही करना है, समाज केवल उसकी विजय व उसके साहस का सम्मान करेगा। संघर्ष के दौरान साथ देने के लिए बहुत कम बार ऐसा होगा कि कोई आगे आएगा। आए दिन के किस्से हैं कि दिनदहाड़े और भरी सड़कों पर कोई गुंडा लूटकर भागता है और कई बार अकेली महिला को ही गुंडे को पकड़ने के लिए दौड़ लगाना पड़ती है। अगर वह उसे पकड़ लेती है तो भीड़ का काम बस गुंडे की पिटाई करके उसे पुलिस को सौंपने भर का बच जाता है। बिरले मौके ही ऐसे होते हैं, जब कोई बहादुर नौजवान अपनी जान की बाजी लगाकर अपराधियों के पीछे दौड़ पड़ता है।
[dc]कुछ[/dc] दिनों पहले ऑस्ट्रेलिया में हुई एक घटना का वीडियो दुनियाभर में वायरल हुआ था। किसी यात्री का पैर ट्रेन के डिब्बे के नीचे आ गया था। तब ट्रेन में सवार यात्रियों ने समूचे डिब्बे को ही दूसरी तरफ झुकाकर यात्री को सुरक्षित बाहर निकाल लिया था। बहस का असली मुद्दा यही बच जाता है कि आपदा प्रबंधन में नागरिकों की व्यक्तिगत और सामूहिक भूमिका कहां से शुरू और कहां पर खत्म होनी चाहिए। हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव थानाखुर्द की दोनों बहनों के साथ रोहतक में हुई घटना और उसके प्रत्यक्षदर्शी यात्रियों की भूमिका नागरिकों के आम स्वभाव से अलग नहीं है। नागरिक अपने ठीक सामने उपस्थित संघर्ष से दो-दो हाथ करने के बजाय व्यवस्था की कमजोरियों को कोसते हुए बाहरी राहत और सहायता की प्रतीक्षा करने में ही अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। कुछ साल पहले चंडीगढ़ के पास हुई एक घटना में सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच एक व्यक्ति ने देखते ही देखते आत्मदाह कर लिया था और समूची घटना का वीडियो भी तैयार हो गया। तब सवाल उठाया गया था कि जो व्यक्ति आत्मदाह की फिल्म उतार रहा था, कम से कम उसने ही आत्मदाह करने वाले व्यक्ति को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की? इस तरह के सवालों के उत्तर कभी प्राप्त नहीं होते।
[dc]इसका[/dc] एक उत्तर यही हो सकता है कि हम व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान को उजागर करने या होने देने से खौफ खाते हैं। ऐसा इसलिए कि दोषियों को दंडित करने में कानून की व्यवस्था के प्रति आम आदमी पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है। बस यात्रियों के लिए पूजा और आरती की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाना अपने आपको तमाम तरह की कानूनी पूछताछ के लिए प्रस्तुत करना साबित हो सकता था और छेड़छाड़ करने वालों के पक्ष में खड़ी खाप पंचायत की नाराजगी का सामना करने की हिम्मत दिखाना भी। यही कारण है कि सड़क दुर्घटना के शिकार व्यक्ति को बहुत सारे मामलों में तत्काल मेडिकल सहायता इसलिए भी नहीं मिल पाती कि लोग पुलिसिया कार्रवाई के दौरान होने वाली पूछताछ से बचना चाहते हैं। न्यायपालिका द्वारा वर्षों पूर्व दिए गए इस आशय के फैसले के बावजूद कि दुर्घटनाओं के शिकार होने वाले लोगों की मदद करने वालों को अस्पतालों आदि स्थानों पर पूछताछ के लिए परेशान नहीं किया जाएगा, आम नागरिक डरते-सहमते हुए ही मदद करने की हिम्मत जुटा पाता है। अगर अतीत में की गई ऐसी किसी मदद से जुड़ा कोई कटु अनुभव हो तो वह व्यक्ति हमेशा के लिए ऐसी किसी भी पहल के प्रति तौबा कर लेता है।
[dc]हरियाणा[/dc] सरकार अगर इस बात की जांच कराए कि उस बस में कौन-कौन यात्री थे और उनमें से प्रत्येक का घटना के बारे में क्या कहना है तो चौंकाने वाला विश्लेषण प्राप्त हो जाएगा। पर ऐसा विश्लेषण तो ऐसी हरेक घटना के संबंध में प्राप्त हो सकता है। निर्भया और उसके साथी को बस से सड़क पर बाहर फेंक दिए जाने के बाद प्राप्त नागरिक सहयोग, मेडिकल सहायता और पुलिस कार्रवाई सबकुछ सवालों के घेरे में रही है। हरियाणा सरकार की ओर से इस आशय के किसी भी आश्वासन को सार्वजनिक किया जाना अभी बकाया है कि दोनों बहनों को किसी तरह की कानूनी लड़ाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। अब तो यह भी कहा जा रहा है कि पूजा और आरती के साथ कोई छेड़छाड़ हुई ही नहीं थी। झगड़ा सीटों को लेकर हुआ था। अत: इस तरह की आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता है कि समूचा दोष अंतत: दोनों बहनों के मत्थे मढ़ दिया जाए और ‘छेड़छाड़’ करने वालों को ही ‘पीड़ित’ पक्ष करार दे दिया जाए। और कि जो मीडिया कल तक दोनों बहनों को ‘बहादुर’ बताकर उनका अभिनंदन कर रहा था, वही ‘छेड़छाड़’ की सच्चाई पर अंगुलियां उठाने लगे।
[dc]ऐसा[/dc] तब तक चलता रहेगा, जब तक कि आम नागरिक व्यवस्था की ओर से अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हुए स्वयं को अपने दोहरे चरित्र से मुक्त नहीं कर लेता। दोहरा चरित्र यही है कि एक अकेले नागरिक के रूप में बस के अंदर प्रत्यक्षदर्शी होते हुए भी वह कानून के डर से अपने आपको सत्य से अलग कर लेता है और जब वही व्यक्ति बस के बाहर सड़क पर नहीं पहचाने जाने वाली भीड़ का अज्ञात चेहरा बन जाता है तो कानून को हाथ में लेने से भी संकोच नहीं करता।