इस बिहारी को तो मुंबई में भी देखा है!

कोसी नदी का पानी अपने किनारों को तोड़ता हुआ लाखों लोगों को अपनी चपेट में नहीं ले लेता तो पता ही नहीं चलता कि देश के नक्शे पर जो बिहार कायम है उसका असली चेहरा कैसा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ सालों के बाद भी देश के गरीब किन हालातों में जिंदा हैं। बाढ़ के पानी में गले-गले तक डूबे हुए बिहारियों के बदन पर कपड़े होते भी हैं या नहीं। अगर होते भी हैं तो किस तरह के और कितने। और अपना किस तरह का सामान वे लोग बाढ़ में बचाने की कोशिश करते हैं। क्या इन लोगों की सूरत कहीं नजदीक से भी उन लोगों से मिलती है जो तीन साल पहले केवल एक दिन की तेज बरसात के कारण भरे पानी से मुंबई में तबाह हो गए थे? बिहार में ऐसी बरबादी तो लगभग हर साल होती है।

इस बार तो जल प्रलय ही हो गया। 16 जिलों में रहने वाली करोड़ों की जनसंख्या प्रभावित हुई है। कोसी पर बने बांध में अगर दरार नहीं पड़ती तो जान ही नहीं पाते कि देश के बाकी हिस्सों से बिहार की मदद के लिए कितने हाथ उठे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर आने वाली आपदाओं से निपटने के लिए सरकारों की तैयारी कितनी है। और कि गरीब जनता के आंसुओं को ईंधन में तब्दील कर राजनीतिक रोटियां बिहार के ही राजनेता किस प्रकार से सेंक सकते हैं। बाढ़ के पानी में गले-गले तक डूबा हुआ यह वही बिहारी है जिसे क्षेत्रवाद की दादागिरी मुंबई की सड़कों पर सरेआम लतियाती रहती है। एक जमाना था जब टीवी चैनल्स नहीं थे और केवल रेडियो और अखबारों की खबरें ही देश की दिनचर्या तय किया करती थीं। असम और बिहार में बाढ़ें तब भी आया करती थीं। जिले के जिले और बस्तियांे की बस्तियां तब भी डूबती थीं। पर तब समूचा देश मदद के लिए सड़कों पर उमड़ पड़ता था। गली-गली और मोहल्ले-मोहल्ले से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत सामग्री जमा की जाती थी।

कोसी का बांध नहीं टूटता तो कैसे पता चलता कि नदी के पानी के साथ-साथ लोगों ने भी रास्ते बदल लिए हैं। बिहार का फटेहाल गरीब जिस समय कोसी की बाढ़ में डूबा हुआ अपनी जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था, देश को जानकारी दी जा रही थी कि वर्ष 1981 से 2005 के बीच के पच्चीस सालों में सवा डालर प्रतिदिन (कोई पचपन रुपए) से कम पर जिंदा रहने वालों की संख्या देश में साठ प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत रह गई है। और यह भी कि एक डालर प्रतिदिन से कम पर अपनी सांसें गिनने वाले लोगों का आंकड़ा 42 प्रतिशत से घटकर 24 प्रतिशत रह गया है। मतलब यह कि कोई 26 करोड़ लोग अभी भी देश में प्रतिदिन एक डालर से कम पर जिंदा हैं।

महंगाई के ताजा आंकड़ों से इसकी तुलना करें तो कल्पना ही की जा सकती है कि इस एक डॉलर से कम में बिहार की गरीबी कितनी चीजें खरीद सकती है। खाने-पीने का सामान छोड़ दें तो भी शायद डॉक्टर के द्वारा लिखी गई दवाएं भी नहीं ढूंढ़ी जा सकती। अब ऐसी हालत में सोचा जा सकता है कि जिस तरह की राहत का इंतजाम बिहार के बाढ़ पीड़ितों को बचाने के लिए किया गया उससे कितने लोग वाकई जीवित बच सकते हैं। कोसी के कारण हुई तबाही और उससे निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे इंतजाम विकास के नाम पर दिखाई जाने वाली तमाम फिल्मी उपलब्धियों की पोल खोलने के लिए काफी हैं। देश को अब नजर आ रहा है कि रोटी-रोजी की तलाश में अपने परिवारों को हजारों मील पीछे छोड़ देश के महानगरों की सड़कों पर धक्के खाने वाला बिहारी और बाढ़ के पानी में अपने बूढ़े मां-बाप या बिलखते हुए बच्चों को ढूंढ़ने वाला चेहरा, दोनों एक जैसे ही दिखते हैं।

बाढ़ का पानी निश्चित ही पूरी तरह से उतरेगा भी और कोसी का गंगा में जाकर मिलना उसकी नियति भी है। आदमी धोखा दे सकता है पर कोसी और गंगा नहीं। गंगा को भी पता है कि सागर से साक्षात्कार होने तक उसे कितनी यात्रा तय करनी है। पर बिहार की तकदीर आसानी से नहीं बदलने वाली। या तो बाढ़ या अकाल और इन दोनों से बचे तो अत्याचारों के बीच जीने के लिए उसका संघर्ष चलता ही रहेगा। देश में जो 26 करोड़ लोग एक डॉलर से कम पर आज जिंदा हैं उनमें बिहार का पेट भी शामिल है। बाढ़ की डूब में आए कई जिलों में वह सहरसा भी है जिसे कोई चालीस साल पहले संत विनोबा भावे ने अपने ग्राम स्वराज आंदोलन का राष्ट्रीय मोर्चा घोषित किया था। मुझे याद है कि मैं भी तब वहां था।

पिछले दिनों एक मुलाकात के दौरान लंदन में रह रहे एक बड़े पाकिस्तानी पत्रकार ने सवाल किया था कि आपके यहां के लोग कश्मीर को लेकर बहुत ही भावुक बने रहते हैं और दावा भी करते हैं कि वह भारत का कभी न जुदा होने वाला हिस्सा है पर उस इलाके में आए भूकंप को लेकर आपके देश के आम नागरिक ने किस तरह की मदद के लिए हाथ बढ़ाया? यह सही है कि भूकंप प्रभावित एक बड़ा इलाका पाक के कब्जे वाले कश्मीर में है पर उससे क्या फर्क पड़ता है, उसने आगे पूछा। पत्रकार ने यह भी कहा कि कश्मीर के भूकंप पीड़ितों को राहत पहुंचाने का काम तो आज भी जारी है पर आप क्या कर रहे हैं? उस पत्रकार को कैसे बतलाया जाए कि कश्मीर ही नहीं बिहार भी भारत में ही है। पर वहां हुई तबाही को लेकर भी हमारी चिंताएं कश्मीर के भूकंप से ज्यादा अलग नहीं है। राष्ट्रीय संवेदनाओं के स्तर पर एक राष्ट्र के रूप में हम बिहार से भी उतने ही दूर हैं जितने कि कश्मीर से। हम इसे प्रतिशतों में नापे जाने वाले विकास की देन मान सकते हैं कि इंसानी रिश्तों को कायम रखने वाली भावनात्मक बुनियादें या तो आधुनिकता के भूकंपों में जमींदोज हो गई हैं या फिर खुदगर्जी की बाढ़ ने उन्हें लील लिया है।

आतंकित करती नागरिक उदासीनता

सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उजागर होने वाली प्रत्येक कमी के लिए खुफिया तंत्र को दोषी ठहराना एक शगल बन गया है। हमने यह नहीं देखा कि हमारे खुफिया और सुरक्षा तंत्र का पिछले तमाम वर्षों में कितना राजनीतिकरण हो गया है और आम नागरिक के हित जिसकी लाठी उसकी भैंस पर आधारित हो गए हैं। खुफिया तंत्र का बड़ा काम अब यह हो गया है कि जो भी सत्ता में है उनक विरोधियों की चालों पर नजरें रखे। सुरक्षा तंत्र की जिम्मेदारियां राजनीति के सफेद हाथियों की हिफाजत और कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित रह गई हैं। वीआईपी इलाके में अगर कोई बूढ़ा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गलती से भी रास्ता भूलकर पहुंच जाए, तो पकड़ लिया जाएगा और आम नागरिकों की बस्तियों में गुंडे योजनाबद्ध तरीके से उत्पात भी मचाते रहें, तो भी कोई कार्रवाई नहीं होगी। अत: आतंकवाद से निपटने का मुद्दा अब केवल राज्य (स्टेट) और आतंकवादियों के बीच तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुद्दा अब नागरिकों और आतंकवादियों के बीच आपसी कार्रवाई का भी हो गया है।

गौर करने लायक है कि जब नागरिकों के दो समुदाय सड़कों पर खुलेआम हिंसक सांप्रदायिक संघर्ष में जुट जाते हैं तब वे राज्य (स्टेट) से न तो कोई आज्ञा प्राप्त करते हैं और न ही उसके (स्टेट के) हस्तक्षेप को ही बर्दाश्त करते हैं। कोशिश तब राज्य की सत्ता को चुनौती देने की ही रहती है। पर जब हमला चोरी छिपे या पीछे से होता है, तो वही नागरिक अपनी हिफाजत के लिए स्टेट का मुंह ताकता है और उसमें जरा सी भी कमी या खोट प्रकट होने पर पूरी व्यवस्था को ही निकम्मी करार देता है। हाल की आतंकवादी कार्रवाइयों के बाद उपजा नागरिक रोष कुछ इसी तरह की अभिव्यक्ति है। तमाम आतंकवादी कार्रवाइयों की जांच-पड़ताल में यह लगभग स्थापित हो चुका है अधिकांश मामलों मंे दुश्मन कहीं बाहर से नहीं आए। ‘बाहर’ से मदद और ‘सहानुभूति’ से इंकार नहीं किया जा सकता। जब नागरिक जानता है कि दुश्मन उन्हीं के बीच ‘नागरिक’ का मुखौटा पहने हुए है, तो उसकी पहचान करने अथवा उसके प्रति सावधानी बरतने का प्रथम दायित्व भी नागरिक का ही बन जाता है। सिस्टम (व्यवस्था) अपनी जिस जिम्मेदारी से बचता रहा या उसमें चूक करता रहा वह यह है कि उसने नागरिकों को किसी भी प्रकार की आपदा से मुकाबला करने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया। कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा आए या फिर आतंकी हमला हो, नागरिकों की पहली प्रतिक्रिया उसके प्रति स्टेट रिस्पांस को लेकर होती है स्वयं के रिस्पांस की नहीं।

समूची व्यवस्था को चौबीस घंटों के लिए स्थायी रूप से हाई अलर्ट पर रखा भी नहीं जा सकता। अगर ऐसा किया गया तो व्यवस्था के नाम पर जो कुछ बचा हुआ है, वह भी चौपट हो जाएगा। पर नागरिक निश्चित ही अपने आपको लगातार हाई अलर्ट पर रख सकते हैं। सीमा इलाके में रहने वाला आम नागरिक ऐसा ही करता है – खेती-बाड़ी करते हुए भी और त्यौहार मनाते हुए भी। सीमा क्षेत्र में आम नागरिक का व्यवहार भी सैनिकों की तरह ही रहता है। ऐसा समूचे देश में भी हो सकता है। हकीकत यह भी है कि सीमा क्षेत्र में रहने वाला नागरिक स्थान परिवर्तन के साथ ही अपने गुण भी बदल लेता है। हमें इस हकीकत के साथ जिंदा रहने की आदत डालना होगी कि नागरिक समाज को सांप्रदायिक रूप से जितना ज्यादा दूषित किया जाएगा उतना ही ज्यादा भार स्टेट के प्रतिरक्षा कवच पर पड़ने वाला है। एक समुदाय अपने आपको दूसरे के खिलाफ जितनी ज्यादा हिंसा के साथ व्यक्त करेगा, उसका प्रकटीकरण आतंकवाद की शक्ल में ही होगा।

अगर हमने अपने घर के भीतर की हिंसा या सुरक्षा के लिए स्टेट पर भरोसा करना बंद कर दिया है, तो खुले में होने वाली हिंसा से निपटने के औजार भी खुद को गढ़ने होंगे। राज्य की भागीदारी हो सकती है, पर इनीशिएटिव नागरिकों को ही लेना पड़ेगा। विस्फोटकों को शक्तिहीन करने के लिए बम निरोधक दस्तों के विशेषज्ञों की सेवाएं लेना आवश्यक है, क्यांेकि न तो यह काम सामान्य नागरिक कर सकता है और न ही उसे करना चाहिए। पर कहीं विस्फोटक पड़ा हुआ है यह सूंघने की क्षमता तो नागरिकों को ही अपने में विकसित करना होगी। स्टेट की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने नागरिकों को उनके सैन्य कर्तव्यों के लिए प्रशिक्षित करे। आतंकवादी हमले इंटेलिजेंस फेल्योर के कारण कम और नागरिक उदासीनता के कारण ज्यादा सफल होते हैं। नागरिकों की उदासीनता ज्यादा आतंकित करने वाली है।

राजनेताओं की प्रतिमाएं और राजनीति के प्रतिमान

उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने अपनी उस शानदार प्रतिमा को 1 जून की रात हटवा दिया जिसका कि अनावरण उनके ही हाथों 14 अप्रैल को नवाबों के शहर लखनऊ में आयोजित एक शानदार समारोह में हुआ था और 2 जून को दिन के उजाले में उनकी नई प्रतिमा उसी स्थल पर फिर से स्थापित भी हो गई। करोड़ों की लागत से गोमती के किनारे आकार ले रहे मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट आम्बेडकर स्मारक में ‘प्रतीक स्थल’ पर स्व. कांशीराम की प्रतिमा के निकट ही मायावती का पुतला भी स्थापित किया गया था। मुख्यमंत्री जैसी हस्ती की एक प्रतिमा को हटाकर दूसरी को लगाए जाने का कोई सरकारी कारण जनता को नहीं बताया गया। जनता ने भी कारण जानने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। ऐसे मामलों में सूचना के अधिकार का इस्तेमाल सफलतापूर्वक कर पाना कोई आसान काम भी नहीं। इमारतों को बनवाने, उन्हें तुड़वाने और फिर से बनवाने को लेकर शहर लखनऊ में नवाबों के कई किस्से चलन में हैं। उनमें एक यह भी है कि इससे जरूरतमंद लोगों को लगातार रोजगार मुहैया करवाया जा सकता है।
आम्बेडकर पार्क का जिस स्थल पर विस्तार हो रहा है वहां पूर्व में एक स्टेडियम सहित और कई चीजंे थीं। पार्क की स्थापना मुख्यमंत्री का कोई साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए का स्वपA है और उसे पूरा करने में कई वर्ष लग सकते हैं। इस दौरान हजारों लोगों को रोजगार मिलता रहेगा। मायावती का इस तर्क में यकीन नहीं कि प्रतिमाएं व्यक्ति के जीते-जी नहीं लगवाई जा सकतीं। मायावती एक लोकप्रिय राजनेता हैं। अपने जीवनकाल में अपनी ही प्रतिमाएं बनवाकर स्वयं के द्वारा उनका अनावरण करने की हिम्मत भी कोई लोकप्रिय राजनेता ही कर सकता है, आम आदमी नहीं। आम आदमी केवल निजी एलबमों में ही अपनी तस्वीरें चिपकाने की ताकत जुटा पाता है। विनोबा भावे तो शायद आम आदमी से भी अलग कोई चीज थे। उन्होंने सलाह दी थी कि उनके निधन के बाद जब मुखागिA दी जाए तो उसमें उनके द्वारा व्यक्त किया गया समस्त लेखन भी स्वाहा कर दिया जाए अन्यथा उनके सर्वोदयी शिष्य उनके लिखे को ही अंतिम सत्य मानकर हवाला देते रहेंगे। विनोबा भावे, गांधीजी के योग्य शिष्य और उनके प्रथम सत्याग्रही थे। गांधीजी की प्रतिमाएं तो देश भर में मिल सकती हैं पर विनोबाजी की प्रतिमा ढूंढ़ने के लिए खोजी दस्ते रवाना करने पड़ेंगे।
राजनेताओं द्वारा अपने जीवनकाल में ही प्रतिमाएं गढ़वाकर खड़ी करने की परंपरा अगर चल निकली तो शहर छोटे पड़ने लगेंगे। इससे एक अन्य बात जो जाहिर होती है वह यह कि राजनेताओं का अपनी ही जनता पर से भरोसा उठ गया है। वह यूं कि कहीं उनके सत्ता से बाहर हो जाने के बाद जनता उनकी प्रतिमाएं स्थापित करने की इच्छा व्यक्त न करे। कई बार ऐसा भी होता है कि हुक्मरानों को उनके जीवनकाल में ही अपनी प्रतिमाओं को उसी जनता के हाथों तबाह होते देखना का दुख झेलना पड़ता है जो कि कल तक उन पुतलों के दर्शन कर भाव-विभोर होती थी। इराक में हुए अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद सद्दाम हुसैन के पुतलों को जिस तरह से गले मंे फंदे डालकर गिराया गया वह काफी चौंकाने वाला और दहलाने वाला था। महापुरुषों की प्रतिमाओं पर कालिख पोते जाने की घटनाएं भी यदा-कदा होती ही रहती हैं। यह अलग मुद्दा है कि चौराहों-चौराहों पर देश भर में स्थापित राजनेताओं की प्रतिमाओं को अथाह गंदगी के बीच अनंत काल तक बिना थके हुए खड़े रहना पड़ता है। इसके बावजूद न तो श्रद्धा और चंदे में कमी आती है और न ही पुतलों को बनाने, बनवाने और स्थापित करने का अभियान कभी रुकता है। राजनेताओं की छवि या उनकी स्मृति को चिरस्थायी भाव प्रदान करने की लालसा से खड़ी की जाने वाली प्रतिमाओं का जनता की श्रद्धा के अलावा बहुत कुछ संबंध इस बात से भी होता है कि उसके लिए बजट कितना स्वीकृत किया गया है। एक ही महापुरुष की समान कद और काठी वाली दो अलग-अलग स्थानों पर लगी हुई प्रतिमाओं के चेहरों में बजट के कारण पैदा होने वाले फर्क को स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। निश्चित ही सुश्री मायावती की प्रतिमा के प्रकरण में बजट की कोई बाधा नहीं रही होगी।
मायावती की प्रतिमा को हटाए जाने के पीछे गैर-सरकारी तौर पर जो अखबारी कारण गिनाया जा रहा है वह यह है कि मुख्यमंत्री पहली प्रतिमा में व्यक्त अपनी ऊंचाई व उसकी प्रभाव क्षमता को लेकर उसके अनावरण के समय से ही बहुत प्रसन्न नहीं थीं। उसी समय से नई प्रतिमा को बनवाने का काम भी प्रारंभ करवा दिया गया था। पहले विधानसभा चुनावों में और बाद में प्रदेश में संपन्न हुए उप-चुनावों में बसपा ने सफलता के जो झंडे गाड़े उसे देखते हुए मायावती निश्चित ही दावा कर सकती हैं कि उनका राजनीतिक कद और वजन बढ़ गया है जो कि पहली प्रतिमा के कद से मेल नहीं खाता होगा। उत्तरप्रदेश में लगातार बदलती हुई राजनीति के जिस काल के दौरान मुख्यमंत्री की पहली प्रतिमा को बनाने का काम कलाकारों ने अपने हाथ में लिया होगा उन्हें मायावती की बढ़ती हुई राजनीतिक ताकत का तब अंदाज नहीं रहा होगा। इस बात का ध्यान नए सिरे से प्रतिमा बनाने वाले कलाकारों ने ही रखा होगा। पूरे प्रकरण में जानना यह जरूरी नहीं है कि एक ‘प्रतिमा’ को हटाकर दूसरी की स्थापना कर दी गई है। समझने की बात यह है कि अपना राजनीतिक प्रभुत्व सिद्ध करने के लिए राजनेताओं द्वारा पुराने प्रतिमानों को रातों-रात ध्वस्त किया जाकर नए ‘प्रतिमान’ स्थापित किए जा रहे हैं।

सरकारें संवादशून्य, नागरिक संवेदनाशून्य!

राजस्थान में वर्तमान में चल रहे आंदोलन ने ‘देश की सरकार’ और ‘देश की जनता’ — दोनों ही को लेकर कुछ अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। इन सवालों की गंभीरता पर गौर किया जा सकता है। सरकार को लेकर सवाल यह है कि कोई भी हुकूमत आंदोलनकारियों के साथ समय रहते बातचीत की पतली सी गली भी क्यों नहीं ढूंढ़ पाती। इस तरह के भ्रम की स्थिति क्‍यों बन जाती है कि फैसला किसे लेना है, पता ही नहीं चलता? एक समूचा प्रदेश आंदोलन की चपेट में आ जाता है, सब कुछ ठप्प हो जाता है और सरकारें तमाशबीनों की तरह खड़ी रहती हैं। वह न तो ‘हां’ बोलती हैं और न ‘ना’। आतंकवादियों, अलगाववादियों, भूमिगत विद्रोहियों — यानी कि और सभी के साथ तो चर्चा के रास्ते निकल आते हैं पर अपनी ही जनता के साथ संवाद नहीं हो पाता। सोचकर डर लगता है कि राजस्थान जैसे हालात अगर और राज्यों में भी पैदा हो जाएं और सारे आंदोलनकारी इसी तरह कानून और व्यवस्था को दंत मंजन बनाकर दिल्ली की तरफ कूच करने लगें तो देश के हालात किस तरह के बन जाएंगे!

यहां चिंता का कारण केवल यही नहीं है कि इस तरह के आंदोलनों से स्थानीय जन-जीवन ठप्प हो जाता है, यातायात व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है और ट्रेनें तथा बस सेवाएं रद्द हो जाती हैं। इतना सब तो जबरदस्त बरसात में भी हो जाता है। मुंबई जैसा शहर भी केवल एक ही दिन की तेज बारिश में तबाह हो चुका है। भूकंप आ जाए तो नुकसान और अव्यवस्थाएं और भी बड़े पैमाने पर भोगना पड़ती हैं। पर सामान्य दिनों में भी सरकारों द्वारा जनता में आंदोलनों के कारण पैदा होने वाली अव्यवस्था और अराजकता को झेलने की हिम्मत पैदा करना प्रजातंत्र के साथ एक खौफनाक मजाक है। जल और जमीन के अपने अधिकारों की मांग के लिए ग्वालियर से राजघाट तक शांतिपूर्ण तरीके से नंगे पैर यात्रा करने वाले गरीब आदिवासियों को दिल्ली से रूबरू करवाने और वर्तमान में चल रहे जैसे आंदोलनों को जानते-बूझते देश की राजधानी की यात्रा का आमंत्रण देने के बीच खासा फर्क है। पहले में इस बात के दर्शन होते हैं कि समाज के दबे-कुचले और शोषित व्यक्ति को भी देश में अपनी बात कहने का अधिकार प्राप्त है और दूसरी में इस बात के कि राजनीतिक सत्ताएं दीवालिया हो चुकी हैं और फैसले अब बंद कमरों में नहीं सड़कों पर लिए जा रहे हैं। प्रश्‍न हिंसक आंदोलनों की वैधानिकता का नहीं बल्कि जनता के वैधानिक अधिकारों की रक्षा का है। और अधिकार यह कि जनता अराजकता के बीच जिंदा रहने की आदत डाले जाने से परहेज कर सकती हैं पर इसके लिए सरकारों को सही वक्त पर फैसले लेने की आदत डालना होगी जो कि हो नहीं रहा है।

दूसरा सवाल तो पहले सवाल से भी ज्यादा गंभीर और परेशान करने वाला है। वह यह है कि देश के ही एक हिस्से में किसी आंदोलन के चलते कोई चालीस लोग शासन की हिंसा के शिकार हो जाते हैं और किसी भी कोने में आंसू की एक बूंद भी नहीं टपकती। जैसे कि देश की बाकी जनता का इन मौतों से कोई सरोकार ही नहीं। ‘आंदोलनकारी’ की मौत को ‘आदमी’ की मौत नहीं मानना राष्ट्रीय संवेदनशून्यता की पराकाष्ठा है। जयपुर में 13 मई को हुए बम विस्फोटों में मृत कोई 65 लोग संवेदना के स्तर पर एक आंदोलन में मरने वाले चालीस लोगों से सरे आम अलग कर दिए जाते हैं। पहला हादसा राष्ट्रीय शोक और संवेदना का विषय बन जाता है और दूसरी राष्ट्रीय असम्बद्धता का। व्यक्तिगत या गुटीय ¨हंसा को काबू में लाने के लिए राज्य की हिंसा को स्वीकृति या उसके प्रति मौन का मतलब है नागरिक संवेदनहीनता की चरम सीमा पर पहुंचने के लिए बिना 1 किसी बाहरी हस्तक्षेप के भी अपने आपको तैयार कर रहे हैं। ऐसा पहले नहीं होता था। आम नागरिक व्यक्तिगत अथवा गुटीय हिंसा के प्रति भी निजी अथवा सामूहिक स्तर पर रोष व्यक्त करता था और राज्य की हिंसा के खिलाफ सुने जा सकने वाले स्वरों में भी आवाज उठाता था। अंग्रेजी में जिसे ‘टोटली अनकन्संर्ड’ कहते हैं, वैसी ही आज स्थिति है जो कि भयावह है।

ट्रेजेडी यह है कि हमने अपनी समस्याओं के हल ढूंढ़ने के लिए सुविधानुसार व्यवस्थाएं बना ली हैं। कुछ तकलीफों के निदानों को हमने अपने-अपने भगवानों के भरोसे छोड़ रखा है तो कुछ अन्य के लिए अपने आपको बाबाओं, साधु-महात्माओं द्वारा बांटे जाने वाले गंडे ताबीजों के हवाले कर दिया है। बावजूद इसके ढेर सारे मसले ऐसे हैं जिनके इलाज के लिए किसी नुस्खे का ईजाद होना बाकी रह जाता है। ऐसे ही मसलों में इस बीमारी का शुमार भी किया जा सकता है कि सरकारें फैसले लेने से डरती हैं। पहले तो सरकारें एक लंबे समय तक चीजों को टालती रहती हैं और जब संकट बढ़ जाता है तो अपनी सारी चिंताएं न्याय पालिका के हवाले करके निश्चिंत हो जाती हैं। वैसे इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि न्यायपालिका द्वारा सुनाए गए हर फैसले को सरकारें अंतिम सत्य की तरह स्वीकारने की नीयत या हिम्मत रखती हों। शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को तब की सरकार ने संसद में कानून बनाकर राजनीतिक कारणों से उलट दिया। जनता का रोल भी इस मायने में भिन्न नहीं कि अपने फिल्मी नायकों को जुकाम भी हो जाने की खबर मात्र से ही वह खुद बीमार पड़ कर यज्ञ-हवन में जुट जाती है पर अपने ही एक वर्ग द्वारा की जाने वाली हिंसा के प्रति भी और उसकी प्रतिक्रिया में उपजने वाले ‘स्टेट वायलेंस’ से होने वाली मौतों को लेकर भी, एक सन्नाटा ओढ़कर सो जाती है। या तो ऐसा हो रहा है कि जनता ने ही अपने आपको हुक्मरानों की तर्ज पर ढाल लिया है या फिर शासकों ने अपनी पसंद की जनता को चुन लिया है।

चापलूसी के चाचा चौधरी और कांग्रेस की अमरकथा

राजीव गांधी राजनीति में पैर भी नहीं रखना चाहते थे। वे एक नितांत ही प्रायवेट और अगल किस्म के इंसान थे। उनका संपूर्ण व्यक्तित्व अद्भुत और आकर्षक था। पर भाई संजय गांधी की असामयिक मौत के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी जब अकेली पड़ गईं तो राजीव ने न सिर्फ राजनीति में प्रवेश किया उसके साथ ईमानदारी भी बरती। राजीव गांधी अगर आज जिंदा होते तो देश की राजनीति काफी अलग और साफ-सुथरी होती। पर ऐसा नहीं हो पाया। प्रियंका गांधी के इस सवाल का नलिनी जवाब नहीं दे पाई कि उनके पिता जैसे एक अच्छे इंसान की जान लेने के पीछे आखिर मकसद क्या हो सकता था। राजीव गांधी के बेटे राहुल गांधी राजनीति में अपनी जगह बनाने की न सिर्फ इच्छा रखते हैं उसके लिए ईमानदारी के साथ कोशिशें भी कर रहे हैं। जिस तरह से राजीव गांधी मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के देवगढ़ गांव में कड़ी धूप के बीच आदिवासियों के झोपड़ों में भारत की आत्मा की तलाश करते थे ठीक उसी तरह राहुल कभी उड़ीसा में तो कभी छत्तीसगढ़ के बस्तर में उन आदिवासी चेहरों को तलाश कर रहे हैं जिनकी तस्वीरें उन्होंने अपने पिता की आंखों में तैरती हुई देखी होंगी।

राहुल का गांव-गांव घूमना कांग्रेस के अनुभवी नेताओं की स्थापित छवि से मेल नहीं खाता। इंदिराजी की हत्या के बाद हुए चुनावों के बाद प्रधानमंत्री पद संभालने और सत्ता से बाहर होने के बाद अपनी हत्या के पूर्व तक जिस कांग्रेस का उन्होंने नेतृत्व किया उस दौरान जिस एक मोर्चे पर उनका संघर्ष बराबर बना रहा वह था पार्टी को चापलूसी से मुक्ति दिलाने का। राजीव गांधी अपने प्रयास में सफल नहीं हो पाए। राजीव गांधी की हत्या के बाद के सत्रह वर्षो के दौरान सारी दुनिया बदल गई, देश की राजनीति बदल गई, कांग्रेस का कई राज्यों से सफाया हो गया पर जो एक चीज नहीं बदली वह है चापलूसों का साम्राज्य। डॉ. मनमोहन सिंह की शराफत की दाद दी जानी चाहिए कि वे प्रधानमंत्री पद पर बने रहते हुए अपने ही दल के वरिष्ठ नेताओं के मुंह से इस तरह के स्तुति गान सुन रहे हैं कि अगले प्रधानमंत्री राहुल गांधी होंगे। राहुल गांधी ने बस्तर दौरे के दौरान अपनी इस पीड़ा को व्यक्त भी किया कि ‘युवराज’ का संबोधन उन्हें अपमानजनक लगता है।

राहुल जानते हैं कि राजा, महाराजा और युवराज बनकर पार्टी चलाने की कोशिशें ही देश की राजनीति को मायावती जैसे नेताओं की झोली में डालेंगी। जिन लोगों ने राजीव गांधी को जमीनी राजनीति नहीं करने दी वे ही तत्व अब राहुल गांधी को भी ऐसा करने से रोकना चाहते हैं। ये लोग राहुल को बिना युद्ध लड़े ही महावीर चक्र प्रदान करना चाहते हैं। इस बात पर जरा गौर किया जाए कि डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यू.पी.ए. सरकार को अब पांच साल होने जा रहे हैं। वर्ष 2004 में हुए चुनावों में न सिर्फ राहुल गांधी ही बल्कि उनके साथ युवा सांसदों की एक बड़ी टोली लोकसभा के लिए चुनी गई थी। ये युवा सांसद जब चुनकर आए थे तब मीडिया में बड़ी-बड़ी कहानियां छपी थीं कि कांग्रेस का अब चेहरा बदलने वाला है। युवा नेतृत्व को बड़ी जिम्मेदारियां मिलेंगी। नई कांग्रेस का जन्म होगा।

हाल ही में हुए मंत्रिमंडल फेरबदल में कुछ युवा सांसदों को जिम्मेदारियां अवश्य सौंपी गई हैं। पर उससे यह आरोप अप्रांसगिक नहीं हो जाता कि राजनीतिक दलों का मंजा-मंजाया घाघ नेतृत्व जिम्मेदारियों के नाम पर युवाओं को केवल जंगल से सूखी लकड़ियां बीनकर लाने का काम ही सौंपता आया है। बृूढ़ा नेतृत्व बैंड बजाना बंद नहीं करता और युवाओं से केवल चुनावी घोड़ों के आगे केवल रॉक एंड रोल करवाया जाता है। राहुल गांधी कोशिश में हैं कि वे लड़ाई जीतकर ही मैडल प्राप्त करें। संघर्ष करके ही पदों तक पहुंचें। इसके लिए जेल भी जाने की उनकी तैयारी है। पर इसके लिए उन्हें पार्टी में जिस स्पेस की जरूरत है वह शायद आसानी से उपलब्ध न हो इस हकीकत के बावजूद कि सोनिया गांधी काफी शक्तिशाली पार्टी अध्यक्ष हैं। अपने-अपने वर्चस्व के लिए संघर्षरत दूसरी पार्टियों के राहुल गांधी भी शायद इसी तरह की परेशानियों से जूझ रहे होंगे।

क्यों नहीं आता गुस्सा और फूटते हैं आंसू

श्याम बेनेगल की स्मरणीय कृति ‘अंकुर’ के अंतिम दृश्य में समाज के सबसे शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला बच्च शोषक जमींदार की हवेली पर पत्थर उछालता है और इसी के साथ फिल्म का अंत हो जाता है। याददाश्त बहुत खराब हो तब भी अंकुर को फूटे कोई तीस-पैंतीस साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है पर जमींदार के खिलाफ उछाला गया पत्थर अभी तक सिनेमा के पर्दे के भीतर ही कैद है। इधर सिनेमा हाल के बाहर की दुनिया पूरी तरह से बदल चुकी है। पूरी की पूरी पुरानी पीढ़ी इस दौरान या तो बूढ़ी हो चुकी है या सांसें तोड़ चुकी है। एक नई जनरेशन इस दौरान अपने पैरों पर खड़ी होकर दुनिया बदलने की तैयारी में है और इसमें वह बच्च भी शामिल होगा जिसने फिल्म में जमींदार की हवेली पर पत्थर फेंका था।

मोहल्ले के ओटलों पर अपनी मशीनें जमाकर सिलाई करने वाले दर्जियों से त्यौहारों के मौकों पर झगड़ा हुआ करता था कि उन्होंने वक्त पर कपड़े सिलकर नहीं दिए। छोटे-छोटे गांवों से लेकर बड़े-बड़े शहरों तक हजारों की तादात में फैले हुए ये दर्जी पिछले तीस सालों के दौरान बगैर कोई खबर किए हुए ही रेडिमेड गारमेंट्स की दुकानों में छुप गए हैं। सर्दी, गर्मी, बरसात-हर मौसम में शहर के चौराहों पर एक टूटी-फूटी छतरी के नीचे बैठने वाला मोची, दो रुपए रोज पर सायकल किराए से देने वाली ढेर सारी दुकानें, सड़क किनारे पंचर जोड़ने की दुकान जमाए हुए कोई चचा, कोई रफूगर, कोई रंगरेज – देखते ही देखते सब कब और कहां गायब हो गए पता ही नहीं चला। शहरों में चलने वाले तांगे पलक झपकते ही पहले ऑटो रिक्शा और फिर कार-टैक्सियों में बदल गए। तांगों के आगे जुतने वाले घोड़े बिक गए और उनके अस्तबल साबुन-तेल के गोदाम बन गए। गली-गली डिब्बे में मलाई की कुल्फियां या कचौरी-समौसे लेकर शहर भर का चक्कर लगाने वाले लोग, बर्फ के लड्डू का ठेला लेकर घूमने वाला बाबा, बुड्ढी के मीठे-मीठे बालों का गोला बनाकर बेचने वाला लाला या गैस की टंकी पर गुब्बारे बांधकर बच्चों को लुभाता हुआ फुग्गे वाला भैया-गुम हो चुके हैं सब लोग। और शहर के उन सिनेमा हॉल्स का क्या हुआ जहां सुबह से रात तक फिल्में चलती थीं। लोग टिकटों के लिए लाइनें बनाकर खड़े रहते थे या धक्के खाते थे। सिनेमा हॉल्स रात के अंधेरों में मलबों के ढेर में बदले और दिन की रोशनी में व्यावसायिक परिसरों, मॉल्स और मल्टीप्लेक्स में ढल गए। कहीं कोई हो-हल्ला या आहट नहीं हुई।

याद पड़ता है कि एक जमाने में ट्रेन के लंबे सफर के दौरान पानी के बॉटल्स लेकर चलना पड़ता था। ट्रेन जैसे ही किसी स्टेशन पर रुकती, लोगों की भीड़ टूट पड़ती थी पानी के नलों पर। एक-दूसरे की बाटलें हटाई जाती थीं, झगड़े होते थे। बॉटल का मुंह पानी के नल पर होता था और नजरें ट्रेन पर। ट्रेन जैसे ही चलने लगती, लोग नल को खुला छोड़ अपने-अपने डिब्बों की तरफ दौड़ पड़ते थे। स्टेशनों पर पानी की प्याऊ बनी होती थी। वहां एक स्टूल पर पानी का मटका, कुछ खुल्ले पैसे पड़े होते थे और पीछे एक बूढ़ा चेहरा होता था जो पानी पिलाता था। कोई पता बताए कि ये सब लोग कहां जाकर बस गए हैं। स्टेशनों के नल आज सूने पड़े रहते हैं। मुसाफिरों की कोई भीड़ अब उन पर नहीं टूटती। स्टेशनों पर भी और चलती हुई ट्रेन में भी मिनरल वॉटर की बोतलें आसानी से मिलती हैं और सुकून से पी जाती हैं।

हमें पता ही नहीं चल पाया और हम अपने ही उन सभी ठिकानों से बेदखल कर दिए गए जिनके साथ पीढ़ियों से जुड़े हुए थे। तीज-त्यौहारों पर घरों में पूजन करवाने वाले पंडितजी फोन पर प्रार्थना करते हैं कि उन्हें नौकरी की जरूरत है। यजमान धीरे-धीरे कर्मकांड छोड़ रहे हैं। महीने में बीस-पच्चीस दिन काम नहीं रहता। कोई वक्त शायद ऐसा भी आए जब यज्ञोपवीत ढूंढ़ने के लिए संग्रहालयों में जाना पड़े। पीत्जा संस्कृति में अपना वजन बढ़ा रही नई पीढ़ी को उनकी कारें उन कोल्ड स्टोरेजों तक ही ले जा पाएंगी जहां ऊंची किस्म के गेहूं को सुरक्षित रखा जाता है। काली मिट्टी और गेहूं की बालियां इंसानी बस्तियों की पहुंच से लगातार दूर हो रही हैं। लहलहाती फसलें अब केवल फिल्मों में दिखाई देती हैं। कैमरों की आंखों से खेत और किसान दोनों ही रंगीन नजर आते हैं। कर्ज में डूबे हुए किसान सैकड़ों की संख्या में आत्महत्याएं करते रहते हैं पर कहीं कोई शोक सभा नहीं आयोजित होती। दूसरी ओर, फिल्मी सितारों के जेलों में प्रवेश करते और बाहर निकलते वक्त समूचा मीडिया और संगठित दर्शक समुदाय भाव विभोर होकर आंसू बहाता रहता है। हमें ही पता नहीं कि हम कितने बदल गए हैं।

हमारा सबकुछ हमारी आंखों के सामने और देखते-देखते खत्म हो रहा है और हम हैं कि देख ही नहीं पा रहे हैं। नदियां पहले नालों में बदलीं फिर उन पर बस्तियां खड़ी हो गईं। सड़कों के दोनों ओर लहलहाते बूढ़े-जवान पेड़ ईंधन में बदलकर धुंआ हो गए। इतना सब हो गया पर न तो हमें कभी गुस्सा आया और न ही आंखों से आंसू फूटे। ताजा सब्जियां और फल बेचने वाले अत्याधुनिक स्टोर की तरफ पत्थर उछालती भीड़ में शामिल होकर नाराजगी जाहिर कर देने भर से जो खत्म हो रहा है, वह कभी वापस लौटने वाला नहीं। अब तो कासाबियां भी अपनी जगह खड़ा हुआ नहीं मिलता और समूचा जहाज जलकर खाक भी हो जाता है।

बाजार ही तय करेगा क्रिकेट और खिलाड़ियों का भविष्य

देश में इन दिनों बहस चल रही है कि विश्व कप में हारकर लौटी टीम के साथ किस तरह का सुलूक किया जाए। इस सवाल को लेकर खुला मतदान चल रहा है कि राहुल द्रविड़ को भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान बनाए रखा जाए या नहीं, ग्रेग चैपल की कोच के रूप में सेवाएं हमें जारी रखना चाहिए या नहीं और कि सचिन तेंडुलकर को क्रिकेट से संन्यास ले लेना चाहिए या नहीं। हॉकी के विश्व मुकाबलों में पिटकर लौटने वाली टीमों को लेकर ऐसी चिंताएं कभी जाहिर नहीं की गईं। सही पूछा जाए तो हमें पता भी नहीं होगा कि हमारी हॉकी टीम के खिलाड़ी कौन हैं और उनका कोच किस नस्ल का है। क्रिकेट में टीम को लेकर जैसा तमाशा इन दिनों चल रहा है वैसा केवल राजनीति में चलता है। जीतने वाले नेताओं की जय-जयकार होती है और हारने वालों से इस्तीफे मांगकर उन्हें घर बैठाया जाता है। या तो ‘क्रिकेट की राजनीति’ चलती है या फिर ‘राजनीति का क्रिकेट’। बीच की कोई स्थिति नहीं है।

देश का सारा ध्यान इस समय क्रिकेट के खिलाड़ियों के वर्ल्ड कप में ‘पूअर परफामेर्ंस’ पर केंद्रित है। राजनीति के खिलाड़ियों और उनके ‘परफामेर्ंस’ की समूची चिंता तो शेयर बाजार के हवाले की जा चुकी है। कोई पूछने को तैयार नहीं कि डॉ. मनमोहन सिंह की कप्तानी में देश आए दिन जिस विश्व प्रतियोगिता में लगा रहता है उसके नतीजे किस तरह के मिल रहे हैं। पी. चिदम्बरम द्वारा संसद में पेश किए गए बजट को बीते हुए अभी एक महीना ही हुआ है पर उसे पूरी तरह से भुला दिया गया है। उत्तरप्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं और उसके नतीजे देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाले हैं पर देश क्रिकेट की टीम के भविष्य को लेकर सिरहाने लगे तकिए गीले करने में व्यस्त है। अखबारों के पन्नों पर सार्क देशों के सम्मेलन के समाचार व फोटो नहीं बल्कि केरल के कोवलम बीच पर राहुल द्रविड़ के तौलिया लिपटे हुए चित्र प्रकाशित हो रहे हैं।

भारतीय क्रिकेट भी शायद किसी बच्चे की तरह खेलते-खेलते गहरे बोरवेल में गिर गया है और समूचा देश उसे सुरक्षित बाहर निकालने में जुटा हुआ है। दुनिया के भ्रष्ट देशों की सूची में भारत किस पायदान पर है इसको लेकर हम अपने आपको कभी भी दुखी और अपमानित नहीं महसूस करते, जितना दुख और अपमान इस बात को लेकर महसूस कर रहे हैं कि हम विश्व कप क्रिकेट के मुकाबलों से इस तरह खाली हाथ कैसे लौट आए! हमारी चिंताओं में इस बात का शुमार नहीं है कि बांग्लादेश के साथ लगी भारत की सीमा पर चल रही गतिविधियों के कारण किस तरह से हमारे उत्तर-पूर्वी राज्यों की शांति भंग हो रही है, हम चिंतित इस सवाल को लेकर हैं कि अगले महीने ढाका दौरे पर जाने वाली भारतीय क्रिकेट टीम कैसी होगी, उसका नेतृत्व कौन करेगा और अगर वहां भी हमारी वर्ल्ड कप जैसी ही पिटाई हुई तो हम किससे और क्या जवाब मांगेंगे।

क्रिकेट को लेकर मचाई जा रही अराजकता को किसी व्यक्ति या समूह के मत्थे मढ़कर निश्ंिचत नहीं हुआ जा सकता। न ही यह कहकर पल्ला झाड़ा जा सकता है कि क्रिकेट के नशे को बढ़ावा किसी सोची-समझी साजिश के तहत दिया जा रहा है, जिसका कि उद्देश्य यह है कि आम जनता का ध्यान देश की मूलभूत समस्याओं से हटाया जा सके। ऐसा निश्चित ही हो भी रहा है। हजारों तरह की बीमारियों और लाखों किस्म की समस्याओं में उलझे होने के बावजूद हम कीड़ों-मकोड़ों की तरह रेंगते रहने के लिए तैयार हैं बशर्ते अपने नशे की पुड़िया हमें जरूरत के वक्त मिल सके।

इस तर्क में काफी दम है कि क्रिकेट का खेल बड़े-बड़े मैदानों और स्टेडियमों से निकलकर गली-मोहल्लों में पहुंच गया है और अब उसे वापस घरों में नहीं पहुंचाया जा सकता। इस बात में भी कम दम है कि सचिन तेंडुलकर अपना बल्ला टांग देंगे या द्रविड़ कप्तानी की दावेदारी से हट जाएंगे। सही बात तो यह है कि ये अगर ऐसा करना चाहें तो भी वे ताकतें ऐसा नहीं होने देंगी जो देश में क्रिकेट के खेल को इतने ही ग्लैमर के साथ चलाए रखना चाहती हैं। विचार किया जाए कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के विज्ञापनों में चमकने वाली हस्तियों में आज शुमार किनका है? या तो गिनती की उन फिल्मी हस्तियों का जिनके कि दम पर बालीवुड में करोड़ों-अरबों की फिल्में बनती हैं या फिर क्रिकेट के उन खिलाड़ियों का जो विश्व कप से मुंह लटकाए वापस लौटे हैं। क्रिकेट के परिदृश्य से अगर इन हस्तियों को अगर आम जनता के मतदान के जरिए ही गायब करना आसान हो गया तो फिर ढेरों की संख्या में अलग-अलग टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में कौन नजर आएगा?

दिग्गज खिलाड़ियों को आम जनता के ही चाहने भर से अगर क्रिकेट टीम से बाहर कर दिया गया तो उस सट्टा बाजार का क्या होगा जिसमें अरबों की संपत्ति का जुआ खेला जाता है और एक संगठित माफिया जिसका किसी तीसरे देश में बैठकर संचालन करता है। उस भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का भी वजन क्या रह जाएगा जो आज अरबों रुपए की संपत्ति का मालिक बना बैठा है? और अंत में उन राजनेताओं का क्या होगा जो क्रिकेट के पिच पर वोटों की राजनीति के बड़े-बड़े स्कोर खड़े कर रहे हैं।

क्रिकेट के बॉक्स आफिस पर फिल्मी दुनिया की तरह पुरानी ब्लैकएंड व्हाइट सफल फिल्मों के रंगीन प्रिंट जारी करके हिट नहीं हुआ जा सकता। इसलिए जो सितारे आज डिमांड में हैं, टीमें भी उन्हीं को लेकर बनाई जाएंगी। अत: इस मुगालते को दूर करना जरूरी है कि कोई चयन समिति होती है जो श्रेष्ठ खिलाड़ियों का चुनाव करती है। हमारी क्रिकेट टीम की असली चयन समिति देश का विस्तृत होता बाजार है और वही तय करता है कि मैच किसे खेलना है और यह भी कि ओपनिंग बैट्समैन कौन होंगे? सही तो यह भी है कि हमारी याददाश्त बड़ी कमजोर है। हर नई एक जीत पुरानी कई हारों को भुला देती है। ऐसा हमने युद्धों में और राजनीति में होते हुए देखा भी है।