बढ़ सकती हैं शिवराज की मुसीबतें

[dc]व्यावसायिक[/dc] परीक्षा मंडल के कुख्यात फर्जीवाड़े में मध्यप्रदेश का समूचा राजनीतिक घटनाक्रम दिल्ली में तैयार की गई स्क्रिप्ट के मुताबिक ही चल रहा है। भोपाल का रोल समाप्त हो गया नजर आता है। रविवार की रात तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अड़े हुए थे कि कोई पैंतालीस लोगों की रहस्यमय परिस्थितयों में जान लेने वाले घोटाले की जांच सही दिशा में चल रही है और मामले को सीबीआई के हाथों में सौंपने की कोई जरूरत नहीं है।
[dc]पर[/dc] सोमवार को दिन में ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री को व्यापमं घोटाले की जांच का रुख बदलने का फैसला लेने को मजबूर होना पड़ा और फिर वे रात भर सो भी नहीं पाए? देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सोमवार को जब अप्रत्याशित रूप से झाबुआ में घोषणा कहा कि व्यापमं फर्जीवाड़े की सीबीआई जांच की कोई जरूरत नहीं है और उसी दिन जब एक अन्य केंद्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती ने मांग कर दी कि किसी सक्षम एजेंसी से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जानी चाहिए तो साफ हो गया था कि दाल में कुछ काला है।
[dc]दो[/dc] केंद्रीय मंत्री एक ही दिन में एक बहुत ही संवेदनशील विषय पर अलग-अलग बयान दें और वह भी ऐसे समय जब प्रधानमंत्री देश से बाहर हों, ऐसा आमतौर पर संभव नहीं। पर दिल्ली में फैसला पहले से कर लिया गया था और शिवराज सिंह से उस पर राय नहीं ली गई होगी। संभवतः यही कारण रहा होगा कि मुख्यमंत्री रात भर सो नहीं पाए।
[dc]दिल्ली[/dc] की मंशा की मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस में घोषणा करने का काम भी मुख्यमंत्री पर छोड़ दिया गया जिससे कि शिवराज सिंह की प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आए। अतः साफ है कि हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार एसआईटी की निगरानी में वर्तमान में चल रही जांच के मुद्दे पर भाजपा का आलाकमान मुख्यमंत्री के साथ लंबे समय तक खड़ा नहीं दिखना चाहता था।
[dc]व्यापमं[/dc] घोटाले को लेकर जिस तरह से एक के बाद एक मौत हो रही है और कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहा है उसका भारी नुकसान पार्टी को बिहार विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता था। व्यापमं फर्जीवाड़े से राष्ट्रीय स्तर पर भी केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की छबि को नुकसान पहुंचने लगा था। अतः प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्रा से लौटने से पहले पूरे मामले को ठंडा पड़ा देखना चाहते थे। इस बात की वैसे अभी भी कोई संभावना नहीं है कि मुख्यमंत्री द्वारा सीबीआई को जांच का जिम्मा सौंपने की मंशा जाहिर कर देने से ही सबकुछ शांत हो जाएगा।
[dc]अब[/dc] नजरें राज्यपाल राम नरेश यादव के भविष्य को लेकर लिए जाने वाले फैसले पर टिक गई हैं। दूसरे यह कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी शिवराज सरकार के अनुरोध पर फिलहाल कोई भी फैसला करने से इंकार कर दिया है। ऐसा सुप्रीम कोर्ट में प्रकरण के विचाराधीन होने के कारण किया गया है जहाँ कि गुरुवार को दिग्विजय सिंह और अन्य लोगों की याचिकाओं पर विचार होना है। अतः शिवराज सिंह की मुसीबतें आने वाले दिनों में बढ़ भी सकती हैं

व्यापमं: शिवराज के भविष्य पर कोई असर होगा?

[dc]मध्य प्रदेश[/dc] में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी गंभीर मुश्किलों में नज़र आ रही है. समूची पार्टी अपने सारे काम काज छोड़कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बचाव की मुद्रा में है. व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) में हुए घोटाले और उसमें कथित तौर पर शामिल या उसके साथ किसी भी तरह से जुड़े लोगों की एक के बाद एक हो रही मौतों ने कोई एक दशक में पहली बार मुख्यमंत्री को बुरी तरह से हिला कर रख दिया है.
[dc]शिवराज[/dc] सिंह के लगातार किए जाने वाले दावे अगर सही हैं कि व्यापमं फ़र्ज़ीवाड़े का खुलासा उन्होंने ही करवाया था और जांच के आदेश दिए थे तो वे अब अपने किए पर खेद व्यक्त कर रहे होंगे. लगातार हो रही मौतों को लेकर जिस तरह से दहशत का वातावरण बन रहा है या फिर बनाया जा रहा है उससे ऐसा लगता है कि आने वाले दिन पार्टी और सरकार के लिए विपक्ष की ओर से और भी परेशानी पैदा करने वाले साबित हो सकते हैं.
[dc]समूचा[/dc] राज्य प्रशासन जैसे कि इस समय ठप्प पड़ गया हो. हरेक व्यक्ति की नज़रें मुख्यमंत्री पर टिकी हुई हैं कि वे सामने खड़े संकट से किस तरह से निपटते हैं. मध्य प्रदेश में ऐसा राजीतिक और प्रशासनिक संकट पहले कभी नहीं पैदा हुआ कि किसी घोटाले को लेकर राज भवन, मुख्यमंत्री निवास, मंत्रिमंडल के कई सदस्य, भारतीय प्रसाशनिक और पुलिस सेवा के कई अफ़सर सभी एक साथ संदेह के घेरे में खड़े पाए जाएं.
[dc]भाजपा[/dc] में किसी समय प्रधानमंत्री पद के एक सशक्त दावेदार माने जाने वाले शिवराज सिंह इस समय अपना मुख्यमंत्री का पद बचाने के संघर्ष में जुटे हुए हैं.
भाजपा का संकट यह है कि पहले सुषमा स्वराज फिर वसुंधरा राजे, स्मृति ईरानी और पंकजा मुण्डे के बाद अब उसे शिवराज को बचाने की कवायद करना पड़ रही है.
आम तौर पर माना जाता है कि शिवराज सिंह को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संरक्षण और आशीर्वाद प्राप्त है.
[dc]पार्टी[/dc] के वरिष्ठ नेताओं की चर्चा करें तो लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज का भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री को खुला समर्थन हासिल रहा है. राजनाथ सिंह द्वारा व्यापमं घोटाले को लेकर वर्तमान में चल रही जांच के प्रति संतोष व्यक्त करना और सीबीआई जांच की मांग को न्यायालय के फैसले पर छोड़ देना मुख्यमंत्री के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा सकता है. मुख्यमंत्री के नज़दीकी लोगों को भरोसा है की व्यापमं घोटाले को लेकर विपक्ष द्वारा बनाए जा रहे दबाव का पार्टी की ताकत और सरकार के स्थायित्व पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. इस आत्मविश्वास के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि व्यापमं फ़र्ज़ीवाड़े की जांच एक लम्बे समय से चल रही है और इसे लेकर हजारों लोग जेलों में बंद भी हैं. इनमें मंत्रिमंडल के एक प्रमुख पूर्व सहयोगी के साथ ही कई नामी हस्तियां भी शामिल हैं.
[dc]इस[/dc] सबके बावजूद सत्तारूढ़ पार्टी ने शिवराज सिंह के नेतृत्व में सभी उपचुनावों में जीत हासिल की है. पार्टी ने हाल ही में गरोठ उपचुनाव भी जीता है. ऐसी स्थिति में इन लोगों को पूरा यकीन है कि मुख्यमंत्री का कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है. अब देखना यह होगा कि घोटाले को लेकर साध्वी और केंद्रीय मंत्री उमा भारती द्वारा इशारों-इशारों में की गई मांग का मध्य प्रदेश की राजनीति पर क्या असर होता है.

राम माधव के ट्वीट और रंग में भंग

[dc]राम[/dc] माधव अब चाहते हैं कि योग के कार्यक्रम को लेकर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को लक्ष्य कर किए गए ट्वीट्स से उपजे विवाद पर ठंडा पानी पड़ जाए, पर शायद ऐसा नहीं भी हो। विपक्षी दलों को इस समय सरकार पर अपने हमले तेज करने के लिए बिना सड़कों पर उतरे हुए मुद्दों की तलाश है और वे उन्हें मिल भी रहे हैं। अतः राम माधव से जुड़ा विवाद तब तक तो चलेगा जब तक कि ललित मोदी, वसुंधरा राजे अथवा सुषमा स्वराज को लेकर कोई नया विस्फोट नहीं हो जाता।
योग कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त हुए प्रचार और उसकी सफलता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने कुछ हद तक सफेदा फेर दिया जिसकी कि कतई जरूरत नहीं थी। योगोत्सव में अल्पसंख्यकों की भागीदारी और ‘ओम’ तथा ‘अल्लाह’ के उच्चारणों को लेकर पहले से ही काफी बहस छिड़ चुकी थी और ऐसे में राम माधव ने अपने ट्वीट्स के जरिए हामिद अंसारी की अनुपस्थिति पर सवाल उठाकर विपक्ष को अवसर प्रदान कर दिया कि वह समूचे आयोजन को हिंदू-मुस्लिम विवाद में बदल दे। राजनीतिक हितलाभ के गणित में ऐसी तमाम कोशिशें नाजायज नहीं मानी जाती हैं।
[dc]हैरानी[/dc] की बात यह है कि राम माधव को अपने पहले ट्वीट से उपजे विरोध से पर्याप्त निराशा हाथ नहीं लगी तो उन्होंने लगे हाथ उसे डिलीट करके दूसरा ठोंक दिया और उसका भी खंडन उन्हें उपराष्ट्रपति के कार्यालय की ओर से झेलना पड़ा। प्रधानमंत्री के विश्वस्त लोगों की सूची में शुमार रहने वाले राम माधव ने अपने अति उत्साह से अपनी सरकार की दिक्कतों में ही इजाफा किया होगा जैसा कि कथित तौर पर कुछ ‘… महाराज ‘ और कुछ अति उत्साही ‘ साध्वियां” पहले से करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री के मौन की दाद दी जानी चाहिए कि इस तरह की पीड़ाओं को न तो वे अपने मन की बात के जरिए व्यक्त करते हैं और न ही सोशल मीडिया पर ट्वीट्स के मार्फत ही प्रकट करते हैं। अपनी नाराजगी को अभिव्यक्ति देने के प्रधानमंत्री के सूत्र सार्वजनिक न होते हुए भी पार्टी में सर्वज्ञात और सर्वव्यापी हैं।
[dc]राम[/dc] माधव ने अपने ट्वीट्स के जरिये न सिर्फ हामिद अंसारी की अप्रसन्नता को आमंत्रण देकर स्वयं की विश्वसनीयता को कम करवाया, अपने किए को लेकर उपराष्ट्रपति से व्यक्तिगत तौर पर क्षमायाचना नहीं करके प्रधानमंत्री के अपने प्रति विश्वास को भी काम करवाया होगा। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन अध्यक्ष हैं। राज्यसभा में सत्तारूढ़ एनडीए को बहुमत प्राप्त नहीं है। देश के उपराष्ट्रपति के पद से संबंधित नेक नीयत से किया गया ट्वीट भी वर्तमान परिस्थितियों में सरकार के लिए असहज महसूस करने का कारण बन सकता है।
[dc]इस[/dc] सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि उपराष्ट्रपति को योग कार्यक्रम में आमंत्रित ही नहीं किया गया था। उपराष्ट्रपति के पद को इसके पूर्व गणतंत्र दिवस के अवसर पर विवादों के घेरे में लाया गया था जब यह कहा गया था कि परेड के दौरान सलामी के लिए हाथ नहीं उठाने से तिरंगे की अवमानना हुई है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था।
[dc]राम[/dc] माधव चूंकि प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी नजदीकी तौर पर जुड़े हुए हैं, उनके द्वारा सोशल मीडिया पर की जाने वाली किसी भी टिप्पणी या दिए जाने वाले बयान से यह प्रचार आसानी से फैलाया जा सकता है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं उसे संघ, संगठन, और सरकार की मौन स्वीकृति प्राप्त है। अतः राम माधव के ट्वीट्स से इतना नुकसान अवश्य हो गया कि एक अच्छे आयोजन की सफलता और गिनीज बुक में दर्ज हुए रिकॉर्डों पर खुशियां व्यक्त करने के बजाय सरकार को अपने बचाव में व्यस्त होना पड़ा। इस अप्रिय प्रसंग को टाला भी जा सकता था। राम माधव चाहें तो प्रधानमंत्री के मौन से भी काफी-कुछ सलाह ले सकते हैं।

आडवाणी, आपातकाल और नरेन्द्र मोदी

[dc]देश[/dc] में फिर से आपातकाल की आशंकाओं वाले भाजपा के पितृपुरुष लालकृष्ण आडवाणी के इंटरव्यू पर विपक्ष के जिन भी उत्साही नेताओं ने राजनीतिक सट्टा लगाया होगा वे सभी अब अपनी हथेलियों को खीज के साथ मसल रहे होंगे। आडवाणी की टिप्पणी पर तालियां बजाने वालों में उस कांग्रेस पार्टी के शूरवीर नेता भी शामिल थे, जोकि चालीस साल पहले देश को आपातकाल की भट्टी में झौंकने के गुनाहगार रहे हैं।
[dc]आडवाणी[/dc] के कहे को लेकर यह अनुमान लगाने में चलीस घंटों का भी इंतजार नहीं किया गया कि पार्टी के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य ने छुपे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ इशारा किया है या नहीं। जैसी कि हशिए पर पड़े भाजपा के वयोवृद्ध नेता से अपेक्षा थी, उन्होंने बिना देर किए सफाई पेश की कि आपातकाल संबंधी उनके कथन का कोई भी संबंध वर्तमान परिस्थितियों से नहीं था। आडवाणी के अनुसार उन्होंने तो कांग्रेस के आपातकाल के बारे में चर्चा की थी। आडवाणी की बाद में दी गई सफाई भी उतनी ही अविश्वसनीय मानी जाएगी, जितनी कि उनके द्वारा इंटरव्यू में कही गई बातें।
[dc]पर[/dc] इतना जरूर माना जा सकता है कि आडवाणी अपने कथनों के जरिए पार्टी और सत्ता के शिखरों तक अपनी जो भी निराशा पहुंचाना चाहते थे, वह काम उन्होंने सफलतापूर्वक कर दिया है। समूचे एपीसोड का वक्त भी संयोग से अथवा प्रयासपूर्वक ऐसा चुना गया जब ललित मोदी के साथ संबंधों को लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफों की मांग विपक्षी दलों द्वारा की जा रही थी।
[dc]दोनों[/dc] ही भाजपा नेत्रियों की आडवाणी के कट्टर समर्थकों में गिनती होती रही है। दिल्ली के आसमान में आपातकालीन परिस्थियों के बादल अचानक इतने गहरा गए थे कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के साथ आडवाणी की मुलाकात भी तय हो गई थी, जो कि समय रहते पितृपुरुष द्वारा रद्द कर दी गई और पार्टी एक बड़ी शर्मिंदगी झेलने से बच गई।
[dc]समूचे[/dc] घटनाक्रम से यही स्थापित हुआ कि पार्टी की संकट की घड़ी में वयोवृद्ध नेता कोई भी बलिदान देने व लेने की सीमा तक अपने दीर्घ राजनीतिक अनुभव का इस्तेमाल कर सकते हैं। आपातकाल जैसी परिस्थितियों को लेकर पहले इंटरव्यू और बाद में उस पर सफाई के बाद वैसे आडवाणीजी का काम तो समाप्त हो गया। अब देश की जनता चाहे तो दिल्ली की पृथ्वीराज रोड की तरफ अपना मुंह और आंखें फाड़कर ताकती रहे कि कोई अगला चौंकाने वाला बयान कब प्रकट होने वाला है।
[dc]आपातकाल[/dc] के पीड़ितों के प्रतिनिधि अवशेषों में जितना भी आधिकारिक रूप से भरोसा करने लायक चालीस वर्षों के बाद भी बचा है, उसमें आडवाणी जी जैसी हस्तियां काफी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। अतः जब उनके द्वारा इस तरह के विचार हवा में उछाले जाते हैं कि लोकतंत्र को कुचलने वाली शक्तियां आज भी मजबूत हैं या कि आने वाले समय में नागरिक आजादी को निलंबित करने की स्थितियां हैं तो लोग उनके कहे को गंभीरता से लेंगे ऐसी अपेक्षा करना बेमानी नहीं है। पर आडवाणी जी जैसे नेता शायद ऐसा नहीं मानते, इस कीमत पर भी नहीं कि भेड़िया आया जैसी आवाजें लगाने से पार्टी से ज्यादा उनकी स्वयं की ही विश्वसनीयता प्रभावित होने वाली है।
[dc]सही[/dc] बात तो यह है कि आडवाणी जी जिस तरह से करवटें बदलते रहते हैं उसके कारण ही उनके बंगले के सन्नाटे में लगातार इजाफा हो रहा है। आडवाणी जी द्वारा सुलगाए गए अनार का अंतिम परिणाम चाहे जब और जैसा निकले, पर एक बात तो स्पष्ट है कि सत्तारूढ़ भाजपा में सबकुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है। हकीकत तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए विपक्ष के मुकाबले पार्टी के भीतर से ज्यादा चुनौतियां प्रकट हो रही हैं।
[dc]बिहार[/dc] चुनाव की पूर्व संध्या पर एक साथ इतनी सारी दिक्कतों का खड़ा हो जाना और उनमें से बगैर आहत हुए सुरक्षित बाहर निकल आना पार्टी और प्रधानमंत्री के लिए साहस का ही काम माना जाएगा।

इस लड़ाई का अंत ​क्या होगा ?

[dc]अरविन्द[/dc] केजरीवाल, केंद्र सरकार के साथ टकराव की राजनीति क्यों कर रहे हैं, और उसके ​​क्या परिणाम निकलेंगे इस सब को लेकर फिलहाल केवल अटकलें ही लगाई जा सकती हैं। पर आम आदमी पार्टी की तरफ से जो कुछ भी नजर आता है वह यह है कि लड़ाई अब बड़ी हो गई है और पीछे हटने में उसे ही नुकसान होगा।आम आदमी पार्टी का दावा है कि दिल्ली की जनता की नजरों में केजरीवाल सरकार को बेवजह परेशान किया जा रहा है। पर जनता की तरफ से आम आदमी पार्टी का ऐसा आकलन पूरी तरह से सही नहीं भी हो सकता है।
[dc]जब[/dc] केजरीवाल दूसरे मुख्यमंत्रियों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि आज उन्हें परेशान किया जा रहा है, कल उनका नंबर भी आ सकता है तो दिल्ली के लड़ाकू मुख्यमंत्री के इरादे साफ होने लगते हैं कि वे मामले को ठंडा करना ही नहीं चाहते। ऐसा नजर आता है कि नौकरशाही पर नियंत्रण के अधिकारों को लेकर प्रारम्भ हुई लड़ाई को अब बिहार के मैदानों तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है। दिल्ली में एक बड़ी संख्या में बिहारी नागरिक निवास करते हैं। आम आदमी पार्टी के नेता इस तैयारी में दिखाई देते हैं कि विधानसभा चुनावों के दौरान बिहार पहुँचकर भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री के खिलाफ माहौल बनाएं। आम आदमी पार्टी के एक बड़े नेता संजय सिंह बातचीत में संकेत भी देते हैं कि; ”हाँ, हम लोग भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार के लिए बिहार जा सकते हैं।”
दिल्ली में उप राज्यपाल नजीब जंग और केजरीवाल के बीच चल रहे घमासान के बीच एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के तौर पर भाजपा आश्चयर्जनक रूप से मुख्यमंत्री के खिलाफ सड़कों पर कोई भी मोर्चा खोलने से कतरा रही है। शायद पार्टी को भय है कि केजरीवाल अभी भी जनता के हीरो बने हुए हैं और आम आदमी पार्टी के खिलाफ किसी भी तरह के आंदोलन के परिणाम उल्टे भी पड़ सकते हैं।
[dc]दिल्ली[/dc] में जो कुछ भी चल रहा है, उसका प्रभाव राजधानी की जनता के हितों पर कितना पड़ रहा है, अभी पूरी तरह से साफ़ नहीं है क्योंकि जनता को तो सस्ती बिजली और पानी चाहिए और उन्हें दोनों प्राप्त हो रहा है।
[dc]क्या​[/dc]​ ​​इस लड़ाई का अंत होगा? हो सकता है और नहीं भी। बहुत संभव कि हालातों को ज्यादा बिगड़ते देख केंद्र दिल्ली में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दे या फिर सुलह – समझाइश की कोई सूरत बन जाए। पर ‘दोनों’ बड़ों के ज्ञात स्वभावों को देखते हुए उसकी कोई उम्मीद बनती नहीं दिखाई पड़ती। फर्जी डिग्री मामले में दिल्ली सरकार के पूर्व कानून मंत्री जीतेन्द्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी से आग में घी पड़ने का काम ही हुआ है। अब तो नया मोर्चा विधायक सोमनाथ भारती के खिलाफ खुल गया है।
[dc]केंद्र[/dc] और केजरीवाल के बीच चल रहे टकराव के बीच इस सच्चाई की अनदेखी नहीं की जा सकती कि प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव की अगुवाई में ‘आम आदमी पार्टी’ से अलग हुआ गुट इस समय पूरी तरह से खामोश है। कहा जा सकता है कि प्रशांत भूषण और यादव केंद्र के साथ टकराव में अरविन्द केजरीवाल के साथ दिखाई देना चाहते हैं और आगे-पीछे उनकी ‘घर वापसी’ भी हो सकती है। अरविन्द केजरीवाल भी चाहेंगे कि लड़ाई तब तक चलती रहे जब तक कि कोई भी फैसला उनके पक्ष में नहीं हो जाता। वे जानते हैं कि अंततः जनता की अदालत में वोट मांगने के लिए तो उन्हें ही जाना पड़ेगा, किसी उप राज्यपाल या किसी नौकरशाह को नहीं। अतः आम आदमी पार्टी के लिए इस ‘जंग’ को जारी रखना जरूरी है। समझ से परे है कि दिल्ली के मामले में भाजपा में फैसले कौन ले रहा है और पार्टी को मौजूदा टकराव से कितना लाभ हासिल होगा।

बिहार चुनाव तय करेंगे देश की राजनीति की शक्ल

[dc]लालू[/dc] प्रसाद यादव अगर नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए हैं तो समझ लिया जाना चाहिए कि दांव पर किस-किस का भविष्य लगा है और परिणामों के बाद देश की राजनीति की शक्ल क्या बनाने वाली है।
[dc]लालू[/dc] एक समझदार राजनीतिज्ञ हैं और उन्हें पता है कि ‘जनता परिवार’ अगर जीतता है तो भी फायदे में उनका राष्ट्रीय जनता दल रहेगा और गठबंधन की अगर हार होती है, तब भी शहादत नीतीश कुमार को ही देनी पड़ेगी।
[dc]निश्चित[/dc] ही बिहार के चुनावों में अब मुकाबला भाजपा और लालू-नीतीश के गठबंधन के बीच नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त विपक्ष के बीच होना है। बिहार में भाजपा के पास हाल-फिलहाल मुख्यमंत्री के पद की उम्मीदवारी के लिए कोई सर्व-सम्मत नेता नहीं है। अतः बहुत मुमकिन है भाजपा को नरेंद्र मोदी की लोकप्रिय छवि को ही आधार बनाकर विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए मजबूर होना पड़े।
[dc]इस[/dc] लिहाज से बिहार का चुनाव एक साल पहले ही हुए लोकसभा के चुनावों और उसके बाद केंद्र सरकार के कामकाज पर जनता के ‘ओपीनियन पोल’ की तरह माना जाएगा। बिहार चुनाव के परिणामों की गूँज दुनिया भर में सुनाई देने वाली है, विशेषकर दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में हुयी भाजपा की सफाई के परिप्रेक्ष्य में।
[dc]वर्ष[/dc] 2010 के चुनाव नीतीश के जदयू और भाजपा ने आपस में मिलकर लड़े थे और गठबंधन सरकार को शानदार बहुमत मिला था। बाद में भाजपा ने सरकार से नाता तोड़ लिया था। दिल्ली चुनाव में अरविन्द केजरीवाल के दूध से जली भाजपा अब बिहार में नीतीश-लालू की छांछ को भी फूँक-फूँक कर पीएगी और किरण बेदी जैसे किसी भी प्रयोग को दोहराने की हिम्मत नहीं करेगी।
[dc]जो[/dc] लोग बिहार की राजनीति को समझते हैं उन्हें पता है कि लालू और नीतीश के बीच अहंकार की लड़ाई स्थाई है और जो समझौता मजबूरी का ‘जहर पीकर’ हुआ है वह जरूरतों के पूरा होने तक ही काम करेगा। दोनों नेताओं और कांग्रेस के लिए अपने अस्तित्व का सवाल है कि मोदी और अमित शाह के चुनावी अश्वमेध को सफल नहीं होने दिया जाए।
[dc]आंकड़ों[/dc] के गणित के हिसाब से चलें तो पिछले चुनावों में नीतीश, लालू और कांग्रेस को प्राप्त कुल मतों का प्रतिशत भाजपा के मुकाबले कहीं अधिक था। जीतन राम मांझी की भूमिका को लेकर भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
[dc]बहुत[/dc] संभव है इसकी वजह मांझी को प्राप्त हो रहे अत्यधिक महत्त्व को लेकर बिहार भाजपा में बढ़ रहा असंतोष हो। सुशील मोदी की भाजपा में एक सर्वमान्य नेता के रूप में लोकप्रियता रही है पर मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर पार्टी आलाकमान अभी खामोश है।
[dc]भाजपा[/dc] को अपने अकेले दम पर बिहार में हुकूमत करने का मौका नहीं मिल पाया है। अतः निश्चित ही मोदी-शाह की संयुक्त कमान बिहार में अपनी समूची ताकत को झोंकने वाली है। राम विलास पासवान का भाजपा बिहार में कितना उपयोग करना चाहेगी, यह भी अभी साफ़ नहीं है।
[dc]भाजपा[/dc] के सारे चुनावी समीकरण हाल-फिलहाल तक इन अटकलों पर टिके हुए थे कि लालू यादव और नीतीश के बीच कभी कोई समझौता नहीं हो पाएगा। पर दोनों नेताओं ने असंभव को संभव कर दिखाया। उनके इस गठबंधन ने कमजोर होती हुई कांग्रेस में भी नई जान डाल दी।
[dc]कांग्रेस[/dc] के पास वर्तमान में केवल पांच सीटें हैं। बिहार विधानसभा चुनावों के परिणाम चाहे जिस तरह के निकलें, उनका देश की राजनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने की शैली पर दूरगामी प्रभाव पड़ने वाला है।

बुच साहब की अनुपस्थिति लंबे अरसे तक खलेगी

[dc]मध्‍य प्रदेश[/dc] की राजधानी भोपाल के अरेरा कॉलोनी स्थित हरियाली से आच्छादित उस बंगले पर अब वैसी चहल-पहल नहीं रहने वाली है और न ही वैसी कोई कड़क आवाज़ ही गूंजने वाली है, जो महेश नीलकंठ बुच नाम की एक असाधारण शख्सियत की उपस्थिति में बनी रहती थी। आमतौर पर नौकरशाहों के शहर के तौर पर अपनी पहचान रखने वाले भोपाल शहर में रहने वाले एक सेवानिवृत्‍त नौकरशाह के इस तरह चुपचाप चले जाने से प्रदेश राजधानी की राजनीति, पत्रकारिता, सामाजिक और स्वयंसेवी संस्थाएं सभी एकसाथ सूनी हो जाएंगी, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
[dc]महेश[/dc] भाई या बुच साहब, जैसा कि उन्हें सब लोग पुकारते थे, चाहे वे उनसे उम्र में कितने भी छोटे हों, उस भोपाल के निर्माता और संरक्षक थे, जैसा कि ख़ूबसूरत शहर आज नज़र आता है। मध्य प्रदेश में ऐसा कोई दूसरा शहर नहीं है। और इसका प्रमुख कारण यह था कि एक कुशल नगर नियोजक के रूप में वे सिद्धांतों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करते थे। यही कारण था कि शासन में उनकी कभी किसी से ज्यादा नहीं बनी। इसी के चलते वर्ष 1984 में उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। पर इसके बावजूद पिछले तीस वर्षों के दौरान अपने नियमित लेखन, स्‍वतंत्र विचारों और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी स्वयंसेवी संस्थाओं के जरिए वे हमेशा चर्चाओं में बने रहे। अपनी अप्रतिम सेवाओं के लिए पद्मभूषण के अलंकरण से सम्मानित महेश भाई का विकास, धर्म, राजनीति और आर्थिक नीतियों को लेकर अपना स्‍वतंत्र नज़रिया था। उनके इस नज़रिए को अनुदारवादियों की लगातार बढ़ती और मज़बूत होती जमातें पसंद नहीं करती थीं। बुच साहब भी इसे समझते थे।
[dc]शहरी[/dc] विकास को लेकर बुच साहब के अपने विचार थे, जो कि उनके वर्षों के अनुभवों के ख़ज़ाने से निकले थे। बुच साहब वर्ष 1971 से नगर निवेश से जुड़े हुए थे तथा राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग के उपाध्यक्ष भी रह चुके थे। अत: जब केंद्र सरकार ने घोषणा की कि देशभर में सौ स्मार्ट सिटीज़ अर्थात अत्याधुनिक नगरों का विकास किया जाएगा तो उन्होंने शहरी विकास मंत्रालय के अधिकारियों के समक्ष तुरंत कई सवाल खड़े कर दिए। बुच साहब ने पूछा कि उन्हें स्‍मार्ट सिटी की परिभाषा बताई जाए। उनका विकास कैसे होगा, कौन लोग लाभान्वित होंगे और योजना के लिए धनराशि कहां से आएगी, यह भी बताया जाए। निश्चित ही, बुच साहब को उनके सवालों का जवाब नहीं मिला। आज समूची योजना किस स्थिति में है, कुछ पता नहीं।
[dc]केवल[/dc] शहरी विकास ही ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें बुच साहब का दख़ल था। सभी विषयों को लेकर उनका अध्‍ययन काफ़ी गंभीर रहता था। मसलन, जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आह्वान किया कि सभी हिंदुओं को एक हो जाना चाहिए और कि यदि हिन्‍दू एक हुए तो भारत सुरक्षित रहेगा तो बुच साहब ने अपनी प्रतिक्रिया अलग तरीक़े से व्यक्‍त की। उन्होंने पूछा कि क्या देश के प्रति वफ़ादारी में मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी एक नहीं हैं? वर्ष 1971 में सेनाध्यक्ष पारसी थे। सेना की पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जमील मेहमूद थे, जिनकी यदि एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु नहीं हुई होती, तो वे देश के सेनाध्यक्ष बनते। उनका मज़हब इस्लाम था। बुच साहब का मानना था कि भारत में बहुत विविधता है और भारत मज़बूत है। ऐसा इस कारण नहीं है कि यह हिंदुत्व का देश है, बल्कि इस कारण है कि देश में विविधता में एकता है। निश्चित ही एक विद्वान, साहसी और ईमानदार व्यक्तित्व के रूप में बुच साहब की अनुपस्थिति एक लंबे अरसे तक खलने वाली है।

व्यापम

[dc]मध्य प्रदेश[/dc] में ​​व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) के हुए फर्जीवाड़े के सिलसिले में कितने लोगों की जानें अब तक ज्ञात अथवा रहस्यमय परिस्थितियों में जा चुकी हैं इसकी सही-सही जानकारी उपलब्ध नहीं है. ऐसा संभव हो उसकी ज्यादा उम्मीद भी हाल – फिलहाल नहीं है. एक ताजा अनुमान के अनुसार, घोटाले में कथित रूप से सम्बद्ध कोई बत्तीस लोगों की जानें जाँच प्रारम्भ होने के बाद से अब तक जा चुकी हैं. विधानसभा में विपक्ष के नेता सत्यदेव कटारे इस तरह की मौतों का आंकड़ा सौ के ऊपर बताते हैं. जो आंकड़े आधिकारिक रूप से उपलब्ध हैं उनमें फर्जीवाड़े के सिलसिले में अबतक गिरफ्तार किये जा चुके लोगों और एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) द्वारा खोजे जाने वाले फरार लोगों की संख्या की जानकारी ही शामिल है. जेलों में बंद लोगों में कई बड़े-बड़े नाम शामिल हैं. शिक्षा के क्षेत्र के अब तक के इस सबसे कुख्यात घोटाले का अंत कब और कैसे होगा कुछ भी नहीं कहा जा सकता. जेलों में बंद लोगों और उनके परिवारजनों की मानसिक और शारीरिक स्थितियों को लेकर किसी भी स्तर पर कोई चिंता या पहल व्यक्त नहीं हो रही है. मीडिया में भी व्यापम घोटाले को लेकर बहुत ज्यादा हो-हल्ला नहीं है और न ही सामान्य जनता के स्तर पर ही कुछ नया जानने की उत्सुकता है. पर फर्जीवाड़े की गंभीरता का अंदाजा केवल इसी तथ्य से लगाया जा सकता है की अकेले ग्वालियर क्षेत्र में ही अब तक साढ़े तीन सौ लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, लगभग अस्सी लोग और पकड़े जाने हैं। पकड़े गए लोगों में फर्जी छात्र, साल्वर्स, दलाल, रेकेटियर्स और अभिभावक शामिल हैं. न्यायालय के समक्ष पेश की गई रिपोर्ट में जिन बत्तीस लोगों की मौतों का जिक्र किया गया है उनमें अधिकांश चम्बल क्षेत्र के बताये जाते हैं. फर्जीवाड़े की जाँच एसटीएफ द्वारा की जा रही है और उसकी मदद के लिये ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, सागर, रीवां और भोपाल में एसआईटी गठित की गयी है. एसआईटी के मामलों की अलग से सुनवाई के लिए अकेले ग्वालियर में ही चार विशेष कोर्ट स्थापित की गयी हैं. शेष पांच जिलों में एक-एक विशेष कोर्ट हैं. इसी बीच जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं. आरोप है कि जिन लोगों ने अपनी जगह दूसरे व्यक्ति को बैठा कर परीक्षा पास की उनके खिलाफ अगर अग्रिम जांच करवाई जाती तो फर्जीवाड़े में शामिल अन्य आरोपियों के नामों का भी खुलासा हो सकता था.
[dc]जिन[/dc] ‘व्हिसिल ब्लोअर्स’ ने व्यापम के फर्जीवाड़े को लेकर समय-समय पर आवाजें उठाई वे भी अपनी सुरक्षा को लेकर अब सवाल उठा रहे हैं. फर्जीवाड़े का एक दुखद पहलू यह भी है कि इससे जुड़ा मानवीय पक्ष नजरअंदाज हो रहा है और समूचे प्रकरण का इस्तेमाल राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए किया जा रहा है. मध्य प्रदेश के राज्यपाल राम नरेश यादव के पुत्र शैलेश की जिन परिस्थियों में मौत हुई थी उससे फर्जीवाड़े को लेकर उजागर होने वाले नामों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए थे। फर्जीवाड़े को लेकर होनेवाली रहस्यमय मौतों के नए-नए किस्से तो उजागर हो रहे हैं पर राजनीतिक स्तर पर जिस तरह की संवेदनशील प्रतिक्रिया की अपेक्षा की जाती है वह अभी किसी भी स्तर पर व्यक्त नहीं हो रही है.
[dc]मुख्यमंत्री[/dc] शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि व्यापम फर्जीवाड़े का पर्दाफ़ाश उनकी सरकार ने ही किया है और कि इसकी जांच भी पूरी तरह से निष्पक्ष तरीके से की जा रही है. तमाम दोषियों को सजा भी दिलवाई जाएगी। सवाल यह है कि इस तरह का रैकेट प्रदेश में शासन – प्रशासन की ठीक नाक के नीचे इतने वर्षों से कैसे चल रहा था? व्यापम की निष्पक्षता को बनाये रखने के लिए नियुक्त जिम्मेदार लोग भी फर्जीवाड़े में शामिल पाये गए और वे अब जेलों में बंद हैं. सत्तापक्ष से जुड़े कतिपय राजनेताओं की भूमिका भी संदेहों के घेरों में आ गयी. शिवराज सिंह मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रहे लक्ष्मीकांत शर्मा और उनके विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) भी इस समय अन्य लोगों के साथ जेल में बंद हैं. व्यापम फर्जीवाड़े के जरिये वर्षों तक हजारों योग्य एवं होनहार छात्रों के भविष्य के साथ क्यों खिलवाड़ होता रहा इसका जवाब कभी भी नहीं मिलने वाला.

न क़त्ल हुए मौक़ों पर सवाल, न मौतों पर जवाब

[dc]मध्य प्रदेश[/dc] व्यावसायिक परीक्षा मंडल घोटाले में कितने लोगों की जानें अब तक ज्ञात अथवा रहस्यमय परिस्थितियों में जा चुकी हैं इसकी सही-सही जानकारी उपलब्ध नहीं है. ऐसा संभव हो उसकी ज्यादा उम्मीद भी हाल-फिलहाल नहीं है.एक ताज़ा अनुमान के अनुसार, घोटाले में कथित रूप से सम्बद्ध कोई 32 लोगों की जानें जांच प्रारम्भ होने के बाद से अब तक जा चुकी हैं.विधानसभा में विपक्ष के नेता सत्यदेव कटारे इस तरह की मौतों का आंकड़ा सौ के ऊपर बताते हैं.जो आंकड़े आधिकारिक रूप से उपलब्ध हैं उनमें फ़र्जीवाड़े के सिलसिले में अब तक गिरफ्तार किए जा चुके लोगों और एसआईटी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) द्वारा खोजे जाने वाले फरार लोगों की संख्या की जानकारी ही शामिल है.
जेलों में बंद लोगों में कई बड़े-बड़े नाम शामिल हैं. शिक्षा के क्षेत्र के अब तक के इस सबसे कुख्यात घोटाले का अंत कब और कैसे होगा कुछ भी नहीं कहा जा सकता.
[dc]जेलों[/dc] में बंद लोगों और उनके परिवारजनों की मानसिक और शारीरिक स्थितियों को लेकर किसी भी स्तर पर कोई चिंता या पहल व्यक्त नहीं हो रही है. मीडिया में भी व्यापमं घोटाले को लेकर बहुत ज्यादा हो-हल्ला नहीं है और न ही सामान्य जनता के स्तर पर ही कुछ नया जानने की उत्सुकता है.
पर फ़र्जीवाड़े की गंभीरता का अंदाजा केवल इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि अकेले ग्वालियर क्षेत्र में ही अब तक साढ़े तीन सौ लोगों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, लगभग अस्सी लोग और पकड़े जाने हैं. पकड़े गए लोगों में फ़र्जी छात्र, सॉल्वर्स, दलाल, रैकेटियर्स और अभिभावक शामिल हैं.
न्यायालय के समक्ष पेश की गई रिपोर्ट में जिन 32 लोगों की मौतों का जिक्र किया गया है उनमें अधिकांश चम्बल क्षेत्र के बताए जाते हैं. फ़र्जीवाड़े की जांच एसटीएफ कर रही है और उसकी मदद के लिए ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, सागर, रीवां और भोपाल में एसआईटी गठित की गई है.
एसआईटी के मामलों की अलग से सुनवाई के लिए अकेले ग्वालियर में ही चार विशेष कोर्ट स्थापित की गई हैं. शेष पांच जिलों में एक-एक विशेष कोर्ट हैं.
[dc]इसी[/dc] बीच जांच प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. आरोप है कि जिन लोगों ने अपनी जगह दूसरे व्यक्ति को बैठा कर परीक्षा पास की उनके खिलाफ अगर अग्रिम जांच करवाई जाती तो फ़र्जीवाड़े में शामिल अन्य आरोपियों के नामों का भी खुलासा हो सकता था.
जिन ‘व्हिसिल ब्लोअर्स’ ने व्यापमं के फ़र्जीवाड़े को लेकर समय-समय पर आवाज़ उठाई वे भी अपनी सुरक्षा को लेकर अब सवाल उठा रहे हैं.फ़र्जीवाड़े का एक दुखद पहलू यह भी है कि इससे जुड़ा मानवीय पक्ष नजरअंदाज हो रहा है और समूचे प्रकरण का इस्तेमाल राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए किया जा रहा है.
मध्य प्रदेश के राज्यपाल राम नरेश यादव के पुत्र शैलेश की जिन परिस्थियों में मौत हुई थी उससे फ़र्जीवाड़े को लेकर उजागर होने वाले नामों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए थे. फ़र्जीवाड़े को लेकर होने वाली रहस्यमय मौतों के नए-नए किस्से तो उजागर हो रहे हैं पर राजनीतिक स्तर पर जिस तरह की संवेदनशील प्रतिक्रिया की अपेक्षा की जाती है वह अभी किसी भी स्तर पर व्यक्त नहीं हो रही है.
[dc]मुख्यमंत्री[/dc] शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि व्यापमं फ़र्जीवाड़े का पर्दाफ़ाश उनकी सरकार ने ही किया है और कि इसकी जांच भी पूरी तरह से निष्पक्ष तरीके से की जा रही है. तमाम दोषियों को सजा भी दिलवाई जाएगी. सवाल यह है कि इस तरह का रैकेट प्रदेश में शासन-प्रशासन की ठीक नाक के नीचे इतने वर्षों से कैसे चल रहा था? व्यापमं की निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए नियुक्त जिम्मेदार लोग भी फ़र्जीवाड़े में शामिल पाए गए और वे अब जेलों में बंद हैं.
सत्तापक्ष से जुड़े कतिपय राजनेताओं की भूमिका भी संदेहों के घेरों में आ गई. शिवराज सिंह मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रहे लक्ष्मीकांत शर्मा और उनके विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) भी इस समय अन्य लोगों के साथ जेल में बंद हैं. व्यापमं फ़र्जीवाड़े के जरिए वर्षों तक हजारों योग्य एवं होनहार छात्रों के भविष्य के साथ क्यों खिलवाड़ होता रहा इसका जवाब कभी भी नहीं मिलने वाला.

Changing the Rules of the Game

[dc]How[/dc] do we describe the story of Narendra Modi’s one year in office as the Prime Minister seeking to address the aspirations of 1.22 billion people? Should we analyse the contributions of the former Gujarat chief minister in improving the lives of millions of Indians or should we try to describe how India will look like when the NDA completes its term of five years? Also, what are the chances of Modi still continuing as the unchallenged leader?
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[dc]While[/dc] we may not dwell on the successes or failures of Modi’s rule, one thing is certain: Modi has successfully changed the dynamics of politics that was in play over the past six decades or so. Modi cannot be expected to return to Gujarat now, to indulge in state politics. He has successfully shed his 2002 image. Although he was an RSS pracharak in the past, he would not want to return to the Sangh’s organisational fold.
[dc]There[/dc] was no opposition in Gujarat during the Modi Raj. While the Bharatiya Janata Party was the ruling party in the state, one cannot recall who the state president of the party was during Modi’s regime in Gandhinagar. Pravin Togadia’s VHP was almost non-existent or invisible during Modi’s chief ministership. Modi decided how the Sangh would function in Gujarat. Had Modi decided not to try his luck in Delhi, he would have continued for as long as Jyoti Basu’s unchallenged rule in West Bengal. But neither Modi was Basu nor the BJP CPM.
[dc]Narendrabhai[/dc] is now repeating his Gujarat experiment and experience in a ‘Modified’ and customised manner which could well suit both the health and fears of Delhi. Modi knows well how the nation’s capital behaved when Emergency was imposed in June 1975 by Indira Gandhi. He had also seen how people started crawling when they were asked to merely bend. Mrs Gandhi was both the prime minister and the ‘Congress party’. There was no space for any kind of dissent in the party. She was a firm believer in the country needing a strong Centre. As a result, the Congress did not have any strong chief ministers in the states. Mrs Gandhi had every other advantage except one that Narendra Modi has. While Mrs Gandhi may have been leading a weak party, she was faced with a determined Opposition which ultimately ensured her ouster from power in 1977.
[dc]Modi[/dc] has potential to establish himself as another Mrs Gandhi, Mrs Margaret Thatcher or Golda Meir of Israel, but for that the country will have to wait till the Bihar elections are over. This election will decide whether Nitish Kumar can prove to be another Arvind Kejriwal or if Patliputra will give way to Modi to fulfil his global ambitions. The revolt of Jitanram Manjhi against Nitish was not engineered in Patna and must have been part of a grand Amit Shah strategy. If Manjhi succeeds in dividing the vote bank of Nitish and Lalu, nothing will stop Modi from taking over an important state.
Uttar Pradesh would then pose no problems for Modi. Polarisation of voters is already deep rooted in the state. Therefore, there is no reason for Modi to get perturbed by what Arun Shourie or Deepak Parekh may have publicly pronounced about his government’s performance.
[dc]In[/dc] fact, Modi may still be judging the mood of the country, his own party, the Sangh, opposition parties, captains of industry and world leaders in general and our neighbours in particular, before he actually starts working on his hitherto undisclosed agenda. On would not be surprised if Modi is doing his own assessment of his government’s performance, caring two hoots for people like Rahul Gandhi. The Congress vice-president gave zero out of ten to the prime minister as far as farmers and labourers were concerned and ten out of ten to the government for dolling out benefits to corporates. Contrary to what Rahul Gandhi has alleged, HDFC chairman Deepak Parekh only said that impatience had begun to show among businessmen as nothing had changed in the first nine months of the Modi government.
[dc]How[/dc] does one know whether a government is performing or not. When asked, a senior person close to the ruling party shared his personal thoughts thus: Modiji wants to do hundreds of things but an atmosphere has been created, deliberately or otherwise, of caution, apprehension and fear, among ministers and bureaucrats in Delhi. There are ministers who were in the race for prime ministership with Modi. While some states are being ruled by the BJP, there are others that are being ruled by parties opposed to the BJP in general and Modi in particular. There are some BJP chief ministers who were being publicly equated with Modi in terms of competence and projected for the top post. All these factors are not being taken into account while assessing the performance of Modi.
[dc]Judging[/dc] Modi’s performance on the strength of figures would be misleading. The loyalists would generate reams of paper to list out achievements. The detractors, on the other hand, will also play their part as stakes are high for both sides. But one thing is certain, whether one likes it or not, Modi is going to stay. The question is whether he is going to change himself and accommodate others. The result of the Delhi assembly elections had answered this question partly. Bihar will provide the full answer. Modi’s actual performance will start from the day Bihar results will be out. Let us wait and watch.