पिता, तुम तो पहाड़

वह जो पहाड़, खड़ा किया था तुमने पत्थर के टुकड़ों को अपनी लगातार ज़ख़्मी होती पीठ पर ढो-ढोकर आज भी वैसा ही खड़ा है। कहीं भी कुछ नहीं बदला, सब कुछ वैसा ही सुरक्षित है जैसा कि छोड़ गए थे तुम सालों-साल पहले। बादलों का वह टुकड़ा जो तुम्हारे फटे हुए छाते के पार से […]

जब पहुंचें हम ज़मीन पर अपनी

वक्‍़त बदल गया है! अब काम नहीं चलने वाला इतना भर कह देने से कि – पहुंच गए हैं हम शिखरों पर और बेताब हैं फहराने को पताकाएं। कि हमने जीत लिए हैं ठिकाने दुश्मन की कमज़ोरियों के, बग़ैर किसी संघर्ष और बाहर निकाले बिना तलवारों को म्यान से। और कि घड़ी आ गई है […]

अब बारी है मेरी प्रतीक्षा करने की

अंधेरी रात की उस घड़ी में टटोल रहे थे तुम जब आंखों की कोई चमक दिखाने के लिए तुम्‍हें रास्‍ता सिर से ऊंचे उठते तूफ़ान से बचाने के लिए अपने आपको मुझे होना था तुम्‍हारे पास एकदम निकट, बिलकुल सटे हुए पर मैं नहीं था वहां। तुम जब तलाश रहे थे ऊष्‍मा से भरे मेरे […]

कौन हैं ये बिखरे हुए लोग?

कौन हैं ये तमाम लोग जो धागे से टूटकर गिरी हुई पन्नियों की तरह यूं जमीन और नुकीली चट्टानों पर इस तरह से बिखरे पड़े हैं? कहां से आए हैं ये लोग जो कि लाए नहीं गए हैं इस तरह बेसुध लेटे हुए एकटक कहीं देख रहे हैं, दूर शून्य में जैसे कि कुछ ढूंढ़ […]

हे पिता, केदारनाथ!

होने लगा है वक्त अब हमारे घर लौटने का प्रभु दीजिए इजाजत हमें, हे केदारनाथ! बढ़ रहा है अंधेरा आंखों के आसपास, लगने लगा है डर अपनी ही उपस्थिति से हमें। तुम तो हो पिता, शिव हो तुम अंतरयामी, जानते हो पीड़ाएं सबकी। करना है ढेर सारे काम हमें लौटकर गांव अपने। आने वाले हैं […]