अज्ञात भय

कुछ हुआ होगा ज़रूर वे तमाम लोग जो दिन के उजाले में घेरे रहे हमेशा मुझे ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की तरह चारों ओर से। अंधेरा होते ही परछाइयों की तरह यकायक ग़ायब हो गए ऐसा नहीं होता कभी – बंद कर दें रास्‍ते हवाएं ही, सूख जाएं सारे वृक्ष एक साथ नहीं सुनाई दे नाद घरों […]

अंत से शुरुआत

हो जाती हैं समाप्‍त शुरू होने से पहले ही कई बार, यात्राएं। टकराने लगते हैं जब आपस में अपनी ही ऊंचाइयों से ख़ौफ़ खाते बच गए हैं जो मुट्ठी भर पहाड़ – जीतने के लिए जगहें ख़ाली पड़े पन्‍नों में इतिहासों के। होती हैं जब कभी गड़बड़ाहटें ऐसी टकराने की इनकी आपस में, बादलों से […]

पिता, एक तलाश

कहां-कहां नहीं ढूंढ़ा तुम्‍हें मैंने घर के कोने-कोने पुरानी फ़ाइलों, ख़तों, एलबमों और जर्जर हो चुके तुम्‍हारे बही-खातों के बीच। इस आशंका से कि शायद किसी दशरथ की तरह तुम भी झेल रहे होंगे किसी नेत्रहीन और बूढ़े मां-बाप का दिया शाप। तलाशा मैंने तुम्‍हें हनुमान की उस प्रतिमा के पीछे भी आराधना में जिनकी […]

क्‍यों होता है ऐसा?

हरेक भगदड़ के दौरान क्‍यों होता है ऐसा छूट जाती है औरत ही हर बार पीछे? घर में भी खाती है मार पैरों की, भगदड़ में भी मरती है कुचलकर पैरों तले ही। क्‍यों होता है हर बार ऐसा? भीड़ में छूटा हुआ बच्‍चा टटोलता है मां का हाथ सबसे पहले आवाज़ लगाता है मां […]

इतिहास की खोज

काग़ज़ों से नहीं डरा मैं इतना पहले कभी भी। स्‍याही का रंग चेहरे पर पुती कालिख से भी होता है ज्‍़यादा गहरा। तुम नाहक ही कर रहे हो कोशिश, किताबों से खींचकर फाड़े गए पन्‍नों को तलाश करने की संग्रहालयों में। ठिकानों पर, केवल पहाड़ ढूंढ़े जा सकते हैं। इतिहास से अलग हुए पन्‍ने नहीं।

चुपचाप तुम

कुछ भी तो नहीं मांगा तुमने कभी कुछ मुझसे न मेरा आकाश और न ही साम्राज्‍य धरती का। कभी दिया ही नहीं जानने तुमने अपने आपको – कैसा होता है रंग फूलों का, आता है वसंत किस महीने में। जीवन भर देखती रहीं तुम केवल झड़ना पत्‍तों का। तुम्‍हें पता ही नहीं चला होगा, कब […]

पश्‍चाताप

कंठाली किराने वाले की दुकान पर सुबह से शाम बैठे हुए जब तुम बुनते रहते थे सपने मेरे बारे में – बहुत दूर तक भी नहीं नज़दीक होने दिया मैंने तुम्‍हें अपने ख़यालों में, खोया रहा अपने ही सपनों में, बनाई हुई दुनिया में अपनी, जो थी दूर बहुत अलग तुमसे। भूलकर भी आया नहीं […]

छुटि्टयों में इस बार

उदास हैं बच्‍चे – नहीं जा पाएंगे छुट्टियों में पहाड़ों पर इस बार। होता है कई मर्तबा ऐसा भी बदल देता है यात्राओं का मुंह तेज़ हवा का एक तेज़ झोंका भी। कांपने लगते हैं जब हाथ ठिठुर जाते हैं पैर घर के भीतर ही। समझ नहीं पाते बच्‍चे। क्‍यों गिर जाती है अलमारी घर […]

बेटी के जन्‍मदिन पर

यह अनुभव करने के लिए कि छोटी है बहुत दुनिया और आदमी बौना भी दिख सकता है ज़रूरी है छूना ऊंचाइयों को। मैं जानता हूं यह भी कि – सब कुछ उतना आसान नहीं जितना आता है नज़र काग़ज़ की ख़ूबसूरत लकीरों में। कंटीली झाडि़यां, पथरीले रास्‍ते कभी न ख़त्‍म होने वाली प्‍यास और एक […]