उनसे ही पूछलें कि फैसला क्या होना था?

२ अक्टूबर २०१० लखनऊ की अदालत ने जमीन के जिस टुकड़े के तीन हिस्से करके बांटने का फैसला दिया है उसके इर्द-गिर्द फिर कुछ सुलगाकर धुंआ फैलाने की कोशिशें की जा रही हैं। दबे हुए कदमों से ही सही, शुरुआत की जा चुकी है। वे पक्ष जो अयोध्या की विवादास्पद जमीन के लिए वर्षों से […]

केंचुलियां और नकाबें उतरने में वक्त लगेगा

३० सितंबर २०१० देश सावधानी के साथ राहत की थोड़ी सांस ले सकता है। साठ साल से चला आ रहा एक ऐसा विवाद जिसने पिछले दो दशकों से न केवल भारत की राजनीति का चेहरा बदल रखा था, उस पर सांप्रदायिक तनावों की कालीख भी पोत रखी थी, इतने शालीन तरीके से हल होने के […]

फैसले के अमल की गारंटी कौन देगा?

२७ सितंबर २०१० सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आज दी जाने वाली व्यवस्था शायद तय कर पाए कि अयोध्या में विवादास्पद भूमि के मालिकाना हक को लेकर चल रहा छह दशक पुराना विवाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के जरिए एक अक्टूबर के पहले निकलना चाहिए या फिर आपसी बातचीत के जरिए उसका हल ढूंढऩे की संभावनाओं […]

राष्ट्रमंडल खेलों में ‘असली भारत’ की खोज?

२४ सितंबर २०१० राष्ट्रमंडल खेलों की आधी-अधूरी तैयारियों को लेकर इस समय बहुत नाराजगी है। यह नाराजगी या गुस्सा दिल्ली और उसके आसपास के लोगों में थोड़ा ज्यादा है जो इन तैयारियों को लेकर अब तक प्रभावित होते रहे हैं और आयोजन की समाप्ति तक रहने भी वाले हैं। देश के बाकी हिस्सों के दुख-दर्द […]

भक्तों के सागर में भगवान की स्थापना का तरुण प्रयास

१३ अगस्त २०१० एक ऐसा कालखंड जिसमें कि चमचमाती खादी अथवा रेशमी वस्त्र धारण कर समाज अथवा राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त करने वाले लोग वस्त्रहीन दिखाई पड़ते हों, मुनि तरुण सागर नामक एक 44 वर्षीय नंगा फकीर अगर देश के लाखों- करोड़ों लोगों को वस्त्र धारण किए हुए दिखाई पड़ता हो तो उसे दुनिया के […]

जो दिख रहा है दांव पर वही नहीं है

२३ जुलाई २०१० प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा सोमवार से प्रारम्भ हो रहे संसद के मानसून सत्र में आने वाले विषयों पर विचार करने के लिए दिए गए भोज का न्यौता ठुकराकर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने यही संदेश दिया है कि देश के सबसे बड़े विपक्षी दल का एजेंडा नई दिल्ली में […]

इस आपातकाल से कौन लड़ेगा?

२४ जून २०१० देश को एक नए प्रकार के आपातकाल की ओर धकेला जा रहा है। इस आपातकाल का कोई सरकारी या राजनीतिक चेहरा नहीं है। न ही यह किसी अदालती फैसले की कोख से पैदा हुआ है जैसा कि आज से पैंतीस साल पहले हुआ था। हो यह रहा है कि लोग स्वयं ही […]

डर त्रासदी का नहीं, भरोसा उठ जाने का है

९ जून २०१० भोपाल गैस त्रासदी को लेकर अदालत द्वारा सोमवार को दिए गए फैसले के बाद से नई दिल्ली स्थित सत्ता के गलियारों में सांसें उखड़ी हुई हैं। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मोहन पी तिवारी द्वारा सुनाए गए फैसले के बाद चिंता इस बात को लेकर शायद कम है कि त्रासदी के कोई २५ वर्षों […]

थरूर, देश की "राष्ट्रीय चिंता" नहीं हैं

१७ अप्रैल २०१० देश में अगर सर्वेक्षण करवाया जाए कि शशि थरूर को मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल से हटा देने से यूपीए सरकार को क्या नुकसान पहुंचेगा तो बहुत मुमकिन है एक बड़ी संख्या में लोग जवाब देने से ही इंकार कर दें। देश की जनता के लिए थरूर अपनी हैसियत को एक “आकर्षक विवादास्पद व्यक्तित्व” […]

बहस का दायरा व्यापक होना चाहिए

२ मार्च 2010 मीडिया में इन दिनों ‘पेड न्यूज’ को लेकर काफी चर्चाएं हैं। ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने भी इस मामले को काफी जोर शोर से उठाया है और चुनाव आयोग से इस संबंध में उन उम्मीदवारों/मीडिया कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है जो ‘राजनीतिक विज्ञापनों’ को ‘खबरों’ के रूप में प्रकाशित […]