गठबंधन की जरूरतों का रेल बजट?

२५ फरवरी २०११ आम आदमी के लिए रेल बजट की परिभाषा को ममता बनर्जी ने इस उद्देश्य तक सीमित कर दिया है कि अगर यात्री किराए और माल भाड़े में कोई वृद्धि नहीं की जाए तो जनता तो उनके लिए तालियां बजाने को तैयार है ही, पर एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी उनकी […]

कमजोरियों का मजबूरियों से बचाव

१६ फरवरी २०११ कोई प्रधानमंत्री अगर अपनी व्यक्तिगत छवि को सरकार की छवि से अलग मानते हुए हर वक्त अग्निपरीक्षा देने की तैयारी दिखाता है तो वह डॉ. मनमोहन सिंह हो जाता है। अत: माना जा सकता है कि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार में हैं भी और नहीं भी। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री के प्रत्येक सार्वजनिक […]

मिस्र:अपनी-अपनी चिंताएं

५ फरवरी २०११ मिस्र में वहां के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के प्रति व्यक्त हो रहे राष्ट्रीय जनआक्रोश को भारतीय संदर्भों में किस तरह से देखा या व्यक्त किया जा सकता है? क्या मिस्र की जनक्रांति को आजादी की लड़ाई के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? भारत में जब स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई अपने […]

लगना भी चाहिए कि राजा पकड़ाया है

२ फरवरी २०११ राजा की गिरफ्तारी बहुत जरूरी थी। प्रजा की बेचैनी सडक़ों पर अंगड़ाइयां लेने को मचल रही थी। दुनिया भर के भ्रष्ट राजाओं पर इस समय मुसीबतों के पहाड़ टूटे पड़ रहे हैं। यह मानना बचपना होगा कि तमिल फिल्मों के कथानायक और मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की इजाजत के बगैर सरकार ने राजा […]

खोदा पहाड़, निकला पहाड़

१९ जनवरी २०११ विपक्ष द्वारा लगभग ठप की जा चुकी संसद के आने वाले बजट सत्र के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में किए गए परिवर्तनों से किसे फायदा और नुकसान हुआ होगा, इसे पकड़ पाना उतना ही मुश्किल है जितना डॉ. मनमोहन सिंह के चेहरे के पीछे छुपी पीड़ा या प्रसन्नता को पढ़ पाना। परिवर्तनों से […]

किसी को नंबर वन से हटाने के लिए काम नहीं कर रहे

हिंदी पत्रकारिता जगत में श्रवण गर्ग चर्चित और सम्मानित नाम हैं. लंबे समय से दैनिक भास्कर के संपादक और समूह संपादक के रूप में कार्यरत हैं. पत्रकारिता में लगभग 40 सालों से सक्रिय श्रवण गर्ग ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. कुछ महीनों पहले भडास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के साथ विभिन्न […]

बिहार अब पूरी तरह से आजाद है!

२४ नवंबर २०१० बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम इससे ज्यादा चमत्कारिक नहीं हो सकते थे। अगर होते तो पूरी तरह से अविश्वसनीय हो जाते। जिस तरह का अकल्पनीय बहुमत जद (यू)-भाजपा गठबंधन को वहां प्राप्त हुआ है वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि राजनीति के फैसले अब जनता के बीच से होने वाले […]

दो तरह का देश, दो तरह की कांग्रेस?

३ नवंबर २०१० कांग्रेस पार्टी, ऐसा लगता है, किसी भी तरह की जोखिम लेने के खतरे से अपने आपको सफलतापूर्वक बचा ले जाती है। पार्टी के प्रजातांत्रीकरण की दिशा में प्राप्त होने वाले हर अवसर को निर्भयतापूर्वक और निर्ममतापूर्वक टाल दिया जाता है। किसी भी तरह की आलोचनात्मक बहस या पोस्टमार्टम करने का तो सवाल […]

खेल खतम, पैसा हजम!

१४ अक्टूबर २०१० शंका-कुशंकाओं और आधी-अधूरी तैयारियों के साये में प्रारंभ हुआ राष्ट्रमंडल खेलों का तमाशा गुरुवार को रंगारंग तरीके से समाप्त हो गया। शुक्रवार से नई दिल्ली की आत्मा अपने पुराने शरीर में फिर से प्रवेश भी कर जाएगी और उसकी चाल-ढाल भी पहले जैसी हो जाएगी। खेलों के सफलतापूर्वक आयोजन को लेकर श्रेय […]

संघ, सिमी और (राष्ट्रीय) समझदारी

७ अक्टूबर २०१० राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सिमी के बीच समानता स्थापित करते समय राहुल गांधी ने निश्चित ही संयम और सूझबूझ से काम लिया होगा, ऐसा अंदाज लगाया जाना चाहिए। राहुल कांग्रेस के महासचिव हैं और माना जा रहा है कि वे आने वाले वर्षों में देश के प्रधानमंत्री भी बनने वाले हैं। अत: […]