मनमोहन सिंह का फेरबदल

१२ जुलाई 2011 डॉ. मनमोहन सिंह के इस कथन पर यकीन करना ही होगा कि वर्तमान राष्ट्रपति की उपस्थिति में यूपीए-दो का अंतिम मंत्रिमंडलीय फेरबदल मंगलवार को संपन्न हो चुका है। देश के लोग राहत की सांस ले सकते हैं कि इस तरह कि मीडियाई अटकलों से उन्हें अब मुक्ति मिल गई है कि मनमोहन […]

टेलीविजन पर विपक्ष!

९ जुलाई २०११ विपक्षी दल इस समय ‘मजा आ रहा है’ की मुद्रा में हैं। वे आनन्दलोक की स्थिति में हैं कि सरकार का एक और मंत्री विदा हो गया। सरकार जितनी ज्यादा कमजोर होती जाती है विपक्ष के लिए जश्न मनाने का कारण भी उतना ही मजबूत बनता जाता है। पर देश की जनता […]

लॉबीइंग, पैसे के बदले खबर और समकालीन पत्रकारिता

८ जुलाई २०११ मीडिया के भविष्य की चिंता करने वालों के बीच इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा पेड न्यूज को लेकर है। इसलिए कम आश्चर्यजनक नहीं कि जो मीडिया पेड न्यूज से सबसे ज्यादा प्रभावित है उसी में इस विषय को लेकर सबसे ज्यादा बातचीत भी हो रही है। अखबारों में छपने वाले समाचारों अथवा […]

खांटी संपादकों में एक प्रभाष

७ जुलाई २०११ प्रभाष जोशी उस पीढ़ी के थोड़े से बचे हुए संपादकों की जमात का प्रतिनिधित्व करते थे जिन्होंने भाषायी पत्रकारिता को उसके संस्कारित स्वरूप में ही राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की हिम्मत की और उसमें सफलता भी हासिल की। राजेन्द्र माथुर के इंदौर से दिल्ली रवाना होने के लगभग डेढ़ दशक पूर्व […]

प्रधानमंत्री का पद और राहुल

१ जुलाई २०११ देश को एक गैर-जरूरी बहस में व्यस्त किया जा रहा है कि राहुल गांधी अब प्रधानमंत्री का पद संभालने के योग्य हो गए हैं। यह कांग्रेस पार्टी का एक अंदरूनी मामला है कि वह सरकार चलाने के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदारी सौंपने का फैसला कब करती है। ईमानदारी से कहा जाए […]

समझौते अभी कतार में हैं! प्रतीक्षा कीजिए

३ जून २०११ ऐसा मानना हड़बड़ी में कोई कठिन आसन लगाने जैसा होगा कि बाबा और सरकार के बीच बातचीत पूरी तरह से विफल हो गई है। बाबा और सरकार के बीच अगर पांच सितारा माहौल में पांच घंटे लंबी बातचीत हुई है तो निश्चित ही इसलिए नहीं कि उसे असफल होने दिया जाए। आमरण […]

ओसामा खत्म हुआ है, आतंकवाद नहीं

२ मई २०११ आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की लड़ाई कितने खतरनाक मुकाम पर पहुंच चुकी है उसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि ओसामा बिन लादेन को तोरा-बोरा के पहाड़ों में बनी गुफाओं में नहीं बल्कि पाकिस्तान की नाक के तले इस्लामाबाद के उत्तर में केवल पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित […]

चाणक्य और चंद्रगुप्तीय आकांक्षाएं

५ मार्च २०११ अर्जुन सिंह अगर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से स्वस्थ होकर बाहर आ जाते और पार्टी की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा पुनर्गठित की गई सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई कार्यसमिति में उनके लिए तय किए गए नए स्थान के बारे में उनसे प्रतिक्रिया मांगी जाती तो उनका शायद यही जवाब होता कि […]

सरकार यानी- आ थॉमस मुझे मार!

३ मार्च २०११ केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पद पर पी.जे. थॉमस की नियुक्ति को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणियां की हैं उसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चाहें तो अपने स्वयं के खिलाफ भी मान सकते हैं। बहुमत से किए गए फैसले को आधार बनाकर की गई थॉमस की गैर संवैधानिक नियुक्ति के […]

सरकार का स्वास्थ्य और देश की बीमारी

२८ फरवरी २०११ विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया को ही अगर देश की सोच भी मान ली जाए तो प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश किए गए बजट को उम्मीदों के विपरीत तथा एक शानदार अवसर को जान-बूझकर हाथ से गंवा देने का उपक्रम करार देते हुए खारिज किया जा सकता है। पर यह पूर्ण सत्य नहीं है। […]