पिता और इतिहास

कभी सोच ही नहीं पाया मैं पूरी ईमानदारी से तुम्‍हारे बारे में। ड्राइंग रूम के किसी कोने में कै़द, परिचय की मोहताज किसी टूटी हुई कुर्सी या मेज़ की तरह जुड़े रहे जीवन भर तुम मेरे शरीर के साथ। और मैं अभागा कभी जी ही नहीं पाया ऊर्जा उन सांसों की जो‍ मिलती थीं मुझे […]

हो जाता पिता, कृष्‍ण का

कुरुक्षेत्र की लहू-लुहान रणभूमि में – बाहुबलियों में क्षत-विक्षत पड़े और ठोकरें खाते शवों के बीच वे जो खड़े हुए हैं – सैनिक, भींचे हुए अपनी तलवारों, गदाओं, धनुष-बाणों को रक्‍त-सिंचित। पंजों के बीच अब शामिल नहीं हैं किसी भी सेना में। न तो वे साथ हैं अब किसी सत्‍य के या कि असत्‍य के […]

नहीं समझ पाते बच्‍चे कुछ भी

मर्द जब जाते हैं मोर्चों पर बीवियां बुनती हैं पहाड़। सीखते हैं बच्‍चे लिखना – गिनती और पहाड़े पोखरों में थमे हुए बरसात के पानी पर। फिर अचानक एक दिन खटखटाने लगते हैं दरवाज़े वायरलेस संदेश। बढ़ जाती है चहल-पहल गांव में शामिल हो जाते हैं भीड़ में बच्‍चे भी लिखना छोड़ लहरों पर गिनतियां। […]

जानते हैं पहाड़

पहाड़ नहीं जाते यात्राओं पर कहीं लौटते भी नहीं कहीं से वे वापस। करते हैं केवल प्रतीक्षा। खड़े-खड़े और छोड़े बग़ैर ज़मीन सालों-साल सदियों तक लौटने की गड़रियों के घर वापस। पर जानते हैं पहाड़ – गया हुआ सब कुछ वापस नहीं लौटता कभी जैसे चट्टानों के सीने चीरकर निकली कोई नदी या कि ससुराल […]