‘देसी’ नेता, ‘बिदेसी’ पत्रकार

गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के लिए भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज्यादा संभावित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रति सहानुभूति व्यक्त की जा सकती है। गुजरात दंगों के कोई ग्यारह साल बाद उन्होंने पहली बार मुंह खोलने का साहस दिखाया और ‘कुत्ता-फजीहत’ में फंस गए। गोरी चमड़ी वाले पत्रकारों के सामने संवेदनशील देशी मुद्दों पर मुंह खोलने की यह पहली कीमत है। दंगों के सवाल पर पिछले तमाम सालों में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट दोनों के ही खुर्राट पत्रकारों को मोदी चतुराई के साथ निपटाते रहे हैं, पर इस बार थोड़े उलझ गए। मोदी अगर किसी हिंदीभाषी राज्य से होते तो थोड़ी सावधानी फिर भी बरत लेते। कुछ मुद्दों पर जवाब देने में वे चोट खा गए, जो अब पार्टी पर भारी पड़ रही है।

रायटर्स संवाद एजेंसी के गोरों के साथ प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की मुख-मुद्रा और शरीर-भाव वैसा नहीं था, जो कि भारतीय मीडियाकर्मियों पर आए दिन मोदी की छाप छोड़ता है। मोदी बहुत विनम्र और झुके-झुके-से नजर आ रहे थे, जो कि वे हैं नहीं। इसका एक कारण मोदी का यह अंतर्ज्ञान भी हो सकता है कि भारतीय मीडिया को जरूरत से ज्यादा भाव देने की जरूरत नहीं, क्योंकि ‘अधिकांश मीडिया’ उनके प्रति कथित तौर पर पूर्वाग्रहों से पीड़ित है। निश्चित ही मोदी के लिए इस समय सबसे बड़ी जरूरत अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अपने पक्ष में जगह बनाने की है। वे जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ही उनके पक्ष या विपक्ष में दुनिया के उन शक्तिशाली मुल्कों में माहौल बना सकता है, जो उनके प्रति वर्ष 2002 का भाव रखते हैं। प्रधानमंत्री पद पर काबिज होकर सफलतापूर्वक बने रहने के लिए बाहरी ताकतों का समर्थन खुद की पार्टी से ज्यादा जरूरी है, जिसकी कि मोदी बेसब्री से प्रतीक्षा भी कर रहे हैं।

सीलिए रायटर्स के साथ इंटरव्यू में मोदी यह तो गर्व से बताते हैं कि ‘इंडिया टुडे’ से उन्होंने निवेदन किया कि हर बार गुजरात ही जीतता रहता है, अत: अगली बार उनके राज्य को प्रतिस्पर्द्धा में शामिल न करें। इससे किसी अन्य राज्य को जीतने का मौका मिलेगा। पर यह सच्चाई जाहिर नहीं हो पाती कि ‘इंडिया टुडे’ या अन्य किसी कॉन्क्लेव में जब रायटर्स की तरह सवाल उनसे पूछे जाते हैं तो उन्हें अपनी एक विशेष भाव-भंगिमा के साथ वे कैसे घोलकर पी जाते हैं। जाहिर है मोदी प्रधानमंत्री पद पर काबिज होने से पहले उसकी अंतरराष्ट्रीय रिहर्सल कर रहे हैं और अपने पहले प्रयास में वे मात खा गए दिखाई देते हैं। मुद्दा यह है कि कुछ संक्षिप्त अपवादों को छोड़कर जिस तरह के प्रधानमंत्रियों या नायकों ने देश की अब तक अगुआई की है, वे ‘कठिन से कठिन’ और ‘घुमा-फिराकर’ पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देने में काफी ‘आर्टिकुलेट’ या चतुर रहे हैं। डॉ. मनमोहन सिंह का तो इस मामले में खैर कोई जवाब ही नहीं है। उनके मौन के सामने अच्छे-अच्छे मौनी बाबा पानी भर सकते हैं। रायटर्स के पहले सवाल पर जरा गौर करें कि उसे किस तरह से गढ़ा गया था : ‘क्या यह कुंठा उत्पन्न करने वाला नहीं है कि ज्यादातर लोग आपको 2002 (जब दंगे हुए थे) से ही परिभाषित करना चाहते हैं?’ अब इस सवाल में मोदी उलझ भी गए और जो जवाब उन्होंने दिया, वैसा सामान्य परिस्थितियों में या हिंदी अथवा गुजराती में पूछे जाने पर नहीं देते या देना चाहते। सवाल सीधे तरीके से नहीं पूछा गया था कि ज्यादातर लोग आपकी 2002 से ही क्यों पहचान करना चाहते हैं?

स बात में कम शक होना चाहिए कि विदेशी संवाद एजेंसी रायटर्स द्वारा पूछे जाने वाले तमाम सवाल मोदी ने पहले से ही प्राप्त नहीं कर लिए होंगे (मोदी ‘मीडिया’ के मामले में बहुत सोच-समझकर ही जोखिम उठाते हैं। गुजरात का मीडिया इस बात को जानता है और मुख्यमंत्री से संभलकर ही बात करता है) और सवालों के दिए जाने वाले जवाबों पर उन्होंने पहले से ही काफी तैयारी नहीं कर ली होगी। कुछ सवालों के जवाब मोदी ने अंग्रेजी में दिए और कुछ में वे हिंगलिश (हिंदी-अंग्रेजी) में जान-बूझकर या मजबूरी में उतर आए। जान-बूझकर इसलिए कि सवाल और जवाब के निहितार्थ घरेलू जनता को समझाना ज्यादा जरूरी था। यह आभास पैदा करने के लिए कि प्रश्नों के जवाब तात्कालिक रूप से और पूरे आत्मविश्वास के साथ दिए जा रहे हैं, मोदी के मीडिया प्रबंधकों द्वारा कैमरे के सामने किसी दुभाषिए की उपस्थिति को दर्शाना जरूरी नहीं समझा गया।

मोदी के जिस जवाब पर हाल-फिलहाल ज्यादा हल्ला मच रहा है, उस पर कई कारणों से गौर करना जरूरी है। सवाल पूछा गया कि असली मोदी हिंदू राष्ट्रवादी नेता हैं या उद्योगों की तरफदारी करने वाला मुख्यमंत्री? गौर करें कि सवाल में ही निहित किया गया था ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ शब्द। यानी जवाब के विकल्प सवाल में ही सीमित कर दिए गए थे। मोदी टुकड़ों में जवाब देते हैं। पहला टुकड़ा : मैं राष्ट्रवादी हूं। दूसरा : मैं देशभक्त हूं। तीसरा : मैं पैदाइशी हिंदू हूं। चौथा : इसमें कुछ गलत नहीं। पांचवा : अत: मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं, इसलिए हां (सवाल के परिप्रेक्ष्य में)। मैं देशभक्त हूं, इसमें भी कुछ गलत नहीं। मोदी ने अपने राजनैतिक विरोधियों को अपनी-अपनी सुविधा से इंटरव्यू का भाष्य करने की खुली छूट (जान-बूझकर या अनजाने में) दे दी कि वे ‘राष्ट्रवादी हिंदू’ हैं या ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ (हिंदू और राष्ट्रवादी शब्दों के बीच अल्पविराम लगाने या न लगाने की छूट है)। लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी में फर्क यहां उजागर होता है। जिन्ना को तो आडवाणी सेकुलर बता देते हैं, पर स्वयं के बारे में वे ऐसी कोई घोषणा नहीं करते। आडवाणी जिन्‍ना को ‘राष्ट्रवादी मुस्लिम’ या ‘मुस्लिम राष्ट्रवादी’ भी घोषित नहीं करना चाहते। अत: आडवाणी की तुलना में मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपने ज्यादा नजदीक नजर आते हों तो आश्चर्य की बात नहीं।

रेंद्र मोदी के एक ‘बिदेसी’ पत्रकार के साथ साक्षात्कार और उसके बाद मच रहे ‘दिग्विजयी’ बवाल के अर्थ यही हैं कि हमारा राष्ट्रीय परिदृश्य अब खालिस ‘देसी’ किस्म के नेतृत्व से परिपूर्ण रहने वाला है। इस परिदृश्य में आगे चलकर नरेंद्र मोदी के साथ-साथ मायावती, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, बेनी प्रसाद जैसी राजनैतिक प्रतिभाएं अपने खालिस देसी अंदाज में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय जनता का प्रतिनिधित्‍व करने वाली हैं और विदेशी मीडिया के साथ अपने साक्षात्कारों में अपनी जातिगत/सांप्रदायिक प्रतिबद्धताओं को अभिव्यक्ति भी देने वाली हैं। अत: नरेंद्र मोदी के साक्षात्कार को लेकर जितना ज्यादा बखेड़ा खड़ा किया जाएगा, प्रधानमंत्री पद के लिए उतनी ही दावेदारी गुजरात के मुख्यमंत्री की मजबूत होगी। राहुल गांधी का ऐसा कोई साक्षात्कार प्रकट होना अभी बाकी है। हालांकि राहुल की अंग्रेजी मोदी की तुलना में ज्यादा ठीक-ठाक है।