हो जाता पिता, कृष्‍ण का

कुरुक्षेत्र की लहू-लुहान रणभूमि में –
बाहुबलियों में क्षत-विक्षत पड़े
और ठोकरें खाते शवों के बीच
वे जो खड़े हुए हैं – सैनिक,
भींचे हुए अपनी तलवारों, गदाओं,
धनुष-बाणों को रक्‍त-सिंचित।
पंजों के बीच अब
शामिल नहीं हैं
किसी भी सेना में।
न तो वे साथ हैं अब किसी
सत्‍य के या कि असत्‍य के
धर्म के या कि अधर्म के
वे अब तटस्‍थ हैं पत्‍थरों की तरह।
लड़ा था संग्राम जो उन्‍होंने
जिन गर्वोन्‍नत पताकाओं के तले –
ख़ून से लथपथ सभी
दिखाई देती हैं एक जैसी
बाणों की शैया पर
वह जो शरीर लेटा हुआ
कर रहा है प्रतीक्षा
सूर्य के प्रस्‍थान की
दक्षिणायन से उत्‍तरायण की ओर
इस समय केवल है एक पुत्र
जो तपता रहा जीवन भर
पिता के प्रेम में।
राजा शांतनु को दिया वचन तो
बहाना था पिता के खूंटे
से बंधे रहने का।
पितामह भीष्‍म को भी था पता
हस्तिनापुर के रक्षक तो थे वे ही
जो थे द्वारपाल द्वारिका के।
क्‍या पड़ता है फ़र्क अब कुरुक्षेत्र को
आ भी जाती है अगर गांधारी
देखने के लिए सौ चेहरे
राजकुमारों के, हस्तिनापुर के
कुचले पड़े थे शरीर जिनके
महत्‍वाकांक्षाओं के रथों-तले।
सच तो यह भी है –
मचता ही नहीं कभी महाभारत
नहीं बांधती गांधारी अगर
आंखों पर अपनी पट्टी
किसे पता, रचा-बुना हो
सबकुछ कृष्‍ण ने ही –
दिखलाने के लिए लीला अपनी
विराट स्‍वरूप अपना।
पिता तो कृष्‍ण हैं –
बहते हैं देखकर जिन्‍हें अश्रु
करता है आतंकित
मन कुरुक्षेत्र का जब-जब भी।

Leave a comment

Your email address will not be published.