होश-ओ-हवास में नशे की वकालत?

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार नर्मदा-शिप्रा लिंक योजना के बाद देसी-विदेशी शराब लिंक योजना की सौगात जनता को देना चाहती है। ऐसा लगता है कि विधानसभा चुनावों में एक सौ पैंसठ सीटों का आंकड़ा सरकार के लिए नशे का काम करने लगा है। गुजरात में सफलतापूर्वक पूर्ण नशाबंदी जारी रखने वाले नरेंद्र मोदी का मुकाबला शिवराज सिंह चौहान देसी शराब की दुकानों पर अंग्रेजी शराब बेचने की अनुमति देकर करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री का इस समय एकमात्र लक्ष्य खजाने के लिए अधिक से अधिक राजस्व बढ़ाने का है, जिससे कि लोकसभा चुनावों के लिए अपनी छवि को और चमका सकें। और वे इसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। सरकार की मंशा शराबखोरों को देसी शराब की जगह विदेशी शराब पीने के लिए प्रोत्साहित करने की है। कैबिनेट की बैठक में जब कुछ मंत्रियों ने इस फैसले का विरोध किया तो उसे अनसुना कर दिया गया। अब देसी शराब की मौजूदा 2737 दुकानों में से ढाई सौ ऐसी हो जाएंगी, जहां दोनों तरह की शराबें मिलेंगी। यानी सरकार द्वारा अपनी ही इस घोषणा का मखौल उड़ाते हुए कि प्रदेश में अब शराब की कोई नई दुकान नहीं खोली जाएगी, विदेशी शराब बेचने वाली दुकानों की संख्या वर्तमान की 937 से बढ़ाकर 1187 कर दी गई है। सरकार चाहती है कि किसान जब मंडियों में अपनी फसल बेचकर लौटें तो रास्तों में उन्हें विदेशी शराब की दुकानें मिलनी चाहिए।

कुछ एयरलाइंस अगर मध्य प्रदेश के राजस्व में अपना योगदान देने की पेशकश करें तो सरकार प्रदेश के बस अड्डों पर हवाई सेवाओं के टिकट भी बेचने की अनुमति दे सकती है। जनता के लिए नशे का सामान सहजता से उपलब्ध करवाने का एक फायदा यह भी होता है कि वह सरकारों के कामकाज में ज्यादा दखल देने की हालत में नहीं बचती। मुख्यमंत्री का तर्क है कि उनके इस क्रांतिकारी कदम से डेढ़ सौ-दो सौ करोड़ का अतिरिक्त राजस्व भी मिलेगा और चोरी-छिपे बिकने वाली नकली और घटिया विदेशी शराब पर भी अंकुश लगेगा। लाड़लों-लाड़लियों के मामा अपने भांजों-भांजियों के लिए ढाई सौ नए स्कूल, कॉलेज, अस्पताल नहीं खोलना चाहते। मुख्यमंत्री प्रदेश में खनिजों की रॉयल्टी और करों में होने वाली चोरी को रोककर प्रदेश का राजस्व नहीं बढ़ाना चाहते। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के वायदों पर भारी-भरकम बहुमत से जीतकर बनने वाली सरकार के ऊर्जा मंत्री का सहयोगी महीने भर से कम समय में ही नोट गिनते हुए पकड़ा जाता है। सरकार माफियाओं और रिश्वतखोरों से नहीं निपटना चाहती, क्योंकि सत्तारूढ़ दल को अभी लोकसभा चुनाव में भी झंडे फहराना हैं। प्रदेश में विपक्ष के नाम पर रियासतों में बंटी हुई एक ऐसी कांग्रेस है, जो जनता की कृपा के बजाय दिल्ली में बैठे अपने आकाओं की अनुकंपा पर ज्यादा भरोसा करती है। शिवराज सिंह सरकार को वक्त रहते हवा का रुख भांपते हुए न सिर्फ अपने ताजा फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, अपने ही मंत्रिमंडलीय सहयोगियों की सलाहों और विरोध को दरकिनार करने के अति उत्साह से भी बचना चाहिए। ऐसा करना उनके स्वयं और प्रदेश की अच्छी सेहत के लिए जरूरी होगा।