‘हिंदू टैरर’: चुप्पी का मतलब स्वीकृति नहीं है

इस्लामी आतंकवाद या ईसाई विस्तारवाद का मुकाबला करने के लिए हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर कतिपय संगठनों ने जो रास्ता चुना है वह खौफ पैदा करने वाला है। मालेगांव (महाराष्ट्र) और मोडासा (गुजरात) में हुए बम धमाकों को लेकर मुंबई की एंटी टैरेरिस्ट स्क्वैड (एटीएस) द्वारा कतिपय हिंदू संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं की जो धर-पकड़ की गई है वह चौंकाने वाली है। पकड़े गए लोगों पर जिस तरह के आरोप हैं उससे लगता है छह साल बाद फिर से देश का मुंह गोधरा कांड के बाद गुजरात में हुए सांप्रदायिक तांडव की ओर मोड़ा जा रहा है। खतरनाक यह है कि हिंदू राष्ट्रवाद के इस बदले हुए चेहरे को देश की बहुसंख्यक जनता का समर्थन प्राप्त नहीं है। इस्लाम के नाम किए जाने वाले धमाकों और उनके कारण होने वाले जान-माल के नुकसान के प्रति व्यक्त होने वाले आक्रोश को ‘हिंदू टैरर’ के छाते तले संगठित करने की कोशिशें इसलिए खतरों से भरी हैं कि ‘हिंसा का मुकाबला हिंसा से’ की तर्ज पर आतंकवाद को भी बांटकर दिखाने का खेल आजमाया जा रहा है। यानी आतंकवादियों का स्टेटस उनके द्वारा निशाने के लिए चुनी गई बस्तियां, मरने वाले लोगों की जात और हिंसा के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले उपकरण और साधन तय करने लगेंगे।

बम धमाकों में अगर साइकिलों का इस्तेमाल होता है तो कुछ अलग किस्म के अपराधियों की तलाश होगी और अगर लोगों की जानंे लेने में मोटर साइकिलें काम में लाई जाती हैं तो अपराधियों की तलाश के दायरे बदल जाएंगे। सिलसिला तब अपराध करने वालों की तलाश तक ही सीमित नहीं रहेगा। सत्ता में काबिज सरकारें भी शक्लों और विचारधाराओं के आधार पर फैसले करने लगेंगी कि किस आतंकवाद के खिलाफ किस तरह की कार्रवाई की जानी है। मालेगांव और मोडासा के धमाके मुंबई की ए.टी.एस. द्वारा की गई धरपकड़ और उसके द्वारा किए गए खुलासे के पहले तक किसी और खाते में दर्ज थे और पर अब उसके कर्जदार बदल गए हैं।

कुतुब मीनार की नाक तले बसे ‘फूल वालों की सैर’ वाले महरौली में ‘अंकिल आपका सामान गिर गया है’ कहते हुए जिस 13 वर्षीय संतोष ने अपनी जान धमाके के बाद गंवा दी थी उसकी रूह को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आतंकवादी का धर्म क्या था और कि वह साइकिल पर सवार था या मोटरसाइकिल पर। हम कबीलाई संस्कृति से बाहर निकल गए हैं और जीने के लिए एक प्रजातांत्रिक जीवन-पद्धति को स्वीकार कर लिया है इसका एक सुबूत यही है कि अपनी सुरक्षा-व्यवस्था के सारे अधिकार हमने राज्य की सत्ता में निहित कर दिए हैं। हमने संवैधानिक रूप से स्वीकार किया है कि देश की सेना व पुलिस हमारी सुरक्षा का कार्य करेगी। पर एक प्रकार के आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए नागरिक स्तर दूसरी किस्म के आतंकवाद को संगठित और प्रशिक्षित करने का अर्थ उन्हीं संस्थाओं को चुनौती देना है जिन्हें हमने अपनी जाल-माल की हिफाजत की जिम्मेदारी सौंप रखी है।

आतंकवाद के इस नए सीरियल में सेना से सेवानिवृत्त हुए अफसरों की जो भूमिका सामने आ रही है वह हैरत से ज्यादा क्षोभ पैदा करने वाली है। मालेगांव और मोडासा में हुए धमाकों के सिलसिले में मुंबई की ए.टी.एस. द्वारा गिरफ्तार एक साध्वी को किसी जनसभा में इस तरह का व्यक्तव्य देते हुए उद्यृत किया गया है कि अहिंसा तो नपुंसकों का हथियार है। बहुत मुमकिन है कि साध्वी ने कुछ ऐसा नहीं कहा हो। पर इस तरह का सोच रखने वालों की आज कमी नहीं कि अहिंसा कायरों का हथियार बताया जाता है। अहिंसा की प्रभावोत्पकता पर बहस की पूरी-पूरी गुंजाइश के बावजूद इस तरह की सनक को किसी वैचारिक यकीन में तब्दील नहीं किया जा सकता कि एक धार्मिक आतंकवाद से निपटने के लिए दूसरे धार्मिक आतंकवाद का सहारा लेना जरूरी है और ऐसा करने में राज्य की सत्ता को भी ललकारा जा सकता है।

गोधरा कांड के बाद गुजरात में हिंदुत्व का जो चेहरा प्रकट हुआ था उसे किसी संगठित आतंकवादी भय की शक्ल में नहीं बदला जा सका था। पर यहां जिस खतरे के प्रति आगाह करना जरूरी है वह यह कि हिंदू आतंकवाद का इस्तेमाल कहीं मतदाताओं के ध्रुवीकरण और सत्ताप्राप्ति के राजनीतिक खेल के रूप में तो नहीं किया जा रहा है? गोधरा कांड के बाद गुजरात में जो राजनीतिक ध्रुवीकरण हुआ था वह आज तक न सिर्फ कायम है और मजबूत हुआ है। उसका समुचित लाभ भी वहां सत्तारूढ़ दल को मिला है। सेना और पुलिस ‘व्यक्त होने वाले’ आतंकवाद से ही निपट सकती है। ‘अव्यक्त आतंकवाद’ का मुकाबला ‘अपरिभाषित जनता’ ही कर सकती है।

अभी तक यह मांग की जा रही थी कि अल्पसंख्यकों की जमातें, उनके धार्मिक नेता और बुद्धिजीवी इस्लाम अथवा ईसाइयत के नाम पर की जाने वाली हिंसा की निंदा और भत्र्सना करें। देश की बहुसंख्यक आबादी, उसके धार्मिक नेता और राजनीतिक दलों के समक्ष अब एक अवसर उपस्थित हुआ है कि वे भी अगर मुंबई की ए.टी.एस. के दावे में कोई सच्चई है तो कथित ‘हिंदू टैरर’ की भी सार्वजनिक रूप से निंदा और भत्र्सना करें। केवल इतना कहने भर से ही पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता कि जो कुछ उजागर हुआ है उनसे हमारा या हमारी पार्टी या संगठन से कोई संबंध नहीं है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो भी इस नतीजे पर पहुंचने में सावधानी तो बरती ही जानी चाहिए कि इस तरह की हिंसक कार्रवाइयोंे को देश की बहुसंख्यक आबादी की कोई मौन सहमति हासिल है। चुप्पी का मतलब स्वीकृति नहीं है।