हमारी भूमिका कहां से शुरू कहां खत्म?

हरियाणा रोडवेज की चलती हुई बस में जब पूजा और आरती नाम की दो बहनें अपने आपको ‘विवादास्पद’ छेड़छाड़ से बचाने के लिए संघर्ष कर रही थीं, तब बस में सवार दूसरे लोग मूकदर्शक बने हुए थे। यकीन किया जाए तो दोनों बहनों के नजदीक बैठी एक महिला ने हिम्मत करके छेड़छाड़ करने वालों का विरोध किया और घटनाक्रम को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर दुनियाभर में पहुंचा भी दिया। समूची घटना को लेकर विवाद अब इस बिंदु पर केंद्रित हो गया है कि दोनों बहनों के साथ छेड़छाड़ हुई थी या नहीं। विवादों के बीच ही हरियाणा सरकार ने ‘बहादुर’ बहनों का सम्मान करने की अपनी योजना को फिलहाल स्थगित कर दिया है और बस के ड्राइवर-कंडक्टर को बहाल कर दिया है। लगता है, दो साल पहले दिसंबर 2012 में राजधानी दिल्ली की चलती बस में हुए निर्भया कांड के बाद भी जैसे कहीं कुछ नहीं बदला है।

महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचारों के प्रति विरोध प्रकट करने का यह तरीका जैसे एक पैटर्न बन गया है कि एक अकेली महिला को संघर्ष तो अपने दम पर ही करना है, समाज केवल उसकी विजय व उसके साहस का सम्मान करेगा। संघर्ष के दौरान साथ देने के लिए बहुत कम बार ऐसा होगा कि कोई आगे आएगा। आए दिन के किस्से हैं कि दिनदहाड़े और भरी सड़कों पर कोई गुंडा लूटकर भागता है और कई बार अकेली महिला को ही गुंडे को पकड़ने के लिए दौड़ लगाना पड़ती है। अगर वह उसे पकड़ लेती है तो भीड़ का काम बस गुंडे की पिटाई करके उसे पुलिस को सौंपने भर का बच जाता है। बिरले मौके ही ऐसे होते हैं, जब कोई बहादुर नौजवान अपनी जान की बाजी लगाकर अपराधियों के पीछे दौड़ पड़ता है।

कुछ दिनों पहले ऑस्ट्रेलिया में हुई एक घटना का वीडियो दुनियाभर में वायरल हुआ था। किसी यात्री का पैर ट्रेन के डिब्बे के नीचे आ गया था। तब ट्रेन में सवार यात्रियों ने समूचे डिब्बे को ही दूसरी तरफ झुकाकर यात्री को सुरक्षित बाहर निकाल लिया था। बहस का असली मुद्दा यही बच जाता है कि आपदा प्रबंधन में नागरिकों की व्यक्तिगत और सामूहिक भूमिका कहां से शुरू और कहां पर खत्म होनी चाहिए। हरियाणा के सोनीपत जिले के गांव थानाखुर्द की दोनों बहनों के साथ रोहतक में हुई घटना और उसके प्रत्यक्षदर्शी यात्रियों की भूमिका नागरिकों के आम स्वभाव से अलग नहीं है। नागरिक अपने ठीक सामने उपस्थित संघर्ष से दो-दो हाथ करने के बजाय व्यवस्था की कमजोरियों को कोसते हुए बाहरी राहत और सहायता की प्रतीक्षा करने में ही अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। कुछ साल पहले चंडीगढ़ के पास हुई एक घटना में सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच एक व्यक्ति ने देखते ही देखते आत्मदाह कर लिया था और समूची घटना का वीडियो भी तैयार हो गया। तब सवाल उठाया गया था कि जो व्यक्ति आत्मदाह की फिल्म उतार रहा था, कम से कम उसने ही आत्मदाह करने वाले व्यक्ति को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की? इस तरह के सवालों के उत्तर कभी प्राप्त नहीं होते।

इसका एक उत्तर यही हो सकता है कि हम व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान को उजागर करने या होने देने से खौफ खाते हैं। ऐसा इसलिए कि दोषियों को दंडित करने में कानून की व्यवस्था के प्रति आम आदमी पूरी तरह से आश्वस्त नहीं है। बस यात्रियों के लिए पूजा और आरती की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाना अपने आपको तमाम तरह की कानूनी पूछताछ के लिए प्रस्तुत करना साबित हो सकता था और छेड़छाड़ करने वालों के पक्ष में खड़ी खाप पंचायत की नाराजगी का सामना करने की हिम्मत दिखाना भी। यही कारण है कि सड़क दुर्घटना के शिकार व्यक्ति को बहुत सारे मामलों में तत्काल मेडिकल सहायता इसलिए भी नहीं मिल पाती कि लोग पुलिसिया कार्रवाई के दौरान होने वाली पूछताछ से बचना चाहते हैं। न्यायपालिका द्वारा वर्षों पूर्व दिए गए इस आशय के फैसले के बावजूद कि दुर्घटनाओं के शिकार होने वाले लोगों की मदद करने वालों को अस्पतालों आदि स्थानों पर पूछताछ के लिए परेशान नहीं किया जाएगा, आम नागरिक डरते-सहमते हुए ही मदद करने की हिम्मत जुटा पाता है। अगर अतीत में की गई ऐसी किसी मदद से जुड़ा कोई कटु अनुभव हो तो वह व्यक्ति हमेशा के लिए ऐसी किसी भी पहल के प्रति तौबा कर लेता है।

हरियाणा सरकार अगर इस बात की जांच कराए कि उस बस में कौन-कौन यात्री थे और उनमें से प्रत्येक का घटना के बारे में क्या कहना है तो चौंकाने वाला विश्लेषण प्राप्त हो जाएगा। पर ऐसा विश्लेषण तो ऐसी हरेक घटना के संबंध में प्राप्त हो सकता है। निर्भया और उसके साथी को बस से सड़क पर बाहर फेंक दिए जाने के बाद प्राप्त नागरिक सहयोग, मेडिकल सहायता और पुलिस कार्रवाई सबकुछ सवालों के घेरे में रही है। हरियाणा सरकार की ओर से इस आशय के किसी भी आश्वासन को सार्वजनिक किया जाना अभी बकाया है कि दोनों बहनों को किसी तरह की कानूनी लड़ाई का सामना नहीं करना पड़ेगा। अब तो यह भी कहा जा रहा है कि पूजा और आरती के साथ कोई छेड़छाड़ हुई ही नहीं थी। झगड़ा सीटों को लेकर हुआ था। अत: इस तरह की आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता है कि समूचा दोष अंतत: दोनों बहनों के मत्थे मढ़ दिया जाए और ‘छेड़छाड़’ करने वालों को ही ‘पीड़ित’ पक्ष करार दे दिया जाए। और कि जो मीडिया कल तक दोनों बहनों को ‘बहादुर’ बताकर उनका अभिनंदन कर रहा था, वही ‘छेड़छाड़’ की सच्चाई पर अंगुलियां उठाने लगे।

ऐसा तब तक चलता रहेगा, जब तक कि आम नागरिक व्यवस्था की ओर से अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हुए स्वयं को अपने दोहरे चरित्र से मुक्त नहीं कर लेता। दोहरा चरित्र यही है कि एक अकेले नागरिक के रूप में बस के अंदर प्रत्यक्षदर्शी होते हुए भी वह कानून के डर से अपने आपको सत्य से अलग कर लेता है और जब वही व्यक्ति बस के बाहर सड़क पर नहीं पहचाने जाने वाली भीड़ का अज्ञात चेहरा बन जाता है तो कानून को हाथ में लेने से भी संकोच नहीं करता।