हमला विपक्ष नहीं जनता पर!

दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को हुई कांग्रेस की बहुचर्चित और बहुप्रचारित रैली के देश के लिए क्या-क्या संकेत हैं? पहला तो यह कि कांग्रेस पार्टी अपनी बढ़ती उम्र और ढलती लोकप्रियता के चलते इस समय घोर निराशा के दौर में है। रैली उसकी चुनाव पूर्व की घोषणा है कि वह सत्ता को आसानी से छोड़ने वाली नहीं है। अगर उसे ऐसा करने पर मजबूर किया गया तो वह ऐसा कुछ संभव होने के पहले उसके खिलाफ खड़े विपक्ष को राजनीतिक रूप से तहस-नहस कर देगी। सोनिया गांधी ने रैली में कहा भी कि जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, उसके लिए कुआं तैयार रहता है। श्रीमती गांधी इस तरह के मुहावरे आम तौर पर इस्तेमाल नहीं करती हैं। उनके भाषण से जिस तरह की आक्रामकता प्रकट हुई है, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि भारतीय राजनीति के अगले दो वर्ष लड़ाई के लिए किस तरह का मैदान तैयार करने वाले हैं।

रैली में दिए गए तीनों प्रमुख भाषणों राहुल गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह तथा सोनिया गांधी की स्क्रिप्ट लगभग-लगभग एक जैसी है। यानी अपना कमजोर बचाव करते हुए विरोधियों पर जोर से हमला बोलना। ऐसी भाषण शैली युद्धों के समय स्वयं लिखी गईं या लिखवाकर पढ़ी जाने वाली वीर रस की कविताओं में ही व्यक्त होती है। संकेत यही है कि कांग्रेस मौजूदा संकट को एक युद्ध की तरह लेना चाहती है और अपने कार्यकर्ताओं की फौज को बैरकों से आजाद कर ‘डु ऑर डाई” के अंदाज में सड़कों पर झोंकने का इरादा रखती है। अपने इस आरोप को साबित करने के लिए कि ”विपक्षी पार्टियां लोकतंत्र की बुनियादों को कमजोर करना चाहती हैं और हम उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे,”” कांग्रेस का नेतृत्व किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार है।

राहुल गांधी के उद्बोधन पर गौर करें तो रैली का तीसरा महत्वपूर्ण संकेत यह है कि कांग्रेस पार्टी अब लोकपाल बिल पारित करवाकर रहेगी। उनका आरोप है कि विपक्ष ने उसे पारित नहीं होने दिया। राहुल गांधी को जिस अंदाज में रैली में पेश किया गया और जिस तरह के तेवरों के साथ उन्होंने आलोचकों पर प्रहार किए, उससे मानकर चला जा सकता है कि कांग्रेस ने अपने युवा नेता को अब औपचारिक रूप से ‘लॉन्च” कर दिया है। आने वाले कुछ दिनों में पार्टी में उनकी बदली हुई हैसियत की घोषणा हो सकती है। इसका प्रायोगिक मतलब यही होगा कि पार्टी संचालन के लिए जिन अधिकारों का वे वर्तमान में इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें पार्टी की संवैधानिक वैधता प्राप्त हो जाएगी।

रामलीला मैदान की रैली से उभरे स्वरों का जनता के समझने के लिए मतलब यही है कि देश में विपक्ष नाम का कोई समूह है, जो कांग्रेस के खिलाफ षड्यंत्र करते हुए जनता को गुमराह कर रहा है। सरकार गरीब आदमी की संपन्न्ता के लिए आर्थिक विकास के जिन सुधारों को लागू करना चाहती है, विपक्ष उसमें बाधा पहुंचा रहा है। कांग्रेस पार्टी के सोच को सच मान लेना इसलिए गलत होगा कि देश की राजनीतिक रगों से विपक्ष इस समय गायब जैसा ही है। जनता ही सरकार का विपक्ष बनी हुई है। यानी औपचारिक तौर पर या चुनाव आयोग के पास विपक्षी दलों के नाम पर जो कुछ भी रजिस्टर्ड है, वह इस समय जनता के पीछे खड़ा है। सरकार के खिलाफ मुद्दे कथित विपक्ष नहीं, बल्कि सिविल सोसायटी, मीडिया और सरकार में ही शामिल कुछ ईमानदार और बहादुर अफसर उठा रहे हैं। देश का औपचारिक विपक्ष तो इन मुद्दों को ही हथियार मानकर सत्ता की सवारी करना चाहता है।

त: कांग्रेस जब अपनी रैली में विपक्ष पर हमला करती है तो वह वास्तव में देश की जनता पर ही प्रहार समझा जाना चाहिए। यही कारण है कि कांग्रेस के नेता जब विपक्ष (यहां भाजपा पढ़ें) को भ्रष्टाचार में लिप्त बताते हुए उस पर प्रहार करते हैं तो जनता बचाव में खड़ी नहीं होती। जनता की नजरों में सलमान खुर्शीद और नितिन गडकरी दोनों की छवियों के बखान लगभग एक जैसे हैं। एक को एक परिवार का संरक्षण प्राप्त है तो दूसरे को दूसरे का। जनता तो कांग्रेस से भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में सफाई और जांच चाहती है, जो कि उसे प्राप्त नहीं हो रही है। जनता को लगता है कि डॉ. मनमोहन सिंह के राज में भ्रष्टाचार नाखूनों की तरह बढ़ता चला गया और कांग्रेस पार्टी के नेता बजाय नाखूनों को काटने के उन पर नेल पॉलिश लगाकर उनके जरिए विपक्षियों को लहूलुहान करना चाहते हैं।
गौर करने काबिल है कि सिविल सोसायटी, अरविंद केजरीवाल, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया आदि, आदि पर हमले अब केवल सरकार के द्वारा ही नहीं हो रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी भी कर रही है। भारतीय जनता पार्टी के मुखपत्र ‘कमल संदेश” में आरोप लगाया गया है कि केजरीवाल ने विदेशी ताकतों सेे’सुपारी” ली है और उनकी टीम लोकतंत्र को खोखला करने के काम में जुटी हुई है। सिविल सोसायटी, मीडिया और जनता जब तक जनलोकपाल को लेकर सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, तब तक सबकुछ ठीक था। अब सभी लोकतंत्र के दुश्मन हो गए हैं।

स्तुस्थिति यह है कि कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह सरकार से जनता को जिन प्रश्नों के जवाब चाहिए, वे नहीं मिल रहे हैं। मिलेंगे भी नहीं। कांग्रेस को यही भरोसा है कि जनता के बीच विपक्ष की कम होती विश्वसनीयता का फायदा शायद उसे अपनी लगभग खत्म हो चुकी विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित करने में मिल जाएगा। पर ऐसा नहीं है। जनता रामलीला मैदान से निकलने वाली आवाजों की ईमानदारी अब अच्छी तरह से पहचानने लगी है। ग्लूकोज का भरम देकर पानी की बोतलों से विश्वसनीयता के डीहाइड्रेशन को दूर नहीं किया जा सकता है।