सैयदना, सुचित्रा, सुनंदा और शुक्रवार

र्ष 2014 की जनवरी के तीसरे शुक्रवार को तीन हस्तियां सुबह से रात के बीच दुनिया से बिदा हो गईं। तीन में से दो तो वास्तव में भी हस्तियां थीं और उनके साथ उनकी उम्र भी जुड़ी हुई थी। उनकी शोहरत की तो कोई मिसाल ही नहीं है। पर तीसरी को मीडिया ने इतनी बड़ी हस्ती बना दिया कि पूरा शनिवार उसकी मौत पर ‘फिदा’ कर दिया। मीडिया का काम ही कुछ ऐसा होता है। तीन हस्तियों में एक के दुनिया भर में फैले हुए बोहरा समाज के 98-वर्षीय धर्मगुरु डॉ. सैयदना मुहम्मद बुराहानुद्दीन के निधन का समाचार सबसे पहले सुबह- सुबह प्रसारित हुआ। उसके बाद खबर आई कि बांग्ला फिल्मों की महानायिका और गुमनामी का आवरण ओढ़े रहने के बाद भी चर्चाओं की ‘आंधी’ खड़ी करती रहने वाली सुचित्रा सेन ने 83 वर्ष की आयु में सुबह साढ़े आठ बजे के करीब दुनिया को अलविदा कह दिया। और फिर कोई बारह घंटे बाद देश को पता चला कि केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की बावन-वर्षीया पत्नी सुनंदा पुष्कर दिल्ली के एक पांच सितारा होटल के कमरे में मृत पाई गई हैं। मीडिया को अंतत: उस तरह की खबर मिल ही गई जिसकी कि उसे तलाश रहती है। हमेशा चर्चाओं में बने रहने वाले पूर्व राजनयिक और वर्तमान में एक राजनीतिज्ञ शशि थरूर की पत्नी की मौत ने जैसे साम्राज्यों को हिला दिया हो।

सैयदना साहब करोड़ों की संख्या में दुनिया भर में फैले हुए अपने अनुयायियों के लिए सिर्फ धर्म गुरु ही नहीं थे, उनके लिए सब कुछ थे। उनके प्रति दूसरे समुदायों के बीच भी अगाध श्रद्धा थी। उनके प्रति श्रद्धा का पता उनके अंतिम दर्शन के लिए मुंबई में उमड़ी लाखों की भीड़ और उसमें मची भगदड़ से चलता है।
सुचित्रा सेन ने कोई चौंतीस साल पहले एकाकी जीवन के एक ऐसे सन्नाटे में अपने आपको कैद कर लिया जिसे कोई नहीं भेद सकता था। वे दृश्य होकर भी अदृश्य बन गईं। अपनी मौत के क्षणों में भी उन्होंने अपने अकेलेपन को टूटने नहीं दिया। आम आदमी और अपने चाहने वाले करोड़ों सिने प्रेमियों को अपनी परछाई के नजदीक भी नहीं पहुंचने दिया। सिनेमाई कैमरों की चकाचौंध से दूर उनके साढ़े तीन दशकों के एकांतवास को ईश्वर से साक्षात्कार की अतुलनीय तपस्या भी माना जा सकता है।

सुनंदा पुष्कर अगर शशि थरूर की पत्नी नहीं बनी होतीं और फिर आईपीएल के दौरान विवादों का हिस्सा नहीं बनतीं तो उनके बारे में इतनी चर्चा कभी नहीं होती। सुनंदा की मौत को लेकर छाए रहस्य की परतें धीरे-धीरे ही खुलेंगी। पर जो स्पष्ट है वह यह कि सुनंदा की मौत का संबंध ग्लैमर की दुनिया और उससे जुड़ी महत्वाकांक्षाओं से रिसने वाले अवसाद से है। नए वर्ष के तीसरे शुक्रवार को भूलना अलग-अलग कारणों से आसान नहीं होगा। पर महीने के खत्म होने से पहले दो शुक्रवार अभी बाकी हैं।