सारे ही “महत्वाकांक्षी” जल्दबाजी में हैं

नीतीश कुमार के फैसले के साथ ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को चुनौती दे सकने वाला अंतिम विरोध भी अब समाप्त हो गया है। एनडीए अभी दस्तावेजी रूप में बना हुआ है। कहने को केवल एक घटक दल और उसका संयोजक ही उससे बाहर निकला है। भारतीय जनता पार्टी में अपेक्षाकृत निर्बल जनाधार वाले मोदी-विरोधियों का अंतिम सहारा भी नीतीश कुमार ने एक झटके से समाप्त कर दिया। राजनाथ सिंह अब और ऊंची आवाज में गुजरात के मुख्यमंत्री की प्रतिभा का गुणगान करने के लिए स्वतंत्र हैं। जदयू और भाजपा एक सप्ताह पहले तक बिहार में एक-दूसरे के लिए मंगलगीत गा रहे थे। अब दोनों ही लालू यादव की जुबान में एक-दूसरे पर ‘विश्वासघात के आरोप लगा रहे हैं। निर्वाचन आयोग से मांग की जा सकती है कि वह देश की जनता को वोट देने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ उसे वैचारिक रूप से अशालीन और भड़काऊ बन सकने वाले लोकसभा चुनावों का सामना करने के लिए भी मानसिक रूप से तैयार करे। नीतीश कुमार ने राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थियों के समझने के लिए भावी चुनावी गठबंधनों की प्रक्रिया को अब काफी सरल बना दिया है। भाजपा के लिए भी अब आसान हो गया है कि वह बिना ज्यादा वक्त गंवाए मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित कर दे। पर भाजपा ऐसा करने से इसलिए डर सकती है कि नीतीश कुमार उसका फायदा यह कहकर ले लेंगे कि ‘मुझे तो सब कुछ पहले से ही पता था। बिहार के मुख्यमंत्री भी अब अपनी महत्वाकांक्षाओं की पतंग तेजी से उड़ा सकते हैं। गैर-भाजपाई और गैर-कांग्रेसी पार्टियों के एक तीसरे मोर्चे की देश की जरूरत भी अब पूरी हो सकेगी। कांग्रेस जानती है कि आंध्र प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में उसकी सीटें कम होने वाली हैं। भाजपा को भी पता है कि राजस्थान और दिल्ली में जो कुछ बढ़ेगा, वह अन्य राज्यों के गड्ढों में समा जाएगा। बिहार में संघर्ष त्रिकोणीय होने वाला है। लालू-कांग्रेस-पासवान एक तरफ और दूसरी तरफ जदयू और अलग से भाजपा। धर्मनिरपेक्षता के झंडे लहराते हुए सभी दल जातिवाद को तेल चढ़ाएंगे। लालू की यादव काट के लिए नीतीश उत्तर प्रदेश की ‘यादव पार्टी से समझौता कर सकते हैं। भाजपा की ‘हिंदू सांप्रदायिकता” का मुकाबला अब ‘जातिवादी धर्मनिरपेक्षता” के दम पर किया जाएगा। कांग्रेस को छोड़ दें तो मैदान में प्रधानमंत्री पद के लिए तीन उम्मीदवार होंगे- नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार और मुलायम सिंह यादव। कोई सौ सीटों की ताकत वाले तीसरे मोर्चे को नीतीश कुमार भविष्य की सौदेबाजी के लिए एक जिंदा हकीकत में बदलने के लिए जान लगा सकते हैं। बिहार में चुनाव हारने या जीतने के लिए अभी उनके पास ढाई साल बचे हुए हैं। नीतीश ने बिना वक्त गंवाए अपना काम शुरू भी कर दिया है। भाजपा चाहे तो नीतीश कुमार के कपड़े उघाड़ने के बजाय अभी अपने ही भीतर की उधड़नों को सिलने के काम में ताकत लगा सकती है। बहुत मुमकिन है कि चुनावों के बाद उसे फिर से नीतीश की जरूरत पड़ जाए। कांग्रेस के लिए नीतीश के मुकाबले लालू ज्यादा ‘रिलायबल सहयोगी हैं वे नीतीश कुमार को आसानी से दस जनपथ में नहीं घुसने देंगे। नीतीश के नेतृत्व में तीसरे मोर्चे के गठन की संभावनाओं के प्रकटीकरण के लिए देश लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के संयुक्त योगदान का आभार मान सकता है।