सरकार यानी- आ थॉमस मुझे मार!

३ मार्च २०११

केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के पद पर पी.जे. थॉमस की नियुक्ति को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणियां की हैं उसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चाहें तो अपने स्वयं के खिलाफ भी मान सकते हैं। बहुमत से किए गए फैसले को आधार बनाकर की गई थॉमस की गैर संवैधानिक नियुक्ति के मुख्य वास्तुकार शासन के शीर्ष पदों पर पदस्थ ये दोनों ही व्यक्ति थे। स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की पहली शर्त ही यह मानी जाती है कि उसमें अल्पमत की भावनाओं का भी सम्मान किया जाता है। पर लोकतंत्र में ही इससे अधिक कुछ भी दुर्भाग्यपूर्ण नहीं हो सकता था कि केवल तीन-सदस्यीय समिति में भी लोकसभा में विपक्ष की नेता द्वारा थॉमस की नियुक्ति को लेकर व्यक्त की गई आपत्तियों की दंभपूर्वक उपेक्षा कर दी गई। सरकार द्वारा न सिर्फ थॉमस की नियुक्ति को कुतर्कों के आधार पर उचित ठहराया गया, अपने द्वारा किए गए निर्णय पर कायम रहने को प्रतिष्ठा का विषय बना लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से यही संदेश दिया है कि संख्या के आधार पर बहुमत का जोर दिखाकर सरकार सत्ता में तो बनी रह सकती है, पर उन उच्च पदों पर नियुक्ति नहीं कर सकती जहां व्यक्ति का बेदाग और निर्विवाद होना जरूरी है। अत: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के जरिए यह सिद्ध पाया गया कि थॉमस के मामले में दोनों ही अपेक्षाओं की क्रूरतम तरीके से उपेक्षा की गई थी। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति द्वारा करवाए जाने की विपक्ष की मांग को लेकर भी सरकार ने पूर्व में जो अडिय़ल रवैया अख्तियार किया था और उसके कारण न सिर्फ संसद का पिछला सत्र बहिष्कार की भेंट चढ़ गया था, बजट सत्र का भविष्य भी दांव पर लगा हुआ था। पर जिस तरह का लचीलापन सरकार ने बाद में जेपीसी की मांग पर दिखाया वैसा ही अगर थॉमस को उनके पद से हटाने के मुद्दे पर दिखा देती तो पिछले पांच महीनों से चल रहे संवैधानिक संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरोपित की गई शर्म का उसे इस तरह से सामना नहीं करना पड़ता। यहां मामला केवल इतने भर तक सीमित नहीं था कि थॉमस केरल के पामोलीन घोटाले में दोषी थे या नहीं, या कि चूंकि वे दूरसंचार सचिव रह चुके थे अत: सतर्कता आयुक्त के रूप में 2-जी स्पेक्ट्रम की जांच को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। मामला इससे कहीं बड़ा यूं था कि संसद में विपक्ष की नेता और इस तरह से संपूर्ण विपक्ष ने इस नियुक्ति का विरोध किया था और सरकार उसकी अनदेखी करना चाहती थी, जिसे केवल अधिनायकवादी अहंकार ही करार दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले से न सिर्फ थॉमस को मुक्त कर दिया, बल्कि सतर्कता आयुक्त के पद को भी इस तरह के बंधनों से आजाद कर दिया कि उस पर केवल अखिल भारतीय सेवाओं के नौकरशाहों की ही नियुक्ति की जा सकती है। विडंबना है कि प्रधानमंत्री और उनके सलाहकार न्यायपालिका को अपनी सीमाओं में रहने की बार-बार नसीहतें देते रहते हैं और वे ही अपने कृत्यों से उसे अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने का आह्वान भी करते रहते हैं।