सरकार तो है मगर ‘अफसोस’ के साथ

१६ अगस्त २०११

अन्ना हजारे और उनके समर्थकों के साथ दिल्ली में लालकिले की नाक के नीचे जो कुछ भी मंगलवार को हुआ उसके लिए गृहमंत्री ने ‘अफसोस’ व्यक्त किया है पर साथ ही यह भी जोड़ा है कि ऐसा करना जरूरी हो गया था। चार जून की आधी रात को दिल्ली के रामलीला मैदान में पुलिस के बल प्रयोग के बाद भी सरकार ने ऐसा ही अफसोस जाहिर किया था और कहा था कि ऐसा करना जरूरी हो गया था। देश में चलने वाले किसी भी शांतिपूर्ण आंदोलन के प्रति सरकार का यह एक स्थायी स्पष्टीकरण बन गया है। सरकार का कहना है कि वह धरनों और आंदोलनों के खिलाफ नहीं है पर सबकुछ निर्धारित शर्तों के मुताबिक होना चाहिए। हुकूमत का कामकाज संवैधानिक शर्तों, मानदंडों, आदर्शों और चुनावों के दौरान जनता से किए गए वायदों के हिसाब से चाहे न चले, उसके प्रति उठने वाली विरोध की कोई भी आवाज, फिर वह चाहे अहिंसक भी क्यों न हो, उसे शर्तों के दायरे में ही व्यक्त की जाने की इजाजत दी जाएगी। यह तानाशाही को लोकतंत्र के मुखौटे में पेश करने का ही दुस्साहस है। पर जो लोग सत्ता में इस समय फैसले ले रहे हैं उनके सारे आकलन इस मायने में उलट गए कि जनता ने सरकार की शर्तों और उसकी सफाई दोनों को स्वीकार करने से न सिर्फ इनकार कर दिया, बल्कि जनलोकपाल की स्थापना की मांग को लेकर प्रारंभ की गई अपनी लड़ाई को अब समग्र परिवर्तन के संघर्ष में बदल दिया है। समूचे घटनाक्रम में आपातकाल के पदचाप इस तरह से ढूंढ़े जा सकते हैं कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की बर्खास्तगी की मांग को लेकर प्रारंभ हुए बिहार में छात्रों के आंदोलन की परिणति अंतत: श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार के पतन में हुई थी। और वर्तमान सरकार चाहती तो इतिहास से सबक लेते हुए अन्ना की मांगों पर सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाते हुए भूल सुधार की सूचना मीडिया में प्रकाशित करवा सकती थी। पर चूंकि देश को अभी पता नहीं है कि सरकार के लिए असली फैसले कौन ले रहा है, अन्ना पर चाबुक चमकाने के लिए कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह और मनीष तिवारी जैसे नेताओं को खुला छोड़ दिया गया। अन्ना को तो अनशन करने के लिए शर्तों की जंजीरों में कैद कर दिया गया पर उनके प्रति कांग्रेस के प्रवक्ताओं के अविश्वसनीय आरोपों और भाषा के इस्तेमाल पर सामान्य शिष्टाचार की शर्तें भी लागू नहीं की गईं। परिणाम सामने है। अन्ना हजारे रातोरात अन्ना हजारों और अन्ना लाखों में तब्दील होकर देश की सडक़ों पर फैल गए। देश की जिस युवा शक्ति के दिलों पर राहुल गांधी अपनी अगुवाई में राज करना चाहते थे, वही पलक झपकते एक बूढ़े अन्ना के चमत्कार पर फिदा होकर अपना सबकुछ लुटाने को तैयार हो गई। नीति- निर्धारकों की अदूरदर्शिता और असीमित अहंकार के चलते प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के लिए बैठे-ठाले अपने बचे हुए कार्यकाल की प्राथमिकताएं बदल दी गईं। अब अनुमान लगाना मुश्किल है कि आंदोलन अगर अनियंत्रित होकर अप्रत्याशित हाथों में पहुंच गया तो उसके परिणाम क्या होंगे। इस तरह की आशंकाओंं को निर्मूल साबित करना बहुत जरूरी है। अन्ना के आंदोलन को बजाए जनलोकपाल की स्थापना की मांग के चश्मे में कैद करने के इस नजरिए से देखा जाना जरूरी है कि कानून-व्यवस्था के नाम पर परिवर्तन की संभावनाओं की पगडंडियों पर भविष्य के लिए अधिनायकवादी व्यवस्थाओं के नुकीले पत्थर नहीं बिछाए जाने चाहिए। जनता को अगर बार-बार अपने तलुओं को लहूलुहान करने की आदत पड़ जाएगी तो फिर उनकी यात्राएं कहां जाकर खत्म होंगी, कभी पता ही नहीं चलेगा। सरकार को जनता के सामने इसलिए झुकने की आदत डालनी चाहिए कि दो-ढाई साल बाद उसे उसी के आगे हाथ जोडऩा है। अन्ना उसी जनता के लिए संभावनाओं के सर्वमान्य प्रतिनिधि होकर उभरे हैं। अन्ना के लिए हिरासत की कोई भी अवधि अब कोई मायने नहीं रखती। उनके प्रति उमड़ रहा समर्थन अगर इसी तरह बढ़ता रहा तो फिर अधिकृत जेलों में तो जगहें नहीं बचेगी और फिर समूचे देश को ही एक खुली जेल घोषित करना पड़ेगा। वैसी स्थिति में सरकार को अपने लिए किसी और जनता का चुनाव करना पड़ेगा।