सरकारें संवादशून्य, नागरिक संवेदनाशून्य!

राजस्थान में वर्तमान में चल रहे आंदोलन ने ‘देश की सरकार’ और ‘देश की जनता’ — दोनों ही को लेकर कुछ अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। इन सवालों की गंभीरता पर गौर किया जा सकता है। सरकार को लेकर सवाल यह है कि कोई भी हुकूमत आंदोलनकारियों के साथ समय रहते बातचीत की पतली सी गली भी क्यों नहीं ढूंढ़ पाती। इस तरह के भ्रम की स्थिति क्‍यों बन जाती है कि फैसला किसे लेना है, पता ही नहीं चलता? एक समूचा प्रदेश आंदोलन की चपेट में आ जाता है, सब कुछ ठप्प हो जाता है और सरकारें तमाशबीनों की तरह खड़ी रहती हैं। वह न तो ‘हां’ बोलती हैं और न ‘ना’। आतंकवादियों, अलगाववादियों, भूमिगत विद्रोहियों — यानी कि और सभी के साथ तो चर्चा के रास्ते निकल आते हैं पर अपनी ही जनता के साथ संवाद नहीं हो पाता। सोचकर डर लगता है कि राजस्थान जैसे हालात अगर और राज्यों में भी पैदा हो जाएं और सारे आंदोलनकारी इसी तरह कानून और व्यवस्था को दंत मंजन बनाकर दिल्ली की तरफ कूच करने लगें तो देश के हालात किस तरह के बन जाएंगे!

यहां चिंता का कारण केवल यही नहीं है कि इस तरह के आंदोलनों से स्थानीय जन-जीवन ठप्प हो जाता है, यातायात व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती है और ट्रेनें तथा बस सेवाएं रद्द हो जाती हैं। इतना सब तो जबरदस्त बरसात में भी हो जाता है। मुंबई जैसा शहर भी केवल एक ही दिन की तेज बारिश में तबाह हो चुका है। भूकंप आ जाए तो नुकसान और अव्यवस्थाएं और भी बड़े पैमाने पर भोगना पड़ती हैं। पर सामान्य दिनों में भी सरकारों द्वारा जनता में आंदोलनों के कारण पैदा होने वाली अव्यवस्था और अराजकता को झेलने की हिम्मत पैदा करना प्रजातंत्र के साथ एक खौफनाक मजाक है। जल और जमीन के अपने अधिकारों की मांग के लिए ग्वालियर से राजघाट तक शांतिपूर्ण तरीके से नंगे पैर यात्रा करने वाले गरीब आदिवासियों को दिल्ली से रूबरू करवाने और वर्तमान में चल रहे जैसे आंदोलनों को जानते-बूझते देश की राजधानी की यात्रा का आमंत्रण देने के बीच खासा फर्क है। पहले में इस बात के दर्शन होते हैं कि समाज के दबे-कुचले और शोषित व्यक्ति को भी देश में अपनी बात कहने का अधिकार प्राप्त है और दूसरी में इस बात के कि राजनीतिक सत्ताएं दीवालिया हो चुकी हैं और फैसले अब बंद कमरों में नहीं सड़कों पर लिए जा रहे हैं। प्रश्‍न हिंसक आंदोलनों की वैधानिकता का नहीं बल्कि जनता के वैधानिक अधिकारों की रक्षा का है। और अधिकार यह कि जनता अराजकता के बीच जिंदा रहने की आदत डाले जाने से परहेज कर सकती हैं पर इसके लिए सरकारों को सही वक्त पर फैसले लेने की आदत डालना होगी जो कि हो नहीं रहा है।

दूसरा सवाल तो पहले सवाल से भी ज्यादा गंभीर और परेशान करने वाला है। वह यह है कि देश के ही एक हिस्से में किसी आंदोलन के चलते कोई चालीस लोग शासन की हिंसा के शिकार हो जाते हैं और किसी भी कोने में आंसू की एक बूंद भी नहीं टपकती। जैसे कि देश की बाकी जनता का इन मौतों से कोई सरोकार ही नहीं। ‘आंदोलनकारी’ की मौत को ‘आदमी’ की मौत नहीं मानना राष्ट्रीय संवेदनशून्यता की पराकाष्ठा है। जयपुर में 13 मई को हुए बम विस्फोटों में मृत कोई 65 लोग संवेदना के स्तर पर एक आंदोलन में मरने वाले चालीस लोगों से सरे आम अलग कर दिए जाते हैं। पहला हादसा राष्ट्रीय शोक और संवेदना का विषय बन जाता है और दूसरी राष्ट्रीय असम्बद्धता का। व्यक्तिगत या गुटीय ¨हंसा को काबू में लाने के लिए राज्य की हिंसा को स्वीकृति या उसके प्रति मौन का मतलब है नागरिक संवेदनहीनता की चरम सीमा पर पहुंचने के लिए बिना 1 किसी बाहरी हस्तक्षेप के भी अपने आपको तैयार कर रहे हैं। ऐसा पहले नहीं होता था। आम नागरिक व्यक्तिगत अथवा गुटीय हिंसा के प्रति भी निजी अथवा सामूहिक स्तर पर रोष व्यक्त करता था और राज्य की हिंसा के खिलाफ सुने जा सकने वाले स्वरों में भी आवाज उठाता था। अंग्रेजी में जिसे ‘टोटली अनकन्संर्ड’ कहते हैं, वैसी ही आज स्थिति है जो कि भयावह है।

ट्रेजेडी यह है कि हमने अपनी समस्याओं के हल ढूंढ़ने के लिए सुविधानुसार व्यवस्थाएं बना ली हैं। कुछ तकलीफों के निदानों को हमने अपने-अपने भगवानों के भरोसे छोड़ रखा है तो कुछ अन्य के लिए अपने आपको बाबाओं, साधु-महात्माओं द्वारा बांटे जाने वाले गंडे ताबीजों के हवाले कर दिया है। बावजूद इसके ढेर सारे मसले ऐसे हैं जिनके इलाज के लिए किसी नुस्खे का ईजाद होना बाकी रह जाता है। ऐसे ही मसलों में इस बीमारी का शुमार भी किया जा सकता है कि सरकारें फैसले लेने से डरती हैं। पहले तो सरकारें एक लंबे समय तक चीजों को टालती रहती हैं और जब संकट बढ़ जाता है तो अपनी सारी चिंताएं न्याय पालिका के हवाले करके निश्चिंत हो जाती हैं। वैसे इस बात की भी कोई गारंटी नहीं कि न्यायपालिका द्वारा सुनाए गए हर फैसले को सरकारें अंतिम सत्य की तरह स्वीकारने की नीयत या हिम्मत रखती हों। शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को तब की सरकार ने संसद में कानून बनाकर राजनीतिक कारणों से उलट दिया। जनता का रोल भी इस मायने में भिन्न नहीं कि अपने फिल्मी नायकों को जुकाम भी हो जाने की खबर मात्र से ही वह खुद बीमार पड़ कर यज्ञ-हवन में जुट जाती है पर अपने ही एक वर्ग द्वारा की जाने वाली हिंसा के प्रति भी और उसकी प्रतिक्रिया में उपजने वाले ‘स्टेट वायलेंस’ से होने वाली मौतों को लेकर भी, एक सन्नाटा ओढ़कर सो जाती है। या तो ऐसा हो रहा है कि जनता ने ही अपने आपको हुक्मरानों की तर्ज पर ढाल लिया है या फिर शासकों ने अपनी पसंद की जनता को चुन लिया है।