सभी पड़ोसी बराबर हैं, नहीं भी हैं!

पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर की बातचीत को रद्द करके मोदी सरकार ने इस्लामाबाद को जो संदेश दिया है, उसके मायने साफ हैं। पहला तो यही है कि कोई तीन महीने पहले नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए शपथ के मौके पर नवाज शरीफ की मौजूदगी से दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों के जमीनी हकीकतों से ज्यादा घने जो ‘बादल” निर्मित किए गए थे, उनका वक्त रहते छंटना स्वाभाविक था। नवाज शरीफ वैसे भी इस वक्त अपने ही देश के आंतरिक संकट में काफी उलझे हुए हैं और तय नहीं है कि उससे किस तरह से और कब उबर पाएंगे। हकीकत यह भी है कि भारत के संबंध में नवाज शरीफ सरकार का एजेंडा या तो वहां की सेना और आईएसआई तय करती है या फिर हाफिज सईद जैसी कट्टरपंथी ताकतें। नौकरशाही के स्तर पर बातचीत की औपचारिकताओं का प्रदर्शन करते रहने के लिए हमेशा की तरह एक संकरी गली इस बार भी मौजूद थी, पर अब वह भी बंद हो गई है। ऐसी परिस्थतियों में तात्कालिक रूप से दोनों देशों के बीच, अप्रिय विकल्पों को छोड़ दें तो, यही रास्ता बचता है कि किसी तीसरे शक्तिशाली राष्ट्र के मार्फत एक-दूसरे के खिलाफ दबाव की कूटनीति का प्रयोग करें। अमेरिका ने इस काम में पहले से सिद्धहस्तता प्राप्त कर रखी है। अप्रिय विकल्पों में जाएं तो एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य शक्ति का उपयोग ही बाकी बचता है। ताजा घटनाक्रम के पूर्व नवाज शरीफ कश्मीर को लेकर अपने देश में बयान दे चुके थे। नरेंद्र मोदी भी लेह में कह चुके थे कि पाकिस्तान भारत के साथ सीधे युद्ध करने की हिम्मत खो चुका है, इसलिए वह आतंकवादी गतिविधियों के जरिए छद्म युद्ध जारी रखे हुए है। पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बना सकता है कि नवाज शरीफ की नई दिल्ली यात्रा, शॉलों और साड़ियों के आदान-प्रदान के जरिए बनी सद्भावनाओं के बाद विदेश सचिवों की प्रस्तावित इस्लामाबाद वार्ता को केवल इसी आधार पर रद्द कर दिया जाए कि अब्दुल बासित कश्मीरी अलगाववादियों के साथ मुलाकातें कर रहे थे।

इस बात में कोई शक नहीं कि पाकिस्तानी उच्चायुक्त द्वारा अलगाववादियों से मुलाकात करने का फैसला नई दिल्ली में नहीं, बल्कि इस्लामाबाद में लिया गया होगा। इसके पीछे इरादा भी साफ रहा होगा कि पाकिस्तान विदेश सचिव स्तर की बातचीत का एजेंडा अलगाववादियों की मंशा अनुसार ही आगे बढ़ाने की नीयत रखता है। भारत सरकार द्वारा बातचीत को रद्द कर देने जैसा कठोर कदम उठाने के बावजूद अगर पाकिस्तानी उच्चायुक्त कश्मीरी अलगाववादियों के साथ मुलाकातें जारी रखते हैं और अपने कदम का बचाव करते हैं तो समझा जा सकता है कि इस्लामाबाद ने भारत के खिलाफ अपना कितना कुछ दांव पर लगा रखा है। और यह भी कि पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमेंट भारत की नाराजगी तो बर्दाश्त करने को तैयार है, पर कश्मीर के अलगाववादी तत्वों की नहीं।

भारत की ओर से जो ‘रिस्क” ली गई है, उसके परिणाम दूरगामी भी हो सकते हैं। दक्षिण एशियाई देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने की दिशा में नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के साथ जो पहल प्रारंभ की थी, उसमें पाकिस्तान की ओर से अस्थायी तौर पर व्यवधान उपस्थित हो सकता है। अपनी घरेलू चुनौतियों से जनता का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तानी एस्टैब्लिशमेंट भारत के साथ तनाव को जरूरत से ज्यादा महत्व दे सकता है। नवाज शरीफ की भारत-यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच अमन की आशा रखने वाले एक बड़े तबके को वार्ता के रद्द होने से निराश होना पड़ सकता है।

ताजा घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में इस सच्चाई की भी समीक्षा की जा सकती है कि अपने पड़ोसियों द्वारा सीमा क्षेत्रों पर की जाने वाली हरकतों के मामले में हम पाकिस्तान के प्रति जितने संवेदनशील बने रहते हैं, उतने चीन को लेकर नहीं होते। चीन के प्रति नरमी का यह नजरिया पिछली सरकारों में भी कायम था और वर्तमान हुकूमत भी उन्हीं नीतियों पर चलती दिखाई पड़ती है। 1962 के युद्ध के बाद से ही चीन ने हमारा एक बड़ा भूभाग अपने कब्जे में कर रखा है। इसके साथ ही अरुणाचल प्रदेश को लेकर वह हमें लगातार चुनौतियां देता रहता है। लद्दाख के उत्तरी इलाकों या अरुणाचल प्रदेश में होने वाली चीनी घुसपैठों के प्रति भारतीय प्रतिरक्षा प्रतिष्ठानों का आमतौर पर रुख घटनाओं को सामान्य घटनाक्रम निरूपित करने या ज्यादा हवा नहीं देने का ही दिखाई देता है। उत्तरी लद्दाख में पच्चीस किलोमीटर तक चीनी घुसपैठ की ताजा खबरों को भी बहुत ज्यादा अहमियत नहीं दी गई। भारतीय मीडिया भी चीन के मुकाबले पाकिस्तान के प्रति ही ज्यादा संवेदनशील बना रहता है। सरकारी स्तर पर चीन की दादागिरी को उस तरह से नहीं ललकारा जाता, जैसा पाकिस्तान को लेकर होता है।

पिछले वर्ष अक्टूबर अंत में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा की गई बीजिंग यात्रा के दौरान तय हुआ था कि दोनों देशों के बीच स्थित चार हजार किमी लंबी ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा” (एलएसी) पर शांति और सद्भावना बनी रहेगी। दोनों देशों ने सीमा रक्षा से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण समझौते ‘बॉर्डर डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट” पर हस्ताक्षर भी किए। पर समझौते के मंत्रों का चीन की ओर से शायद ही कभी ईमानदारी के साथ पालन किया गया हो।

इस्लामाबाद के मुकाबले बीजिंग के प्रति हमारे रवैये में लचीलेपन का कारण यह भी माना जा सकता है कि चूंकि चीन विश्व की एक बड़ी आर्थिक और सैन्य ताकत है, हमें उसके साथ अलग तरीके से ही पेश आना होगा। भारत ने कई मर्तबा कई मंचों पर व्यक्त भी किया है कि चीन हमारा सबसे बड़ा पड़ोसी और विश्वभर में उपस्थिति रखने वाला महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोगी है। इन अनुमानों के विपरीत अगर नरेंद्र मोदी की हाल की काठमांडू यात्रा से यह संदेश पहुंचा हो कि चीन की नाराजगी की कीमत पर भी भारत नेपाल को अपने करीब लाने को उत्सुक है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान के प्रति हमारे ताजा फैसले से चीनी नेताओं तक भी संदेश पहुंचेगा कि भारत के साथ रिश्तों को लेकर बीजिंग को अपना दृष्टिकोण आगे या पीछे बदलना ही पड़ेगा।