‘संस्कार’ क्षेत्रीय, आकांक्षा अखिल भारतीय

त्तर प्रदेश की आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन से उपजे विवाद में समाजवादी पार्टी के महासचिव और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई रामगोपाल यादव ने केंद्र सरकार को जो चुनौती दी है, उस पर व्यापक संदर्भों में चर्चा किए जाने की जरूरत है। रामगोपाल यादव के बयान को केवल आवेश या बौखलाहट में की गई टिप्पणी करार देकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने जताया है कि ‘केंद्र सरकार सारे आईएएस अधिकारियों को उत्तर प्रदेश से वापस बुला ले। हम अपने राज्य के अफसरों के सहारे ही सरकार चला लेंगे।’ सरकार चलाने को लेकर किस संवर्ग के अफसरों की जरूरत राज्य विशेष को होनी चाहिए, उसके बारे में टिप्पणी करने का जायज हक निश्चित ही सरकार के ‘मुखिया’ के पास सुरक्षित होना चाहिए, उसके परिवार के ‘मुखियाओं’ के पास नहीं। पर जिन परिस्थितियों और हकीकतों से देश को अब जूझना पड़ रहा है, उसमें अधिकांश फैसले संविधानेतर (एक्स्ट्रा कांस्टीट्यूशनल) सत्ताओं द्वारा ही लिए जाने वाले हैं। इकतालीस मिनट में एक अफसर को निलंबित करवाकर सार्वजनिक रूप से उसकी मुनादी कर देना भी इसी हकीकत का एक हिस्सा है।

रामगोपाल यादव की केंद्र को दी गई चुनौती को इस संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए कि राजनीति जैसे-जैसे संकीर्ण और क्षेत्रीय मानसिकता की होती जाएगी, उसकी अखिल भारतीयता भी वैसे-वैसे कमजोर होती जाएगी। और उसका असर नागरिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होता नजर आएगा, बल्कि नजर आने लगा है। क्षेत्रीय आकांक्षाओं का प्रस्फुटीकरण और प्रकटीकरण विकास की दौड़ और होड़ में आम आदमी की भागीदारी का ही परिचायक है। पर क्षेत्रीयता को सामंतवादी संकीर्णता की दीवारों में कैद कर लेना और उस दीवार के दरक जाने को राजनैतिक सांप्रदायिकता में तब्दील कर उसे केंद्र बनाम राज्य के संघर्ष में बदल देना, एक खतरनाक पहल की ओर इशारा करता है। रामगोपाल यादव जब यह कहते हैं कि वे राज्य के अफसरों के सहारे ही अपना काम चला लेंगे तो उसमें से यही ध्वनि निकलती है कि उत्तर प्रदेश सरकार को अब किसी भी प्रकार का अखिल भारतीय हस्तक्षेप स्वीकार नहीं है। यानी सरकार का सारा कारोबार राज्य के अफसरों (और माफियाओं) की मदद से भी चलाया जा सकता है। बहुत मुमकिन है कि उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में असली कमान भी राज्य के अफसरों के हाथों में ही हो और ऐसा सभी तरह की अखिल भारतीय सेवाओं को लेकर सच हो। पर यह हकीकत केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। रामगोपाल यादव अलग-अलग नामों से ज्यादातर राज्यों में मौजूद हैं। और नए राज्यों के गठन के साथ-साथ उनकी संख्या भी बढ़ती जाएगी।
अधिकांश राज्यों में आज स्थिति यही है कि अखिल भारतीय सेवाओं के लिए होने वाली कड़ी प्रतिस्पर्द्धाओं के बाद चुने जाने वाले ईमानदार अफसरों के लिए काम करने की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। जैसे-जैसे प्रतियोगिताओं के मुकाबले कड़े हो रहे हैं और प्रतिस्पर्द्धियों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे क्षेत्रीय आकाओं और माफियाओं के कद भी ऊंचे होते जा रहे हैं। खुर्राट किस्म के उन अफसरों की बात छोड़ दें, जो हरेक हुकूमत में अपने राजनैतिक आकाओं के दलाल ढूंढ़कर उनसे तालमेल बैठा लेते हैं, पर जो ईमानदार अधिकारी हैं, उनके घर का सामान तो किसी भी एक ठिकाने पर कभी ठीक से खुल ही नहीं पाता और अगर किस्मत से खुल जाए तो घर जमने के पहले ही नया तबादला आदेश पहुंच जाता है।

मजोर किस्म के मुख्यमंत्री ‘दादा’ नस्ल के घरेलू या फिर घाघ अफसरों से घिरे रहते हैं और दादा किस्म के मुख्यमंत्रियों के इलाकों से किसी भी दुर्गा की कोई शक्ति कभी प्रकट ही नहीं हो सकती। नरेंद्र मोदी, ममता बनर्जी, जयललिता, आदि की हुकूमतों वाले राज्यों में क्या पूरी तरह से प्रशासनिक अमन-चैन और रामराज्य कायम है? क्या इन राज्यों या इन जैसे अन्य प्रदेशों में जहां ताकतवर मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल काबिज हैं, अखिल भारतीय सेवाओं के जरिए चुनकर पहुंचने वाले युवा अफसरों के लिए बालू रेत के बजाय सोने की खदानें बिछी हुई हैं? या केवल ऐसा है कि प्रशासनिक कराहें और विद्रोह की आवाजें फिलहाल केवल हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से ही प्रकट हो रही हैं। क्षेत्रीय स्तरों पर राजनैतिक सौदेबाजियों की रॉयल्टी दरें जैसे-जैसे बढ़ती जाएंगी, अखिल भारतीयता की कराहें भी तीव्र होती जाएंगी। अखबारों के पन्नोंी और टीवी के पर्दों पर इस तरह के दृश्य और ज्यादा दिखने लगेंगे, जिनमें उच्च पदों पर तैनात प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी अपने राजनैतिक आकाओं को धोक देते या उनके जूते/सैंडिल पोंछते नजर आएंगे। खीसें निपोरते हुए भ्रष्ट राजनेताओं के सामने शतरंज के मोहरों की तरह बिछ पड़ने वाले ये ही वे अफसर और कर्मचारी हैं, जिनके यहां छापों में करोड़ों की संपत्ति निकलती है, पर उनका कभी बाल भी बांका नहीं होता। रामगोपाल यादव ने गलती केवल यह की कि वे बोल पड़े। सही बात तो यह है कि रीढ़ की हड्डी वाले ईमानदार अफसरों के लिए कहीं भी कोई जगह नहीं बची है। पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल ने पेशकश की है कि दुर्गा शक्ति नागपाल पंजाब के अपने मूल काडर में लौटना चाहें तो उनका स्वागत है। और एक वरिष्ठ सपा नेता ने कथित रूप से सलाह दी है कि दुर्गा और उनके पति अगर माओवादी इलाके में नियुक्ति की प्रार्थना करें तो उस पर विचार किया जा सकता है। अपने भविष्य का फैसला अब दुर्गा शक्ति नागपाल या उनके जैसे अन्य अफसरों को ही करना है। राजनैतिक विकल्प तो जाहिर हो गए हैं।

गौर करने की बात यह है कि संकीर्ण और सामंतवादी संस्कारों की कड़ाही में सत्ता की पूड़ियां तलने वाले तमाम किस्म के राजनेताओं की अंतिम आकांक्षा अपने स्वप्नों को अखिल भारतीयता प्रदान करने की है, पंद्रह अगस्त के दिन लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराने की है, अमेरिका की यात्रा कर हार्वर्ड में ‘गुड गवर्नेंस’ पर भाषण देने की है और व्हाइट हाउस की सीढ़ियों को अपने चरण कमलों से उपकृत करने की है। सवाल यह है कि क्या इसकी इजाजत दी जानी चाहिए?