संघ, सिमी और (राष्ट्रीय) समझदारी

७ अक्टूबर २०१०

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सिमी के बीच समानता स्थापित करते समय राहुल गांधी ने निश्चित ही संयम और सूझबूझ से काम लिया होगा, ऐसा अंदाज लगाया जाना चाहिए। राहुल कांग्रेस के महासचिव हैं और माना जा रहा है कि वे आने वाले वर्षों में देश के प्रधानमंत्री भी बनने वाले हैं। अत: राहुल द्वारा की जाने वाली कोई भी टिप्पणी उनके नेतृत्व में आकार लेने वाले देश के एजेंडे का हिस्सा बन सकती है, इस तरह की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। तात्कालिक मुद्दा केवल इस तथ्य की तह में जाने का बन सकता है कि अयोध्या विवाद पर आए अदालती फैसले के केवल एक सप्ताह में, जबकि समूचा देश दोनों ही पक्षों से जुड़े हुए कट्टरपंथी तत्वों के धैर्य की परीक्षा लेने में व्यस्त हो, इस तरह की टिप्पणी के सार्वजनिक किए जाने की जरूरत क्यों पड़ गई होगी? कांग्रेस के ही किसी अन्य नेता ने भी इस तरह की जरूरत पर गौर नहीं किया। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने भी नहीं जिन्होंने पिछले ही दिनों ‘आतंकवाद’ के साथ ‘भगवा’ नत्थी करके कांग्रेस में बवाल मचा दिया था। और इससे पहले कि देश की कथित भगवा ब्रिगेड में कोई हलचल मचती, दिग्विजय सिंह और जनार्दन द्विवेदी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने ही केंद्रीय गृहमंंत्री के कथन पर यह कहकर ठंडा पानी उड़ेल दिया था कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। राहुल गांधी के वक्तव्य को लेकर कांग्रेस में हाल-फिलहाल सन्नाटा है और उसे अन्य नेताओं द्वारा दोहराए जाने को लेकर कोई होड़ जैसी नहीं मची है जैसा कि इस राष्ट्रीय पार्टी में होता रहता है। पर इस आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि राहुल गांधी की टिप्पणी के बाद कांग्रेस के उदारवादी तत्वों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने में स्वयं पर नियंत्रण रखने का संघर्ष करना पड़े। जो भी दो-चार प्रतिक्रियाएं अभी तक सामने आई हैं वे केवल संघ व भाजपा के आधिकारिक प्रवक्ताओं की ओर से ही हैं। सिमी ने भी कुछ नहीं व्यक्त किया है। बहुत मुमकिन है राहुल गांधी ने संघ और सिमी को लेकर अपनी टिप्पणी बहुत ही सहज रूप से की हो। मध्यप्रदेश की यात्रा के दौरान कांग्रेस के महासचिव को ऐसा विवादास्पद बयान देने की जरूरत के बारे में कन्विंस करवाया भी जा सकता था। मध्यप्रदेश के कुछ शहर सिमी की गतिविधियों और उससे जुड़े पदाधिकारियों की गिरफ्तारियों को लेकर हमेशा चर्चा में बने रहते हैं। इसी प्रकार हिंदू कट्टरपंथ को लेकर भी इसी प्रदेश के कुछ इलाके राष्ट्रीय खबरों में बराबर स्थान बनाते रहे हैं। पर राष्ट्रीय महासचिव के वक्तव्य को केवल प्रादेशिक महत्व का निरूपित करके ही खारिज भी नहीं किया जा सकता। छिद्रान्वेषण करके बाल की खाल निकालने में माहिर राजनीतिक विश्लेषक निश्चित ही ऐसा होने भी नहीं देंगे। राहुल गांधी के वक्तव्य के पीछे कांग्रेस के कथित सेक्यूलर खेमे की इस बेचैनी की तलाश जरूर की जा सकती है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद संघ के क्षेत्रों में पैदा हुए उत्साह को काबू में रखने का एक उपाय इस तरह का वक्तव्य भी हो सकता था। राजनीतिक रूप से संघ कोई आक्रामक मुद्रा अपनाए उसके पहले ही उसे प्रतिरक्षा के कवच में ढाल दिया जाए। राहुल गांधी की राजनीतिक सूझ-बूझ के प्रति पूरी तरह से विश्वास व्यक्त न कर पाने की गुंजाइश अपनी जगह कायम रखते हुए भी इस तथ्य पर तो गौर किया ही जा सकता है कि तमाम पक्की घोषणाओं के बावजूद वे आजमगढ़ की यात्रा पर नहीं गए। वे तमाम लोग जो स्वयं के सोच व राष्ट्र के अच्छे-बुरे के प्रति ईमानदारी से आश्वस्त हैं, इतना जरूर मानते हैं कि अयोध्या मामले में आए फैसले से संघ को कोई लाभ मिल पाएगा इसमें संदेह है। पर संघ पर किए जाने वाले इस तरह के हमलों से कथित कट्टरपंथी संगठन के उदारीकरण की प्रक्रिया को धक्का अवश्य लग सकता है जिससे कि कम से कम हाल-फिलहाल के लिए तो कांग्रेस बच सकती है। वैसे भी कहना अभी मुश्किल है कि राहुल गांधी की टिप्पणी से सहमत होने का सभी कांग्रेसी सार्वजनिक रूप से उत्साह दिखाना चाहेंगे।