संकट कांग्रेस का है, राष्ट्र का नहीं!

                                                  
राबर्ट वाड्रा पर लगाए गए आरोपों को लेकर कांग्रेस के मंत्री और प्रवक्ता (सलमान खुर्शीद, जनार्दन द्विवेदी, रेणुका चौधरी, मनीष तिवारी, जयंती नटराजन, आदि) जिस तरह से लामबंद होकर आक्रामक अंदाज में पेश आ रहे हैं ऐसा आभास जा रहा है कि देश के समक्ष कोई गंभीर (राष्ट्रीय) संकट उत्पन्ना हो गया है। कांग्रेस नेता इस समय न सिर्फ अद्‌भुत एकता का प्रदर्शन कर रहे हैं, सभी प्रवक्ता एक जैसी जुबान का ही इस्तेमाल भी कर रहे हैं। जन लोकपाल बिल को लेकर चली बातचीत और फिर उसकी विफलता के बाद प्रारंभ हुए आंदोलन के दौरान कांग्रेस के प्रवक्ता टीम अण्णा के लोगों के प्रति अलग-अलग विशेषणों का इस्तेमाल भी कर रहे थे और साथ ही अपने कहे के प्रति खेद भी व्यक्त करते जा रहे थे। पर कांग्रेस पार्टी के लिए इस बार मामला थोड़ा अलग और ज्यादा गंभीर बन रहा है। यह काफी चौंकाने वाली बात है कि वाड्रा के प्रति आरोपों का कांग्रेस के प्रवक्ता सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव जैसा ही कुछ मानकर मुकाबला कर रहे हैं जिसकी कि कोई जरूरत नहीं थी। कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि एफडीआई के मुद्दे पर संपूर्ण विपक्ष की धज्जियां उड़ाते हुए अश्वमेध यज्ञ के अंदाज में आर्थिक सुधारों के घोड़े दौड़ाती हुई सरकार को अरविंद केजरीवाल-प्रशांत भूषण के कद के व्यक्ति भी इस तरह से हिला कर रख देंगे। असर ऐसा कि जैसे किसी ने षड्‌यंत्रपूर्वक समूची पार्टी की बिजली काट दी हो और उसके सामने दिन-दहाड़े ही अंधेरे को खड़ा कर दिया हो। पर साथ ही सच्चाई यह भी है कि प्रशांत भूषण और केजरीवाल ने जो आईना कांग्रेस के सामने खड़ा किया है उसमें देश की जनता को फटेहाल विपक्ष की सूरतें भी नजर आ रही हैं। जिस विपक्ष ने जन लोकपाल बिल के मुद्दे पर अण्णा के साथ चोरी-छुपे ही सही धोखाधड़ी की थी वही अब केजरीवाल और प्रशांत भूषण के मैदान में उतरते ही राजनीतिक वेंटीलेटर से अपने आपको मुक्त कर अंगड़ाइयां लेता नजर आ रहा है। वाड्रा प्रकरण ने तो एफडीआई के खिलाफ विपक्ष की लड़ाई को भी ताक पर धर दिया है। एक लाख अस्सी हजार करोड़ के कोयला घोटाले के मुकाबले केवल तीन सौ करोड़ का प्रकरण रातों-रात ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

केजरीवाल-भूषण ने कांग्रेस के लिए एक ऐसे समय हंगामा खड़ा किया है जब पार्टी चुनावों का सामना करने की तैयारी कर रही थी और प्रचार के काम में प्रियंका की इंदिरा-छबि का फायदा लेने की रणनीति को भी अंजाम दे सकती थी। राजनीति में प्रवेश करने को लेकर पहले से ही कम इच्छुक प्रियंका के लिए ताजा एपीसोड ने अब चुनाव प्रचार के लिए भी अपने आपको उपलब्ध कराने पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। ताजा हालातों में कांग्रेस पार्टी वाड्रा मामले के ठंडा पड़ने की प्रतीक्षा ही कर सकती है। पर ऐसा शायद तब तक संभव न हो जब तक कि प्रशांत भूषण और केजरीवाल कोई और बड़ा हंगामा नहीं खड़ा कर दें। इस बात की निकट भविष्य में इसलिए कोई उम्मीद नजर नहीं आती कि मामला अब भूषण-केजरीवाल के नियंत्रण से बाहर हो चुका है। श्रीमती सोनिया गांधी ने अपनी हाल की राजकोट यात्रा के दौरान कहा था : “ये लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, सिर्फ हमारे खिलाफ हैं।” याद रखा जा सकता है कि श्रीमती गांधी ने विपक्ष पर उक्त आरोप भूषण-केजरीवाल द्वारा दिल्ली में किए गए विस्फोट के पहले लगाया था।