शरीफ का साहस वाजपेयी युग की वापसी है

तृणमूल कांग्रेस की तेज-तर्रार नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आ रही हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपनी तमाम घरेलू दिक्कतों के बावजूद नई दिल्ली पहुंचने का फैसला कर लिया है। नवाज शरीफ को उनके साहस के लिए सेल्यूट किया जा सकता है। नवाज शरीफ ने इसके पहले हिम्मत तब दिखाई थी जब फरवरी 1999 में उन्होंने भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की वाघा सीमा पर पहुंचकर ऐतिहासिक अगवानी की थी। नवाज शरीफ के साथ उस समय वाघा पर मौजूद जनरल मुशर्रफ ने अक्टूबर आते-आते नवाज शरीफ को अपदस्थ कर नजरबंद कर दिया था और खुद सत्ता पर काबिज हो गए थे। अत: शरीफ के मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचने और न पहुंचने के फैसले दोनों ही भारत-पाक संबंधों के भविष्य का नया मजमून लिखने वाले थे। नवाज शरीफ के भाई और पंजाब के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख जनरल रहील शरीफ के बीच दो दिन पहले तक लाहौर में इसी बात पर सहमति बनी थी कि नवाज शरीफ के स्थान पर एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ही दिल्ली जाएगा। पर नवाज ने फैसला बदल दिया। माना जाना चाहिए कि मोदी और पाक प्रधानमंत्री दोनों ही इतिहास के उस सफे को आगे ले जाना चाहते हैं जो 21 फरवरी 1999 को वाजपेयी और शरीफ ने ‘लाहौर घोषणा-पत्र’ के रूप में दोनों मुल्कों की जनता और दुनिया को दिया था। पर उसके बाद डेढ़ दशक का वक्त आतंकी हमलों से निपटने और बहादुर सैनिकों के शवों को आंसुओं की चादरों से ढंकने में ही खर्च हो गया। नवाज शरीफ और श्रीलंका के राष्ट्रपति को आमंत्रण दोनों ही नई सरकार की पारी की एक बहादुर शुरुआत है। मनमोहन सिंह की तरह, मोदी के सामने गठबंधन की मजबूरियां नहीं हैं पर तमिलनाडु जैसा महत्वपूर्ण दक्षिणी राज्य जहां कि भाजपा को केवल एक सीट मिली है वहां की तमिल राजनीति के भावनात्मक दबाव को नजरअंदाज करने की जोखिम उठाकर श्रीलंका के राष्ट्रपति की अगवानी करने का फैसला उतना ही साहस भरा है जितना कि अपने यहां के अंदरूनी दबावों को दरकिनार कर शरीफ का भारत आना कबूल करना। अपने चुनाव प्रचार के दौरान मोदी कहते रहे हैं कि आतंकवादी कार्रवाई और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते या कि गोला-बारूद के शोर में बातचीत सुनाई नहीं पड़ती। इसी तरह नवाज शरीफ सहित सभी पाकिस्तानी नेताओं का कहना रहा है कि भारत के साथ होने वाली किसी भी बातचीत में कश्मीर मसले का हल भी शामिल होना चाहिए। अब मोदी अगर अपने कहे को ही बदलना चाह रहे हैं तो भारत के नए विदेश मंत्री के लिए चुनौतीपूर्ण दायित्व समझा जाना चाहिए। नरेंद्र मोदी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के साथ कितनी गर्मजोशी के साथ पेश आते हैं इस बात पर लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में नजर रखना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं के लिए भी नया अनुभव होगा। संघ ही क्यों, क्रिकेट मैच सहित पाकिस्तान के साथ सभी तरह के रिश्तों की मुखालफत करने वाले भाजपा के महत्वपूर्ण घटक शिवसेना के आक्रामक नेता उद्धव ठाकरे के लिए भी नवाज शरीफ की यात्रा बहुत कुछ छोड़कर जाने वाली है। सवाल यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी को अगर अपने दम पर बहुमत प्राप्त नहीं होता तो क्या नरेंद्र मोदी नवाज शरीफ और राजपक्षे को आमंत्रित करने की जोखिम उठाना चाहते? बहुत मुमकिन है वे तब भी ऐसा करने का साहस दिखा देते।