‘वित्तीय घाटा’ कम होगा या ‘राजनीतिक घाटा?’

माम भविष्यवाणियों को नकारते हुए वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम ने घोषित तौर पर कोई चुनावी बजट पेश नहीं किया। एक बड़ी संख्या में कांग्रेसी उम्मीदवार उम्मीदें लगाए बैठे थे कि चुनाव पूर्व के इस (संभवत:) आखिरी बजट में मतदाताओं के लिए राहतों के ढेर लगा दिए जाएंगे और संसद में फिर से पहुंचना आसान हो जाएगा। विपक्ष इसलिए गमगीनी की हालत में है कि उसे न तो चिदम्बरम समझ में आ रहे हैं और न ही उनका बजट। देश के तमाम अर्थशास्त्रियों, विश्लेषकों और चार्टर्ड अकाउंंटेंट्स की ओर से प्रतिक्रिया बन सकती है कि चिदम्बरम ने बजट के प्रति आम जनता की बची-खुची रुचि भी खत्म कर दी। पवन बंसल द्वारा मंगलवार को पेश रेल बजट, बुधवार को वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर सौदे को लेकर राज्यसभा में रक्षामंत्री एके एंटनी द्वारा अपनी और सरकार की छवि का जोरदार बचाव और गुरुवार को चिदम्बरम द्वारा पेश वित्तीय प्रावधानों को एक ही कतार में पढ़ा और देखा जाना चाहिए कि कांग्रेस ने अपने आपको चुनावी परिणामों की चिंताओं से मुक्त कर लिया है। सरकार शायद इस नतीजे पर पहुंच गई है कि योजनाओं का लाभ और राहतें नियोजित तरीकों से जरूरतमंद तक सीधेे पहुंचानी होगी तभी कुछ भला हो सकेगा। साथ ही उच्च आय वाले समूह को भी उसके द्वारा संदेश देना जरूरी है कि उससे अब अतिरिक्त वसूली की जाएगी। बजट के बाद जब शेयर बाजार का सूचकांक गिर रहा था, तब देश का कॉर्पोरेट संसार चिदम्बरम की वाहवाही कर रहा था। बजट के संकेत साफ हैं कि सरकार की आत्मा अपने नौ साल पुराने चोले को छोड़कर ‘इमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज” (छवि निर्माण की कसरत) में प्रवेश कर गई है। सरकार के लिए ‘इंटरनेशनल क्रेडिट रेटिंग”, ‘ग्रोथ रेट” और ‘फिस्कल डेफीसिट” अब ज्यादा महत्वपूर्ण सूत्र वाक्य बन गए हैं। रेल बजट के बाद भी मुंबई का शेयर बाजार धराशायी हुआ था और वित्त बजट के बाद भी ऐसा ही हुआ। सरकार को इसकी चिंता नहीं है। सरकार न तो राहतें बांटने की माली हालत में बची है और न ही जनता पर करों का बोझ डालने की स्थिति में। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में चिदम्बरम कुछ और भी कड़ी और बड़ी घोषणाएं कर सकते हैं। चिदम्बरम ने संकेत दे दिया है कि मंत्रालयों को सुनिश्चित करना होगा कि जितनी राशि का आवंटन उन्हें किया गया है उसका पूरा-पूरा उपयोग होना चाहिए। साथ ही अनुसूचित जाति/जनजाति और अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए जो धन मुहैया करवाया गया है उसका किसी और काम में उपयोग नहीं हो सकेगा। वंचित वर्ग के लिए बनाई गई नकद हस्तांतरण योजना (डायरेक्ट केश ट्रांसफर स्कीम) को अब और व्यापक कर दिया जाएगा। सरकार का निशाना साफ है। उसके राडार पर युवा हैं, महिलाएं हैं, दलित और आदिवासी हैं और वे तमाम तबके हैं जो सरकारें बनाते-बिगाड़ते हैं, पर विकास की दौड़ में पीछे छूटे हुए हैं।

वित्तमंत्री का बजट सही में पूछा जाए तो कांग्रेस पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र है। वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी अब उन्हीं मुद्दों को हथियार बनाने वाली है जिन्हें कि चिदम्बरम ने अपने बजट में उठाया है। वित्तीय घाटा कम करना अब कोई मुद्दा नहीं बचा है। कांग्रेस के लिए समूची लड़ाई राजनीतिक घाटे को पाटने की है जिसके लिए वह बजट घोषणाओं का निर्ममतापूर्वक उपयोग करना चाहेगी। वित्तमंत्री वर्ष 2013-14 के साथ-साथ वर्ष 2014-15 में अर्थव्यवस्था की विकास दर और संभावित वित्तीय घाटे के भी अनुमानों का अगर उल्लेख कर रहे हैं, तो उनके इस आत्मविश्वास के पीछे कुछ राजनीतिक कारण भी होंगे। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की मंशा के पीछे असली मकसद चुनावों के पहले पार्टी की संभावनाओं को ठीक पटरी पर लाना भी हो सकता है।