विकास के एजेंडे में सुरक्षा की तलाश

[dc]एक[/dc] राष्ट्रीय सार्वभौम सत्ता के रूप में हम मजबूत होते जा रहे हैं और हम ऐसा सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने व्यक्त भी कर रहे हैं, पर एक अकेले नागरिक के तौर पर हम अपने आपको लगातार कमजोर होता हुआ और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। बहुत मुमकिन है, ऐसा अन्य राष्ट्रों में भी हो रहा हो। नागरिकों का अकेलापन या उनके अंदर पनपता असुरक्षा का भाव देश के सकल घरेलू उत्पाद में कभी परिलक्षित नहीं हो पाता। ठीक वैसे ही, जैसे जमीन के गहरे अंदर, सुरंगों को भेदते हुए, काले सोने की खुदाई में जो मजदूर और इंजीनियर जुटा रहता है, वह सकल घरेलू उत्पाद में उल्लेखनीय योगदान देते हुए भी अपने आपको तब तक असुरक्षित महसूस करता रहता है, जब तक कि वह खुले आकाश के नीचे खुली हवा में नहीं पहुंच पाता। हममें किसी किस्म का ज्वर होने के प्रकट लक्षण नहीं हैं, चिकित्सक भी हमारा इलाज करने को लेकर सहमत नहीं हैं, पर हमें लगातार लगता रहता है कि हमारे हाथ तप रहे हैं। डॉक्टर मानते हैं कि हमें दवा की नहीं, मनोचिकित्सा की जरूरत है और हम डॉक्टर को अयोग्य मानते रहते हैं।
[dc]देश[/dc] की विकास दर में वृद्धि के दावे किए जा रहे हैं, जो काफी हद तक सही भी हो सकते हैं। कहा जा रहा है कि हमारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ रहा है, महंगाई घट रही है। पर ऐसा क्यूं है कि देश की एक बड़ी आबादी को यह भाषा पल्ले ही नहीं पड़ रही है? उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि उसके हिस्से की दुनिया कैसे ज्यादा रहने काबिल बन रही है। उसे यही लगता है कि वह विकास की दौड़ से बाहर सड़क के किसी एक किनारे पर दर्शकों की भीड़ का हिस्सा बनकर खड़ा है और उसे तालियां बजाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। उसे अहसास है कि भीड़ से अलग होते ही वह अपने आपको फिर से अकेला और असुरक्षित महसूस करने लगेगा। यह केवल एक मिथ है कि विकास व्यक्ति को सुरक्षा भी प्रदान कर सकता हैै। अगर ऐसा होता तो दुनिया भर में इतनी हिंसा नहीं बढ़ती। जब विकास की गति व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होने लगती है तो इसके कारण पैदा होने वाला सामाजिक घर्षण पहले असुरक्षा को और फिर उससे प्रतिरक्षा के लिए हिंसा को उत्पन्न् करता है।
[dc]इस[/dc] बात की समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक पड़ताल की जा सकती है कि क्या धार्मिक या मजहबी कट्टरवाद के इतनी तेजी के साथ फैलने का कोई संबंध एक राष्ट्रीय नागरिक में व्यक्ति के रूप में अपने अंदर पनप रहे अकेलेपन के भय से है? व्यक्ति को क्या ऐसा लगता है कि एक वृहत् नागरिक समाज के बजाय धर्म की बुनियाद पर की जाने वाली संगठित सौदेबाजी कहीं ज्यादा सुरक्षा प्रदान कर सकती है, चाहे फिर उसके लिए उसे चेहरे पर नकाब ओढ़कर हिंसा का भी सहारा लेना पड़े?
[dc]अपने[/dc] बचपन के दिनों में झांककर देखने पर याद आता है कि पचास-साठ साल पहले भगवान गोगादेव की जयंती पर शहर के अत्यंत ही पिछड़े तबके के लोगों का एक छोटा-सा समूह पारंपरिक रूप से जुलूस बनाकर निकलता था। गिने-चुने लोग ही होते थे उसमें। आज जो जुलूस निकलता है, उसमें सैकड़ों लोग होते हैं और उसमें भी नौजवानों की बड़ी तादाद होती है। यही स्थिति मोहर्रम के अवसर पर होने वाले प्रदर्शनों की है, जिनमें कम उम्र के युवाओं को गर्वपूर्वक अपनी पीठ लहूलुहान करते देखा जाता है। हिंदू समाज से जुड़े संगठनों में युवाओं की बढ़ती भागीदारी और धार्मिक कट्टरता संदेह पैदा करती है कि इस एकजुटता का संबंध सुरक्षा की सामूहिक दीवारें खड़ी करने से भी हो सकता है, इस बात की परवाह किए बगैर कि जातिगत और धार्मिक एकजुटता के कारण हिंसा में इजाफा हो रहा है तथा एक अखंड राष्ट्र के तौर पर हमारी विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है। नागरिकों की एक बड़ी जमात अपने आपको कबीलाई निशानों से दागे जाने पर गौरवान्वित महसूस कर रही है। धार्मिकता को नए तरीके से परिभाषित किए जाने के आंदोलनों और उसके पक्ष में चलने वाले संगठित प्रचार अभियानों को अगर इतना व्यापक समर्थन प्राप्त हो रहा है तो उसके कारणों की भी वैज्ञानिक खोज की जानी चाहिए। क्या यह संभव नहीं कि नागरिकों को उनकी सुरक्षा के संबंध में इस तरह से भयभीत किया जा रहा हो कि वे संगठित रूप से राजनीतिक या धार्मिक सत्ताओं के तीमारदार बन जाएं। और फिर इसी ‘असुरक्षा’ के हथियार का इस्तेमाल महिलाओं की आजादी के खिलाफ फतवे जारी करने में किया जाने लगे। यह काफी खतरनाक और आतंकित करने वाली शुरुआत है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में व्यक्ति राज्य की कानून-व्यवस्था पर से अपना भरोसा उठा रहा है। वह अब अपने जाति संगठनों, धार्मिक और खाप पंचायतों और सांप्रदायिक शक्तियों की शरण ले रहा है। व्यक्ति और व्यक्ति के बीच नजरों के अविश्वास की जो दीवारें खड़ी की जा रही हैं, वह उस हिंसा को जन्म दे रही है, जो विभाजन की सांप्रदायिक हिंसा से काफी अलग है। हिंसा के जिस सांप्रदायिक चेहरे से हमारा गणतंत्र आजादी के बाद से मुखातिब रहा है, वह तात्कालिक परिस्थितियों अथवा परिस्थितिजन्य उकसावों की उपज रही और सड़कों पर पैदा होकर वहीं खत्म भी होती रही। पर यह जो नई हिंसा है, वह सोची-समझी साजिशों के तहत एक ऐसे औजार के रूप में विकसित की जा रही है कि जिसका जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल राजनीतिक सत्ताओं की रक्षा अथवा परिवर्तनों के लिए किया जा सके। ऐसा कोई चुपचाप नहीं हुआ होगा कि भीड़ में व्यक्ति के अकेलेपन के साथ जुड़े सारे संदर्भ बदल दिए जाएं। देखते-देखते भीड़ में अकेलेपन में भी अपने आपको सुरक्षित समझने वाला व्यक्ति अब केवल भीड़ की ही सुरक्षा चाहता है और अपने को अकेला नहीं देखना चाहता। उसे अब भीड़ भी अपनी ही पसंद और विश्वास की चाहिए। एक ऐसा गणतंत्र, जो विकास की नई ऊंचाइयों का स्पर्श करने के लिए बेताब है, ‘सामूहिक’ राजनीतिक नेतृत्व की नई स्थापनाओं के प्रति व्यापक जनसमर्थन की आकांक्षाएं व्यक्त कर रहा है, उसे अपने नागरिक के अकेलेपन और सुरक्षा के प्रति उसकी चिंता को भी विकास के एजेंडे में शामिल करना पड़ेगा। नागरिक को अपनी सुरक्षा को लेकर बढ़ती हिंसा के प्रति संरक्षण विकास के जमीनी ब्लूप्रिंट में मिलना चाहिए, भीड़ की हिंसा में नहीं।

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