लॉबीइंग, पैसे के बदले खबर और समकालीन पत्रकारिता

८ जुलाई २०११

मीडिया के भविष्य की चिंता करने वालों के बीच इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा पेड न्यूज को लेकर है। इसलिए कम आश्चर्यजनक नहीं कि जो मीडिया पेड न्यूज से सबसे ज्यादा प्रभावित है उसी में इस विषय को लेकर सबसे ज्यादा बातचीत भी हो रही है। अखबारों में छपने वाले समाचारों अथवा टीवी चैनलों पर चलाई जाने वाली खबरों के संबंध में बरती जाने वाली ईमानदारी को लेकर इतनी चिंता पहले कभी नहीं दिखाई गई। यह एक अच्छा संकेत भी है और आगे आने वाले खतरों के प्रति मुनादी भी। पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान पैसे लेकर प्रकाशित और प्रसारित की गई खबरों को आधार बनाकर हम मीडिया के भविष्य को सुरक्षित बनाना चाहते हैं ताकि आगे के चुनाव खबरों के प्रकाशन और प्रसारण के लिहाज से ज्यादा ईमानदार नजर आ सकें। पेड न्यूज को लेकर वर्तमान में चल रही बहस उस मुकाम पर पहुंचाई जा रही है जहां फैसले इस बात के होने हैं कि इस बुराई पर काबू पाने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन किए जाएं, कोई नए उपाय ढूंढ़े जाएं या मीडिया संस्थानों को स्वानुशासन लागू करने अथवा अपनी ही आचार संहिता का पालन करने के लिए छुट्टा छोड़ दिया जाए। मीडिया और राजनीति दोनों ही क्षेत्रों में इस तरह की वकालत करने वालों की कमी नहीं है कि पेड न्यूज की बुराई पर रोकथाम के लिए कड़े से कड़े कानूनी प्रावधानों की जरूरत है। हम मीडिया प्रतिष्ठानों को अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की तरह पब्लिक इश्यू जारी कर सम्पत्ति उगाहने और शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव की अंतहीन दौड़ में शामिल होने की इजाजत भी देना चाहते हैं और उनसे उनके ‘उपभोक्ताओं’ के प्रति ईमानदार रहने की उम्मीद भी करना चाहते हैं। राजनीति की मदद अपने व्यावसायिक हितों का विस्तार करते हुए मीडिया प्रतिष्ठान आज इतने आगे बढ़ चुके हैं कि अपने पाठकों के प्रति इस तरह की उदारता की उनसे अपेक्षा ही नहीं की जा सकती।

एक बात तो साफ है कि पेड न्यूज से निपटने का मामला हमारे सोच से ज्यादा पैचीदा है। इस पैचीदगी में यह भी शामिल है कि जो मीडिया राजनेताओं की विज्ञापननुमा जानकारियों को खबरों के रूप में छापकर अपने पाठकों के विश्वास को दाव पर लगाने में भी खौफ नहीं खाता वही मीडिया जब राजनेता पैसा लेकर संसद में सवाल पूछते हैं तो उनके खिलाफ खबरें प्रकाशित करने में भी कोई संकोच नहीं करता। और जब राजनीति करने वालों की एक बड़ी जमात समूची व्यवस्था को ही भ्रष्ट बनाने में जुटी हुई हो मीडिया से उम्मीद करना कोई गलत काम भी नहीं कि कम से कम उसे तो ईमानदार दिखाई देते रहना चाहिए। अपेक्षा यह है कि जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि चाहे तो अपने मतदाताओं के प्रति बेईमान हो जाने का अधिकार रख सकता है, मीडिया को तो भ्रष्ट होने से बचाने के तमाम प्रयास किए जाना चाहिए। पर आज जो खतरा मीडिया पर या मीडिया में दिखाई दे रहा है वह पेड न्यूज की चिंता से कहीं ज्यादा बड़ा है। कई बार यह डर भी लगता है कि पाठकों और दर्शकों का ध्यान पेड न्यूज की बहस पर इतना ज्यादा केन्द्रित हो रहा है कि किसी और बड़ी मुसीबत की तरफ से हमारा ध्यान हट रहा है। विचारवान लोगों का ध्यान इस सवाल की ओर आकर्षित किया जा सकता है कि देश को अगर फिर से किसी आपातकाल का सामना करना पड़ जाए तो उसके प्रतिरोाध में आज के मीडिया की भूमिका क्या होगी? हम अभी इस सवाल पर चर्चा नहीं कर रहे हैं कि मौजूदा विपक्ष और मौजूदा जनता की भूमिका क्या होगी। दोनों के बारे में अलग से और विस्तार से बहस की जा सकती है। सवाल हायपोथेटिकल है, पर जरूरी नहीं कि आपातकाल से मीडिया का सामना उसकी उसी शकल में हो जो आज से पैंतीस साल पहले उस पीढ़ी से मुखातिब थी जिसके मीडिया में अब केवल अवशेष ही बचे हैं। उस समय जब लगभग समूचा विपक्ष जेल में बंद था, आपातकाल से मुकाबला मीडिया का केवल धारदार तबका ही कर रहा था। मीडिया का एक प्रभावशाली वर्ग तो घुटनों के बल बैठने की मांग करने पर रैंगने को बेताब था। वे वामपंथी जो आज पेड न्यूज के खिलाफ कानून की मांग कर रहे हैं, तब मीडिया पर सेंसरशिप से सबसे ज्यादा प्रसन्न थे। जरा तलाश की जाए कि कितने रामनाथ गोयनका और राजेन्द्र माथुर इस समय देश में उपस्थित हैं। पर जो सच्चाई है व इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली है। वह यह कि बिना किसी आपातकाल के ही मीडिया के एक बड़े वर्ग ने आज अपने आपको इतने स्वानुशासन में ढाल लिया है कि केंद्र या राज्यों में व्यवस्था के खिलाफ किसी भी तरह की अभिव्यक्ति के लिए च्स्पेसज् की गुंजाइश ही नहीं बची है। पेड न्यूज को लेकर चिंता इस सच्चाई की उपज भी है कि चुनावों के दौरान पैसे लेकर कुछ उम्मीदवारों के पक्ष में खबरें प्रकाशित करने से योग्य व ईमानदार लोग संसद या विधानसभाओं में पहुंचने से वंचित रह जाते हैं। यह कृत्य न सिर्फ जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन है बल्कि अन्य कानूनों जैसे कंपनी और आयकर अधिनियम, आदि का भी मजाक उड़ाता है। इसमें इस संभावना को भी जोड़ा जा सकता है कि पेड न्यूज पर प्रतिबंध लग जाने के बाद सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेने वाले, सांसद निधि में भ्रष्टाचार करने वाले तथा कबूतरबाजी करने वाले लोग विधयिकाओं में चुनकर नहीं जा सकेंगे। पर जो बड़ी चिंता बहस का विषय हो सकती है वह यह कि चुनावों के अलावा साल के तीन सौ पैंसठ दिनों जो कुछ भी छप रहा या दिखाया जा रहा है उसमें ऐसा कितना है जो भरोसा करने के काबिल है, जिसमें पाठकों और दर्शकों के साथ धोखाधड़ी की गुंजाइश नहीं है, जिसे इस राजनेता या उस राजनेता, धर्मगुरु, कार्पोरेट हाउस या माफिया के दबाव में न तो छापा और दिखाया गया है और न ही छपने या दिखाए जाने से रोका गया है। अधिकांश लोगों को कभी पता ही नहीं चल पाता कि कौन किसके लिए क्या काम या लॉबिंग कर रहा है। अत: इस पर भी चर्चा होना जरूरी है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि एक डरे हुए मीडिया ने आपातकालीन व्यवस्थाओं को अपना स्वभाव ही बना लिया है और ‘पेड न्यूज’ के मुद्दे का अपने बचाव में एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।