लालू जेल में, कांग्रेस की रिहाई

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के जरिए सत्ता में पहुंचने के बाद भ्रष्टाचार का ही एक आरोपी बनकर जेल की यात्रा करने में लालू प्रसाद यादव ने कोई चालीस साल का वक्त लिया। वर्ष 1974 में राहुल गांधी कोई चार साल के रहे होंगे। तब पच्चीस साल के लालू यादव ने उनकी दादी और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में मोर्चा खोल रखा था। बिहार छात्र संघर्ष समिति के नेता के रूप में लालू ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के खिलाफ लड़ाई को माध्यम बनाकर अपनी कथित ‘ईमानदारी’ की लड़ाई की शुरुआत की थी। वर्ष 1974 का बिहार का संघर्ष ही बाद में दिल्ली पहुंचकर ‘इंदिरा हटाओ’ में तब्दील हो गया। तब जयप्रकाश नारायण द्वारा इंदिरा गांधी के शासन को भ्रष्टाचार की गंगोत्री निरूपित किया गया था। सुशील कुमार मोदी, राम विलास पासवान, नीतीश कुमार, रघुवंश प्रसाद और न जाने कौन-कौन, सभी नेता इसी जेपी आंदोलन की उपज थे और एक साथ मैदान में भी थे। बाद की कहानी सबको मालूम है कि कैसे आपातकाल लगा और वर्ष 1977 में चुनाव हुए तो जनता पार्टी के बैनर तले ‘बिजली के खंभे’ भी जीतकर संसद में पहुंच गए। इन खंभों की ही रोशनी का कमाल रहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करने वाले ही बाद में भ्रष्टाचार के अखिल भारतीय स्तूप बनकर उभरे। इतने बड़े स्तूप कि डॉ. मनमोहन सिंह को उनकी सदस्यता बचाने के लिए अपनी समूची प्रतिष्ठा ही दांव पर लगानी पड़ी। लालू ने चीजों को समझने में यहीं भूल कर दी कि सरकार अब मनमोहन सिंह नहीं बल्कि राहुल गांधी चला रहे हैं, जो कि चार साल के नहीं रहे बल्कि चवालीस के होने जा रहे हैं। और यह भी कि जब तक लालू जेल से बाहर आने की तैयारी करेंगे वे सत्तर के ऊपर और राहुल पचास के होने लगेंगे। इतना ही नहीं, 2014 के चुनावों के बाद लोकसभा में वे तमाम चेहरे गायब दिखेंगे जिन्हें लालू सदन के अंदर और बाहर गरियाते रहे हैं।

राजनीति में पांच साल का वक्त काफी लंबा होता है। जेल में वक्त बिताते हुए हो सकता है कि लालू को 2019 के चुनावों की तैयारी में जुटना पड़े। यह बात अलग है कि सीबीआई कोर्ट के फैसले के खिलाफ ऊंची अदालत में अपील करके कोई रियायत पाने में लालू सफल हो जाएं, पर उसकी संभावना फिलहाल कम ही दिखती है। सही पूछा जाए तो चारा घोटाले में देश को हुए नुकसान की भरपाई प्रधानमंत्री ने अपने व्यक्तिगत स्वाभिमान के साथ समझौता करके की है, जो कि देश के हित में ही हुआ है। पर पूरे प्रकरण ने कांग्रेस को ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया है जहां से पीछे मुड़कर देखना अब उसके लिए संभव नहीं होगा। जो लोग बिहार को समझते हैं उन्हें पता है कि लालू में इतनी ताकत है कि जेल के भीतर रहते हुए भी वे अपने कद को और बड़ा कर सकते हैं। लालू को जेल जाते रहना वैसे अच्छा भी लगता है। बिहार आंदोलन के दौरान जब भी सड़कों पर पुलिस की लाठियां खाने का मौका आता था, लालू किसी न किसी बहाने से अपनी गिरफ्तारी देकर पटना की फुलवारी शरीफ जेल में भर्ती हो जाते थे। अत: ऐसा निष्कर्ष निकालने में भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए कि लालू के राजनीतिक भविष्य का अब अंत हो गया है और कि संसद और विधानसभाओं में अब अपराधी प्रवृत्ति के प्रतिनिधियों का टोटा पड़ने वाला है। पर हाल- फिलहाल के लिए इतना भर यकीन तो अवश्य ही किया जा सकता है कि लालू के जेल जाने के बाद राहुल गांधी की जमानत पर कांग्रेस पार्टी ‘छोटे-छोटे समझौतों’ की जेल से रिहा हो गई है।