री-इन्वेंटिंग रीजनल जर्नलिज्म

६ अगस्त २०११

झारखंड के युवा कवि अनुज लुगुन की जिस कविता ‘अघोषित उलगुलान’ को इस बार समकालीन युवा कविता का सर्वाधिक प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त हुआ है उसकी अंतिम आठ पंक्तियां इस प्रकार हैं: लड़ रहे हैं आदिवासी/अघोषित उलगुलान में/कट रहे हैं वृक्ष/माफियाओं की कुल्हाड़ी से और/बढ़ रहे हैं कंक्रीटों के जंगल/दान्डू जाए तो कहां जाए/कटते जंगल में/या बढ़ते जंगल में!

क्षेत्रीय पत्रकारिता या रीजनल जर्नलिज्म के सामने आज जो परेशानी है वह दान्डू आदिवासी के संकट से अलग नहीं है। बहस का मुद्दा क्षेत्रीय पत्रकारिता को री-इन्वेंट करने का नहीं बल्कि उसे उसकी मूल आत्मा के साथ पुनर्जीवित करने, पोषित करने और संरक्षित करने का है। निश्चित ही यह एक बहुत ही बड़ा और चुनौतीपूर्ण काम है। क्योंकि रीजनल जर्नलिज्म भी महानगरीय पत्रकारिता की चकाचौंध (जैसे कि विशालकाय मशीनों, रंगीन छपाई, चिकने कागज, बहुरंगी साप्ताहिक परिशिष्टों, अत्याधुनिक तकनीकी सुविधाओं वाले कार्यालयों) का अवतार बनकर बाजार की पूंजी पर एकाधिकार कायम करने की गलाकाट प्रतियोगिता में गुम होना चाह रही है। और ऐसे में असली खबर अखबार के पन्नों से या तो पूरी तरह गायब हो रही है या उसे इतने बदले हुए स्वरूप में प्रस्तुत किया जा रहा है कि पाठक भयभीत भी हो रहा है और आश्चर्यचकित भी। रीजनल जर्नलिज्म को पुनर्जीवित करने अथवा री-इन्वेंट करने का सोच और समूची कसरत इस संकल्प के साथ जुड़ी है कि छपने वाले शब्द के प्रति पाठकों के साथ होने वाली धोखाधड़ी कैसे बंद हो। पत्रकारिता में बरती जाने वाली ईमानदारी और विश्वसनीयता समाज के स्तर पर यकीन में कैसे बदले। अखबार आम आदमी की जिंदगी को कैसे पॉजीटिव और सकारात्मक बना सके कि उसमें जीवन को जीने के प्रति उम्मीदें जगे और साथ ही यह कैसे स्थापित हो कि समूची व्यवस्था के खिलाफ निहित स्वार्थों और राजनीति का जो मिलाजुला षड्यंत्र आज चल रहा है उसमें अखबार का संपादक और पत्रकार शामिल नहीं है। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा बहस के लिए यह भी है कि कथित राष्ट्रीय पत्रकारिता में ऐसा क्या कुछ राष्ट्रीय बचा हुआ है जो क्षेत्रीय पत्रकारिता को उससे अलग साबित करने के लिए पर्याप्त हो। क्या राष्ट्रीय पत्रकारिता में अब ऐसा क्या कुछ भी गर्व करने लायक है और जो उसे रीजनल पत्रकारिता से दो सीढिय़ां ऊपर स्थान देने की सामथ्र्य रखता हो? सच्चाई यह है कि राष्ट्रीय सम्मान, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय पशु-पक्षियों, आदि को छोडक़र देश में अब सब कुछ रीजनल होता जा रहा है। किसी जमाने में कांग्रेस नामक राजनीतिक दल पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक एक राष्ट्रीय सहमति (नेशनल कंसेंसस) के रूप में जाना जाता था। क्या आज ऐसी कोई स्थिति बची है? कितने राज्यों में आज कांग्रेस सत्ता में बची है और कितनों में क्षेत्रीय पार्टियां राज कर रही हैं? भारतीय प्रजातंत्र आज हर क्षेत्र में प्रांतीय या क्षेत्रीय हो चुका है? क्षेत्रीय दलों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं, क्षेत्रीय भाषाओं, क्षेत्रीय मांगों यानी कि हर चीज क्षेत्रीय होती जा रही है। कल अगर कोई मायावती, नीतीश कुमार, जयललिता, नवीन पटनायक या ममता बनर्जी केंद्र में सरकार बना ले तो क्या कहेंगे कि बसपा, जदयू, अन्नाद्रमुक, बीजद और तृणमूल क्षेत्रीय हैं और ये तमाम लोग राष्ट्रीय नेता नहीं हैं। स्वीकार करना होगा कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अथवा नेशनल और रीजनल जैसा अब कुछ बचा नहीं है। अगर कुछ री-इन्वेंट करना है तो वह समूची पत्रकारिता को करना है, केवल रीजनल जर्नलिज्म को नहीं।

और फिर इस हकीकत से पिण्ड कैसे छूटेगा कि देश के दस शीर्ष समाचार पत्रों में नौ वे हैं जिन्हें रीजनल या क्षेत्रीय करार दिया जाता है। इनमें भी पांच हिंदी के, दो मलयालम के, एक तमिल व एक मराठी का है। सातवें-आठवें क्रम पर केवल एक अखबार अंंग्रेजी का है। ये सभी नौ समाचार पत्र भाषायी इलाकों में शीर्ष पर हैं। पर अंग्रेजी की पत्रकारिता और मानसिकता में ये राष्ट्रीय नहीं माने जाएंगे। राष्ट्रीय राजनीतिक दल अगर प्रचलित मान्यताओं से ही परिभाषित किए जाते रहेंगे तो पूछना पड़ेगा कि बसपा, अन्नाद्रमुक, जद(यू), तृणमूल, झारखंड मुक्ति मोर्चा, बीजद, तेलुगू देसम, तेलंगाना विकास पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस आदि का वजूद किस तरह स्थापित माना जाएगा। इस मुद्दे पर अलग से बहस करनी पड़ेगी कि जैसे-जैसे क्षेत्रीय पार्टियां और क्षेत्रीय आकांक्षाएं ताकतवर होती जा रही हैं, राजनीति में हिंसा, सौदेबाजी और अपराधीकरण भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है। और इसका प्रभाव उस पत्रकारिता पर भी तेजी से बढ़ रहा है जिसे हम री-इन्वेंट करना चाहते हैं। जिस पत्रकारिता को हम रीजनल के नाम से परिभाषित या स्थापित करना चाहते हैं वह किसी कथित राष्ट्रीय पत्रकारिता का विकेंद्रित स्वरूप नहीं है। यह स्थिति केवल प्रिंट मीडिया में ही हो ऐसा नहीं है। रीजनल जर्नलिज्म को अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक फैला दें तो जवाब ढूंढऩा पड़ेगा कि ई-टीवी, जया, टीवी-9, साक्षी, कैरली आदि, चैनलों की कथित राष्ट्रीय चैनलों के मुकाबले उसी तरह बेहतर स्थिति है जैसी कि दिल्ली के ‘राष्ट्रीय’ अखबारों के मुकाबले रीजनल माने जाने वाले दैनिकों की। रीजनल चैनलों के लिए कोई दो सौ लाइसेंस हैं और कथित राष्ट्रीय चैनल्स भी अब क्षेत्रीय भाषाओं मेें उतरते जा रहे हैं। इसे उनकी व्यावसायिक मजबूरी भी माना जा सकता है और देश की वास्तविकता के साथ साक्षात्कार भी।

देश की कुल आबादी का लगभग आधा हिंदी भाषी बताया जाता है और उसका भी आधा यानी कोई पच्चीस करोड़ हिंदी पढऩा भी जानते हैं। वर्तमान में हिंदी दैनिकों की कुल प्रसार संख्या छह करोड़ (एवरेज इस्यू रीडरशिप के मुताबिक) बताई जाती है जो कि बारह वर्ष से ऊपर की 87.14 प्रतिशत आबादी का 7 प्रतिशत है। देश के ग्यारह प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों में जनसंख्या के मान से प्रिंट मीडिया की पैठ ढूंढ़ें तो सर्वाधिक 38 प्रतिशत राजस्थान में है। सबसे कम पैठ के चार राज्य – मध्य प्रदेश (१६ प्रतिशत), बिहार (18 प्रतिशत) और झारखंड तथा उ.प्र. (20 प्रतिशत) हैं। अत: कहा जा सकता है कि हिंदी या भाषायी पत्रकारिता की विकास यात्रा का असली दौर तो अब शुरू हुआ है। जिस तरह से साक्षरता का प्रतिशत देश में बढ़ रहा है और उसके साथ-साथ सूचनाओं तथा ज्ञान का विस्फोट हो रहा है, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ही वर्चस्व में वृद्धि हो रही है। आर्थिक विकेंद्रीकरण और ग्रामीण भारत इस समय कार्पोरेट बाजार की आकांक्षाओं और सत्ता के आकांक्षाधारियों के निशाने पर है। सत्तर करोड़ लोगों के हाथों में मोबाइल सेट पहुंच चुके हैं। कोई पन्द्रह करोड़ लोग मोबाइल पर इंटरनेट की सुविधा का लाभ ले रहे हैं। हिंदी भाषी राज्यों में लोकसभा की सीटें कुल स्थानों (543) की लगभग आधी हैं। दोहराया जा रहा है कि भारत महानगरों से निकलकर उन छोटे-छोटे शहरों और गांवों की तरफ दौड़ लगा रहा है जहां कि विकास की नई इबारतें लिखी जानी हैं। पर क्या बदलते हुए भारत का रीजनल मीडिया वैसा ही बना रहेगा जैसा कि आज है? क्या भारत तो बदलेगा पर पत्रकारिता की लीडरशिप जस की तस बनी रहेगी? वैसी ही परंपरागत। रीजनल जर्नलिज्म को री-इन्वेंट करने की पहली शर्त यही बनने वाली है कि खबर ज्यादा महत्वपूर्ण है प्रसारसंख्या के मुकाबले। संख्या पाठकों की बढऩी चाहिए, अखबारी कागज की नहीं। पाठकों के विश्वास को अब केवल आपसी संघर्षों, फिल्मी ड्रामा और मनगढ़ंत अपराध कथाओं के भरोसे ही नहीं जीता जा सकेगा। पाठकों को उनकी दिक्कतों, चिंताओं के हल चाहिए और ईमानदारी से व्यक्त भरोसा करने लायक ऐसी सच्ची खबरें चाहिए जो उन्हें बहादुरी से संघर्ष करते हुए जिंदा रहने की तकनीकें सिखा सके। पर जिस तरह का मीडिया स्वामित्व देश में पनप रहा है। जिस तरह से राजनीतिक स्वामित्व मीडिया में बढ़ रहा है। जिस तरह से बाजार और बाजारी ताकतें मीडिया पर हावी हो रही हैं और खबरों के नाम पर अखबार की खाली जगह का वे उपयोग तय कर रही हैं, मुश्किल लगता है कि आने वाले वक्त में पत्रकारों के लिए ज्यादा कुछ करने को बचा रहेगा।

अनुज लुगुन की कविता के अंश से ही अगर अंत करना चाहें तो : ‘बोलते हैं बोलने वाले/केवल सियासत की गलियों में/आरक्षण के नाम पर/बोलते हैं लोग केवल/उनके धर्मांतरण पर/चिंता है उन्हें/उनके ‘हिन्दू’ या ‘ईसाई’ हो जाने की/यह चिंता नहीं कि/रोज कंक्रीट के ओखल में/पिसते हैं उनके तलवे/और लोहे की ढेंकी में कुटती है उनकी आत्मा/बोलते हैं लोग केवल बोलने के लिए।’