राहुल ने तो ‘मन’ का फैसला सुना दिया है!

डॉ. मनमोहन सिंह अगर पद से त्यागपत्र देने के लिए अपनी ही पार्टी के जिम्मेदार नेतृत्व द्वारा सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किए जाने के किसी मौके की अब तक प्रतीक्षा कर रहे थे, तो वह क्षण भी आ पहुंचा है। डॉ. सिंह को विदेश यात्रा से लौटते ही अपने समूचे मंत्रिमंडल के साथ इस्तीफा दे देना चाहिए। उनके इस एक कदम के साथ ही यह घोषणा भी हो जाएगी कि राहुल गांधी लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बना दिए गए हैं। राहुल गांधी ने डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ अपनी एक अप्रत्याशित ‘बगावत’ से पार्टी में चल रही इस बहस को दफना दिया है कि कांग्रेस में सत्ता के दो (या तीन) केंद्र हैं। यानी कि अब केवल एक केंद्र ही बचा है जिसके कि केंद्र में राहुल गांधी हैं। राहुल गांधी ने इतना साहस अर्जित कर लिया है कि वे अपने ही प्रधानमंत्री की महत्वपूर्ण विदेश यात्रा के दौरान मंत्रिमंडल द्वारा सर्वसम्मति से मंजूर होकर राष्ट्रपति को स्वीकृति के लिए प्रेषित जन-प्रतिनिधित्व कानून (संशोधन एवं विधिमान्यकरण) अध्यादेश-2013 को बकवास बताते हुए फाड़कर फेंकना चाहते हैं। मान लिया जाना चाहिए कि लोकसभा चुनावों का सामना करने से पहले ही कांग्रेस पार्टी का ‘नर्वस ब्रेकडाउन’ हो गया है और वह गहरे ‘अवसाद’ में डूब गई है। राहुल गांधी अगर ईमानदारी के साथ ऐसा मानते हैं कि भ्रष्टाचार से मुकाबला करना हो तो राजनीतिक हितों के लिए छोटे-छोटे समझौते करने का सिलसिला अब बंद होना चाहिए तो उन्होंने 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले का सार्वजनिक रूप से स्वागत क्यों नहीं किया जिसमें जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को रद्द करते हुए सजायाफ्ता सांसदों/विधायकों की सदस्यता समाप्त होने का प्रावधान किया गया था? राहुल गांधी और उनकी ब्रिगेड ने उस सर्वदलीय पहल का विरोध क्यों नहीं किया जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बेअसर करने के लिए संसद के मानसून सत्र में जन-प्रतिनिधित्व कानून (द्वितीय संशोधन) विधेयक-2013 पेश किया गया था? पूरे देश को पता है कि सरकार के सारे फैसले किन ठिकानों से लिए जाते हैं और उनमें राहुल गांधी की सहमति होती है या नहीं। मनमोहन सिंह सरकार जब सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने के साथ-साथ अध्यादेश लाने की भी तैयारी कर रही थी तब राहुल गांधी ने अपनी मंशा से प्रधानमंत्री को क्यों नहीं अवगत कराया? विरोध क्यों नहीं जताया? क्या इसके लिए वे प्रधानमंत्री के विदेश यात्रा पर रवाना होने की प्रतीक्षा कर रहे थे?

राहुल गांधी द्वारा नई दिल्ली में किए गए इस अप्रत्याशित ‘विस्फोट’ में कांग्रेस की भावी रणनीति भी नजर आती है और साथ ही उसकी यह कोशिश भी कि राजनीति में शुचिता लाने के नाम पर देश की जनता को आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है। मुद्दा यह है कि प्रधानमंत्री पद के ‘उम्मीदवार’ राहुल गांधी को जनता का यह मूड समझने में इतनी देर क्यों लगी कि देश अब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है? लोकसभा चुनावों की लड़ाई खाद्य सुरक्षा, सूचना और शिक्षा के अधिकार और भूमि अधिग्रहण कानून जैसी ‘उपलब्धियों’ के मुद्दों पर नहीं बल्कि महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकारी ‘हिरासत’ से गुम होने वाली फाइलों पर लड़ी जानी है। नरेंद्र मोदी अपनी सभाओं में आर्थिक और विदेश नीतियों की उबाऊ बातें नहीं कर रहे हैं। उनका एक ही नारा है ‘कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ’। राहुल गांधी जिस अध्यादेश को ‘बकवास’ बताकर उसे फाड़ फेंकने की बात कर रहे हैं वह वास्तव में उनके द्वारा अपनी ही सरकार को बर्खास्त करने की मांग करने जैसा है। भारतीय जनता पार्टी को भी यह ज्ञान देर से प्राप्त हुआ कि सजायाफ्ता नेताओं को संरक्षण देने की कोशिशों में कांग्रेस का साथ देना उसे भारी पड़ सकता है। उससे बिहार में नीतीश कुमार को कम, पर देश भर में भाजपा को ज्यादा नुकसान पहुंच जाएगा। राहुल गांधी जब ड्रामाई अंदाज में दिल्ली के प्रेस क्लब पहुंचकर अध्यादेश को ‘बकवास’ बता रहे थे, तब अमेरिका में रात थी और प्रधानमंत्री वाशिंगटन स्थित पांच सितारा होटल के आलीशान कमरे में सोए हुए थे। डॉ. मनमोहन सिंह को सुबह तैयार होकर अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने के लिए जाना था। कांग्रेस में जैसी कि चापलूसी करने की आदत है, कोई आश्चर्य नहीं कि वे तमाम मंत्री और नेता जो अब तक अध्यादेश का बचाव कर रहे थे, राहुल की जय-जयकार में जुट जाएं और यह काम शुरू हो भी गया है। देखना केवल यह बचा है कि प्रधानमंत्री दिल्ली पहुंचकर क्या फैसला करते हैं।