राष्ट्रीय संकट और राग दरबारी

१३ जनवरी २०११

जिस तरह की अस्थिरता का माहौल इस समय देश में व्याप्त है, पहले कभी नहीं रहा। देश एक अहिंसक अराजकता के दौर में प्रवेश करने की तैयारी करता दीख रहा है। संसद का समूचा सत्र विपक्ष की इस मांग और सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा उसे किसी भी कीमत पर नहीं स्वीकार करने की भेंट चढ़ चुका है कि दूरसंचार घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाए। दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जिद पर इस हद तक अड़े हुए हैं कि आगामी बजट सत्र का क्या हश्र होगा कुछ कहा नहीं जा सकता। विपक्ष निश्चित ही इसका ठीकरा सत्तारूढ़ गठबंधन पर और यूपीए उसे भाजपा, उसके सहयोगी दलों तथा वामपंथियों के सिर पर फोड़ेगा। ऐसा तो पहले भी हुआ है कि देश में गहरा राजनीतिक संकट उत्पन्न हो गया हो या फिर राष्ट्र को किसी आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ गया हो। 1974 के बिहार आंदोलन और फिर 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसले के बाद उत्पन्न हुआ राजनीतिक संकट और उसके कोई डेढ़ दशक बाद चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में विदेशी मुद्रा की स्थिति को लेकर उत्पन्न हुई आर्थिक परिस्थितियां उदाहरण के तौर पर गिनाए जा सकते हैं। दोनों ही तरह की परिस्थितियों का देश ने सामना भी किया और उसमें से सफलतापूर्वक बाहर भी आया। उसका बुनियादी कारण यही रहा कि तब आम आदमी देश की चिंताओं को अपनी चिंता मानता था। वर्तमान की इस खतरनाक स्थिति की ओर किसी का ध्यान नहीं है कि संसद के अस्तित्व में होने या नहीं होने के प्रति जनता को संवेदनाशून्य बनाया जा रहा है। जनता को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक व प्रतिनिधि संस्था इस तरह से ठप पड़ी है कि जैसे उसकी जरूरत ही खत्म हो गई है या कि उसके बिना भी काम चल सकता है। कल को विधानसभाओं और स्थानीय निकायों को लेकर भी ऐसी ही स्थितियां बन सकती हैं। लड़ाई इस तरह की छिड़ी है कि संवैधानिक संस्थाओं की शामत बन आई है, उनकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, उनसे संबद्ध लोगों के चाल-चलन और प्रतिबद्धताओं को संदेह के घेरे में लाया जा रहा है और किसी भी स्तर पर विरोध या चिंता के स्वर प्रकट नहीं हो रहे हैं। सलाहकारों और दरबारियों की जमात निर्वस्त्र राजा के भी शानदार परिधानों से सुसज्जित होने का दावा करने में जुटी है और प्रजा को महंगाई और भ्रष्टाचार की ठंड में ठिठुरने के लिए सडक़ों पर ठेला जा रहा है। संवैधानिक संस्थाओं की वैधता को सार्वजनिक रूप से चुनौती देने और उनके निर्णयों को कठघरों में खड़ा कर उन्हें शर्मिंदा करने के सिलसिले को रोका जाना इसलिए जरूरी है कि बारह से बीस रुपए के बीच की आमदनी पर बसर करने वाली देश की कोई चालीस करोड़ जनता के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंचने के वैधानिक रास्ते ये ही हैं। बिनायक सेन मामले में रायपुर (छत्तीसगढ़) की जिला अदालत द्वारा दिए गए फैसले को लेकर जिस तरह की नाराजगी, आलोचना और गुस्से का प्रदर्शन किया जा रहा है वह लगभग उसी तरह का है जैसा कि शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के बाद संबंधित न्यायाधीशों के खिलाफ आक्रोश सडक़ों पर व्यक्त हुआ था। ‘धार्मिक कट्टरवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष कट्टरवाद’ में शायद कोई फर्क नहीं रह गया है। तथाकथित ‘सेकुलरिज्म’ भी एक तरह के ‘कट्टरवाद’ में तब्दील होकर संवैधानिक संस्थाओं को उसी तरह से जलील और अपमानित करने में जुट जाना चाहता है जैसा कि धार्मिक कट्टरवादी करते हैं। बोफोर्स तोपों की खरीद में दी गई कथित दलाली को लेकर आयकर अपीलीय अधिकरण की व्यवस्था पर जिस आशय की शंकाएं राजनीतिक स्तरों पर व्यक्त की गईं और उसके निर्णय को संदेहों के घेरे में लाया गया है, व्यवस्था के खंभों को कमजोर करने की दिशा में यह एक और कदम है। 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट को लेकर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के नेतृत्व में कांग्रेस ने जो आक्रामक रवैया अपनाया है वह और भी हैरान करने वाला है। समझ से बाहर है कि कौन किसे बचाना चाहता है और कि असली अपराधी कौन है! नीरा राडिया का प्रकरण अब कहां है, कौन बताएगा? बातचीत के पांच हजार आठ सौ टेप्स में से केवल कुछ चुने हुए ही क्यों जाहिर हुए? बाकी का क्या हुआ? किससे पूछा जाए? कैग की ’77 पृष्ठों’ की रिपोर्ट संसद में 16 नवंबर को संसद के पटल पर रखी गई थी। (सरकार को तो रिपोर्ट 10 नवंबर को ही सौंप दी गई थी)। बताने की जरूरत नहीं कि रिपोर्ट में स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए के नुकसान की बात कही गई थी। पूरे घोटाले में ए. राजा की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए थे। यही वह समय था जब देश राडिया टेप्स की गिरफ्त में था और नीरा राडिया, ए. राजा तथा मीडिया से संबद्ध बड़े-बड़े नामों की भूमिका को लेकर बहसें चल रही थीं और लानतें भेजी जा रही थीं। रिपोर्ट पेश होने के लगभग दो महीने बाद दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कैग के उन तमाम निष्कर्षों को निराधार, गलतियों से भरा एवं महज अनुमानों के आधार पर गढ़ा हुआ बता दिया जिनका जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने व्यक्तिगत तौर पर संसद की लोकलेखा समिति के समक्ष प्रस्तुत होने का प्रस्ताव किया था। श्री सिब्बल का दावा है कि सरकारी खजाने को वास्तविकता में कोई घाटा नहीं हुआ। एक ऐसी संवैधानिक संस्था जिसकी रिपोर्ट्स की वैधता और विश्वसनीयता को लेकर अतीत में कभी संदेह नहीं व्यक्त किए गए, उसे एक झटके में केवल इसलिए दांव पर लगा दिया गया कि इस समय प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत निष्ठा और सरकार का अस्तित्व दांव पर लगा है। पूछा जाना चाहिए कि अगर कोई घोटाला हुआ ही नहीं है तो क्यों ए. राजा को त्यागपत्र देना पड़ा, क्यों उनके ठिकानों पर छापे पडऩे चाहिए थे और क्यों प्रधानमंत्री को लोकलेखा समिति के समक्ष पेश होने का प्रस्ताव करना चाहिए। और अगर कैग की रिपोर्ट का कोई मतलब ही नहीं है तो फिर पूरे मामले की जांच क्यों तो लोक लेखा समिति को करनी चाहिए और क्योंकर संयुक्त संसदीय समिति गठित की जानी चाहिए। सरकार इस समय बदहवासी की स्थिति में नजर आती है क्योंकि उसे एक साथ कई मोर्चों पर न सिर्फ एक साथ लड़ाई लडऩी पड़ रही है बल्कि उसके सैनिक भी वैचारिक रूप से विभाजित और अलग-अलग उद्देश्यों के लिए भटकते नजर आ रहे हैं। जनता भौचक्की है कि उसे क्या करना चाहिए। कोई सांत्वना देने वाला नहीं। संवैधानिक संस्थाओं की साख को कमजोर करने वाले कार्यक्रमों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालकृष्णन के परिजनों से संंबंधित आरोपों और मुख्य सतर्कता आयुक्त पी.जे. थॉमस से जुड़े विवादों पर अलग से चर्चा की जा सकती है। वर्ष 2010 की विशेषताओं के बारे में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर साल सबसे ज्यादा निराशाजनक ढंग से खत्म हुआ ही है पर 2011 की शुरुआत भी कोई आशाजनक तरीके से नहीं हुई है।