राष्ट्रीय शोक और सामूहिक संकल्प का क्षण

ह देश के भीतर से ही देश की आजादी पर किया गया एक ऐसा हमला है जो एक ताकतवर राष्ट्र के रूप में हमारे बने रहने के दावे को झुठलाने के लिए पर्याप्त है। चुनावों की पूर्व संध्या पर अगर लाशों पर राजनीति करने की हरकतों से बचा जा सके तो इस नक्सली हमले को सभी राजनीतिक दल एक राष्ट्रीय अपमान के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ या देश के दूसरे राज्यों में नक्सली समस्या कितनी खतरनाक समस्या का रूप ले चुकी है उसकी जानकारी जनता पर हुकूमत करने वाले आकाओं और उनके खुफिया तंत्र को नहीं होना हमले की घटना से ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और खौफ पैदा करने वाला है। वे दिन अभी ज्यादा पीछे नहीं छूटे हैं जब पी चिदम्बरम देश के गृहमंत्री थे और नक्सली समस्या के साथ प्रभावकारी तरीके से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार की सार्वजनिक रूप से तारीफ करते थे। पर राजनीति ने हालात रातों-रात बदल दिए हैं। केंद्र सरकार मुगालते में जी रही है कि देश की सुरक्षा को खतरा सीमाओं के पार से है। अपनी आंतरिक अक्षमताओं पर परदा पड़ा रहने देने के लिए सभी सरकारें इसी तरह की बेइमानियां लगातार गढ़ती रहती हैं। देश के कम से कम आठ राज्यों के सौ से अधिक जिलों और उनमें रहने वाली करोड़ों की आबादी आज नक्सली उग्रवाद की चपेट में है। सैकड़ों सुरक्षाकर्मियों और निर्दोष लोगों की आए दिन हत्याएं होती रहती हैं। नागरिकों और अधिकारियों के अपहरण हो जाते हैं। उन्हें छुड़ाने के लिए या तो फिरौती दी जाती है या फिर जेलों में बंद उग्रवादियों को छोड़ा जाता है। यह खेल बरसों से चल रहा है। छत्तीसगढ़ में ही कुछ समय पूर्व सुकमा के कलेक्टर की नक्सलियों के हाथों रिहाई को लेकर चले ड्रामे की स्क्रिप्ट बहुत पुरानी नहीं पड़ी है। वे तमाम नेता जो शनिवार को जगदलपुर के निकट दरभा में हुई वारदात को लेकर अब अपने छाती-माथे कूट रहे हैं वे ही समूची समस्या को नक्सली क्षेत्रों को विकास का पर्याप्त लाभ न मिल पाने का कारण बताकर निर्ममतापूर्वक खारिज करते रहे हैं। बंगाल से प्रारम्भ हुई नक्सली यात्रा ने एक-एक कर बिहार, झारखंड, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के इलाकों को अपनी गिरफ्त में ले लिया और हमारी हुकूमतें सोती रहीं। गौर किया जाए कि नक्सल-प्रभावित अधिकांश राज्यों में देश के सर्वाधिक प्राकृतिक संसाधन और खनिज सम्पदा मौजूद है। मजा यह है कि प्राकृतिक संसाधनों का भी बेरोकटोक शोषण हो रहा है और नागरिकों का भी। चुनावों के ढोल-नगाड़ों के साथ ही ‘परिवर्तन और ‘विकास यात्राएं शुरू हो जाती हैं जो सरकारों के बनने-बिगड़ने के साथ ही पांच सालों के लिए ठंडी पड़ जाती हैं। राजनीतिक दल जिसे ‘परिवर्तन और ‘विकास मानते हैं वह नक्सलियों की परिभाषा में फिट नहीं बैठता। यह सवाल हो सकता है कि अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की जान की कीमत पर कांग्रेस को किसने सलाह दी थी कि वह इतने संवेदनशील इलाके में परिवर्तन यात्रा करे! खासकर उस स्थिति में जब महेंद्र कर्मा और उनके परिजनों को पहले भी निशाना बनाया जा चुका था। अगर कांग्रेस की यात्रा के साथ राज्य सरकार ने पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम नहीं कराए थे, और यह भी सही है कि पर्याप्त सुरक्षा इंताम नहीं थे, तो फिर उस यात्रा को जारी क्यों रखा गया? लेकिन लोकतंत्र में राजनीतिक दल खतरों के बीच भी अपने राजनीतिक अभियान चलाते हैं। एक गंभीर सवाल यह भी है कि हजारों की संख्या में नक्सली उस इलाके में मौजूद हैं और वे इस तरह से योजनाबद्ध तरीके से हमला कर केंद्र और राज्य सरकार को चुनौती दे सकते हैं क्या इसका किसी को भी अंदाज नहीं था? छत्तीसगढ़ सरकार की पूरे मामले में अगर कोई कोताही नजर आती है तो उसे तुरंत प्रभाव से बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए .जो कुछ हुआ है उसे एक राष्ट्रीय शोक के रूप में अनुभव किया जाना चाहिए और चुनौती का मुकाबला सामूहिक संकल्प के जरिए व्यक्त होना चाहिए।