राष्ट्रमंडल खेलों में ‘असली भारत’ की खोज?

२४ सितंबर २०१०

राष्ट्रमंडल खेलों की आधी-अधूरी तैयारियों को लेकर इस समय बहुत नाराजगी है। यह नाराजगी या गुस्सा दिल्ली और उसके आसपास के लोगों में थोड़ा ज्यादा है जो इन तैयारियों को लेकर अब तक प्रभावित होते रहे हैं और आयोजन की समाप्ति तक रहने भी वाले हैं। देश के बाकी हिस्सों के दुख-दर्द काफी अलग हैं। उनकी चिंता को लेकर दिल्ली के कोप भवन में प्रतिनिधित्व करने वाला कोई नहीं है। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों को लेकर दूसरी चिंता दिल्ली के मीडिया और इलेक्ट्रानिक चैनलों की है जो समूचे देश को बता रहे हैं कि पैंतीस हजार करोड़ रुपए की बर्बादी कैसे बर्दाश्त की जा सकती है! और अंत में, विदेशों में कमाई करके देसी-विदेशी जिन्दगी बिता रहे वे आप्रवासी भारतीय हैं जो तैयारियों को लेकर वहां के मीडिया में हो रही छीछालेदार के कारण अपने आपको शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेलों की हुई खराब तैयारियों,भ्रष्टाचार और विदेशी मेहमानों के सामने आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे देश की एक बदबू मारती तस्वीर पेश होने के आतंक से भयभीत उक्त सभी पक्षों की अपेक्षाओं में एक तत्व ‘कॉमन’ है। वह यह कि हम विदेशियों को विदेश की शक्ल सूरत वाला ‘इंडिया’ बेचना चाहते हैं, वह ‘भारत’ नहीं जिसका कि जिक्र राहुल गांधी करने लगे हैं। सालों पहले एक कार्टून छपा था जिसमें बताया गया था कि एक भारतीय दुकानदार एक अमेरिकी को सामान यह कहकर बेच रहा है कि ‘सर, दिस इज मेड इन यूएसए।’ हकीकत कुछ ऐसी ही है। राष्ट्रकुल खेलों की तैयारियों में जितना अनर्थ हो सकता था निश्चित ही हुआ होगा, पर हाल-फिलहाल के लिए तो अपनी ही पीठों पर नैतिकता की चाबुकें फटकारकर उन्हें लहूलुहान दिखाने की बहादुरी पर कुछ संयम कायम किया जा सकता है। हम जानते हैं कि सम्पन्न मेहमानों के घर पर आगमन पर कुछ लोग किस तरह से बच्चों को पड़ोसियों के यहां रवाना कर देते हैं और अपने बूढ़े मां-बापों को घर के सीलनभरे कमरों में कैद कर देते हैं। दिल्ली में भी सबकुछ वैसा ही करना चाह रहे हैं। भारत अपनी स्थापित छवि से बाहर निकलने की कोशिश में है। हम चाहें तो अपने विदेशी मेहमानों के समक्ष एक साफ-सुथरा और संवेदनशील भारत पेश करने की कोशिश भी कर सकते हैं। पुल और छतें विदेशों में भी गिरती होंगी पर फर्क यह है कि वहां दोषियों को सजा भी मिलती है। आशंका व्यक्त की जा सकती है कि खेलों की समाप्ति के बाद हमारे यहां ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला। सुरेश कलमाडी और शीला दीक्षित के दावों के अनुसार, अगर सब कुछ ठीक से सम्पन्न हो गया तो बधाइयों के जश्न भी मनेंगे और समूचे भ्रष्टाचार और लापरवाहियों पर ताले भी पड़ जाएंगे। सही पूछा जाए तो हमें हजारों की संख्या में आने वाले विदेशी मीडिया और विदेशी मेहमानों द्वारा पूछे जा सकने वाले इन सवालों के जवाब सिखाए जाने चाहिए कि हमारे यहां किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं और अनाज क्यों सड़ रहा है? आयोजन समिति पर हमलों की आड़ में उन सवालों से किनारा नहीं किया जाना चाहिए, जिनसे भारत की एक दूसरे किस्म की छवि विदेशों में बन रही है। इस तरह के आयोजन तो हमेशा ही होते और बिगड़ते रहेंगे।