राष्ट्रपति भवन का राजनीतिकरण? विशेष टिप्पणी : श्रवण गर्ग

प्रधानमंत्री का पद जब कमजोर हो जाता है तो राष्ट्रपति भवन ज्यादा वजनदार बन जाता है। राष्ट्रपति भवन में श्रीमती प्रतिभा पाटील की गैर-विवादास्पद और फोटोफ्रेम किस्म की सादगीपूर्ण उपस्थिति के बाद अब उनकी जगह लेने वालों की उम्मीदवारी को लेकर राजनीतिक दलों में अगर घमासान की शुरुआत हो गई है तो उसके पीछे के कारणों को समझना और समझाना भी जरूरी हो गया है। चल रही उठा-पटक के संकेत यही हैं कि आने वाले वक्त में प्रधानमंत्री का पद और ज्यादा कमजोर तथा अस्थायी होता जाएगा और राष्ट्रपति का पद ज्यादा महत्वपूर्ण तथा स्थायी। ऐसी स्थितियाँ पहले काफी हद तक नहीं रहीं। देश ने ऐसे वजनदार प्रधानमंत्री देखे हैं जिन्होंने राष्ट्रपतियों को ज्यादा हस्तक्षेप का मौका ही नहीं दिया। अगर दिया भी तोे मजबूत प्रधानमंत्रियों के चलते बहुत सारी चीजें आसानी से निपट गईं जिसमें कि देश को आपातकाल में झोंकना भी शामिल है। श्रीमती पाटील ने अपने कार्यकाल में स्वयं को लगातार विदेश यात्राओं और अन्य कार्यक्रमों में इतना व्यस्त रखा कि उन्हें ताबड़तोड़ दिल्ली लौटाने और उनसे कोई कड़े फैसले करवाने की स्थितियाँ ही कभी उत्पन्ना नहीं हुईंं। देश इसके लिए श्रीमती पाटील का ऋणी भी हो सकता है। पर जो कुछ बीत चुका है उसका पुनर्प्रस्तुतिकरण संभव नहीं है। इसलिए राष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवारों को पार्टियाँ (यहाँ कांग्रेस और भाजपा पढ़ें) अब खुले तौर पर अपने प्रवक्ताओं की तर्ज पर बाँटने की हिमाकत पर उतर आई हैं। उदाहरण के लिए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. हामिद अंसारी के नामों और उनकी उम्मीदवारी का उपयोग राष्ट्रपति भवन की गरिमा बढ़ाने के लिए कम और राजनीतिक जोर-आजमाइश के लिए ज्यादा किया जा रहा है। यह बहस का मुद्दा है कि डॉ. कलाम, डॉ. अंसारी और चुनाव आयुक्त डॉ. कुरैशी जैसी निर्विवाद हस्तियों को क्या अब इस बात की घोषणा नहीं कर देना चाहिए कि वे केवल सर्वसम्मति की स्थिति में ही राष्ट्रपति भवन में पैर रखना चाहेंगे। देश के राजनीतिक दल अगर राष्ट्रपति भवन को भी पार्टी पोस्टरों और मजहबी टोपियों से रंगने का इरादा रखते हैं तो साहस उन्हीं लोगों को दिखाना होगा जिनके नामों पर सत्ता की राजनीति की बिसातें बिछाई जा रही हैं। सभी दलों को साफ अंदाजा है कि वर्ष 2014 में होने वाले चुनाव किस तरह के परिणाम उगल सकते हैं और किसी एक दल या गठबंधन को बहुमत न मिलने की हालत में किस तरह की असामान्य परिस्थितियाँ देश में उत्पन्ना हो सकती हैं। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान बहने वाला वैमनस्य का मवाद ही तय करेगा कि देश की राजनीति कितनी बीमार पड़ गई है और वर्ष 2014 के चुनावों के लिए पहुँचने तक हमें अपने नायकों से किस हद तक उम्मीद रखना चाहिए। मुद्दा यह नहीं है कि राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार राजनीतिक हो अथवा गैर-राजनीतिक। देश के राजभवनों को सत्तारूढ़ दलों द्वारा किस तरह से पार्टी कार्यालयों और राज्यपालों को कार्यकर्ताओं में तब्दील करने का चलन अब तक रहता आया है, गिनाने की जरूरत नहीं। अत: कोई गारंटी नहीं कि वोटों की ताकत के आधार पर जिताया गया कोई गैर-राजनीतिक व्यक्ति भी राष्ट्रपति भवन में पहुँचने के बाद संवैधानिक फैसले राजनीतिक मंशा से न करने लगे। छोटी-छोटी पार्टियाँ और क्षेत्रीय राजनीतिक दल सौदेबाजी करते हुए केंद्र सरकार के अस्तित्व को आज समर्थन की तलवार की धार पर रखे हुए हंैं। आने वाले समय में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर भी स्थितियाँ कोई भिन्ना नहीं बनने वाली हैं। प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारों की कतार लगी हुई है और जनता ने किसी अज्ञात राजनीतिक अराजकता की आशंका से बीमार पड़ना शुरू कर दिया है। राजनीतिक दलों की अंदाजे-बयानी से शक होना वाजिब है कि संघर्ष शायद राष्ट्रपति भवन में पार्टी आधार पर किसी प्रधानमंत्री” की स्थापना करने को लेकर है। ऐसा होना आम जनता की संवैधानिक उम्मीदों के साथ एक क्रूर राजनीतिक मजाक ही साबित होगा