राम माधव के ट्वीट और रंग में भंग

राम माधव अब चाहते हैं कि योग के कार्यक्रम को लेकर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को लक्ष्य कर किए गए ट्वीट्स से उपजे विवाद पर ठंडा पानी पड़ जाए, पर शायद ऐसा नहीं भी हो। विपक्षी दलों को इस समय सरकार पर अपने हमले तेज करने के लिए बिना सड़कों पर उतरे हुए मुद्दों की तलाश है और वे उन्हें मिल भी रहे हैं। अतः राम माधव से जुड़ा विवाद तब तक तो चलेगा जब तक कि ललित मोदी, वसुंधरा राजे अथवा सुषमा स्वराज को लेकर कोई नया विस्फोट नहीं हो जाता।
योग कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त हुए प्रचार और उसकी सफलता पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने कुछ हद तक सफेदा फेर दिया जिसकी कि कतई जरूरत नहीं थी। योगोत्सव में अल्पसंख्यकों की भागीदारी और ‘ओम’ तथा ‘अल्लाह’ के उच्चारणों को लेकर पहले से ही काफी बहस छिड़ चुकी थी और ऐसे में राम माधव ने अपने ट्वीट्स के जरिए हामिद अंसारी की अनुपस्थिति पर सवाल उठाकर विपक्ष को अवसर प्रदान कर दिया कि वह समूचे आयोजन को हिंदू-मुस्लिम विवाद में बदल दे। राजनीतिक हितलाभ के गणित में ऐसी तमाम कोशिशें नाजायज नहीं मानी जाती हैं।

हैरानी की बात यह है कि राम माधव को अपने पहले ट्वीट से उपजे विरोध से पर्याप्त निराशा हाथ नहीं लगी तो उन्होंने लगे हाथ उसे डिलीट करके दूसरा ठोंक दिया और उसका भी खंडन उन्हें उपराष्ट्रपति के कार्यालय की ओर से झेलना पड़ा। प्रधानमंत्री के विश्वस्त लोगों की सूची में शुमार रहने वाले राम माधव ने अपने अति उत्साह से अपनी सरकार की दिक्कतों में ही इजाफा किया होगा जैसा कि कथित तौर पर कुछ ‘… महाराज ‘ और कुछ अति उत्साही ‘ साध्वियां” पहले से करने में जुटे हैं। प्रधानमंत्री के मौन की दाद दी जानी चाहिए कि इस तरह की पीड़ाओं को न तो वे अपने मन की बात के जरिए व्यक्त करते हैं और न ही सोशल मीडिया पर ट्वीट्स के मार्फत ही प्रकट करते हैं। अपनी नाराजगी को अभिव्यक्ति देने के प्रधानमंत्री के सूत्र सार्वजनिक न होते हुए भी पार्टी में सर्वज्ञात और सर्वव्यापी हैं।

राम माधव ने अपने ट्वीट्स के जरिये न सिर्फ हामिद अंसारी की अप्रसन्नता को आमंत्रण देकर स्वयं की विश्वसनीयता को कम करवाया, अपने किए को लेकर उपराष्ट्रपति से व्यक्तिगत तौर पर क्षमायाचना नहीं करके प्रधानमंत्री के अपने प्रति विश्वास को भी काम करवाया होगा। उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन अध्यक्ष हैं। राज्यसभा में सत्तारूढ़ एनडीए को बहुमत प्राप्त नहीं है। देश के उपराष्ट्रपति के पद से संबंधित नेक नीयत से किया गया ट्वीट भी वर्तमान परिस्थितियों में सरकार के लिए असहज महसूस करने का कारण बन सकता है।

इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि उपराष्ट्रपति को योग कार्यक्रम में आमंत्रित ही नहीं किया गया था। उपराष्ट्रपति के पद को इसके पूर्व गणतंत्र दिवस के अवसर पर विवादों के घेरे में लाया गया था जब यह कहा गया था कि परेड के दौरान सलामी के लिए हाथ नहीं उठाने से तिरंगे की अवमानना हुई है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था।

राम माधव चूंकि प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी नजदीकी तौर पर जुड़े हुए हैं, उनके द्वारा सोशल मीडिया पर की जाने वाली किसी भी टिप्पणी या दिए जाने वाले बयान से यह प्रचार आसानी से फैलाया जा सकता है कि वे जो कुछ भी कह रहे हैं उसे संघ, संगठन, और सरकार की मौन स्वीकृति प्राप्त है। अतः राम माधव के ट्वीट्स से इतना नुकसान अवश्य हो गया कि एक अच्छे आयोजन की सफलता और गिनीज बुक में दर्ज हुए रिकॉर्डों पर खुशियां व्यक्त करने के बजाय सरकार को अपने बचाव में व्यस्त होना पड़ा। इस अप्रिय प्रसंग को टाला भी जा सकता था। राम माधव चाहें तो प्रधानमंत्री के मौन से भी काफी-कुछ सलाह ले सकते हैं।