राजनेताओं की प्रतिमाएं और राजनीति के प्रतिमान

उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने अपनी उस शानदार प्रतिमा को 1 जून की रात हटवा दिया जिसका कि अनावरण उनके ही हाथों 14 अप्रैल को नवाबों के शहर लखनऊ में आयोजित एक शानदार समारोह में हुआ था और 2 जून को दिन के उजाले में उनकी नई प्रतिमा उसी स्थल पर फिर से स्थापित भी हो गई। करोड़ों की लागत से गोमती के किनारे आकार ले रहे मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट आम्बेडकर स्मारक में ‘प्रतीक स्थल’ पर स्व. कांशीराम की प्रतिमा के निकट ही मायावती का पुतला भी स्थापित किया गया था। मुख्यमंत्री जैसी हस्ती की एक प्रतिमा को हटाकर दूसरी को लगाए जाने का कोई सरकारी कारण जनता को नहीं बताया गया। जनता ने भी कारण जानने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। ऐसे मामलों में सूचना के अधिकार का इस्तेमाल सफलतापूर्वक कर पाना कोई आसान काम भी नहीं। इमारतों को बनवाने, उन्हें तुड़वाने और फिर से बनवाने को लेकर शहर लखनऊ में नवाबों के कई किस्से चलन में हैं। उनमें एक यह भी है कि इससे जरूरतमंद लोगों को लगातार रोजगार मुहैया करवाया जा सकता है।

आम्बेडकर पार्क का जिस स्थल पर विस्तार हो रहा है वहां पूर्व में एक स्टेडियम सहित और कई चीजंे थीं। पार्क की स्थापना मुख्यमंत्री का कोई साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए का स्वपA है और उसे पूरा करने में कई वर्ष लग सकते हैं। इस दौरान हजारों लोगों को रोजगार मिलता रहेगा। मायावती का इस तर्क में यकीन नहीं कि प्रतिमाएं व्यक्ति के जीते-जी नहीं लगवाई जा सकतीं। मायावती एक लोकप्रिय राजनेता हैं। अपने जीवनकाल में अपनी ही प्रतिमाएं बनवाकर स्वयं के द्वारा उनका अनावरण करने की हिम्मत भी कोई लोकप्रिय राजनेता ही कर सकता है, आम आदमी नहीं। आम आदमी केवल निजी एलबमों में ही अपनी तस्वीरें चिपकाने की ताकत जुटा पाता है। विनोबा भावे तो शायद आम आदमी से भी अलग कोई चीज थे। उन्होंने सलाह दी थी कि उनके निधन के बाद जब मुखागिA दी जाए तो उसमें उनके द्वारा व्यक्त किया गया समस्त लेखन भी स्वाहा कर दिया जाए अन्यथा उनके सर्वोदयी शिष्य उनके लिखे को ही अंतिम सत्य मानकर हवाला देते रहेंगे। विनोबा भावे, गांधीजी के योग्य शिष्य और उनके प्रथम सत्याग्रही थे। गांधीजी की प्रतिमाएं तो देश भर में मिल सकती हैं पर विनोबाजी की प्रतिमा ढूंढ़ने के लिए खोजी दस्ते रवाना करने पड़ेंगे।

राजनेताओं द्वारा अपने जीवनकाल में ही प्रतिमाएं गढ़वाकर खड़ी करने की परंपरा अगर चल निकली तो शहर छोटे पड़ने लगेंगे। इससे एक अन्य बात जो जाहिर होती है वह यह कि राजनेताओं का अपनी ही जनता पर से भरोसा उठ गया है। वह यूं कि कहीं उनके सत्ता से बाहर हो जाने के बाद जनता उनकी प्रतिमाएं स्थापित करने की इच्छा व्यक्त न करे। कई बार ऐसा भी होता है कि हुक्मरानों को उनके जीवनकाल में ही अपनी प्रतिमाओं को उसी जनता के हाथों तबाह होते देखना का दुख झेलना पड़ता है जो कि कल तक उन पुतलों के दर्शन कर भाव-विभोर होती थी। इराक में हुए अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद सद्दाम हुसैन के पुतलों को जिस तरह से गले मंे फंदे डालकर गिराया गया वह काफी चौंकाने वाला और दहलाने वाला था। महापुरुषों की प्रतिमाओं पर कालिख पोते जाने की घटनाएं भी यदा-कदा होती ही रहती हैं। यह अलग मुद्दा है कि चौराहों-चौराहों पर देश भर में स्थापित राजनेताओं की प्रतिमाओं को अथाह गंदगी के बीच अनंत काल तक बिना थके हुए खड़े रहना पड़ता है। इसके बावजूद न तो श्रद्धा और चंदे में कमी आती है और न ही पुतलों को बनाने, बनवाने और स्थापित करने का अभियान कभी रुकता है। राजनेताओं की छवि या उनकी स्मृति को चिरस्थायी भाव प्रदान करने की लालसा से खड़ी की जाने वाली प्रतिमाओं का जनता की श्रद्धा के अलावा बहुत कुछ संबंध इस बात से भी होता है कि उसके लिए बजट कितना स्वीकृत किया गया है। एक ही महापुरुष की समान कद और काठी वाली दो अलग-अलग स्थानों पर लगी हुई प्रतिमाओं के चेहरों में बजट के कारण पैदा होने वाले फर्क को स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। निश्चित ही सुश्री मायावती की प्रतिमा के प्रकरण में बजट की कोई बाधा नहीं रही होगी।

मायावती की प्रतिमा को हटाए जाने के पीछे गैर-सरकारी तौर पर जो अखबारी कारण गिनाया जा रहा है वह यह है कि मुख्यमंत्री पहली प्रतिमा में व्यक्त अपनी ऊंचाई व उसकी प्रभाव क्षमता को लेकर उसके अनावरण के समय से ही बहुत प्रसन्न नहीं थीं। उसी समय से नई प्रतिमा को बनवाने का काम भी प्रारंभ करवा दिया गया था। पहले विधानसभा चुनावों में और बाद में प्रदेश में संपन्न हुए उप-चुनावों में बसपा ने सफलता के जो झंडे गाड़े उसे देखते हुए मायावती निश्चित ही दावा कर सकती हैं कि उनका राजनीतिक कद और वजन बढ़ गया है जो कि पहली प्रतिमा के कद से मेल नहीं खाता होगा। उत्तरप्रदेश में लगातार बदलती हुई राजनीति के जिस काल के दौरान मुख्यमंत्री की पहली प्रतिमा को बनाने का काम कलाकारों ने अपने हाथ में लिया होगा उन्हें मायावती की बढ़ती हुई राजनीतिक ताकत का तब अंदाज नहीं रहा होगा। इस बात का ध्यान नए सिरे से प्रतिमा बनाने वाले कलाकारों ने ही रखा होगा। पूरे प्रकरण में जानना यह जरूरी नहीं है कि एक ‘प्रतिमा’ को हटाकर दूसरी की स्थापना कर दी गई है। समझने की बात यह है कि अपना राजनीतिक प्रभुत्व सिद्ध करने के लिए राजनेताओं द्वारा पुराने प्रतिमानों को रातों-रात ध्वस्त किया जाकर नए ‘प्रतिमान’ स्थापित किए जा रहे हैं।