मोदी यानी भाजपा का एक रुका हुआ फैसला

भारतीय जनता पार्टी ने जता दिया है कि नरेंद्र मोदी चाहे पार्टी की उतनी चिंता और परवाह नहीं करते हों, पार्टी को गुजरात के मुख्यमंत्री की जरूरत से ज्यादा जरूरत भी है और वह उनकी कितनी परवाह करती है उसका सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करके दिखाना भी चाहती है। शनिवार को नई दिल्ली के विशाल तालकटोरा स्टेडियम में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में पार्टी नेताओं ने नरेंद्र मोदी का उसी तरह से स्वागत किया जैसा कि पिछले दिनों कांग्रेस की जयपुर जंबूरी में राहुल गांधी और सोनिया गांधी का हुआ था। भारतीय जनता पार्टी ने परोक्ष रूप से स्वीकार कर लिया है कि चुनाव जिताने के लिए उसके पास मोदी की टक्कर का कोई अन्य मैदानी नेता नहीं है। मोदी की तारीफ में पार्टी अध्यक्ष ने दूसरे दावेदारों के कदों को बहुत ही शालीन तरीके से यह कहते हुए छोटा दिखा दिया कि गुजरात के मुख्यमंत्री का स्वागत महज शब्दों से नहीं बल्कि ‘स्टैंडिंग ओवेशन” से होना चाहिए। ऐसा हो भी गया। मोदी को पार्टी का ‘महान” नेता तो घोषित कर दिया गया पर यह जाहिर करने में पूरी ताकत के साथ संयम बरता गया कि वे ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी होंगे। पार्टी में साहस होता तो ऐसा कर देती। पार्टी हाल-फिलहाल गुड़ से परहेज बरतते हुए गुलगुले खाने तक का इंतजार करना चाहती है। गुजरात के मुख्यमंत्री भी अपने पार्टी नेताओं की जरूरतों और मजबूरियों को बखूबी समझते हैं। दोनों ही शायद एक-दूसरे को आपसी सहमति के साथ प्रतीक्षा करवाना चाहते हैं। इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में तीन महत्वपूर्ण राज्य मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के हैं। चौथा राज्य कर्नाटक है। यकीनन नहीं कहा जा सकता कि शिवराजसिंह और रमनसिंह को हैटट्रिक बनाने तथा वसुंधराराजे को राजस्थान में सरकार बनाने के लिए नरेंद्र मोदी के चुनावी नेतृत्व की ज्यादा जरूरत है। श्रीमती सुषमा स्वराज भी भोपाल के नजदीक स्थित विदिशा से ही सांसद हैं और शिवराजसिंह की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं का प्रकटीकरण होना अभी बाकी है। दूसरा यह भी कि भाजपा में फैसले अयोध्या में मंदिर निर्माण की तर्ज पर बरसों बरस टलते और बदलते रहते हैं। नरेंद्र भाई जानते हैं कि वे भी कारसेवकों को लेकर गोधरा आ रही ट्रेन से जुड़े हादसे और उसके बाद चली राजनीति के पार्टी में भी शिकार रहे हैं और बाहर भी।

मानदारी से पूछा जाए तो इस बात में थोड़ा शक लगता है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा भाजपा लोकसभा चुनावों के पहले तक कर पाएगी। ज्यादा संभावना यही है कि पार्टी के हिम्मत जुटाने के पहले चुनाव की तारीखों की घोषणा हो जाए। इसे भाजपा की अंदरूनी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी माना जा सकता है कि वह इस मामले में सभी पक्षों को अंत तक लटकाकर रखे- कांग्रेस को भी, नीतीश सहित एनडीए के घटकों और माया-ममता-मुलायमसिंह को भी, साथ ही संघ तथा पार्टी के अन्य महत्वाकांक्षियों को भी। गुजरात के मुख्यमंत्री भी शायद यही पसंद करें कि ओखली में सिर देने से पहले सारे मूसलों की सम्मिलित और अलग-अलग ताकत का अंदाज लगा लें। हकीकत अंत में चाहे जो भी बने, नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और उनकी उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार करने वाली एजेंसियों की इस बात की तारीफ की जानी चाहिए कि गुजरात के मुख्यमंत्री के पक्ष में माहौल पहले के मुकाबले आज कहीं ज्यादा तेजी से बन रहा है। मोदी की छवि के प्रकाश में राजनाथसिंह की पार्टी अध्यक्ष के रूप में जो छवि चमक रही है, वह भी गौर करने योग्य है। गडकरी बस यहीं चूक कर गए थे। प्रतीक्षा की जानी चाहिए कि मोदी ‘सुशासन” पर अपने भाषण में आज किस तरफ इशारा करते हैं।