मुठभेड़ के लिए एक बजे का इंतजार!

२२ जुलाई २०१०

यह लगभग तय हो गया है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वस्त सहयोगी और गृह राज्यमंत्री अमित शाह, सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ के मामले में शुक्रवार को सीबीआई के सामने पेश होने वाले हैं। गुरुवार को उन्हें हाजिर होना था पर वे नहीं हुए। वर्ष 2002 के दंगों के दौरान हुए गुलबर्ग सोसायटी मामले में जांच कर रही स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम के सामने उपस्थित होकर अपना बयान देने के मामले में मुख्यमंत्री मोदी ने भी पहले तो ऐसा ही सस्पेंस खड़ा किया था। पर अंत में वे उपस्थित भी हुए और देर रात तक बयान दर्ज कराने के बाद विजेताओं की तरह बाहर निकले थे। उस मामले का निपटारा होना अभी बाकी है। अमित शाह को लेकर जो कुछ भी चल रहा है उसके पीछे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के ही एक वर्ग की भी रुचि हो सकती है। पार्टी में ऐसा चाहने वालों की शायद कमी नहीं होगी जो अमित शाह को गिरफ्तार होते देखना चाहते हैं। बड़ी संख्या में गुजरात सरकार के पुलिस अफसर इसी फर्जी मुठभेड़ कांड के सिलसिले में इस समय जेलों में बंद हैं। श्री शाह के नजदीकी माने जाने वाले अजय पटेल और यशपाल चूडास्मा फिलहाल फरार घोषित हैं। वर्ष 2002 में हुए दंगों से जुड़े एक मामले में फंसने के बाद मोदी मंत्रिमंडल की एक सदस्य डॉ. मायाबेन कोडनानी पहले ही इस्तीफा दे चुकी हैं। अमित शाह ने अभी सार्वजनिक रूप से इस्तीफा नहीं दिया है। कहा जाता है कि सीबीआई के पास अमित शाह के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और दूसरी ओर राज्य के प्रवक्ता मंत्री जयनारायण व्यास ने आश्वासन दिया है कि राज्य सरकार केंद्रीय जांच एजेंसी के साथ सहयोग करेगी। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई द्वारा की जा रही कार्रवाई को एक टेस्ट केस के रूप में इस तरह देखा जा सकता है कि अमित शाह के खिलाफ की जाने वाली कोई भी कड़ी कार्रवाई गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार के लिए और राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के लिए कितनी ऊंची राजनीतिक लहरें पैदा कर सकती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सोहराबुद्दीन कांड में राजनीतिक रूप से गुजरात जैसे संवेदनशील राज्य के गृहमंत्री को, जिनके पास विधि और जेल विभाग भी हैं, सीखचों के पीछे पहुंचाने का सीबीआई का कोई भी सफल उपक्रम मुख्यमंत्री की ताकत को चुनौती देने की पहली बड़ी कोशिश माना जा सकता है। गुजरात की परिस्थितियां तो ऐसा मानने के लिए अनुकूल कही जा सकती हैं क्योंकि गृह विभाग के वास्तविक सर्वेसर्वा तो मुख्यमंत्री ही रहे हैं। अमित शाह तो केवल गृह राज्यमंत्री ही हैं। कहा नहीं जा सकता कि नरेंद्र मोदी की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक उद्देश्यों से भुनाने की इच्छा रखने वाली भाजपा बिहार में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर अमित शाह की फर्जी मुठभेड़ में कथित लिप्तता से उपजे संकट से कैसे निपटेगी। इसे नरेंद्र मोदी का साहस या मजबूरी भी माना जा सकता है कि इतने बड़े संकट के बावजूद वे श्री शाह को उनके मंत्री पद पर बनाए हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी के पास परिस्थिति से निपटने के लिए दो ही उपाय हो सकते थे : संकट का कानूनी ढंग से मुकाबला या पूरे मामले को केंद्र सरकार का षड्यंत्र बताते हुए कोई आंदोलनात्मक कार्रवाई करना। निश्चित ही श्री शाह ने पहले विकल्प का सहारा लेते हुए मामले से कानूनी तौर पर निपटने का फैसला लिया है। यह एक सच्चाई भी है कि एक गृह राज्यमंत्री के रूप में पर्याप्त ताकतवर होते हुए भी जनता के बीच समर्थन के मामले में वे मुख्यमंत्री का मुकाबला नहीं कर सकते थे और उनके लिए बेहतर विकल्प सीबीआई का सामना करना ही हो सकता था। 2002 के दंगों और फर्जी मुठभेड़ों को लेकर अदालतों और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की गई अब तक की कार्रवाइयों को लेकर व्यक्त हुए गुजरात की जनता के तटस्थ रुख को देखते हुए मुख्यमंत्री ने भी शायद अमित शाह को सीबीआई का सामना करने की सलाह दी है। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ कांड में अब तक पन्द्रह गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। अमित शाह सीबीआई के समक्ष पेश होने का फैसला नहीं करते और उनकी गिरफ्तारी अगर नहीं टलती तो गुजरात और देश में इतिहास बन सकता था। पर बहुत कुछ पता तो आज एक बजे के बाद ही चलेगा। तब तक के लिए इंतजार किया जा सकता है।