मिस्र:अपनी-अपनी चिंताएं

५ फरवरी २०११

मिस्र में वहां के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के प्रति व्यक्त हो रहे राष्ट्रीय जनआक्रोश को भारतीय संदर्भों में किस तरह से देखा या व्यक्त किया जा सकता है? क्या मिस्र की जनक्रांति को आजादी की लड़ाई के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? भारत में जब स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई अपने चरम पर थी और गांधीजी के नेतृत्व में अंग्रेजों पर देश छोडऩे के लिए दबाव बढऩे लगा तब उन्होंंने वही तर्क दिया जो मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक अपनी जनता को दे रहे हैं। मुबारक का कहना है कि वे अगर सत्ता से हट जाएंगे तो मिस्र में अराजकता फैल जाएगी। अंग्रेजों ने भी गांधीजी को यही तर्क दिया था कि उनके चले जाने के बाद भारत में अराजकता का साम्राज्य हो जाएगा। गांधीजी ने तब जवाब दिया था कि वे अंग्रेजों की गुलामी की बजाए देश में अराजकता ज्यादा पसंद करेंगे। अंग्रेज जिस अराजकता का हवाला दे रहे थे वह वास्तव में राष्ट्रवाद की उस लहर से था जो हर तरह के पश्चिमी आधिपत्य को देश से बाहर कर देना चाहती थी, जो पश्चिम के वैचारिक साम्राज्यवाद के भी खिलाफ थी। मिस्र के पहले ट्यूनीशिया में जो कुछ हुआ वह यूरोपीय आधिपत्य के खिलाफ वहां की जनता का संघर्ष था। इस आधिपत्य की अगुवाई ट्यूनीशिया में फ्रांस कर रहा था। मिस्र के जनआंदोलन की तीव्रता और उसके परिणामों से मुखातिव होने में राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिका से प्रभावित तमाम राष्ट्रों को एक सप्ताह से ज्यादा का वक्त लगा तो कल्पना की जा सकती है कि पश्चिमी देशों के लिए काहिरा में दांव पर क्या लगा है। अमेरिका और पश्चिमी राष्ट्रों को मिस्र के परिणामों में इस्लामी कट्टरपंथियों के सत्ता में काबिज होने का खतरा दिखाई दे रहा है जो कि हाल-फिलहाल के लिए देश में प्रजातंत्र की स्थापना की मांग के रूप में व्यक्त हो रहा है। अंग्रेजों को भी डर रहा होगा कि उनके जाते ही एशिया का सबसे बड़ा मुल्क भारत अपने आपको कट्टरपंथी हिन्दू राष्ट्र में तब्दील कर लेगा। अगर होस्नी मुबारक को तीस वर्षों से सत्ता में बनाए रखना अरब संसार में पश्चिमी हितों को पोषित करते रहने की कोई साजिश नहीं थी तो मिस्र के जनआंदोलन का प्रजातंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के आधार पर समर्थन करना भी बेमायने है। वास्तविक खतरा यह है कि ट्यूनीशिया और मिस्र के बाद जनता की नाराजगी उन तमाम मुल्कों को अपनी गिरफ्त में ले सकती है जहां की हुकूमतें पश्चिम परस्त हैं। यानी कि अरब क्षेत्र में एक नए प्रकार का शक्ति संतुलन कायम हो सकता है जो अपनी शर्तों पर अपना उपभोक्ता बाजार भी उपलब्ध कराएगा और अपनी ही शर्तों पर अपने संसाधनों का दोहन भी होने देगा। मिस्र को लेकर अमेरिका और उसके नाटो मित्रों की चिंता में यह भी शामिल है कि काहिरा अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों का गढ़ बन सकता है और अनवर सादात के बाद पश्चिम एशिया में शांंति स्थापना की दिशा में किए गए तमाम प्रयास खतरे में पड़ जाएंगे। इसकी पहली मार इजराइल पर पड़ेगी। समझा जा सकता है कि मिस्र के घटनाक्रम को लेकर प्रतिक्रिया देने में जितनी सावधानी बराक ओबामा द्वारा बरती गई उससे कहीं ज्यादा इजराइल में नेतन्याहू द्वारा प्रदर्शित की गई। अत: मिस्र में जो कुछ भी हो रहा है उसके सारी दुनिया की राजनीति पर दूरगामी परिणाम होने वाले हैं। एक नए प्रकार का शक्ति ध्रुवीकरण आने वाले वर्षों में देखने को मिल सकता है। मिस्र के जनआंदोलन की लहर अरब मुल्कों के साथ ही अफ्रीका के उन राष्ट्रों की हुकूमतों के सामने संकट खड़ा कर सकती है जहां जन आकांक्षाओं के साथ दशकों से धोखाधड़ी की जा रही है। आश्चर्यजनक नहीं कि मिस्र के जनआंदोलन से संबंधित तमाम खबरों को चीन में प्रतिबंधित कर दिया गया है। बहुसंख्यक चीनी नागरिकों के लिए मिस्र पूर्व की तरह से ममियों और पिरामिडों के देश के रूप में ही कायम है पर शक किया जा सकता है कि यह स्थिति लंबे समय तक कायम रह सकेगी। मिस्र में प्रजातंत्र की स्थापना के लिए चल रहे आंदोलन का एक रोचक पहलू यह भी है कि जहां एक ओर ओबामा प्रशासन वर्तमान सरकार को अपनी ही कठपुतली मानता रहा है और मुबारक के बाद अपने ही किसी समर्थक को सत्ता में देखना चाहता है, राष्ट्रपति होस्नी मुबारक आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें हटाने की मांग करने वाले युवा, इजराइल के पिट्ठू हैं जिन्हें अमेरिका और कतर में प्रशिक्षण दिया गया है। दूसरी ओर मुबारक द्वारा ही जनआंदोलन के पीछे ईरान का हाथ भी बताया जा रहा है जो कि कट़्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड को उनके खिलाफ मदद दे रहा है। यानी कि मिस्र के नागरिकों की समूची लड़ाई को या तो अमेरिकी-इजराइली षड्यंत्र या फिर धार्मिक साम्राज्यवादी संघर्ष में बदला जा रहा है। इतने व्यापक जनआंदोलन का विरोध करने के लिए मुबारक समर्थकों का सेना के साए में हिंसक तरीके से सडक़ों पर उतर आना, वह भी 25 जनवरी को प्रारंभ हुए प्रदर्शनों के इतने दिन बाद कई तरह के संदेहों को जन्म देता है। इस बात पर भी गौर किया जा सकता है कि निर्गुट देशों के आंदोलन, अफ्रीकी यूनियन और इस्लामिक कांफ्रेंस संगठन जैसे बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने मिस्र के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुबारक सरकार द्वारा इस्तेमाल की जा रही हिंसा की कोई आलोचना नहीं की है। भारत ने भी एक लंबी चुप्पी के बाद नपे-तुले शब्दों में ही मिस्र के घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मिस्र में जो कुछ चल रहा है उसका एक भारतीय संदर्भ यह भी है कि जनता के स्तर पर भी हम वहां के आंदोलन और आंदोलनकारियों की पीड़ाओं से बहुत दूर हैं। वहां के जनआंदोलन को लेकर हमारी चिंताएं केवल अपने इस स्वार्थ तक ही सीमित हैं कि पेट्रोल और डीजल के दाम और नहीं बढ़ जाएं।