मलाला के मुल्क में मासूमों का कत्ल

शांति का नोबेल पुरस्कार ग्रहण करते हुए मलाला यूसुफजई जब अपने दिल के कहीं बहुत भीतर से कह रही थीं कि बच्चों के हाथों में बंदूकें देना आसान है पर किताबें देना मुश्किल, तब पाकिस्तान की स्वात घाटी की इस बहादुर बालिका को अंदाजा नहीं रहा होगा कि कुछ ही दिनों में समूची दुनिया को पेशावर में हद दर्जे की दहशतगर्दी से मुखातिब होना पड़ेगा। तालिबानी आतंकवादियों ने पेशावर के आर्मी स्कूल के मासूम बच्चों पर हमले को अंजाम देकर समूची दुनिया के बच्चों की आंखों और रातों में दहशत पैदा कर दी है।

आतंकवाद का जो कहर उत्तरी वजीरिस्तान में पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई का बदला लेने के नाम पर बरपाया गया है, वह इसी मायने में अभूतपूर्व है कि मासूम और निहत्थे बच्चों को निशाने पर लिया गया। तालिबानी आतंकवादियों का इरादा बच्चों को बंधक बनाकर नवाज शरीफ सरकार या सेना के साथ किसी तरह की सौदेबाजी करने का नहीं था। वे बच्चों के खून से होली खेलना चाहते थे। तालिबानी आतंकवादियों ने पाकिस्तानी सेना की सबसे कमजोर नब्ज पर हमला किया है। बच्चों को पूछ-पूछकर निशाना बनाया गया कि कौन-कौन सेना के परिवारों से जुड़ा है। ऐसा तो दुनिया की किसी भी लड़ाई में अब तक नहीं हुआ। तालिबानियों द्वारा दी गई चुनौती पाकिस्तान की निहायत कमजोर साबित हो चुकी शरीफ सरकार और वहां की सेना के लिए ही नहीं, समूची दुनिया के लिए है। बच्चों के खिलाफ इस तरह की घृणित कार्रवाई का सफल हो जाना तमाम लोकतांत्रिक हुकूमतों के लिए खौफ पैदा करने वाला है। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में दो दिन पहले सामने आए आतंकवादी चेहरे से यह हजार गुना ज्यादा डरावना और भयावह है।

नवाज शरीफ सरकार के साथ दिक्कत यह है कि उसे पता ही नहीं है कि अपने ही देश में ताकतवर हो रही आतंकवादी ताकतों और उनके कारण उपजने वाली व्यथा और दर्द से कैसे निपटा जाए। सत्ता में काबिज होने के बाद नवाज शरीफ मानकर चल रहे थे कि बातचीत के जरिये तालिबानी आतंकवाद पर काबू पाया जा सकता है। यह भी कि शरीफ सरकार अफगानिस्तान के तालिबानियों और पाकिस्तान के तालिबानियों के बीच फर्क नहीं कर पा रही थी। अफगानिस्तान में तालिबानियों ने अपनी कार्रवाई के दौरान निर्दोष बच्चों को इस तरह से निशाने पर नहीं लिया था। पाकिस्तान के तालिबानी ऐसा कर रहे हैं। पाकिस्तानी सेना अपनी ही सरकार की नीतियों से सहमत नहीं थी कि आतंकवाद का मुकाबला बातचीत के जरिये किया जा सकता है। यही कारण रहा कि उत्तरी वजीरिस्तान के ‘ट्रायबल’ इलाकों में पाकिस्तानी सेना ने जैसे ही तालिबान के खिलाफ अपनी कार्रवाई शुरू की, आतंकवादियों ने सेना के सबसे संवेदनशील पहलू पर हमला करने की कार्रवाई को अंजाम दे दिया। इसे पाकिस्तानी सेना की सबसे बड़ी नाकामी माना जा सकता है कि वह आतंकी मंसूबों को भांप तक नहीं सकी।

सवाल यह है कि पाकिस्तानी सरकार इस चुनौती का अब कैसे जवाब देती है। वह सारी दुनिया को अपना मुंह कैसे दिखा पाती है कि सवा सौ से ज्यादा बच्चों के संहार को रोक पाने में वह क्यों विफल रही। भविष्य में हो सकने वाले इस तरह के हमलों को रोकने के लिए उसके पास क्या उपाय हैं? पाकिस्तान का उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत का इलाका कोई एक दशक से अधिक समय से आतंकवाद की चपेट में है और सैकड़ों लोगों की अब तक जानें ले चुका है। क्या पेशावर के ‘आर्मी स्कूल’ पर हमले के बाद तालिबान के खिलाफ कार्रवाई में सेना के हाथ और कदम थम जाएंगे?

पेशावर में हुई घटना भारत के लिए इसलिए चिंताजनक बन जाती है कि पाकिस्तान की सरकार अगर तालिबानी आतंकवाद पर काबू पाने में नाकामयाब साबित हुई तो आग का धुआं हमारे सीमा क्षेत्र को भी असुरक्षित करेगा। पाकिस्तान की कोई सोलह करोड़ की आबादी पेशावर के हादसे पर किस तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करती है, अभी सामने आना बाकी है। शरीफ सत्ता में बने रहते हैं या फिर पेशावर की आग में झुलसी सेना सरकार के सारे सूत्र अपने हाथों में ले लेती है या विपक्षी दल बच्चों की नृशंस हत्या को मुद्दा बनाकर कोई नया आंदोलन छेड़ देते हैं, यह भी अभी भविष्य के गर्भ में है।

आतंकवाद के इस नए और क्रूर तालिबानी चेहरे का तब तक मुकाबला नहीं किया जा सकेगा, जब तक कि पाकिस्तानी सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी ताकतों को समर्थन देना बंद करके भारत और अफगानिस्तान के सहयोग से कार्रवाई करने का साहस नहीं जुटाती। नवाज शरीफ अपनी कमजोर सरकार के दम पर तो तालिबानी चुनौती का सामना नहीं कर पाएंगे।

पेशावर की घटना के बाद मलाला ने कहा है कि मासूम बच्चों की नृशंस हत्या से उसका दिल टूट गया है। जिस समय तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के आतंकवादी पेशावर में अपनी हरकतों को अंजाम दे रहे थे, पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ क्वेटा में एक सैन्य परेड को संबोधित करते हुए दावा कर रहे थे कि नफरत और आतंक फैला रहे मुठ्ठीभर तत्वों को पूरी तरह से परास्त करके बलूचिस्तान प्रांत को अमन के वतन में तब्दील कर दिया जाएगा। जनरल शरीफ को इसके तत्काल बाद ही क्वेटा से पेशावर के लिए निकलना पड़ा।

सवाल यह है कि जो सरकार और सेना अपने मासूम बच्चों की जिंदगी की ही हिफाजत नहीं कर सकती, उस पर पाकिस्तान के सोलह करोड़ नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए कैसे और कब तक भरोसा कर पाएंगे?