मनमोहन सिंह का फेरबदल

१२ जुलाई 2011

डॉ. मनमोहन सिंह के इस कथन पर यकीन करना ही होगा कि वर्तमान राष्ट्रपति की उपस्थिति में यूपीए-दो का अंतिम मंत्रिमंडलीय फेरबदल मंगलवार को संपन्न हो चुका है। देश के लोग राहत की सांस ले सकते हैं कि इस तरह कि मीडियाई अटकलों से उन्हें अब मुक्ति मिल गई है कि मनमोहन सिंह हटाए जा रहे हैं और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन रहे हैं। और कि फलां व्यक्ति मंत्री बन रहा है और फलां हट रहा है। देश में राजनीतिक स्थिरता कायम करने की दिशा में भी प्रधानमंत्री की उक्त घोषणा काफी महत्वपूर्ण है। मंत्रियों के आचरण और कामकाज को लेकर लगातार चलते रहने वाले अफवाहों और इस संबंध में कांग्रेस पार्टी के ही पदाधिकारियों द्वारा दिए जाने वाले आए दिन के बयानों से मुक्ति के लिए भी इस तरह का आश्वासन जरूरी हो गया था। पर प्रधानमंत्री की उक्त घोषणा का इस सच्चाई से दूर का भी संबंध नहीं कि तमाम हो-हल्ले और श्रीमती सोनिया गांधी से चार बार के विचार-विमर्श के बावजूद उन्होंने इतना निस्तेज और अप्रभावी फेरबदल तीन साल बाद (उसके पहले भी) होने वाले लोकसभा चुनावों का सामना करने के लिए देश को दिया। प्रधानमंत्री यदि दृढ़ इच्छाशक्ति दिखा पाते तो इस अवसर का लाभ वे अपनी स्वयं की और सरकार की छवि को ताकतवर बनाने में ले सकते थे। अगर वे ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाए तो उसे गठबंधन की मजबूरी कम और पार्टी के आंतरिक विरोधों को ही ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री के हाथ कितने बंधे हुए हैं इस बात से पता चलता है कि गठबंधन के ही एक घटक तृणमूल कांग्रेस से राज्यमंत्री मुकुल राय असम पहुंचकर दुर्घटनास्थल का दौरा करने से उन्हें मना करने की हिम्मत जुटा लेते हैं और कांग्रेस के एक राज्यमंत्री गुरुदास कामत मंत्रिमंडल से इसलिए इस्तीफा दे देते हैं कि उन्हें एक ऐसा विभाग बंटवारे में मिला जो देश के आम आदमी की जिंदगी से सीधा ताल्लुक रखता है। दोनों ही उदाहरण डॉ. मनमोहन सिंह के कमजोर नेतृत्व का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। सही पूछा जाए तो इस तरह के मंत्रिमंडलीय फेरबदलों में ज्यादा रुचि सत्ता के ईर्द-गिर्द मंडराते रहने वाले दलालों की ही होती है, आम जनता की नहीं। आम जनता तो जानती है कि इस तरह की कसरतों से केवल अखबारों के पन्ने भरे जा सकते हैं, पेट नहीं। पेट भरने के लिए जनता की नजरें तो हमेशा एक ऐसी मजबूत लीडरशिप पर लगी रहती हैं जिसे वह अपनी आंखों और दिलों मेें उतार सके। डॉ. मनमोहन सिंह चूंकि अब मंत्रिमंडलीय फेरबदलों के चौके-चूल्हे से मुक्त हो चुके हैं, अपने बचे हुए कार्यकाल का उपयोग वे अपने आपको उन पूर्व प्रधानमंत्रियों की कतार में शामिल कराने में कर सकते हैं जिन्हें उनकी तमाम कमियों और कमजोरियों के बावजूद जनता भूलना ही नहीं चाहती। डॉ. मनमोहन में कई खूबियां हैं और वे इस कतार में शामिल होने के हकदार भी हैं। वे चाहेें तो अपने फैसलों से माहौल को अपने पक्ष में बदल सकते हैं। जनता मंत्रियों को नहीं, उनके नेता की तरफ ही हमेशा देखती रहती है। अत: मंत्रियों के फेरबदल से कभी कुछ भी हासिल नहीं होता। वैसे भी यह फेरबदल तो गुम ही होने जैसा है।