मध्यावधि का महाधिवेशन?

२० दिसंबर २०१०

तीन-दिनी कांग्रेस महाधिवेशन में जिस तरह से संघ परिवार को निशाना बनाया गया उससे इस तरह का इम्प्रेशन बन सकता है कि कांगे्रस परिवार के कोई पन्द्रह हजार लोगों को देश के कोने-कोने से केवल इसी का गवाह बनने के लिए आमंत्रित किया गया था। महाधिवेशन की इस तरह की परिणति पार्टी के एजेंडे की प्राथमिकताओं में निश्चित ही नहीं रही होगी। विकीलीक्स के दस्तावेज अगर तीन-चार दिन बाद जारी होने का तय कर लेते तो शायद भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों को कांग्रेस की जंबूरी में इतना अतिरंजित महत्व नहीं प्राप्त होता। महाधिवेशन की ध्वनि और नतीजे तब राजनीतिक भ्रष्टाचार और महंगाई पर ज्यादा केंद्रित रहते और उस स्थिति में तालियां बुराड़ी में उपस्थित अनुशासित कार्यकर्ताओं की भीड़ के साथ ही देश की सौ करोड़ की आबादी भी बजाती। इसे एक संयोग अथवा असामयिक दुर्घटना भी माना जा सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का बिगुल बजा देने और तमाम तरह के जोखिम उठाने की तैयारियों के बावजूद कांग्रेस ने महाधिवेशन में अपनी उपलब्धियों को केवल भाजपा-संघ पर हल्ला बोलने तक सीमित कर दिया। कांग्रेस महाधिवेशन में भाजपा को उसकी राजनीतिक हैसियत से ज्यादा अहमियत इस मायने में दे दी गई कि जैसे देश में केवल दो दलों (कांग्रेस और भाजपा) का ही शासन है, बाकी राजनीतिक दलों का या तो जैसे कोई अस्तित्व ही नहीं है या फिर सत्तारूढ़ दल को उनसे कोई भी हिसाब-किताब चुकता नहीं करना है। आने वाले साल में कांग्रेस और तृणमूल का मुकाबला पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के साथ तथा तमिलनाडु में (द्रमुक के साथ मिलकर) अन्नाद्रमुक और अन्य दलों से है। वर्ष 2012 में भी पार्टी का मुकाबला मुख्य रूप से मायावती की बसपा से ही है। गौर किया जाए कि आने वाले दो वर्षों में जिन भी प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं उनमें कहीं भी भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस का प्रमुख विरोधी दल गिनाए जाने की स्थिति में नहीं है। अत: कांग्रेस महाधिवेशन में भाजपा को छोडक़र अन्य किसी भी विपक्षी दल का प्रमुखता से जिक्र नहीं होना थोड़ा आश्चर्यजनक माना जा सकता है। यह सच्चाई अपनी जगह कायम है कि केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को बसपा और सपा दोनों का ही समर्थन प्राप्त है। इन हकीकतों के बीच केवल कांग्रेस नेतृत्व ही इस तरह की संभावनाओं को खारिज कर सकता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को और आक्रामक बनाते हुए पार्टी की तैयारी राष्ट्रपति पद के चुनावों (2012) के पहले देश को मध्यावधि चुनावों में डालने की कतई नहीं है। हालांकि इस तरह की अटकलों को इसलिए भी खारिज नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस पार्टी इस समय अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत विकेट पर है। दूरसंचार घोटाले की जांच को लेकर प्रधानमंत्री ने जो पेशकश की है वह संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की विपक्ष की मांग को कमजोर करने के लिए काफी है। मध्यावधि के गणित को अपने समापन भाषण में श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा की गई घोषणा से भी जोडक़र देखा जा सकता है कि कांग्रेस विपक्ष के प्रति न सिर्फ आक्रामक रवैया अपनाएगी देश के हरेक विधानसभा क्षेत्र में प्रभावी तरीके से सभाएं आयोजित कर पार्टी की उपलब्धियों को जनता के सामने पेश करेगी। भाजपा और संघ परिवार पर हमले को कांग्रेस के महाधिवेशन में एक व्यापक और देशव्यापी रणनीति का हिस्सा अगर मान लिया जाए तो उसे ‘कुछ हद तक’ उचित ठहराया जा सकता है। ‘कुछ हद तक’ ही इसलिए कि पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपने उद्बोधन में भगवा उग्रवाद को लेकर जिस तरह की भावनाएं व्यक्त करके तालियां बटोरी वैसे ही विचार वे भाजपा और संघ परिवार की भूमिकाओं को लेकर अपने दस वर्षों के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान अविभाजित और विभाजित मध्यप्रदेश में व्यक्त करते रहे हैं और उससे कांग्रेस के हित में अपेक्षित परिणाम नहीं निकले। यह भी कहा जा सकता है कि इसमें ज्यादा गलती जनता की ही रही होगी। कहा जाना चाहिए कि भगवा आतंकवाद के प्रति किसी भी तरह का समर्थन देश की जनता की ओर से नहीं है और वह इससे निपटने की क्षमता को वह कानून-व्यवस्था का हिस्सा मानती है। और ऐसा हो भी रहा है। हां, देश की अन्य मौजूदा गंभीर समस्याओं के प्रति महाधिवेशन में जिस तरह के संकल्प व्यक्त किए गए हैं उनका इसलिए भी स्वागत किया जाना चाहिए कि इस समय लोग काफी उम्मीदों के साथ सरकार के एक-एक कदम पर नजरें गड़ाए हुए हैं और वे निराश नहीं होना चाहते हैं।