मजबूरी के “लकवे” से मुक्ति!

ममता बनर्जी ने फिर से धमकी दी है। बंगाल की फायर ब्रांड नेत्री ने इस बार केंद्र सरकार को बहत्तर घंटे का अल्टीमेटम दिया है कि वह डीजल की मूल्यवृद्धि के साथ ही मल्टी ब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के अपने फैसले वापस ले। उन्होंने यह नहीं बताया है कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो वे कौन-सा तूफान खड़ा करने वाली हैं।लेकिन टेलीविजन के पर्दों पर सरकार के मंत्रियों के आत्मविश्वास से भरे चेहरों को देखकर यही लगता है कि बहत्तर घंटों में सरकार ममता और विपक्षी पार्टियों को और ज्यादा नाराज करने वाले कुछ और फैसले ले सकती है।

मनमोहन सिंह सिद्ध करने पर आमादा हैं कि उनकी सरकार वास्तव में “पॉलिसी पैरेलिसिस” से पीड़ित नहीं थी। वह तो देश की जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए सहयोगी दलों की बैसाखियों पर जान-बूझकर लंगड़ाकर चल रही थी। गठबंधन की मजबूरी अब एक झटके में दूर कर ली गई है। रिटेल में विदेशी निवेश का मामला तो ऐसा है कि वामपंथी भी अब सरकार के करीब जाने से खौफ खाएंगे।

सरकार का सोच साफ है कि जिस आम आदमी की नाराजगी का हौआ विपक्षी दल और टेलीविजन चैनल खड़ा कर रहे हैं, वह वास्तव में देश का वही मिडिल क्लास है, जो पहले से ही कांग्रेस से खार खाए बैठा है। और यह भी कि मिडिल क्लास कुछ समय पहले तक अण्णा हजारे के भी साथ था। कांग्रेस की भाषा में समझें तो यही मिडिल क्लास आलू, प्याज, शकर, डीजल, पेट्रोल और खाना पकाने की गैस की उपलब्धता और उनकी कीमतों के आधार पर ही सरकारों के परफॉरमेंस तय करता है। सरकार को यह भी पता है कि देश के अधिकांश राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें सत्ता में हैं और इसीलिए उसके खिलाफ मुद्दा एक हो या हजार हों, कांग्रेस का विरोध संगठित तरीकों से भी होगा और प्रायोजित भी होगा।

यही कारण है कि मनमोहन सिंह सरकार के द्वारा पिछले दो दिनों में लिए गए फैसलों का असर भी दो अलग-अलग स्तरों पर नजर आ रहा है। एक तरफ (खाना पकाने की) गैस से पीड़ित वर्ग सरकार के पुतलों को डीजल छिड़ककर आग लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर उद्योगपतियों का समूह डॉ. मनमोहन सिंह की जय-जयकार कर रहा है कि किसी अज्ञात “बाबा” (रामदेव) की वजह से सरकार का लकवा ठीक हो गया। शेयर बाजार भी ठीक हो रहा है और डॉलर के मुकाबले रुपया भी मजबूती पकड़ रहा है। यही धनाढ्‌य वर्ग अब उम्मीद लगाए बैठा है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती भी करने की स्थिति में आ जाएगा। राहुल गांधी जिस “भारत” और “इंडिया” का गाना गाते हैं, उसकी असली हकीकत यही है। सिद्ध भी हो रहा है कि सरकार की नीतियां किसकी तरफदारी करना चाहती हैं।

बहस का ताजा मुद्दा अब “कोलगेट” नहीं है। कोयला खदानों के आवंटन का मुद्दा सरकार विपक्षी दलों के देखते-देखते ही निगल गई। सारे नेता मुंह ताकते रह गए।कोई अब उसका जिक्र भी नहीं कर रहा है। सरकार के मास्टर स्ट्रोक की दाद दी जाना चाहिए। प्रधानमंत्री की तो जैसे चाल ही बदल गई। भाजपा के लिए भी अब बड़ा मुद्दा कोयला नहीं, मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश है, क्योंकि जो वर्ग इससे प्रभावित होने वाला है, वही उसका सॉलिड वोट बैंक भी है और मुद्रा कोष भी। बहस का मुद्दा अब यह बन गया है कि ममता बनर्जी क्या करने वाली हैं। ममता कुछ करेंगी या कुछ नहीं कर पाएंगी। धमकियां ही देती रहेंगी। तृणमूल कांग्रेस समर्थन वापस ले लेगी तो भी सरकार गिरने वाली नहीं है। सही पूछा जाए तो सरकार को गिराने का फैसला भी अब कांग्रेस को ही करना है। निश्चित ही सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस को इसकी जल्दी नहीं है।

देश को चुनावों में झोंकने का निर्णय करने से पहले कांग्रेस तीन चीजें अपने पक्ष में सुनिश्चित करना चाहेगी। पहली तो यह कि तमाम गैर-कांग्रेसी दलों के बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर जारी घमासान अपने चरम पर पहुंच जाए। पांच विपक्षी राज्यों के पांच मुख्यमंत्री और पांच बड़े विपक्षी नेता इस दौड़ में हैं। कांग्रेस चाहेगी कि चुनावों तक पहुंचने के पहले विपक्षी एकता पूरी तरह से तार-तार हो जाए। शरद पवार की पार्टी ने तो खुले तौर पर केंद्र की नीतियों के साथ प्रतिबद्धता व्यक्त कर दी है।

दूसरे यह कि देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से पटरी पर लौटा दिया जाए, जिससे कि सरकार की दुनिया भर में पहले की तरह वाह-वाही होने लगे। और अंत में यह कि इसी बीच मौके का फायदा उठाकर कांग्रेस अपने घर को भी पूरी तरह से ठीक कर ले, जिसकी उसने शुरुआत कर दीहै। मंत्रिमंडल और संगठन में व्यापक फेरबदल का तीसरा बड़ा कदम उठने वाला है, जो ममता की बौखलाहट और मुलायम के लिए चुनौतियों को और बढ़ा सकता है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर कांग्रेस अगले चुनावों में भी मनमोहन सिंह को ही प्रधानमंत्री के रूप में फिर से पेश कर दे।

टिप्पणीकारों ने टेलीविजन की बहसों में प्रधानमंत्री का प्रशस्तिगान शुरू कर दिया है कि डॉ. मनमोहन सिंह अपने १९९१ के अवतार में फिर से प्रकट हो गए हैं और उन्होंने अपने हाथ जैकेट के पॉकेट्‌स से बाहर निकालने की शुरुआत कर दी है।