भीड़ के बीच अकेलेपन की प्रगति-साधना

२३ अक्टूबर २०१०

एक जमाना था जब रेलगाडिय़ों के वातानुकूलित या अन्य आरक्षित डिब्बों में या फिर हवाई अड्डों पर ढेर सारे परिचित चेहरे मिल जाते थे। साफ-सुथरे और आरामदेह वस्त्रों में सजे-धजे इन लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहटें और बदन पर इत्र की ऐसी खुशबू तैरती रहती थी जो समूची यात्रा के दौरान बनी रहती थी। ऐसा लगता था सभी लोग सीधे स्नानागारों से निकलकर रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डों पर पहुंच गए हैं। कहीं कोई तनाव नजर नहीं आता था। किसी को भी कहीं पहुंचने की कोई जल्दी नहीं होती थी। स्टेशन भी परिचित ठिकानों की तरह ही नजर आते थे। और फिर हवाई अड्डों पर तो तब कोई खास भीड़ भी नहीं होती थी। इसी सब के चलते बहुतेरे लोगों ने आखिरी वक्त पर ट्रेनें और हवाई जहाज पकडऩे की आदतों के साथ रिश्ते कायम कर लिए थे। पर पता ही नहीं चल पाया और पलकें झपकते ही सब कुछ अचानक बदलने लगा। न तो रेलवे स्टेशन और न ही हवाई अड्डे ही पहले जैसे रहे और न ही यात्रा करने वाले चेहरे। किसी समय चहलकदमी करते ट्रेनोंं पर सवार होने वाले या हर एक स्टेशन पर उतरकर डिब्बों में अपने परिचितों को ढूंढऩे वाले लोगों की जगह थकी-मांदी और बेसब्र भीड़ ने ले ली है। एक-दूसरे को धक्के मारते हुए कैसे आगे बढ़ा जाए हर तरह की यात्रा का मूल मंत्र हो गया है। हर एक ट्रेन अपनी सुरक्षा के प्रति आशंकित विस्थापितों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोकर ले जाती हुई मशीन जैसी नजर आने लगी है। हर एक यात्री रात के सफर में बार-बार चौंककर उठने लगा है कि या तो उसका सामान चोरी हो चुका है या फिर उसका स्टेशन पीछे निकल गया है और वह उतर नहीं पाया। अब पूरे डिब्बे में कोई परिचित या तो मिलता ही नहीं। मिलता भी है तो या तो कुछ याद करता हुआ या फिर अपनी सीट के लिए परेशान नजर आता है। कई बार तो इस तरह का भ्रम भी होने लगता है कि हमारे बहुत सारे परिचित लोगों ने यात्राएं करना ही बंद कर दिया है। जैसे कि कहीं जाने के लिए या वापस लौटने के लिए सारी जगहें गुम हो चुकी हों। ऐसा भी नहीं कि रेलगाडिय़ों की थकान से घबराए हुए परिचितों ने तय कर लिया हो कि वे अब हवाई यात्राएं ही करेंगे। हवाई अड्डे भी थके-मांदे और परेशान लोगों की भीड़ के ‘अड्डों’ में तब्दील होते जा रहे हैं। परिचित चेहरों और मुस्कुराहटों की जगह या तो सस्ती दरों वाली हवाई सेवाओं द्वारा तैयार किए गए नए उपभोक्ता वर्ग ने ले ली है या फिर एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में लेप-टॉप संभाले हुए टाई छाप कार्पोरेट कल्चर ने। पहले लोग कम होते थे और खिलखिलाहटें और आवाजें ज्यादा पर अब केवल भीड़ होती है जो बसंत के मौसम में भी सन्नाटा ओढ़े रहती है। बोर्डिंग पास लेनेके लिए लगने वाली कतारें देखते ही देखते सुरक्षा जांच के तनाव और फिर ‘विमान में सबसे पहले कैैसे चढक़र अपना सामान जमा लें’ की आपाधापी में परिवर्तित हो जाती हैं। ट्रेनों में भी मोबाइल और लैपटॉप के चार्ज करने के पाइंट्स की तलाश की जाती है और हवाई अड्डों पर भी। एक-दूसरे को आत्मीयता और अपनेपन से चार्ज करने के आनंदवन तनावों और अवसादों के रेगिस्तानों में बदल गए हैं। एक वक्त था जब बीमारों के ईलाज के लिए महानगरों में ले जाने के लिए हवाई जहाजों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती थी, अब ऐसा लगता है कि बीमारों से भरे जहाजों को ईलाज के लिए कहीं ले जाया जा रहा है। तने हुए चेहरों के छोटे-छोटे कई गांव जैसे आकाश में एक साथ प्रतियोगिता करते हुए उड़ रहे हों। एक-दूसरे से आगे निकलने की प्रतियोगिता। ऐसा कुछ प्राप्त करने की प्रतियोगिता जिसे व्यक्त नहीं किया जा सके। पहले रेलगाडिय़ों के विलंब से आने-जाने को लेकर भी ज्यादा खीझ नहीं होती थी अब हवाई जहाजों के विलंब से उडऩे या किसी उड़ान के रद्द हो जाने की पीड़ा भी बर्दाश्त से बाहर हो चली है। इंसानी संवेदनाएं रेलगाडिय़ों के अप-डाउन नम्बरों और उड़ानों की संख्या में बदल गई हैं। अब इस तरह की कोई सूचना नहीं मिलती कि कितने लोग मुस्कुराते हुए अपने घरों को सकुशल पहुंच गए। अब बताया यह जाता है कि सितंबर में छप्पन हजार से अधिक यात्रियों को उड़ानों के निरस्त हो जाने या उड़ानों में विलंब से परेशानी हुई। प्रगति की नई परिभाषा ने हर एक चीज को आंकड़ों में बदल दिया है। शहरों की कुल आबादी के मुकाबले मोबाइल सेटों की संख्या ज्यादा हो रही है पर लोगों ने सीधे-मुंह एक दूसरे से बात करना या तो बंद कर दिया है या कम कर दिया है। एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि इंफार्मेशन टेक्नालॉजी के क्षेत्र में भारत में कार्यरत दस में से नौ लोग अपनी व्यावसायिक उत्पादकता के लिए ऑफिस जाना जरूरी नहीं समझते। जिस कार्पोरेट इन्फार्मेशन की उन्हेें अपने काम के सिलसिले में जरूरत पड़ती है उसे वे आफिसों के बाहर भी प्राप्त कर सकते हैं। यानी कि देश आधुनिक टेक्नालॉजी के एक ऐसे संसार में प्रवेश कर रहा है जो न सिर्फ ‘वायरलेस’ है ‘कान्टेक्टलेस’ भी है। मीडिया में काम करने वाले लोगों को एक ही वस्तु के दो अलग-अलग समाजों में विज्ञापनी प्रस्तुतीकरण के बारे में ज्ञान दिया जाता है। उन्हें समझाया जाता है कि पित्जा की डिलीवरी देने वाला ब्वाय जब यूरोप के किसी मकान में दरवाजे पर दस्तक देता है तो अंदर कामचलाऊ रोशनी के बीच जमीन पर पैर लम्बे किए और लेपटॉप पर काम करता हुआ एक अकेला इंसान होता है। उसी पित्जा कंपनी के डिलीवरी ब्वॉय को भारतीय विज्ञापन में एक ऐसे मकान पर दस्तक देते हुए बताया जाता है जहां पूरा परिवार एक साथ बैठा हुआ टीवी देख रहा है या गप्पे हांक रहा है। पर यह दृश्य भारत में भी शायद लम्बे समय तक नहीं चले। तरक्की की समूची बहस ही जब ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ पर केंद्रित होती जा रही हो और असली फैमिली तो धीरे-धीरे आदिवासी स्वरूप को ही प्राप्त करने वाली है। एक ऐसा भारतीय समाज जो अकेलेपन से हमेशा घबराता और डरता रहा है अब एक ऐसी व्यवस्था को आत्मसात कर रहा है जो अपार भीड़ के बीच भी उसे पूरी तरह से शून्यता का बोध कराने वाली है। और यह सब किसी यौगिक क्रिया या तंत्र-साधना के तहत नहीं हो रहा है। जान-बूझकर किए जाने वाला सामूहिक प्रयास है। जैसे-जैसे भीड़ बढ़ेगी, रेलवे स्टेशनों पर मल्टी-लेयर प्लेटफाम्र्स बनेंगे, रेलगाडिय़ों की संख्या बढ़ेगी, हवाई अड्डे लगातार आधुनिक और विस्तारित होते जाएंगे। एक-एक शहर में कई-कई हवाई अड्डे होंगे। और तब विमानों की भीड़ एक दूसरे के आगे-पीछे वैसे ही दौड़ती नजर आएंगी जैसे अभी आकाश में चिडिय़ाओं के झुंड दिखाई देते हैं। तब चिडिय़ाएं उडऩे के लिए कहां जाएंगी? वे तो इंसानों की तरह घोसलों में कैद रहने की आदत नहीं डाल पाएंगी। मुमकिन है प्रगति के जिस सुख की आधुनिक भारत को तलाश है उसके लिए यह कोई बड़ी कीमत न भी हो।