भाजपा बोले तो नरेंद्र मोदी!

गोवा में नरेंद्र मोदी जीत गए। उन्होंने साबित कर दिया कि वे ही अब भारतीय जनता पार्टी और उसका असली चेहरा हैं। पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं ने ‘नरेंद्र भाई के इस दावे पर अपनी मुहर भी लगा दी। जो विरोध में थे ‘समय लिखेगा उनका भी इतिहास की तर्ज पर चुप बैठे रहे। पार्टी पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की तीन-दिनी बैठक के बाद राजनाथ सिंह ने औपचारिक रूप से घोषणा कर दी कि नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी की अभियान समिति के अध्यक्ष होंगे। धीर-गंभीर मुद्रा में जब राजनाथ सिंह संक्षिप्त-सी घोषणा को अंजाम दे रहे थे, साफ नजर आ रहा था कि वे कितने दबाव में रहे होंगे। उनके आसपास बैठे अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू के चेहरे तने हुए थे। साथ में बैठा केवल एक चेहरा जो मंद-मंद मुस्करा रहा था, वह गोवा के मुख्यमंत्री पार्रिकर का था जिसने कि नरेंद्र मोदी के लिए पणजी में पूरी बिसात जमाई थी। पार्रिकर ने मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी का समर्थन करते हुए लालकृष्ण आडवाणी को सेवानिवृत्ति लेने की सलाह बैठक के पहले ही दिन दे डाली थी। मेजबान मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद ही आडवाणीजी ने पणजी में पैर न रखने का फैसला भी लिया होगा। राजनाथ सिंह की घोषणा ने पुष्टि कर दी है कि आडवाणी अगर भाजपा को अपना मार्गदर्शन देने के लिए अब उपलब्ध नहीं हैं तो 85-वर्षीय नेता की भावनाओं का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए। 75-वर्षीय जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती आदि अब अपने लिए किस भूमिका की तलाश करते हैं, भाजपा का आने वाला समय ही निर्धारित करेगा। जो तय है वह यह कि भाजपा की फिल्म पूर्व-निर्धारित स्क्रिप्ट के मुताबिक ही नागपुर के निर्देशन में पूरी हो रही है। किसी समय कांग्रेस में हुए ‘सिंडीकेट-इंडीकेट” की तर्ज पर भाजपा भी अंदर से दो फाड़ हो रही है। अब प्रतीक्षा ही की जा सकती है कि मतभेदों के गंदे अंतर्वस्त्र सार्वजनिक नलों पर धोकर सड़कों पर रस्सियां तानकर सुखाए जाते हैं या नहीं। क्योंकि गुजरात के मुख्यमंत्री ने पार्टी के अंदर अभी तो अपनी पहली जंग जीती है। उनके विरोधी जानते हैं कि नरेंद्र मोदी का अगला निशाना प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित करवाना रहेगा जो कि चार राज्यों के चुनावों के बाद और भी आसान हो जाएगा। बहुत मुमकिन है दिल्ली में लालकृष्ण आडवाणी से आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद नरेंद्र मोदी दूसरा बड़ा काम अपने कट्टर समर्थक येदियुरप्पा को अपना आशीर्वाद देने का करें। येदियुरप्पा, आडवाणी और सुषमा दोनों के घोर विरोधी हैं। नरेंद्र मोदी अभी भाजपा की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष बने हैं, एनडीए के नहीं। एनडीए के घटक दलों में अभी केवल अकाली दल ने ही उनकी नई नियुक्ति का स्वागत किया है। मतलब साफ है कि भाजपा ने अपने आप को एनडीए के भविष्य की चिंता से मुक्त कर लिया है। पार्टी अब संघ के पूर्व पूर्णकालिक प्रचारक मोदी के नेतृत्व में कट्टर हिन्दुत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़कर अकेले ही सरकार बनाने का दम भरना चाहती है। यानी कि वर्ष 2014 के चुनावों का ध्रुवीकरण अब ज्यादा स्पष्ट हो गया है। एक तरफ कट्टर हिन्दुत्व की विचारधारा को हथियार बनाकर देश के विकास की बात की जाएगी और दूसरी तरफ कथित धर्मनिरपेक्षता को औजार बनाकर मोदी विरोधी तमाम दलों को एक छाते के नीचे लाया जाएगा। आकाश की ऊंचाई को अंगुलियों से नापने की अपनी महत्वाकांक्षा को मोदी किस तरह से अंजाम दे पाते हैं यह अगले एक साल में ही साबित हो जाएगा। भाजपा के लिए जो निश्चित हो गया है, वह यह कि पार्टी ने अब अपना भविष्य मोदी के हवाले कर दिया है। राजनाथ सिंह ने अपने एक फैसले से 9 जून 2013, रविवार के दिन को देश के सबसे बड़े विपक्षी दल और देश में विपक्ष के भविष्य के लिए जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है।