भाजपा के भीतर की ‘परिवर्तन यात्रा’

लालकृष्ण आडवाणी की उम्मीदवारी को लेकर उत्पन्न हुआ संकट भारतीय जनता पार्टी के किसी नए विवाद में उलझने तक के लिए टल गया माना जाना चाहिए था, पर वैसा नहीं हुआ। वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने नया विवाद शुरू कर भी दिया है। राजनाथ सिंह की चेन्नई यात्रा के दौरान की गई इस घोषणा के बाद कि आडवाणीजी गांधीनगर या भोपाल कहीं से भी लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं। पितृपुरुष ने फैसला गांधीनगर के पक्ष में सुनाया, जो कि उनकी संघ के नेताओं से हो चुकी बैठक के परिप्रेक्ष्य में अपेक्षित भी था। राजनाथ सिंह चाहते तो जो दरियादिली उन्होंने चेन्नई पहुंचकर दिखाई, वह वे आडवाणी की उम्मीदवारी के पत्तों को सार्वजनिक करने के पहले नई दिल्ली में ही दिखा सकते थे। इससे पार्टी चुनाव-पूर्व की शर्मिंदगी से कुछ वक्त के लिए तो बच जाती। पर चीजें राजनाथ सिंह के हाथों में नहीं थीं। गांधीनगर सीट को लेकर आडवाणी ने अपनी नाराजगी व्यक्त कर पार्टी की सांसों को चाहे चौबीस घंटों तक सफलतापूर्वक रोके रखा हो पर अंत में उन्हें वही करना पड़ा, जो मोदी उनसे चाहते थे।

ह मान लेना उचित नहीं होगा कि भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा संकट के मूल में केवल गांधीनगर और बाड़मेर की सीटों को लेकर उपजी नाराजगी ही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रिय उपस्थिति में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि सत्ता की भूख में अपनी पूर्व प्रतिबद्धताओं को धता बताकर लोग मधुमक्खियों की तरह दोपहर को भाजपा में शामिल हुए हों और रात तक उन्हें पार्टी का टिकट भी बंट गया हो। नई भाजपा (जिसे कि जसवंत सिंह ‘नकली’ बता रहे हैं) का असली संकट यह है कि अटलबिहारी वाजपेयी जैसे भीष्म पितामही व्यक्तित्व की चुनावी परिदृश्य से गैर-मौजूदगी में उसे आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह जैसे अनुभवी नेताओं की दरकार तो है, पर उतनी भी नहीं जितनी कि ये बुजुर्ग नेता अपनी ओर से ‘नए नेतृत्व’ पर आरोपित करना चाहते हैं। अत: अगर आभास ऐसा जा रहा हो तो कुछ गलत नहीं कि पार्टी को केवल अपने फैसलों पर विश्वसनीयता की मोहर लगवाने भर के लिए घरेलू किस्म के कुछ दादाजी टाइप व्यक्तित्वों की जरूरत है, जिसे पूरी करने से आडवाणी आदि इनकार कर रहे हैं।

कीकत यह है कि भारतीय जनता पार्टी की आत्मा अब अपना पुराना चोला छोड़कर नए शरीरों को धारण कर रही है। ये ‘शरीर’ पार्टी की स्थापित परंपराओं और संस्कारों से अलग ‘अंतरजातीय’ और अंतरराष्ट्रीय किस्म के माने जा रहे हैं। पार्टी अपने ‘बड़ों’ की परंपरागत पोशाकों से भी मुक्त होकर फैशन डिजाइनरों के कारखानों में प्रवेश कर रही है। कांग्रेस में भी यही सब चल रहा है, पर इतना मुखर कभी नहीं बन पाया जितना भाजपा में दिख रहा है। पुराने से नए की तरफ कांग्रेस पार्टी ने ट्रांजिशन तो कर लिया, पर वह अपने आपको सामंतवादी आचरण और चापलूसी परंपराओं से निजात नहीं दिला पाई। चुनावों के बाद किसी नई कांग्रेस पार्टी के जन्म की केवल उम्मीद भर ही की जा सकती है। पर यहां फिलहाल चर्चा भाजपा की चल रही है।

रेंद्र मोदी का संघर्ष वास्तव में अपनी पार्टी के ‘ओल्ड गार्ड्स’ और ‘ओल्ड थॉट्स’ से है। गुजरात में जब मोदी ने केशुभाई सहित तमाम पुराने लोगों और विहिप आदि संगठनों को हाशिए पर खड़ा करने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हस्तक्षेप से अपने आपको मुक्त कर लिया, तब वैसा शोर कभी नहीं मचा, जैसा कि उनके दिल्ली पहुंचने की संभावनाओं के बीच आज मच रहा है। वर्ष 2014 का चुनावी मुकाबला नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों के बीच कम से कम इस एक बात को लेकर तो साफ है कि दोनों ही गेहूं के साफ दानों को घुन लग गए गेहूं से अलग करके अपना नया किचन जमाना चाहते हैं। पर मोदी यह काम कथित तौर पर अपने चिर-परिचित अंदाज में ही पूरा करना चाहते हैं। वे तमाम दाइयां, जो पार्टी की स्थापना के बाद से सारी प्रसूतियां नागपुर के चिकित्सकों की सलाहों पर अभी तक घरों में ही संपन्न करवाती रही हैं, नरेंद्र मोदी की आधुनिक ‘सर्जरी’ का विरोध कर रही हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है।

मोहन भागवत द्वारा ‘नमो जाप’ को लेकर अपने प्रतिनिधियों को बेंगलुरू में दिया गया प्रवचन तथा गांधीनगर सीट को लेकर मचे घमासान में संघ के जाग्रत हस्तक्षेप के बाद इस दिशा में सोचा जा सकता है कि क्या नागपुर ने मोदी की ‘भाजपा परिवर्तन यात्रा’ को लेकर अपनी पेशबंदी शुरू कर दी है? गुजरात अगर मोदी के लिए विकास का ‘रोल मॉडल’ है और वे उसे प्रधानमंत्री बनने के बाद समूचे देश में लागू करना चाहते हैं तो उसकी अनिवार्य जरूरतों में एक यह भी हो सकती है कि अपनी नई संस्कारित फौज को वे संघ के प्रति प्रतिबद्धताओं से आजाद कर दें। अत: संघ के स्थापित संस्कारों से इतर भाजपा में जो उथल-पुथल इस समय चल रही है, उसे कोई अनायास पैदा हुआ तूफान मानकर नहीं टाला जा सकता। नरेंद्र मोदी ने अपने आपको सफल साबित करने के लिए किसी की भी नाराजगी मोल लेने की क्षमता विकसित कर ली है।

गौर करने योग्य है कि अयोध्या से कारसेवकों को लेकर लौटने वाली जिस ट्रेन पर गोधरा में हमले की प्रतिक्रिया स्वरूप गुजरात में 2002 मचा और जिसके लिए नरेंद्र मोदी को बार-बार कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है, वही मोदी राम जन्मभूमि की यात्रा करने के प्रत्येक आमंत्रण को बहुत ही विनम्रतापूर्वक टाल रहे हैं। अयोध्या उनके एजेंडे में नहीं है। वे सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि देश को आज देवालयों के बजाय शौचालयों की ज्यादा जरूरत है।

रेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के ‘ओरिजिनल नक्शे’ में वर्णित सत्ता की सीमाओं में इतना परिवर्तन कर दिया है कि उनके द्वारा लिए जाने वाले फैसलों को अब जितनी ज्यादा चुनौती दी जाएगी, वे पार्टी के अंदर उतनी ही मजबूती के साथ उभारे जाएंगे। मोदी की सत्ता को पार्टी के भीतर से अब चुनौती नहीं बची है। उन्हें अब अगर कोई चुनौती मिल सकती है तो वह जनता की तरफ से ही होगी, जो कि हाल-फिलहाल उनके ही पक्ष में जाती दिखाई जा रही है। जनता का फैसला चाहे जैसा भी व्यक्त हो, एक बात तय लगती है कि भारतीय जनता पार्टी का ‘चेहरा’ तब तक इतना बदल चुकेगा कि ‘मोदी मार्ग’ पर ही चलते रहना उसकी अनिवार्यता बन जाएगा। वे तमाम लोग जो मोदी के विरोध में आज करवटें बदल रहे हैं, उन्होंने वक्त रहते आंखें खोलकर सच्चाई को भांपने में देर कर दी है।